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    नाटक ‘फ़रेब-ए-हस्ती’: फिक्शन, कॉमेडी और उर्दू शायरी का कोलाज

    By January 5, 2023624 Comments7 Mins Read

    डॉक्टर सादिक़ उर्दू के जाने-माने विद्वान लेखक हैं और उन चंद उर्दूदाँ में हैं जो हिंदी में भी लिखते हैं। उनका नया नाटक आया है ‘फ़रेब-ए-हस्ती’। इस नाटक में कबीर भी हैं और ग़ालिब भी। उसी नाटक की समीक्षा पढ़िए, जिसको लिखा है वी.के. गुप्ता ने। आप भी पढ़िए-

    ==================

    इस बात में दो राय नहीं कि सोशल मीडिया के उभार से हिंदुस्तान में जिस भाषा का सबसे अधिक प्रसार हुआ है, वह निसंदेह उर्दू है। फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर जैसी सोशल मीडिया साइट्स के ज़रिये उर्दू के उन शायरों के शेर भी, जिन्हें उनकी ही भाषा (उर्दू) में दुरुह शायर कहा जाता है, और उनके कहे शेरों को समझने से क़ासिर होकर किसी कहा था,

    मज़ा कहने का जब है इक कहे और दूसरा समझे

     मगर अपना कहा ये  आप समझें या ख़ुदा समझे

    आम-ओ-फहम में भी लोकप्रिय बना दिया है। यहां ख़ुशी की बात यह है कि उर्दू भाषा और उसके साहित्य का प्रसार केवल सोशल मीडिया साइट्स तक ही सीमित नहीं है। उर्दू के लेखकों और शायरों पर अब हिंदी में भी ऑथेंटिक और रिसर्च बेस्ड किताबें लिखी जा रही हैं। इन किताबों में जीवनी, संस्मरण, शायरी और नाटक शामिल है। इसी कड़ी में हाल ही में उर्दू-हिंदी के मशहूर लेखक, शायर, ग़ज़लकार और चित्रकार डॉ. सादिक़ का ड्रामा ‘नाटक फ़रेब-ए-हस्ती’ आया है।

    डॉ. सादिक़ को ग़ालिब पर विशेषज्ञ का दर्जा हासिल है। वह ग़ालिब पर दो नाटक लिख चुके हैं और उनकी फ़ारसी मसनवी का हिंदी में ‘चिराग़-ए-दैर’ नाम से अनुवाद मुकम्मल कर चुके हैं। ‘चिराग़-ए-दैर’ ग़ालिब की वह मसनवी है, जिसे उन्होंने अपनी ख़ानदानी पेंशन के सिलसिले में दिल्ली से कलकत्ता के सफ़र के दौरान बनारस में अपने ठहराव के वक़्त लिखा था। यह मनसवी ग़ालिब का एक अज़ीम शाहकार है। जो डॉ. सादिक़ के अनुवाद से पहले हिंदी में तो क्या उर्दू में भी मयस्सर नहीं था। मगर अब डॉ. सादिक़ के हिंदी अनुवाद पर आधारित इस मनसवी के अंग्रेजी और मराठी अनुवाद भी प्रकाशित हो चुके हैं।

    ‘चिराग़-ए-दैर’ के बाद डॉ. सादिक़ ने ग़ालिब की ज़िंदगी पर ‘इस शक़्ल से गुज़री ग़ालिब’ नाटक लिखा। इस नाटक में ग़ालिब की ज़िंदगी के उस अर्से को ड्रामाटाइज़ किया गया है, जब ग़ालिब अपनी ख़ानदानी पेंशन के सिलसिले में दिल्ली से कलकत्ता तक जाते हैं। एक तरह से देखा जाए तो लेखक ने इस नाटक में ग़ालिब की ज़िंदगी के सबसे मुश्किल दौर को बयान किया है। इसीलिए इस नाटक को ‘त्रासदी’ कहा गया है। वहीं प्रस्तुत नाटक कॉमेडी है। मगर यह नाटक कॉमेडी भर नहीं है, बल्कि इसका हर दृश्य क्लाइमेक्स है, इस हर पात्र एंटीक है और हर घटना मीनिंगफुल है।

