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    विहाग वैभव और ‘मोर्चे पर विदागीत’

    By May 4, 2024No Comments22 Mins Read

    विहाग वैभव लंबें समय से कविताएँ लिख रहे हैं, जो समय-समय पर विभिन्न पत्रिकाओं आदि में पढ़ी जाती रहीं । पिछले वर्ष राजकमल प्रकाशन से उनकी कविताओं का संग्रह प्रकाशित हुआ है ‘मोर्चे पर विदागीत’। इस किताब में तमाम तरह की कविताएँ हैं जिन्हें विद्रोह की कविताएँ कहा जा सकता है। इस संग्रह की समीक्षा कर रहे हैं शिवेन्द्र कुमार मौर्य। शिवेन्द्र हिन्दी विभाग, लंगट सिंह महाविद्यालय, मुजफ्फरपुर में सहायक प्राध्यापक हैं । उनकी यह समीक्षा आप भी पढ़ सकते हैं – अनुरंजनी

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    ‘मोर्चे पर विदागीत’ विहाग वैभव का प्रथम काव्य संग्रह है। इस संग्रह की कविताओं का तेवर और कलेवर अत्यंत ऊर्जस्वित है। 158 पृष्ठों का यह संग्रह सितंबर 2023 में राजकमल प्रकाशन से पहली बार प्रकाशित हुआ। इसके पहले पेपर बैक संस्करण की कीमत 199 रुपए है। कोरोना महामारी की एक ही शीर्षक से प्रकाशित पांच कविताओं समेत इस संग्रह में 70 कविताएं संग्रहीत हैं।

    ‘मोर्चे पर विदागीत’ काव्य संग्रह अतीत के संवेदनाओं का उमड़ता ज्वार है। इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए पाठक को वर्तमान से ज्यादा अतीत के प्रवाह में अधिक बहना पड़ता है। अतीत की स्मृतियों का प्रवाह ऐसा है जिसमें अनुभूति की हुई संवेदनाएँ ज्वार की तरह उमड़ती हैं। ये संवेदनाएँ अतीत की अमानुषिक तबाही को पाठकों के हृदय में उतार देती हैं। यह संग्रह वर्तमान का एक प्रस्थानबिंदु तय करता है जहाँ से अतीत की घटनाएँ क्रमवार पाठक को पीछे की ओर घसीटते लिए जाती हैं। साथ ही उसके भयावह दृश्य की कालिमा को उजागर करती हैं। इस काव्य संग्रह की पहली कविता का शीर्षक है ‘इस मोड़ से जो लौटना चाहते हैं लौट जाएं’। कवि के मंतव्य को स्पष्ट करती हुई इस कविता की कुछ पंक्तियाँ यहाँ दृष्टव्य हैं–“इस मोड़ से जो लौटना चाहते हैं लौट जाएं/ यहां से आगे/ घृणा की आग में जली बस्तियां आएंगी/मध्यकालीन मर्द के मस्तिष्क के मवाद से मरी बच्चियां आएंगी/ परिवार के कोल्हू में कच्ची तीसी सी पेर दी गई स्त्रियां आएंगी/ बीमार मनुष्यता के लिए जंगल के सन्नाटे की औषधि बटोरते हुए पहाड़ों में जिंदा दफनाए गए मुंडा और टोप्पो आएंगे/ अवर्णों की हड्डियां उनके लहू में घिसकर चंदन लगाने वाली संस्कृतियां आएंगी/मजलूमों का रक्त पीकर जवान हुई सभ्यताएं आएंगी/वध की भाषा में कत्ल की कथाएं आएंगी/यहां से आगे ऐसा बहुत कुछ आएगा/ जिससे निपटने के लिए यहां से बहुत-बहुत पीछे जाना होगा/”। यहाँ पर उपर्युक्त कविता का उद्धरण थोड़ा लंबा अवश्य हो गया है किंतु इस संग्रह को समझने और परखने के लिए यह कविता प्रवेश द्वार है। उपर्युक्त कविता की कुछ आंशिक पंक्तियाँ यहाँ और प्रस्तुत की जा रही हैं, जिससे पूरी कविता और इस संग्रह का मूल भाव स्पष्ट हो सके। इस कविता की आगे की पंक्ति है–“यहां से आगे/ लाशों से पटे धर्मस्थलों के गर्भगृह में बर्बरता की करुणा से तर्क युद्ध लड़े जाएंगे/यहां से दुख नहीं, दुख के कारण आएंगे/ यहां से आगे बहसों का अंधड़ /आएगा यहां से आगे पुनर्व्याख्याओं की लू चलेगी/ यह इस नयी सदी और सभ्यता का आखिरी मोड़ है/ इस मोड़ से जो लौटना चाहते हैं लौट जाएं”। यहाँ अतीत की पुनर्व्याख्या से कवि का मतलब गड़े मुर्दे उखाड़ना नहीं, बल्कि इतिहास के सच को सामने लाना है। कवि का मानना है कि जब तक अतीत की पुनर्व्याख्या नहीं होगी, तब तक बीमार मनुष्यता से भरे समाज को ठीक से नहीं समझा जा सकता। अतीत की संस्कृति पर गौरव गान का जो स्वर्णिम लेप है वह पुनर्व्याख्या से उद्घाटित हो सकता है। 21वीं सदी के नए विमर्शों (स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, ओबीसी विमर्श आदि) को मूल्यांकित  और दृढ़ करने के लिए कवि अतीत की पुनर्व्याख्या आवश्यक समझता है। कवि वर्तमान को नई सदी और सभ्यता का आखिरी मोड़ कहता है। इसलिए पुनर्व्याख्या की कसौटी से तिलमिलाने और अकुलाने वाले को कवि ने अपनी परिधि से बाहर रखा है। पुनर्व्याख्या की इस कसौटी में क्या मनुष्य? क्या देवता? सब उघाड़ हुए हैं। यह संग्रह मानवद्रोहियों की शिनाख्त का दस्तावेज है। ‘मानवद्रोहियों की जैविक संरचना के संदर्भ में’ शीर्षक कविता में कवि ऐसे लोगों की पहचान करते हुए कहता है–‘वे वीर्य से नहीं, घृणा से उपजे थे/ वे मनुष्य योनि में हुए/ और मनुष्यता के मवाद की तरह जीते रहे / मनुष्य को मनुष्य से अलगाते रहे/ और मनुष्यता की आत्मा चबाते रहे/’। मानवद्रोहियों ने ही मनुष्य को मनुष्य से अलग किया। उनके भीतर उसने घृणा और द्वेष पैदा किया। वे कभी मनुष्यता के पक्ष में खड़े ही नहीं हुए। ये मानवद्रोही कभी ईश्वर,कभी साधु, कभी ऋषि, कभी इंजीनियर, कभी डॉक्टर आदि रूपों में आते रहे। मनुष्य और मानवद्रोहियों के बीच हमेशा एक जैविक अंतर रहा है। मनुष्य, स्त्री और पुरुष के प्रेम संसर्ग से उपजा, जबकि मानवद्रोही घृणा और विष–द्वेष से पैदा हुए।

