Close Menu
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
    Subscribe
    • कविताएं
    • संपर्क
    • Vote for 2017 Best Seller
    • Best Seller 2018
    • सहयोग/ समर्थन
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    हान नदी के देश में: विजया सती

    By February 2, 20238 Comments11 Mins Read


    डॉक्टर विजया सती अपने अध्यापकीय जीवन के संस्मरण लिख रही हैं। आज उसकी सातवीं किस्त पढ़िए-
    ======================

    जैसे विदेशी पर्यटक भारत आने पर नमस्ते, धन्यवाद बोल लेते हैं, उसी तरह हमने भी विदेशी भाषा के कुछ शब्द सीखे. हंगरी में कोसोनोम – धन्यवाद के साथ अंत में प्रमुख हुआ विसोंत्लातास्रा, संक्षेप में विस्लात यानी विदा ! बुदापैश्त पहुँचने की घनी सर्दी के बाद आया भारत की घनघोर गर्मी में लौटने का समय. जून महीने के आरंभिक दिन पीटर और मारिया जी हंगरी के लित्ज़ फेरेंस हवाई अड्डे तक विस्लात कहने आए.
    और हमने खूबसूरत पर्यटन नगरी बुदापैश्त से विदा ली !

    भारत पहुँचने के कुछ महीने बाद ..हिन्दी की बदौलत एक और अवसर मेरे सम्मुख खुला.
    नवम्बर 2014 में दक्षिण कोरिया की राजधानी सिओल की प्रसिद्ध हान्कुक/ हंगुक यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ॉरन स्टडीज़ में हिन्दी पढ़ाने का निमंत्रण मिला. कॉलेज की ओर से पहले तो मनाही हो गई – अभी तो आप लौटी हैं, इतनी जल्दी छुट्टी कैसे?
    किन्तु कॉलेज गवर्निंग बॉडी के चेयरमैन पुंज साहब को दूर देश में अपनी भाषा पढ़ाने जाने का विचार बहुत ही बढ़िया लगा, उन्होंने सहर्ष स्वीकृति दे दी.
    इस तरह हमारा कोरिया यात्रा का प्रसंग आगे बढ़ा. हमारा इसलिए कि इस बार डॉ सती साथ थे.
    पक्की सर्दी के दिन थे.. फरवरी अंत में हम साढ़े सात – आठ घंटे की उड़ान के बाद इंचन हवाई अड्डे पर जब उतरे तो हमारे नाम का कार्ड उठाए भारत अध्ययन विभाग के छात्र मिले. वे हमें सीधा विश्वविद्यालय परिसर ले आए, यहीं प्रोफेसर्स रेज़ीडेंस में सातवीं मंजिल पर हमारा नया ठिकाना बना.
    हमारे पहुंचते ही तत्कालीन विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर हावन कू स्वागत शब्दों के साथ मुस्कुराती हुई आई और शाम का कार्यक्रम सुनिश्चित कर चली गई.
    बर्फीली हवाओं के बीच गंगा रेस्तरां में शाम का कार्यक्रम था – नए प्रोफ़ेसर का स्वागत और पुराने प्रोफ़ेसर की विदाई !
    प्रोफ़ेसर रमेश शर्मा दिल्ली विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष, यहाँ दो वर्ष से पढ़ा रहे थे. उनसे पहली मुलाक़ात भारत में न हो कर यहीं हुई. यहीं विभाग के सभी वरिष्ठ सहयोगियों से भेंट हुई, सरल होने कारण प्रोफ़ेसर किम, प्रोफ़ेसर ली जैसे नाम तुरंत याद हो गए.
    बहुत सौहार्दपूर्ण वातावरण में रात का भारतीय भोजन संपन्न हुआ – समोसा और चाय को भी होना ही था !