    ‘नाटक फ़रेब-ए-हस्ती’ में लेखक ने 19वीं सदी के मशहूर और दुरूह कहे जाने वाले शायर मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ां ग़ालिब को मौजूदा सदी में दिखाया है। 19वीं सदी का शायर जब 21वीं सदी की दिल्ली की सड़कों पर चहल-कदमी करता है तो मानो हर चीज़ उससे कॉमेडी करती नज़र आती हैं। मगर बात कॉमेडी तक ही सीमित रहती तो कोई बात नहीं थी, कहानी में दिलचस्प मोड़ तब आता है, जब खुफ़िया पुलिस के अधिकारी ग़ालिब को पड़ोसी देश का जासूस समझकर उनकी गतिविधियों को नोट करने लगते हैं।

    हालांकि, नाटक की शुरुआत रिटायर्ड अधिकारी विष्णु प्रसाद द्वारा एक मंसूब के तहत होती है। विष्णु प्रसाद कबीर पर किताब लिखना चाहता है। इसके लिए वह कबीर की आत्मा को बुलाकर उनका साक्षात्कार करना चाहता है। कबीर की आत्मा को बुलाने के लिए वह प्राचीन साधु-संतों की तांत्रिक विद्या को मॉर्डन टेक्निक डिवाइस ‘प्लांचेट’ में शामिल कर लेता है। इस मंसूबे में वह अपने बेटे और उसकी गर्लफ्रेंड छाया माथुर, जो इस नाटक का प्रमुख क़िरदार भी है, दोनों की मदद लेता है।

    मगर विष्णु प्रसाद प्लांचेट द्वारा जहां कबीर की आत्मा को बुलाना चाहता है, वहीं छाया माथुर ग़ालिब की दीवानी है। अंग्रेजी की प्रोफेसर होने के बावजूद उसे ग़ालिब के सैंकड़ों अशआर मुंहज़बानी याद है। वह चाहती है कि कबीर की तरह ग़ालिब की आत्मा को भी बुलाया जाए। अपनी इस इच्छा का ज़िक्र वह विष्णु प्रसाद से भी करती है, मगर विष्णु उसे मना करते हुए कहता है,

    “लेकिन अभी नहीं. अभी तो केवल एक ही नाम याद रखो- कबीर, कबीर… सिर्फ़ कबीर. हां, एक बात और समझ लो… ये विधि ऐसा दरवाज़ा है, जिसे हम खोल तो सकते हैं लेकिन बंद करना हमारे वश में नहीं.”

    कहा जाता है कि जो इंसान के दिल में होता है वही उसकी ज़बान पर भी आ जाता है। छाया भी ऐन मौक़े पर कबीर की बजाय ग़ालिब का नाम पुकारने लगती है। छाया के नाम पुकारते ही ग़ालिब किसी स्वर्गीय देवदूत की तरह उसके सामने हाज़िर हो जाते हैं।

    यहां से कहानी एकदम नए परिदृश्य में पहुंचती है। छाया ग़ालिब को होटल से निकालकर अपने दोस्त माज़िद मीर के पास यूनिवर्सिटी ले जाती है। कश्मीर नौजवान माज़िद मीर नाटक का दूसरा अहम किरदार है। यूनिवर्सिटी में ग़ालिब की शायरी पर रिसर्च कर रहा है। हॉस्टल के अपने उस छोटे-से कमरे में ग़ालिब को बैठे देखकर उसे हैरानी भरी बेयकीनी होती है। अपनी इसी हैरानी भरी बेयकीनी में वह छाया से कहता भी है,

    “छाया तुमने जो कुछ कहा, वो सुनने के बाद भी मुझे यक़ीन नहीं आ रहा है.”

    इस पर छाया कहती है,

    “कमाल करते हो माजिद. अरे यार मिर्ज़ा ग़ालिब तुम्हारे सामने बैठे हैं और तुम कह रहे हो की यक़ीन नहीं आ रहा है!”