    यह संग्रह भारतीय संस्कृति की पड़ताल करता है। कवि का मानना है कि भारत सदैव प्रेम,करुणा और सौहार्द का देश रहा है। लालसा, लिप्सा, घृणा, दंभ, अमानुषता जैसी संज्ञा इस देश की संस्कृति में कभी नहीं रही। ऐसी संज्ञा सिर्फ मानवद्रोहियों की रही है। कवि अपनी कविता में कहता है कि ऐसे मानवद्रोहियों का इस देश में कोई स्थान नहीं है जिन्होंने मानवता को शर्मसार किया है। ‘यह देश उनका है’ शीर्षक कविता में कवि का मंतव्य स्पष्ट है–‘तुम कि जिनका धर्म हत्या है/ तुम कि जिनका व्यापार धर्म है/ तुम कि जिनका इतिहास घृणा है/ तुम इस देश के बाशिंदे नहीं/तुम्हें इस देश से जाना होगा/’ ऐसे मानवद्रोही जिन्होंने मानवता का कत्ल करके भारतीय संस्कृति को धूमिल किया तथा अपने घृणित और क्रूरतम इतिहास को स्वर्णिम पन्नों पर उकेरकर उसका मिथ्या प्रचार किया है, यह संग्रह ऐसे लोगों की पहचान कराता है। ‘कत्ल का लहू बोलता है’ शीर्षक कविता में कवि कहता है– ‘इतिहास सिर्फ कागजों और किस्सों में दर्ज नहीं होता/ वह हमारे रक्त की सवारियां भी करता है/ और एक दिन अधनींद के कान में बता जाता है उन पन्नों के बारे में/ जहां हमारा कत्ल हुआ, जहां चुपके से दफनाया गया हमें/‘  प्रतिरोधी संस्कृति की पहचान कर उसके खिलाफ एकजुट होने का आह्वान इस संग्रह में दिखाई पड़ता है।

