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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    परस्पर प्रेम और मनुष्यता

    By May 22, 2024Updated:May 22, 2024No Comments10 Mins Read

    आज जब हर व्यक्ति एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगा हुआ है तब कोई अपने साथ के व्यक्ति को ( ख़ास कर एक ही पेशे में होने के बावजूद) भरपूर प्रेम और सम्मान से याद करे तो यह निश्चित ही मनुष्यता की ओर आश्वस्ति का भाव पैदा करता है। यह भी तभी संभव होता है जब प्रेम और सम्मान परस्पर हों। पल्लव जी, एक शिक्षक और बनास जन के संपादक अपने समकालीन आशीष त्रिपाठी के प्रति इसी तरह का अनुभव हमसे साझा कर रहे हैं ।आप भी पढ़ सकते हैं – अनुरंजनी

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                                                 एक शिक्षक का दूसरे शिक्षक के प्रति प्रेम 

    आशीष त्रिपाठी पचास के हो गए। आशीष त्रिपाठी कवि, आलोचक और सम्पादक तो हैं ही इन सबसे पहले वे बेहद लोकप्रिय अध्यापक हैं। हुआ यह कि हमारे देश में जिन ओहदों को एकदम बेकार का मान लिया गया है उनमें शिक्षक का पद भी एक है और किसी को विश्वास नहीं होता कि शिक्षक होना भी बड़ी बात हो सकती है। शिक्षक आशीष त्रिपाठी को जो जानते हैं वे इस बात को समझते हैं। आश्चर्य नहीं कि झालावाड़ से बनारस तक उनके पढ़ाए योग्य युवाओं की लम्बी शृंखला है जो कवियों, प्रशासनिक अधिकारियों और अध्यापको से बनती है। उनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि अगर दिल्ली में कहीं उनका भाषण हो तो दस बीस श्रोता ऐसे अवश्य आ जाएँगे जो, “आशीष सर को बनारस में सुने थे इधर एतना दिन हो गया और पता चला कि सर दिल्ली आए हैं तो दौड़े आए।” ऐसा कहते हैं।

    याद करता हूँ कि पहली बार मेरी उनकी मुलाकात कहाँ हुई। वह 2002 का साल था और शायद नवम्बर-दिसम्बर के दिन थे। राजस्थान साहित्य अकादमी का अध्यक्ष वेद व्यास को मनोनीत किया गया था। वेद जी ने राजस्थान भर से कुछ नये पुराने लोगों को उदयपुर बुलाया और उन्हें अपने अपने शहर में ‘साहित्य के सामाजिक सरोकार’ विषय पर एक आयोजन करवाने को कहा। इस बैठक में मैं चित्तौड़ से उदयपुर गया था। राजस्थान साहित्य अकादमी के पुस्तकालय में हो रही इस बैठक में मेरी बगल में एक युवक बैठे हुए थे जो मेरी तरफ देखकर झीना-झीना मुस्कुरा रहे थे। मैंने उनसे नाम पता पूछा तो उन्होंने आशीष त्रिपाठी बताया। वे झालावाड़ के राजकीय महाविद्यालय में हिंदी पढ़ा रहे थे और मैं बेगूं के नये-नये खुले शहीद रूपाजी करपाजी महाविद्यालय का पहला अध्यापक नियुक्त हुआ था। मुझे इस मुलाक़ात में आशीष जी पसंद आए। मैंने उनका नाम पता लिख लिया और चित्तौड़ आते ही उन्हें एक चिट्ठी लिख दी। और देखिये, जवाब भी आ गया। फिर क्या था वे मेरे आशीष भैया हो गए और मैं उनका प्रिय पल्लव। फिर तो हमारा संवाद बढ़ता गया। चिट्ठियाँ, फोन और यदाकदा मुलाकातें। होते-होते मैं बेगूं से उदयपुर आ गया और वहाँ से निकल रहे महावीर समता सन्देश नामक अखबार में साहित्य के पन्ने बेहतर बनाने में लग गया। तब मैंने यह अभियान चलाया कि हर अंक में किसी एक युवा कवि की कविताएँ और फोटो छपे। विनय सौरभ और रवि कुमार के साथ इस शृंखला में आशीष त्रिपाठी की कविताएँ भी छपीं। फिर उदयपुर विश्वविद्यालय में सक्रियता का दौर शुरू हुआ तो उसमें भी आशीष जी को होना ही था ,वहाँ हुए दो बड़े आयोजनों में आशीष जी आए। पहला आयोजन था मीरां के पाँच सौंवे जन्मदिन पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी और दूसरा, अखिल भारतीय कविता कार्यशाला। मीरां पर हुई संगोष्ठी में शिव कुमार मिश्र, कमला प्रसाद, जीवन सिंह और प्रणय कृष्ण आए तो कविता कार्यशाला में हिंदी के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण कवि आए थे। इसका उद्घाटन नामवर सिंह ने किया था। आशीष जी ने उदयपुर में मीरां पर पर्चा पढ़ा और कविता कार्यशाला में अपनी  कविताएँ सुनाईं।