    राजधानी सिओल के अतिरिक्त शहर से दूर ग्लोबल कैम्पस, योंगिन में भी हिन्दी पढ़ाई जा रही थी. मुझे वहां आरंभिक हिन्दी की कक्षाएं दी गई, सप्ताह में एक दिन. सिओल परिसर से शटल बस हमें दूसरे कैम्पस ले जाने और लाने को तैनात थी.

    अब हम हान नदी के देश में थे… यहीं आकर जाना कि कोरियाई भाषा में देश का नाम हंगुक है और कोरियाई भाषा की लिपि हंगुल ! स्वर और व्यंजनों के योग से बनी इस भाषा की वर्णमाला को अन्वेषित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोकप्रिय राजा सेजोंग के जन्मदिन को ही यहां अध्यापक दिवस के रूप में मनाया जाता है.
    धीरे-धीरे समझा कि यहां उच्चारण में क को ग और ग को क कहने में कोई हर्ज नहीं होता – जैसे देश का नाम हंगुक भी और हंकुक भी ! इसी तरह र और ल भी आपस में ऐसे मिल जाते हैं कि आप दूर नहीं दूल जा सकते हैं !
    कोरियाई जीवन आधुनिकता और परम्परा के मेल से बना है. शहरी सभ्यता ने फ़्लैट में जिन्दगी कैद की है तो परम्परागत घर भी यथावत संवरे हुए हैं, इन्हें हानोक कहते हैं. ठन्डे देशों में ‘हीटिंग’ यानी कमरा गर्म रखना जरूरी होता है. कोरिया में इसे ओंदोल कहते हैं, जो यूरोपीय और अन्य पश्चिमी देशों से भिन्न है – यह दीवारों को नहीं, फर्श को गर्म रखने की प्रक्रिया है. कारण यह है कि कोरिया में फर्श पर सोना और फर्श पर बैठ कर भोजन करना अब भी परम्परागत तरीका है.
    कोरिया की पारंपरिक पोशाक हानबोक कहलाती है. अब यह विशेष अवसरों पर ही पहनी जाती है.
    बच्चे का पहला जन्मदिन दोल है, परिवार में साठवां जन्मदिन धूमधाम से मनाया जाता है.
    मुख्य भोजन चावल, हरी सब्जियां, अंकुरित अनाज, सूप और मांस है. कोरियाई भोजन किम्छी के बिना अधूरा है. किम्छी बंदगोभी और मूली का मसालेदार व्यंजन है जो सर्दी के लम्बे मौसम से पहले बना कर बड़े-बड़े बर्तनों में संभाल दिया जाता है. यह प्रत्येक भोजन में, एक तरह से ‘साइड डिश’ की तरह है जिसे ‘बानछान’ कहते हैं.
    किम्छी ऐसी घुली-मिली है कोरिया के जीवन में कि उसके बिना फोटो सेशन भी अधूरा रहता है यानी जब फोटो खींचते हैं तो मुस्कुराने के लिए ‘Say cheese’ के बदले Say किम्छीss कह कर मुस्कुराने को कहा जाता है !
    सभी त्यौहारों में चावल से बने ‘राईस केक’ की वैरायटी ख़ास भेंट रहती है, चावल की शराब भी प्रिय है यहाँ जिसका नाम है माकोली !
    आधुनिक बाजारों की चकाचौंध के बावजूद परम्परागत कोरियाई बाजारों की रौनक बरकरार है.