    भारत ईश्वर की आस्था में डूबा हुआ देश है। मानवद्रोही मनुष्यों द्वारा निर्मित ईश्वर पर कवि को बिल्कुल भी भरोसा नहीं है। ऐसा ईश्वर मनुष्य के बीच पक्षपात करता है। ऐसे ईश्वर को कवि ने मानवद्रोही मनुष्यों के मस्तिष्क की कोढ़ बताया है। कवि की संपूर्ण संवेदना मनुष्यता के पक्ष में है। इस देश के स्त्री- पुरुषों पर जितने जुल्म और अत्याचार हुए हैं इसका दोषी ईश्वर को ही ठहराया गया है। कवि कहता है यदि ईश्वर का अस्तित्व है तो वह निरपराध मनुष्य की रक्षा क्यों नहीं करता? यदि वह सर्वशक्तिमान है तो मनुष्यों से अपराध क्यों करवाता है? ऐसी ऊहात्मक स्थिति को स्पष्ट करते हुए कवि कहता है– ‘ईश्वर मनुष्य के मस्तिष्क का पहला कोढ़ है/ देवता इसलिए देवता है कि उसने कभी बलात्कार नहीं झेला/’ जिन देवताओं ने अपने धर्म और न्याय की चक्की में असंख्य अपराध और अन्याय किए हैं, कवि और उसकी कविता ऐसे अन्यायी प्रभुओं के खिलाफ डटकर खड़ी मिलती है। इस देश में ईश्वर होना, किसान होने से बहुत आसान है। किसान की कठिनाइयों को देखते हुए कवि ईश्वर को किसान के रूप में देखना चाहता है। ‘ईश्वर को किसान होना चाहिए‘ शीर्षक कविता में कवि कहता है– ‘इस देश में ईश्वर होना/ किसान होने से कई गुना आसान है/ सृष्टि के किसी कोने में/ सचमुच ईश्वर कहीं है/ और वह अपने अस्तित्व को लेकर सचेत भी है/ तो फिर अब समय आ गया है कि/ उसे अनाज बोना चाहिए/ काटना चाहिए, रोना चाहिए/ ईश्वर को किसान की तरह होना चाहिए/’। ईश्वर सेनानायक, न्यायाधीश, राजा, ज्ञानी और न जाने कितने– कितने रूपों में आया, किंतु वह किसान के रूप में कभी न आया। ईश्वर किसान होने से डरता है। कवि अपनी कई कविताओं में मानवद्रोही मनुष्यों द्वारा गढ़ित ईश्वर के ऐसे भ्रमजाल को काटता नजर आता है।

    स्त्री और दलित की पीड़ा इस काव्य संग्रह का मूल स्वर है। मानवद्रोहियों द्वारा इन पर किया गया अत्याचार इस संग्रह की कविताओं में लगातार रेखांकित है। उन बर्बर और क्रूर मानवद्रोहियों के प्रति कवि की कविता नदी का उफान और आग की ज्वाला बनकर पाठकों का हृदय आक्रांत करती है। उसकी शांति किसी दर्शन या महान विचार से नहीं, बल्कि क्रांति से संभव दिखती है। कवि कहता है–‘जब घर में लगी हो भीषण आग/ आग की जद में हों बहनें और बेटियां/ तो आग के सीने पर पांव रखकर/ बढ़कर उन्हें बचा लेने के लिए/ नहीं चाहिए कोई दर्शन या महान विचार/×××××× चाहिए तो बस/ थोड़ी–सी सनक, थोड़ा सा पागलपन/’।  और एक आवाज को बुलंद करते हुए/ मुफ्त में मर जाने का हुनर/’ ‘लगभग फूलन के लिए’, ‘हत्या पुरस्कार के लिए प्रेस विज्ञप्ति’, ‘तुम एक औरत की हत्या का जश्न मनाते हो’, ‘हमारे चेहरों पर चीखों के धब्बे हैं’, ‘कत्ल का लहू बोलता है’, ‘और फिर एक दिन’ आदि कविताएँ स्त्रियों पर हुए अत्याचार की गवाही देती हैं। यह ऐसी सच गवाहियाँ हैं, जिन्हें झुठलाने का बार-बार प्रयास किया जाता रहा है, किंतु वे अपनी तीक्ष्ण चीखों से सब का हृदय झकझोर रही हैं साथ ही स्त्रियों को दी गई कठोर यातनाएँ और बलात्कार की चीखें पुरुष जाति को प्रश्नांकित करती रही हैं। कवि का मानना है कि इतिहास हत्यारों के दलाल की तरह सच छुपाने का आदी है। कवि कहता है कि –‘तुम हत्या के जश्न से इतना शोर पैदा कर देना चाहते हो/ कि अगली पीढ़ियां न सुन पाएं एक झुलसती हुई औरत की चीख/ पर तुम नहीं जानते कि कत्ल का लहू बोलता है/’। स्त्रियों पर हुए बलात्कार और अत्याचार के ऐसे बहुत से दृश्य इस संग्रह में अंकित हैं जो हृदय को ग्लानि और पीड़ा से भर देते हैं। ऐसा ही एक दृश्य यहाँ प्रस्तुत है–‘नालंदा की राजगीर पहाड़ी पर बलत्कृत स्त्री के यौनांग से रिसता खून/ और छह पुरुषों के लिंग से बहता सभ्यता का वीर्य मेरे मस्तिष्क में मवाद की तरह जम रहा है/‘ फूलन का दृश्य हो, नालंदा के राजगीर का दृश्य हो, हाथरस का दृश्य हो, या आठ वर्ष की मासूम बच्ची के साथ किया गया बलात्कार का दृश्य हो ये सारे दृश्य ऐसे भयावह और क्रूर सत्य का उद्घाटन करते हैं जहाँ मनुष्यता शर्मसार दिखती है। कवि ऐसे मार्मिक दृश्यों को अपनी कविता के केंद्र में रखता है। सरकार और समाज की हृदयहीन व्यवस्था पर सवाल उठाता हुआ कवि कहता है— ‘सवाल एक बलत्कृत स्त्री और क्षत–विक्षत हुई सभ्यता का है/ सवाल यह है कि/ इसे लेकर हम किस अस्पताल में जा सकते हैं/×××××× किस भाषा में, दुनिया की किस अदालत में दायर किया जा सकता है यह मुकदमा/’ कवि का यह प्रश्न दुनिया भर की अदालत को कटघरे में खड़ा कर देता है। अपने हक और इंसाफ के लिए लड़ती हुई ऐसी अनंत स्त्रियों को कभी राक्षसी, तो कभी डायन कह कर जिंदा जला देने या कत्ल कर देने की कोशिश सदियों से होती आई है। उसमें से लोना, नंदेली फूलन आदि जैसी बहादुर स्त्रियाँ जो बच निकलीं वही मनुष्य के क्रूरतम इतिहास की गवाह बन गईं।