    तभी मेरे जीवन में अस्थिरता और तनाव का दौर आया। मैं उदयपुर से फिर चित्तौड़ आया और चित्तौड़ से उदयपुर। पक्की नौकरी की तलाश ख़त्म न होती थी। आशीष जी गाहे-बगाहे फोन पर उत्साह बढ़ाते थे। इन्हीं दिनों में बनास के प्रकाशन की योजना बनी जिसमें आशीष जी ने लिखा तो नहीं लेकिन वे दिलचस्पी लेते रहे। पहला अंक आने के कुछ ही दिनों बाद आगरा में शम्भुनाथ जी ने हिंदी शिक्षक सम्मलेन आयोजित किया था जिसमें आशीष त्रिपाठी के साथ युवा शिक्षक-लेखकों की लम्बी कतार थी। इस आयोजन में शशिकला राय, विनोद तिवारी, बसंत त्रिपाठी, अनुराधा, सूर्य नारायण और कई लोग आए थे। गोआ से रोहिताश्व भी। रात को रोहिताश्व जी किसी से मिलने गए और होटल में युवाओं के इस उत्साही दल ने उनके थैलों की जांच कर डाली। जांच में बड़ी संख्या में काजू बरामद हुए तो सर्वसमति से तय हुआ कि इन काजुओं पर जनता का हक़ है और इस हक़ को लेने में हमें देर न करनी चाहिए। आशीष जी इन तमाम गतिविधियों में उतना ही रस लेते थे जितना गोष्ठी में बोलने या पर्चा पढ़ने में। मैं भी इस अवसर का लाभ उठाने में पीछे न था। मैं अपने साथ बनास के चार-पांच बंडल ले गया था और तय करके गया था कि मित्रों को विक्रयार्थ दे दूंगा। यही हुआ, मैंने आशीष जी समेत सभी मित्रों में इन बंडलों की प्रतियां बाँट दी कि वे अपने अपने शहरों में इनको बेचें और पैसा भेजें। बाद में समझ आया कि कवियों-साहित्यकारों को बिणज से क्या लेना-देना? वे इन बातों से उबर चुके मनुष्य हैं।

    इन्हीं दिनों में एक दिन आशीष जी का फोन आया जिसे मैं कभी नहीं भूलता। वे बोले कि “तुम्हारे लिए अच्छी खबर है पल्लव।” बेरोज़गार आदमी को यह वाक्य कितना सुकून देता है इसे कोई भी समझ सकता है। मैंने अधीरता से पूछा, बताइए न। वे बोले, “कल हमारे विभागाध्यक्ष प्रो. कुमार पंकज तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे और यह भी बोले कि उसे कह दीजिए कि चिंता न करे। सब ठीक होगा”  मैं सचमुच खुश हो गया कि नियुक्ति जब मिलेगी तब मिलेगी यही क्या कम है कि बीएचयू के विभागाध्यक्ष मुझे जानते हैं! वाह!

