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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    शहर एक अनुभव का नाम है

    By March 11, 2023Updated:March 11, 2023139 Comments5 Mins Read

     

    बबीता जोशी नानकमत्ता पब्लिक स्कूल में 11 वीं कक्षा में पढ़ती हैं। कुछ महीने पहले इसने जानकी पुल के लिए एक लेख भेजा। जवाब में मैने लिखा कि इस तरह के लेख लोग गूगल से पढ़ लेते हैं। अभी पढ़ने पर ध्यान दो लिखने पर कम। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। मेल किया कि मेरे लेखन में क्या कमी थी? मैने जवाब दिया कि कुछ अपने अनुभव से लिखने की कोशिश करो। वही तुम्हारी मौलिकता होगी। उसके बाद उसने यह लेख भेजा। पढ़कर देखिए-
    =========================
    शहर के अनुभव से हर किसी को गुज़रना ही पड़ता है। चाहे वह रोज़गार के लिए हो या किसी इंस्टीट्यूट में पढ़ने के लिए। इस बार मैं भी इस अनुभव का हिस्सा रही। मैंने भी शहर नामक इंस्टीट्यूट को देखा और जाना। नानकमत्ता पब्लिक स्कूल के हम लगभग 44 शिक्षार्थी, दिल्ली की एक ट्रिप का हिस्सा रहे। हम सभी न सिर्फ़ घूमने गए बल्कि हमारा मक़सद विश्व पुस्तक मेले को एक्सप्लोर करना था। हमने अनेक मॉन्यूमेंट्स को देखा और उन्हें इतिहास से जोड़ने का प्रयास किया। नेशनल म्यूज़ियम भी हमारे इस सफ़र का हिस्सा था जहां हमने प्राचीन अवशेषों को समझने की कोशिश की।
    हर इंसान की प्रवृत्ति होती है – न तो वह अकेला रहना चाहता है, न ही रह पाता है। सभी धीरे-धीरे इतने सारे सोशल ग्रुप्स बनाना शुरू कर देते हैं कि शायद उन्हें भी इसका कोई अंदाज़ा नहीं होता। शहरों की ओर बढ़ा जाए जहाँ टेक्नोलॉजी के आने से लोग ट्रांसपोर्ट को कम समय देने लगे हैं, AC और लैपटॉप में बैठकर काम करने लगे हैं। यहां लोग आधुनिकता की ओर तेज़ी से आकर्षित होते जा रहे हैं। अगर महिलाओं या लड़कियों की स्थिति के बारे में बात की जाए तो वह इतने बड़े शहर में इतनी ज्यादा सुरक्षित हैं कि घर से बाहर ही नहीं निकलतीं। निकलने पर वह मैट्रो से सफ़र करना पसंद करतीं हैं, जहां उनकी सुरक्षा बनी रहे।
    हमारे शहरों, इमारतों, पार्कों, बाज़ारों या घूमने-फिरने की जगहों को पुरुषों ने डिज़ाइन किया है। इसलिए अधिकांश जगह महिलाओं के लिए सुविधाजनक, सुरक्षित और फिट नहीं बैठती। कहीं बिजली नहीं होती तो कहीं बैठने की जगह नहीं होती। सार्वजनिक जगहों पर बच्चों को दूध पिलाने या उनके कपड़े बदलने के लिए भी कोई अलग सुविधा उपलब्ध नहीं होती। इस तरह की दिक्कतें जब हमने दिल्ली जैसे महानगर में महसूस की, मुझे लगा कि अगर इतने बड़े शहर में हमारे लिए कोई आम सुविधाएं ही नहीं हैं तो हम छोटे शहरों या कस्बों से क्या उम्मीद करेंगे!
    दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में घूमते हुए मुझे वॉशरूम की ज़रूरत पड़ी, लेकिन कहीं भी कोई सार्वजनिक वॉशरूम नहीं था। थोड़ा प्रयास करने पर भी मुझे उस इलाके में वॉशरूम नहीं मिला। दिल्ली के इस अनुभव ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि अगर किसी एक लड़की को दिल्ली में ट्रैवलिंग के दौरान सैनिटरी पैड चेंज करना हो तो उसे आसपास कोई सुविधा मुश्किल से ही उपलब्ध होगी। उसे बहुत दूर चलकर पालिका बाज़ार जाना पड़ सकता है जहां वह चेंज कर सके। जब लड़कियों के शरीर में इतने सारे क्रैंप्स आते हैं, उनकी हालत चलने लायक नहीं होती, ऐसी स्थिति में उन्हें इतना दूर चलना पड़े तो यह महिलाओं के अधिकारों को नज़रंदाज़ करने जैसा ही है।
    आज भी जब पब्लिक स्पेसेस पर महिलाओं की बात होती है तो महिलाओं, ट्रांस या क्वीर समुदायों की मौजूदगी नज़र नहीं आती। ट्रांस कम्यूनिटी को लोग सामान्य लोगों जितना सम्मान नहीं देते। साथ ही अलग-अलग नामों से बुलाते हैं, जैसे – किन्नर, हिजड़े और भी बहुत कुछ। यह ऐसी कम्यूनिटी है जो लड़कियों या महिलाओं को बहुत सम्मान देती है। उनका कहना है, “औरतों के कारण ही तो हमारा काम चलता है अगर वह इस समाज में ही नहीं रहीं तो समाज कैसे चलेगा”। यह लोग लड़कियों को भी लड़कों के समान अधिकार देने की बात करते हैं। कहीं भी दुआएँ देने जाने पर वह समानता की बात रखते हैं।
    हमारा विद्यालय सिनेमा को सीखने-सिखाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम मानता है। हर रोज़ बच्चों को उनके पाठ्यक्रम से संबंधित कोई न कोई फ़िल्म दिखाई जाती है और उसपर चर्चा भी की जाती है। इस दौरान हमने ‘मेरा अपना शहर’ डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म देखी। इसे देखकर यह महसूस हुआ कि शहरों पर महिलाओं की क्या स्थिति है। क्योंकि यह फ़िल्म एक महिला के नज़रिए पर थी इसलिए इसे समझना मेरे लिए ज्यादा मुश्किल नहीं था। आज जब हम बात करते हैं कि महिलाओं की स्थिति में सुधार आया है तो कई बार मेरा विश्वास करने का मन नहीं करता।
    हाल ही में मैंने ‘नो नेशन फॉर वूमेन’ किताब पढ़ी। इसे पढ़कर मुझे यह समझ आया कि महिलाओं के लिए इस समाज में कितनी जगह है। यह किताब महिलाओं के साथ हुए गलत कर्मों पर बात करती है। मुझे यह भी समझ आया कि जो लोग महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम देखते हैं इसमें उनका क्या दोष है। जिनकी परवरिश हुई ही एक ऐसे समाज में है जहाँ लड़कियों या महिलाओं को एक निर्धारित प्रतिष्ठा और दर्जा मिलना आम बात है, उनसे हम बराबरी और न्याय की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

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