    स्त्रियों की तरह शोषित पुरुषों का भी एक ऐसा तपका है जो शोषितों द्वारा सदियों से शोषण का शिकार रहा है। इतने शोषण के बावजूद भी वह बेहया के फूल की तरह खिलता और खिलखिलाता रहा है। उसे कितनी जहालत, कितनी पीड़ा और कितना अपमान सहन करना पड़ा फिर भी उसकी उत्कट जिजीविषा की जिद उसके अस्तित्व को बचाए और बनाए रखी। कवि कहता है– “हम फूल होते हुए भी महक न सके तो क्या/ हम में एक जिद थी दृश्य को सुंदर बनाने की/ और हमारे हर बार खिल आने का यही एक रहस्य था/”। जाति व्यवस्था भारत की सबसे बड़ी बीमारी है। मनुष्य सदियों से इसका शिकार रहा है। आज भी मनुष्य अपनी जाति की केंचुल से मुक्त नहीं हो पाया है। इसलिए कवि इस देश की जाति व्यवस्था को एक प्रकार की महामारी कहा है। प्रेम, दोस्ती, विवाह यहां तक कि वर्तमान राजनीति भी जाति आधारित हो गई है। पिछली पीढ़ियों द्वारा जाति के नाम पर की गई नृसंस  हत्याएं विहाग की कविता में दर्ज हैं। पुरखों को याद करते हुए कवि ने उन हत्यारों का एक चित्र खींचा है– “भूख—भर अन्न/ धूप—भर छत/ प्यास–भर पानी/ बहुत मामूली–सी चीज मांगी थी मेरे पुरखों ने/ पर घृणा के मवाद का खाद पाकर लहलहाती हुई तुम्हारी सभ्यता ने उन्हें/ भूख में डुबोकर मारा/ पानी में बांधकर मारा/ इतिहास की छत बनवाई और छत में चुनवा कर मारा/” कवि की कविता रक्तखोरों के खिलाफ रक्तबीज की तरह है और जातिखोरों के खिलाफ जमात की तरह है। कवि जाति को जंगल की आग कहता है। शोषकों के लिए यह जाति की आग बहुत काम की होती है। ‘कुछ लड़ाइयां अटल और अनिवार्य होती हैं’ शीर्षक कविता में कवि कहता है— “दोस्तों! बहुत काम की चीज होती है आग/ जाति का ज़हर ज़ेहन में चढ़ जाए तो/ लगा दी जाती है चमारों की बस्तियों में/ बलात्कारियों के हत्थे चढ़ जाए तो/ फूंक दी जाती है चीखती हुई औरत/ यह धर्म शास्त्रों में शस्त्र की तरह फैलती है/ और राख हो जाता है मोहल्ला, पुरवा, प्रदेश/आग का प्रयोगधर्मी यदि हो जाए प्रधानमंत्री/ तो धू –धू कर जलने लगता है पूरा देश।”