    आखिर नियुक्ति मिली और मैं दिल्ली आ गया। दिल्ली आ जाने के बाद उनसे मिलने और बतियाने का सिलसिला कुछ बढ़ा। वे जब भी दिल्ली आते, मिलें या न मिलें फोन तो करते ही।

    उनके साथ लिखाई-पढ़ाई का भी सम्बन्ध प्राय: पहली मुलाक़ात के साथ शुरू हो गया था। जैसा कि बताया था उन दिनों मैं उदयपुर में एक छोटे से पाक्षिक अखबार से जुड़ गया था और उसके लिए साहित्य का पन्ना तैयार करने लगा था। मेरे आग्रह पर आशीष जी ने अपनी कविताएँ भेजीं और उनके साथ जो फोटो भेजा था वह शायद दसवीं में खिंचवाया होगा। बहरहाल कविताएँ उसी फोटो के साथ छपीं। फिर जब मुझे ज्ञात हुआ कि वे नामवर जी के असंकलित लेखन को खोज रहे हैं और उन्हें पुस्तकाकार करने में जुटे हैं तब मैं उत्साह से उनके अभियान में शामिल हो गया। जब कहीं किसी पुरानी लघु पत्रिका या किताब में नामवर जी का कोई लेख या व्याख्यान दिखाई देता तब मैं तुरंत उन्हें सूचित करता। कोई बीसियों बार ऐसा हुआ और उनमें से उन्नीसियों बार उन्होंने सहृदयता और सौजन्यता के साथ कहा, “यह लेख या व्याख्यान मेरे पास है पल्लव।” बहुत बाद में मुझे पता चला कि यह काम असल में उनके गुरु कमला प्रसाद जी ने शुरू किया था और उनके असामयिक और अप्रत्याशित निधन के बाद इसे आशीष जी ने अपने हाथ में ले लिया। मेरा अनुमान है कि आशीष जी के इस अभियान से नामवर जी की दो दर्जन नई पुस्तकें तो आई ही होंगी। लगभग पंद्रह सालों से वे इस काम में जुटे हुए हैं और अभी भी उनका यह अभियान पूरा नहीं हुआ है। सोचता हूँ कि अपने गुरु का संकल्प पूरा करने का साहस किन शिष्यों में होता है? हमारे वांग्मय में समर्पित शिष्यों के अनेक आख्यान मिलते हैं लेकिन फेसबुक के इस युग में जब किसी को अपने अतिरिक्त दूसरा कोई दिखाई तक नहीं देता तब तीसरे के लिए यह उद्यम?  मेरे मन आशीष जी के प्रति आदर के अनेक प्रसंगों में यह प्रसंग अविस्मरणीय है।

    ऐसी एक और घटना भी याद आती है। यह 2010 की बात है मैं अपने मित्र आशुतोष मोहन के साथ देव दीपावली पर बनारस गया था। बनारस की यह मेरी पहली यात्रा थी। आशुतोष जी को खुद कार चलाकर लम्बी यात्राएँ करने का भारी शौक रहा है तो हम लोग सुबह जल्दी दिल्ली से निकले और शाम ढलते-ढलते बनारस पहुँच गए। उसी यात्रा में एक दिन जब हम लोगों की मुलाक़ात काशीनाथ जी से हुई तब की यह घटना है। हुआ यह था कि हम लोग बीएचयू के किसी अतिथि गृह में ठहरे हुए थे और सुबह-सुबह जल्दी काशीनाथ जी हम लोगों से मिलने आ गए। आते ही बोले कि तुम लोगों ने अभी चाय तो नहीं पी है न। हमने नहीं पी थी। तब उन्होंने आदेश दिया कि चलिए आप लोगों को आशीष के घर ले चलूँ। हम तीनों परिसर में ही रह रहे आशीष जी के घर चले। वहा