    हान नदी का किनारा
    कोरिया गणराज्य की राजधानी सिओल चारों ओर छोटे पर्वतों से घिरी है, बीच में हान नदी बहती है. हान नदी के किनारे प्रकृति के साथ तकनीकी विकास का अनूठा संगम देखने को मिला.
    नदी के हर कोने से सिर ताने खड़ी ऊंची इमारतें दिखाई दीं, दूर-दूर जहां तक नज़र जाती – बहुमंजिली इमारतों का जाल बिछा दिखता, जिनमें रिहायश, दफ्तर और होटल हैं.
    ख़ास यह है कि प्रकृति के बीच आना, उसके साथ घुल-मिल जाना यहाँ के निवासी भूले नहीं हैं.
    धुपहला दिन जैसे जीवन का बड़ा उल्लास हो – बच्चे-बूढ़ों सहित परिवार मौज के लिए बाहर निकल आते हैं. भारी जनसमूह हान नदी के किनारे उमड़ पड़ता है – हरी-भरी घास का सुख लेने को.
    छुट्टी का दिन नदी किनारे की सड़कों पर साइकिल चलाने का दिन है, छोटे-छोटे पहाड़ों पर चढ़ने का दिन हैं, बच्चों और युवाओं के लिए ही नहीं, बल्कि अधिकतर उम्रदराज़ लोगों के लिए भी !
    शहर में प्रकृति को बचाए रखने की कोशिश हर जगह दिखाई दी – यदि पहाड़ के ऊपर घर बसे हैं तो सड़क उनके नीचे सुरंग से होकर जा रही है. पेड़ों को काटे बिना पुल बनाए गए हैं. पत्थरों के बीच हरियाली समेटी गई है और फूल खिलाए गए हैं.
    देश के सुप्रसिद्ध विश्वविद्यालय के दोनों परिसर तकनीक के चरम विकास के साथ-साथ प्रकृति के नैसर्गिक सौन्दर्य को अपने में समेटे हुए खड़े हैं.. विश्वविद्यालय सही मायने में मुक्त हैं – कोई चारदीवारी नहीं है, कोई बंद द्वार नहीं !
    भारत और कोरिया दोनों देशों का स्वाधीनता दिवस एक ही तिथि को है और पराधीनता से मुक्ति के बाद दोनों ही देशों का विभाजन भी हुआ.
    भारत के साथ अपने सांस्कृतिक सम्बन्ध को यह देश इस रूप में याद करता है कि किसी समय अयोध्या की एक राजकुमारी का विवाह कोरिया के राजकुमार के साथ हुआ. भारत में भी इस तथ्य को स्वीकृति मिली और दोनों देशों ने पारस्परिक सहमति से राजकुमारी की स्मृति में एक स्मारक अयोध्या प्रशासन के सहयोग से मार्च 2001 में निर्मित किया.
    हान नदी के आस-पास हमें छोटी छोटी खुशियों से भर देने वाली एक खूबसूरत दुनिया मिली – सुन्दर पहाड़ जिन्हें सान कहा जाता है, संगीतमय नाम हैं उनके – सोरोक्सान, तैबैक्सान, नाम्सान, दोबांग्सान. ये पर्वत श्रृंखलाएं भी हैं और विकसित राष्ट्रीय उद्यान भी !
    यहां मौन को मुखरित करते बौद्ध मंदिर हैं, जिन्हें ‘सा’ पुकारते हैं – मेगोक्सा, जोग्येसा, बुल्गुक्सा..
    चेरी ब्लॉसम यहां वसंत के आरंभ का अनूठा उत्सव है. शून्य से नीचे पहुंचते तापमान की ठंडी हवाएं विदा हुई, पंक्तिबद्ध पेड़ हलके पीले और सफेद चेरी के फूलों से लद गए, इनके बीच टहलना और शहर को इसके सुन्दरतम रूप में देखना, बढ़िया भोजन और परम्परागत सांस्कृतिक आयोजन का आनंद लेना कोरियावासियों को भाता है !
    हान नदी के देश में, हमारे लिए हिम उत्सव एक और उल्लास का अवसर ले आया. जब सब ओर बर्फ का साम्राज्य है तब भी घर में कैद क्यों रहें ? आप बर्फ पर साइकिल चलाएं, स्लेज में फिसलते चले जाएं और बर्फीली नदी की ऊपरी सतह को भेद कर मछलियाँ भी पकड़ें !