    राजनीतिक कोलाहल में साहित्य का स्वर खो गया है। जहां बहुत से साहित्यकार सत्ता पक्ष का यशगान करने में जुटे हैं वहीं विभाग वैभव अपनी कविता के माध्यम से विपक्ष रचते नजर आते हैं। ‘पार्श्व में नगाड़े बजाते हैं’ कविता की पंक्ति इस बात का प्रमाण है– “कोई बताएगा/ सभी हिनहिनाते हुए घोड़ों का मुंह/ देश की राजधानी की तरफ क्यों है?” इन पंक्तियों के माध्यम से कवि जनता की भावनाओं को टटोलता है। राजधानी से जनता की भावनाएँ जुड़ी हैं। सपने दिखाकर जनता की भावनाओं का जब दलन हो रहा हो तो विहाग जैसा कवि जनता की भावनाओं के साथ खड़ा दिखता है। बेरोजगारी, महँगाई, भ्रष्टाचार के आगे समूची जनता असहाय है। जनता रूपी घोड़े की लगाम जब सत्ता के हाथ लग जाती है तो जनता की बेबस हिनहिनाहट साफ सुनाई पड़ती है। विभाग जैसा कवि कभी नहीं चाहता कि जनता द्वारा चुना राजा उन्मादी होकर दुनिया को बदरंग करे। यदि वह ऐसा करने की सोचता है तो एक सजग कवि उसका विरोध करता है। साथ ही जनता को सचेत भी करता है। कवि का आत्मबोधन जनता का स्वर हो जाता है। ‘मोर्चे पर विदागीत‘ शीर्षक कविता में कवि कहता है–“यह युद्ध मेरे और मेरे राजा के बीच है/ मेरा उन्मादी राजा दुनिया की हर खूबसूरत चीज को नेस्तनाबूत कर देने की योजनाओं में व्यस्त है/ हर प्रकार की स्वतंत्रता को वह चबा लेना चाहता है/ मनुष्य को धर्म में बदल देना चाहता है/”।  राजनीति देश का आदर्श पहलू रही है। किंतु उत्तरोत्तर इसमें बहुत ह्रास देखा जा रहा है। उसके दोहरे चरित्र से कवि अत्यंत आहत दिखता है। धर्म की आस्था ने लोकतंत्र की आस्था को डिगा दिया है। धर्म के राजनीतीकरण ने जनता के भीतर उन्माद भर दिया है। वह अब लोगों की आस्था कम राजनीति का अस्त्र ज्यादा बन गई है। धर्म रूपी अफीम जनता में ऐसी घुल गई है कि वह उसके नशे में झूम रही है। सत्ता, जनता की इस लत को पहचान गई है। वह इस लत से उसे बाहर न निकाल कर उसमें और धकेले जा रही है। देश का नागरिक होने के लिए धर्म अब नई अर्हता बन गया है। ‘इस देश की नागरिकता की नई अर्हताएं’ शीर्षक कविता में कवि कहता है– “अपने मस्तिष्क में धर्म का धुआं भर लो/ और सोच सको कि/ मेरा प्रधानमंत्री इसके समर्थन में है/××××× जुबान काट कर रख आओ सत्ता के पैरों पर/ आंखों का पानी बेच आओ संप्रदाय की दुकान में/××××× फिर तो स्वागत है तुम्हारा इस देश में/ एक देशभक्त और सम्मानित नागरिक की तरह/” राजनीति में अपराधीकरण की प्रवृत्ति जिस तरह से बढ़ी है वह बेहद चिंतनीय है। बड़े से बड़ा अपराधी और माफिया धर्म एवं राजनीति की शरण में है। ऐसे अपराधी, माफियाओं से जनता त्रस्त है। राजनीतिक शक्ति व धार्मिक भक्ति से वह हर संभव हर बार बाइज्जत बरी हो जाता है। त्रस्त जनता कानून के शरण की बजाय अपराधी/ माफिया की शरण में जाने को अभिशप्त है। लोकतंत्र में आस्था रखने वाली जनता की आत्मा ऐसे में बार-बार मरती है। जनता की इस पीड़ा को रेखांकित करते हुए कवि कहता है–“अपनी आत्मा को सुख दो पहले/ फिर अपनी रीड की हड्डी निकाल कर सौंप आओ/ हत्यारों,आतताइयों और धार्मिक उन्मादियों के हाथ/××××× अपने कानों में ठूंस लो हत्या– समर्थन के सभी तर्क– पुराण/ और उन गला सुजाकर रोती मांओं की चीख को भजन या राष्ट्रगान की तरह सुनो/”।  ‘देश के बारे में शुभ-शुभ सोचते हुए’ शीर्षक कविता में भी कवि के इन्हीं उद्गारों की चीख सुनाई पड़ती है–“अभी राज्य का प्रचंड हत्यारा/ ससम्मान न्यायाधीश होगा/ अभी राज्य के कुख्यात चोरों के हाथों/ सौंप दिया जाएगा/ देश का वित्त मंत्रालय/××××× अभी देश ने/ अपने भाग्य और इतिहास के/ सबसे बुरे दिन नहीं देखे हैं/” कवि जनता को भयमुक्त और देश को खुशहाल देखना चाहता है। देश में हो रही लोकतंत्र की लगातार हत्या से कवि व्यथित है। इसलिए जनता के प्रति संवेदना और सत्ता के प्रति आक्रोश उसकी कविता में बराबर दिखाई पड़ता है। ऐसी कई काव्य पंक्तियों में देश और जनता के प्रति कवि की निष्ठा देखी जा सकती है।