    वहाँ चाय पीते हुए काशीनाथ जी ने कहा कि “यार आशीष लगता है हमरा फोन जवाब दे रहा है, ज़रा देखो तो।” आशीष जी ने देखा कि फोन बार बार स्विच ऑफ़ हो रहा था। उन्होंने तुरंत उस फोन से सिम निकाली और अपने फोन में डालते हुए बोले, “यह लीजिए ताऊजी।” काशीनाथ जी ने कहा, “तुम्हारा फोन हम कैसे ले लें यार ?” आशीष जी ने कहा “आप इसे इस्तेमाल कीजिए मैं कुछ और देख लूँगा।” हालाँकि तब वाह्ट्सएप और महंगे फोन का चलन नहीं आया था तब भी किसी के लिए कोई अपने फोन की क़ुरबानी नहीं देता था। आशीष जी की पत्नी ने बताया कि काशीनाथ जी उनके ससुर जी (प्रो. सेवाराम त्रिपाठी जी ) के मित्र और बड़े भाई जैसे हैं सो हम सब इन्हें ताऊजी कहते हैं।

    मैं सोचता था कि नामवर जी की किताबों के कारण आशीष जी का अपना लिखना-पढ़ना बाधित होता होगा। मैं सही था, उनका पहला संग्रह 2010 में आया था ‘एक रंग ठहरा हुआ’ और दूसरा अब यानी 2024 में आया है, ‘शांति पर्व’। यानी लगभग पंद्रह साल बाद। मेरे कुरेदने पर उनका उत्तर होता था कि “हम लोगों को अपने मित्रों को लिखने और छपने के लिए उत्साहित करते रहना चाहिए।” पता नहीं किसके दिलाए उत्साह से ‘शांति पर्व’ आया है। उनके पास अपनी आलोचना की पुस्तकों की पांडुलिपियाँ ठीक- ठाक संख्या में हैं। उनके पक्के शिष्य और मित्र विशाल विक्रम सिंह सोचकर बताते हैं कि “बड़ा वाला तो नहीं लेकिन 407 वाला मिनी ट्रक तो सर की अधूरी पांडुलिपियों से भर ही जाएगा।” आशीष जी की प्राथमिकता में अभी यह सब नहीं है। कुरेदो, तो वे बताते हैं कि “कमला जी के घर से निकली बोरा भर कर चिट्ठियाँ हैं जिन्हें व्यवस्थित किया जाना है। कमला जी की रचनावली तैयार होनी है, नामवर जी पर मोनोग्राफ आना है, देवताले जी पर कुछ बड़ा काम करना है, भगवत रावत वाला काम पूरा होने को है और भी ये ये काम हैं।” असली बात यह है कि मध्य प्रदेश उनकी चिन्ता में सर्वोपरि है और प्रगतिशीलता उनके चिंतन का आधार बिंदु। अपने मध्य प्रदेश प्रेम के खातिर उन्होंने भोपाल में फ़्लैट खरीद लिया और हबीब तनवीर की जीवनी लिखने लगे। मैं सोचता हूँ कि एक आदमी जिसका काम नाटकों पर था और जो कविताएँ लिखता था वह किन नई- नई दिशाओं में जा सकता है और कितनी बार! आशीष जी पचास के हो गए। हिंदी जगत में षष्ठिपूर्ति का चलन है लेकिन आशीष जी के पचास अच्छों अच्छों के साठे पर पाठे हैं। उनके नए कविता संग्रह का खूब स्वागत हो रहा है। मैं तो उन्हें पचास की बधाई देता हूँ और सोचता हूँ कि अगली मुलाक़ात में उन्हें बादाम भेंट करूँ ताकि उनकी याद में मेरे लिए भी थोड़ी सी जगह बनी रहे।

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