    कोरिया में चन्द्र नव वर्ष और छूसक परम्परागत उत्सव हैं, चन्द्र कैलेण्डर की पहली तिथि को मनाया जाता है चन्द्र नव वर्ष – Lunar New Year. और छूसक ? कुछ लोग मानते हैं कि अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की तरह छूसक कृतज्ञता ज्ञापन Thanks giving का उत्सव है. लेकिन कुछ कहते हैं कि छूसक तो नई फ़सल के आगमन का शुभ अवसर है.
    दोनों ही त्यौहारों में उपहारों की खरीदारी का अंतहीन सिलसिला जारी रहता है. मन में घना उत्साह लिए, उपहारों से लदे हुए शहरी लोग प्रस्थान करते हैं – अपने गृह नगरों को. लम्बे सार्वजनिक अवकाश में ऑफिस, बाज़ार, शहर सुनसान हो जाते हैं, आखिर छूसक परिवार के पुनर्मिलन का उत्सव हैं !
    हान नदी के आर-पार स्थित बहुसांस्कृतिक केंद्र – मल्टी कल्चरल सेंटर – परदेशियों को निमंत्रित करते हैं – उत्सव के उल्लास में शामिल होने के लिए – नृत्य में, संगीत में, पारंपरिक वेशभूषा को धारण करने में !
    इस समय विशेष पर्यटन स्थलों पर प्रवेश निशुल्क कर दिया जाता है – बस एक छोटी सी शर्त के साथ कि आप पारंपरिक कोरियाई पोशाक पहन कर आएं ! फिर चाहे वह चांदनी रात में राजमहल में प्रवेश ही क्यों न हो !

    राजधानी सिओल को ‘सोल ऑफ़ एशिया’ कह कर विज्ञापित किया जाता है. दिसंबर से फरवरी-मार्च तक यहां कड़क बर्फीली सर्दी होती है, अप्रैल-मई में वसंत का वैभव बिखर जाता है. उमस भरी गर्मी जून अंत से जुलाई-अगस्त तक बनी रहती है.
    सितम्बर अंत से अक्टूबर भर साफ़ नीला आसमान मन को भाता है. नवम्बर आते ही पूरा कोरिया रंग बिरंगे पत्तों से भर जाता है, बाकायदा सूचित किया जाता है कि किन दिनों, किस उद्यान और पर्वत प्रदेश में पहुँच कर आप रंग बदलते पत्तों से भरा यह मनभावन दृश्य देख सकते हैं. यह अंग्रेज़ी का ‘फ़ाल’ है जब मेपल के कटावदार पत्ते अनूठी लाली से भर जाते हैं. बहुरंगी आभा मन को लुभाती है – और फिर जल्दी ही पतझड़ चला आता है … क्या यही जीवन है?

    कोरिया में जीवन बुद्ध और कन्फ्यूशियस की विचारधारा से प्रेरित और प्रभावित है. एक के भले से अधिक महत्व सबके भले का है. परिवार में पिता प्रमुख हैं और वे सबके भले के लिए उत्तरदायी हैं. परिवार के किसी सदस्य की भूल के लिए परिवार के मुखिया की सार्वजनिक क्षमा याचना इसी का दूसरा पहलू है.

    कोरिया में एक लोकप्रिय पर्यटन कार्यक्रम है ‘टेम्पल स्टे’, जिसके तहत कोई भी व्यक्ति कुछ समय के लिए अपने चुने हुए बौद्ध मंदिर में जा कर रह सकता है.
    अधिकतर बौद्ध मंदिर आबादी से दूर शांत स्थानों पर बने हैं, प्राय: पहाड़ों और घने पेड़ों से घिरे.
    किन्हीं ख़ास अवसरों पर ये मंदिर अपने आंगन में आपका निशुल्क स्वागत करने को तत्पर होते हैं. तब आप विशिष्ट बौद्ध मंदिर के अतिथि बनकर वहां की सभी प्रमुख गतिविधियों में हिस्सा ले सकते हैं, जो प्रतिनिधि भिक्षु के साथ आसन, ध्यान, व्यायाम और वन-भ्रमण से लेकर चाय तथा भोजन की पारंपरिक पद्धति को जानने तक फ़ैली रहती है.
    ‘शरण में आए हैं हम तुम्हारी’ ….संभवत: इसी भाव को मन में धरे कोरियावासी बुद्ध का जन्म दिवस ‘लोटस लेंट्रन’ प्रकाशित करके मनाते हैं.