    स्पष्टता इस काव्य संग्रह का स्थाई भाव है। जिस स्पष्टता और साफगोई से कवि अपना पक्ष रखता है, हीनग्रंथि वाले पाठक या श्रोता के भीतर ऐसी कविताएँ बहुत बार विचलन पैदा कर देती हैं या कर सकती हैं। सहमति या असहमति का अपना एक पक्ष है, किंतु हीनग्रंथिता स्वयं की भी पक्षधर नहीं होती। वर्ग, वर्ण और जाति भारत की बहुत पुरानी बीमारी है।इस संग्रह की कविताओं को पढ़कर यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि कवि ने देश की उस बीमारी की जड़ तक पहुँचने में अभूतपूर्व सफलता पाई है। जिस संवेदना और साहस के साथ कवि कहता है–“यही सही समय है कि मनुष्यता के हक में मेरी कविताएं रक्तदान करें/ यही सही समय है कि कविताएं इस ग्रह पर मनुष्य की आदिम बाशिंदगी के हक में गवाही दें/ और अपने होने का मूल्य अदा करें/”। कवि की संवेदना का यह धरातल उसे नई ऊँचाई प्रदान करता है। मनुष्यता की रक्षा हर धर्म और मजहब से बढ़कर माना गया है। कवि की संवेदना मनुष्यता के निकट है। इसलिए वह सिर्फ कविता में ही नहीं बल्कि कविता की दुनिया के बाहर संसद से सड़क तक मनुष्यता की रक्षा के लिए अपने को हमेशा तैयार रखता है। कवि का आत्मघोष है–“धार्मिक परिभाषाओं के इतर आत्मा नाम की चीज होती है/ इसके पहले की मेरा ईमान मेरी आत्मा को सत्तर चाकू गोदकर मार डाले/ मुझे इस शांति मार्च में जाना होगा/ मुझे हर उस विरोध मार्च में जाना होगा जहां कविताओं के बाहर इंसान का/ निचाट बदन लाठी चार्ज झेल रहा है/”। मनुष्यता की रक्षा के लिए कवि की कविता हर अन्याय और दमन के खिलाफ खड़ी दिखती है। उसकी कविता अन्याय और अत्याचार की घोर भर्त्सना करती है। कवि को पता है “मनुष्य कविताओं से बहुत पहले का है/ वह कविताओं के बहुत बाद तक रहेगा” इसलिए कवि कहता है–“यही सही समय है कि मैं अपने कवि को लेकर/ खेतों में नध जाऊं/ सड़कों पर उतरूँ और सरकार से लड़ जाऊं/ फिर फर्क नहीं पड़ता जीतूं या मर जाऊं/”। कवि की यह प्रतिबद्धता उसकी कविता की उर्वरा शक्ति है। समय और सत्ता की क्रूरता का प्रतिरोध उसे अन्य कवियों से अलग करता है।