    यहीं हमें माजिद मीर और छाया में ग़ालिब की शायरी से उनकी जुनूनी मौहब्बत का पता चलता है, जब माजिद कहता है,

    “तुम्हारी बातें सुनने और अपनी आंखों से देखने के बावजूद मेरा ज़हन यही कह रहा है कि, 

                              हैं ख़्वाब में हनोज़ जो जागे हैं ख़्वाब में”

         अब ग़ालिब माज़िद मीर के साथ ही हॉस्टल में रहना शुरू कर देते हैं। माज़िद मीर ग़ालिब को अपने दिल्ली घुमाने ले जाता है। वह उन्हें पहले पाकिस्तान एबेंसी, फिर निजामुद्दीन और ग़ालिब एकेडमी दिखाने ले जाता है। एकेडमी देखने के साथ ही ग़ालिब अपनी मज़ार पर भी जाते हैं, जहां कभी उनका खानदानी कब्रिस्तान हुआ करती था, और जिसमें उन्होंने अपने सात शीरख़्वार बच्चों को ख़ुद दफ़न किया था। अपने ज़िंदगी के उस दर्दनाक पहलू को याद करते हुए ग़ालिब कहते हैं,

    “ख़ैर, अब तो सब कुछ ख़त्म हो गया. न दिल रहा, न दर्द-ओ-ग़म, न ज़माना रहा, न उसके ज़ुल्म-ओ-सितम.”

    इसके बाद माजिद मीर ग़ालिब साहब को कॉफी हाउस ले जाता है, जहां वह अपने दोस्तों से ग़ालिब का परिचय अपने ‘मोहतर बुजुर्ग’ के रूप में कराता है।

    अगले दृश्य में माजिद और छाया ग़ालिब को ड्रामा दिखाने मंडी हाउस लाते है, जहां उनकी मुलाकात ‘कॉमरेड हिटलर’ से होती है।

    इस मुलाकात के दौरान ही ख़ुफ़िया पुलिस के कर्मी ग़ालिब को देख लेते हैं, और यहीं से नाटक अपने सबसे दिलचस्प मोड़ में प्रवेश कर जाता है।

    छाया और माजिद मीर ग़ालिब को एक बार फिर मंडी हाउस पर हो रहे इवेंट में ले जाते हैं। इस इवेंट की थीम होती है- ग़ालिब की शायरी ने भारतीय ललित कलाओं को किस तरह प्रभावित किया। मगर ग़ालिब की शायरी और भिन्न ललित कलाओं के विशेषज्ञों की बातचीत के दौरान ही श्रोताओं में बैठे कुछ लोग ग़ालिब को पहचान लेते हैं। वे ग़ालिब के नाम की सदाएं बुलंद करते हैं। वहीं कुछ लोग उन्हें बहुरुपिये समझते हैं।

    इस इवेंट में कुछ मीडिया वाले भी होते हैं, जो ग़ालिब को वहां से निकालकर अपने टीवी चैनल के दफ्तर ले जाते हैं।

         टीवी पर शो के दौरान एंकर्स ग़ालिब से न केवल ग़ालिब की ज़िंदगी बल्कि तत्कालीन समय, समाज और पहली जंग-ए-आज़ादी (1857) में उनके लेखन की भूमिका और क्रांतिकारियों की कारगुज़ारियों पर भी सवाल करते हैं, जिनका ग़ालिब अपनी उसी हाजिर-जवाबी और चुटीले अंदाज में जवाब देते हैं, जिनके लिए वह ताउम्र मशहूर और बदनाम रहे।

         शो के बाद जैसे ही ग़ालिब चैनल के दफ्तर से निकलते हैं, तभी ख़ुफ़िया पुलिस उन्हें गिरफ़्तार कर लेती है। हवालात में बंद ग़ालिब से ख़ुफ़िया पुलिस का अफ़सर जब वही सवाल पूछता है, जिसका जवाब हममें से हर कोई जानना चाहता है, और यह सवाल भी केवल ख़ुफ़िया पुलिस अफ़सर का ही नहीं है, बल्कि यह हर उस शख़्स का सवाल है, जो जानना चाहता है एक लेखक क्यों लिखता है, किसके लिए लिखता है, और वह है कौन?

    ख़ुफ़िया पुलिस अफ़सर के इस सवाल का ग़ालिब जो जवाब देते है, वह वाक़ई लाजवाब कर देने वाला जवाब है, जिसे हर लिखने-पढ़ने वाले को जानना चाहिए।

    तो अगर भी ग़ालिब के इस जवाब को जानने चाहते हैं तो यह दिलचस्प नाटक- ‘नाटक फ़रेब-ए-हस्ती’।

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