    कोरिया में युवा ज़िंदगी को परिभाषित करना हो तो कह सकते हैं …
    हजारों हसरतें वो हैं कि रोके से नहीं रुकती
    बहुत अरमान ऐसे हैं कि दिल के दिल में रहते हैं !
    यहां युवा जितने मस्त, जितने फैशनेबल, जितने फिल्म और संगीत के दिवाने, जितने खिलाड़ी और जितने घुमक्कड़ हैं, उतने ही मेहनती भी. विश्वविद्यालयों में परीक्षा के बाद जब दो महीने गर्मी की छुट्टियां शुरू होती हैं, तब युवा एक नई पारी शुरू करते हैं. गर्मी की छुट्टी कई विद्यार्थियों के लिए नए सत्र की फीस जुटाने के प्रयत्न के लिए भी आती है.
    इसलिए यदि वे कोई भाषा जानते हैं, तो अनुवादक बन जाएंगे, पर्यटक गाईड बन जाएंगे. रेस्तरां में खाना परोसेंगें और अगर बनाना जानते हैं तो बना भी देंगे…. यानी शेफ हो जाएंगे. किसी काम से कोई परहेज़ नहीं.
    लेकिन समय अपने लिए भी निकालेंगे जरूर.
    दूर दराज से पढ़ने आए विद्यार्थी गृह नगरों को लौटेंगे, परिवार के साथ मिल-बैठ कर गपशप होगी. दोस्तों के साथ घूमने भी निकल जाएंगे. सत्र के आरंभ में ताजगी भरी वापसी के लिए यह सब कितना जरूरी है, वे जानते हैं.
    अपने से बड़ों के लिए उनका आदर भाव काबिले तारीफ़ है. वे बहुत झुक कर नमस्कार करते हैं, कोई भी वस्तु देनी हो तो दोनों हाथों से संभाल कर देंगे. प्रेम की पश्चिमी-यूरोपीय स्वच्छंदता इनमें नजर नहीं आती, लेकिन मित्रता में हाथ थाम कर चलना गुनाह भी नहीं मानते ! स्मार्ट फोन के दीवाने इन युवाओं का सब कुछ इसी में समाया रहता है – सब-वे के नक़्शे से लेकर तमाम रीडिंग मैटीरियल तक !
    लेकिन यही वह युवा पीढ़ी है जिसमें से काफी संख्या बहुत सी अंग्रेजी सीखकर अमेरिका पहुंच जाना चाहती है !
    वह थोड़ी अनमनी और बेचैन दिखाई देती है .. परंपरा, आधुनिकता और पश्चिमीकरण ….इनके बीच घिरा युवा मन और जीवन ….

    विजया सती

    Related Posts

    Драгон Мани: Мифический зверь или реальный выигрыш?

    June 21, 2026

    test

    June 21, 2026

    Драгон Мани: Мифический зверь или реальный шанс на выигрыш?

    June 21, 2026
    View 8 Comments
    Leave A Reply Cancel Reply

    Recent Posts

    • Драгон Мани: Мифический зверь или реальный выигрыш?
    • test
    • Драгон Мани: Мифический зверь или реальный шанс на выигрыш?
    • Dragon Money Сайт: Всё, что нужно знать о платформе
    • Драгон Мани Игры: Мифы и Реальность

    Recent Comments

    No comments to show.
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
    Facebook X (Twitter) Instagram Pinterest Vimeo YouTube
    © 2026 jankipul. Designed by jankipul.

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.