    कवि उन सब को कटघरे में खड़ा करता है जो मनुष्यता के खिलाफ है। मनुष्यता के खिलाफ होने का मतलब है स्वतंत्रता, समानता, न्याय और प्रेम के खिलाफ होना। ‘सभ्यता की अदालत में तटस्थता एक अपराध है’ शीर्षक कविता में कवि सबकी खबर लेते हुए कहता है–“यदि आप नहीं खड़े होते स्वतंत्रता, समानता, न्याय और प्रेम के पक्ष में/ तो तमाम मृत तर्कों के बावजूद/ आप उनके विरोधियों में हो चुके होते हैं शामिल/”। दिनकर की पंक्ति याद आती है कि ‘जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी इतिहास’। कवि विहाग ने तटस्थता को अपराध माना है। मनुष्य जब संवेदनहीन हो जाता है तो वह जाति, धर्म, वर्ण आदि से परे मनुष्यता का भक्षक बन जाता है। मानवता की रक्षा का प्रश्न वैश्विक है। ‘चाय पर शत्रु सैनिक’ और ‘सीरिया के मुसलमान बच्चे‘ शीर्षक कविता इस बात का प्रमाण है कि कवि मानवता के रक्षार्थ दुनिया के साथ खड़ा है।

    कोरोना महामारी वैश्विक समस्या थी किंतु इस महामारी का दृश्य कवि को अतीत के गहन गहवर में घसीट ले जाता है। महामारी की यह घटना कवि को उन तमाम घटनाओं से जोड़ती है जहाँ-जहाँ मृत्यु के इतिहास का सामूहिक दफन हुआ है। कवि को याद आता है निरपति हरिजन का गाँव जिसमें मनुष्य से मवेशी तक को राख में बदल दिया गया, कोयला की वे खदानें जिसमें दबे हुए लोग ईंधन हो गए, मिलों और मशीनों में समा गए वे मजदूर जो कभी घर लौटकर नहीं आए, बेगारी में तड़पती हुई आत्माएँ जिनके पेट की भूख कभी शांत न हो पाई, नींव में दबे गरीब–गुरबे जिनकी चीखों पर शुभता की सभ्यता पली–बड़ी, हिरणों और अन्य मवेशियों की आकृतियों और उससे सज्जित अय्याश संपन्नता, साथ ही साथ याद आई दिनचर्या में शामिल बलात्कार की वे घटनाएँ जो किसी महामारी से कम न थी। बरबस ही कोरोना महामारी ने कवि को जाति, धर्म, वर्ग और वर्ण की ऐसी त्रासद महामारी से जोड़ा जिसका क्रूरतम इतिहास आज भी झुठलाया नहीं जा सकता। कवि ने अतीत में घटी ऐसी तमाम घटनाओं को महामारी की संज्ञा दी है। वर्तमान महामारी कोरोना ने कवि के भीतर जो मंजर पैदा किया इसका कारण सिर्फ वह रोग ही नहीं था जिसके कारण अनगिनत लोग मारे गए, बल्कि उसके कारणों में कवि ने पुलिस की क्रूरता, भय, घृणा, लालच और लिप्सा आदि को भी चिन्हित किया है। ‘प्रचलित परिभाषाओं के बाहर महामारी–3’  कविता में कवि लिखता है– “कुछ भूख से मरे/ कुछ भय से/ जो आस्तिक थे वे ईश्वर की कृपा से मरे/ कुछ तो सिर्फ यह देखकर मर गए कि इस कब्रिस्तान में उनके लिए कोई जगह नहीं बची है/××××× कुछ को घृणा ने मारा, कुछ को शक्ति ने/ कुछ को ऐश्वर्य ने मारा, कुछ को भक्ति ने/ महामारी में मरने वाले सब के सब लोग महामारी से नहीं मरे थे/” इस तरह कवि ने कोरोना महामारी को अपनी निगाह से रेखांकित किया है।

    ‘कुम्हार के हाथ से’ शीर्षक कविता नई चेतना व नए संदेश की वाहक है। यह कविता अतीत की मानसिक कार्यवाहियों के स्थगन और जगत के पुनर्रचना पर जोर देती है। मनुष्य की अमानवीयता और समय की कठोरता को देखते हुए कवि कहता है– “यह सही समय है जगत के पुनर्रचना की/मुनादी पिटवाकर/ इसी दम/ सृष्टि की सभी कार्यवाहियां स्थगित की जाएं/××××× मनुष्यों, अपनी देह से बाहर निकलो/ यही सही समय है/ मनुष्यता की पुनर्रचना की/”।  गहरे इतिहास बोध से जुड़ी विभाग की कविताएँ अतीत के कटघरे में खड़े मनुष्यों की वकालत करती हैं। इतिहास ने सदैव श्रम के महत्व को दबाया है। जिन लाशों की ढेर पर शौर्य गाथाएँ लिखी गई उन लाशों का इतिहास में कहीं जिक्र ही नहीं है। कवि अवर्णित इतिहास को प्रकाश में लाता है क्योंकि उसे पता है ये अवर्णित इतिहास उसके पुरखों का है। ‘वे सारे अपने हैं’ शीर्षक कविता में कवि की संवेदना इसी ओर है–“इतिहास जिन्हें विराट शौर्यजीवी योद्धा कहता है/ उनकी जमीन की तरफ देखिए वे मेरे पुरखों की लाशों के ढेर पर खड़े हैं/”। इस संग्रह में कवि लगातार अपने पुरखों और पुरखिनों को याद करता है। उन पर हुए अत्याचार से उसकी आँखें नम और हृदय पीड़ा से भरा है। उसकी यह पीड़ा इन पँक्तियों में स्पष्ट झलकती है–“इतनी पीड़ा से भरा बैठा था कि/ जरा अकेले की वोट लेकर किसी ने हाल- भर पूछा तो फफक पड़ा/”। ‘संस्थापन भी एक यातना है’ शीर्षक कविता में भी कवि की पीड़ा स्पष्ट दिखती  है। कवि को ऐसा लगता है कि अतीत की यह पीड़ा उसे मृत्यु के बाद भी न छोड़ेगी। कवि कहता है– “किसी को जब मेरी मृत्यु की खबर मिलेगी/ तब तक मेरी सारी बेचैनियां, सारी पीड़ाएं जा चुकी होंगी किसी और देश में/”। ‘रुलाई’, ‘करुणा की ठिठोली से झूलता देहयात्री था प्रेम’, ‘नींद की आत्मा शिविर मे’, ‘आबाद रहे ये मुर्दाघर’, ‘कोशिकाएं पूछती हैं पता अपना’, ‘कायांतरण’, ‘तत्व संवाद’ आदि कविताएँ अतीत की पीड़ा का गान हैं।

    महाभारत का अभिमन्यु पुरुषों का, तो फूलन स्त्रियों के उम्मीदों का, किसान भरण का, तो मजदूर पोषण का और कुम्हार नवसृजन का प्रतीक बनकर उभरे हैं।‘ओझौती जारी है’ शीर्षक कविता रोजगार, न्याय और अन्न के लिए जूझती जनता का बयान है, तो ‘अभी बस अभी एक नारा लगेगा’ शीर्षक कविता वर्तमान भारत की तस्वीर का असली रेखांकन है। ‘मां का सिंगारदान’ मां पर, तो ‘पिता होना बचा रहेगा’ पिता पर लिखी भावपूर्ण कविता है। ‘प्रेम का अर्थशास्त्र’, ‘मैं अपना प्रेम कहीं रखकर भूल गया हूं’, ‘चाह का मर्सिया’, ‘सोनतारा’, ‘सूर्य के नदी में डूबने की भाषा में विदा’ आदि कविताओं में अर्धप्रेम के संगीत को सुना जा सकता है। इस काव्य संग्रह की भाषा गठी और सधी है। पाठकों के सामने कविता के भाव अभिधात्मक ही प्रतुत हुए हैं। अपने हृदय की पीड़ा और आक्रोश को कवि ने सहज और सरल तरीके से कविता में प्रतिस्थापित किया है। पाठक भी उसी भाव से कविता में उतरता चला जाता है। कविताएँ पाठक को सच का आईना दिखाती हैं। इस आईने में अतीत के धुंधलके पात्र और घटनाएँ स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं।

    निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि इस संग्रह में एक ओर शोषित, पीड़ित, दमित समाज की वेदना का करुण क्रंदन है, तो दूसरी ओर क्रूर, हिंसक, शोषक वर्ग का अट्टहास गर्जन। एक ओर सत्ता और ईश्वर की निरंकुश्ता का व्यापित मायाजाल है, तो दूसरी ओर उसके पक्षपातपूर्ण व्यवहार का सनसनीखेज खुलासा। एक ओर अतीत के गर्त में खोए पुरखों के पौरुष को ढूंढने का प्रयत्न है, तो दूसरी ओर भविष्य को बचाने के लिए वर्तमान से टकराने की दृढ़ इच्छाशक्ति। एक ओर सभ्यता और मृत्यु के बीच छटपटाती भूख है, तो दूसरी ओर मृत्यु और सृजन के बीच पलती अपूर्ण कोमल प्रेम कथा। एक ओर जाति की विद्रूपता से सना समाज है, तो दूसरी ओर राजनीति की लिप्सा में लिपटा देश। सच को सच और झूठ को झूठा कहने का अपार साहस इस संग्रह की सबसे बड़ी ताकत है। कवि ने इस संग्रह में जिस तरीके से भूत, वर्तमान और भविष्य को रचा है वह उसकी पैनी इतिहास दृष्टि और वर्तमान गहनताबोध से उपजा भाव है।

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