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    यूरी बोत्वींकिन के नाटक ‘अंतिम लीला’ का दूसरा खंड

    By June 1, 2024No Comments16 Mins Read

    यूरी बोत्वींकिन के नाटक ‘अंतिम लीला’ का पहला खंड हम पढ़ चुके हैं। आज पढ़िए दूसरा खंड-

    ======================================

     

    अंतिम लीला – 2

    भूमिका

    इस नाटक के पात्रों में हिंदू देवी-देवताओं के साथ कुछ स्लाविक पौराणिक ईसाईपूर्व देव-देवता भी हैं, जिनका ऐतिहासिक आधार हिंदू चरित्रों की तुलना में कहीं कम प्रमाणित किया गया है, यहाँ तक कि कुछ वैज्ञानिक इन चरित्रों को नवरचित भी मानते हैं। कारण यह है कि ईसाई धर्म आने के बाद पुराने रूस (जो कि अधिकतर आधुनिक युक्रैन का ही नाम हुआ करता था) में पुराने धर्म-सिद्धांतों का नामोनिशान मिटाने का पूरा प्रयास किया गया था। फिर भी स्लाविक सनातनी परंपराओं की कुछ बची हुई झलकें आजकल एक नई परंपरा में विकसित हो रही हैं और इसके कार्यकर्ताओं की मूल प्रेरणा वैदिक सानातनी संस्कृति से ही आ रही है। ऐतिहासिकता का कोई दावा न लगाते हुए स्लाविक मिथकीय चरित्रों को इस नाटक में मात्र प्रतीकवादी रूप में लाया गया है।

                                                                      पात्र –

    कृष्ण

    लेल – कुछ लोककथाओं के अनुसार पौराणिक  स्लाविक वसंत और प्रेम का देवता, जो कृष्ण की भांति एक चरवाहा था और मुरली या वीणा बजाकर लड़कियों-महिलाओं को मोहित करता था। उन्हीं कथाओं के अनुसार उसकी बहन लेल्या वसंत की देवी होती थी। दोनों के नामों को संस्कृत “लीला” शब्द से जोड़ा जाता है।

    रुसावा, ज़्लाता, होर्दाना – स्लाविक जनजाति की युवतियाँ।

    प्रिलेस्ता – स्लाविक वैद्य महिला।

     ज़ोर्याना, क्विताना – प्रिलेस्ता की दो चेलियाँ (निःशब्द)

    भारतीय नर्तकियाँ (निःशब्द)

    शक्ति देवी (काली और लक्ष्मी के रूप में)

    यमराज

    स्लाविक मृत्यु देवी (निःशब्द)

    गायन दल

     दृश्य 3

    “गंजी (वृक्षहीन चोटी वाली) पहाड़ी” पर प्रिलेस्ता अपनी दो जवान चेलियों के साथ पूर्णिमा को समर्पित एक नृत्य करती हैं डफलियाँ बजाती हुई। नृत्य के बाद युवतियाँ मंच से चली जाती हैं, प्रिलेस्ता अलाव के पास बैठकर ध्यानावस्था में आग को निहार रही है। उस पर पारंपरिक कढाई वाली सफ़ेद कमीज़, तांत्रिक के जैसे हार और कंगन। खुले बिखरे बाल, चेहरे पर सौंदर्य एवं कठोरता दोनों का छाप है। लेल और कृष्ण आते हैं।

    लेल (मुस्कुराकर) – प्रसिद्ध डायन को प्रणाम! तुम कैसी हो, प्रिलेस्ता?

    प्रलेस्ता (उनको देखकर, नाटकीय भाव से, हलका मुस्कुराकर) – अच्छा? मेरे प्रियतम को मेरा स्मरण तो  आया  अंततः ?

    लेल (चंचलता से) – मैं भूला कब था! क्या करें, विश्व को चमकाते फिरना तारों जैसे यह तो हमारा भाग्य है, तभी तो तारों ही की भांति मिल रहे हैं तुमसे, एक बार अनंतकाल में… हाँ, देवी, अनंतकाल से कम नहीं लगा मुझे  यह एक सप्ताह!

    प्रिलेस्ता (हँसकर) – तुम आओ और ऐसी बातें न करो – हो ही नहीं सकता! पर यह ‘डायन’ क्यों विश्वास करे तुम्हारा हर समय युवती की भांति?  (कृष्ण को देखकर) यह है तुम्हारा श्याम सा सुंदर भाई? बहुत सुना है लड़कियों से… क्या नाम है इस अनुभवी महोदय का?

    कृष्ण (मुस्कुराकर) – तुम्हारी इस छुपी उर्जा और इस दृष्टि के सामने यही करता है मन कि कोई नया नाम ले लूँ ज्वालामुखी के मुख से…

    प्रिलेस्ता (फिर हँसकर) – अरे! लगता है कि तुम दोनों अग्नि-देवी को और गर्म करने का मन बनाकर आए हो! सावधान! ज्वालामुखी के जाग जाने का परिणाम क्या होता है वह लेल से पूछो!

    लेल (नाटकीय डर से) – वह मृत्यु आने के समान है, भाई! देवी की बाहों में मरकर सवेरे फिर जाग जाते हो पुनर्जन्म लिए शिशु की भांति, निर्दोष व स्मरणहीन…

    कृष्ण – बस “दंतहीन” नहीं कहा है तुमने, फिर चलेगा!

    तीनों हँसते हैं। लेल और कृष्ण प्रिलेस्ता के दोनों ओर बैठ जाते हैं।

    लेल – ये आर्यवर्त से आए कृष्ण हैं ।

    प्रिलेस्ता – कृष्ण?.. तुमको पहले भी देख चुकी हूँ मैं… भविष्य में जब झांका था…

    कृष्ण – अच्छा? अब मिलकर भी झांक लें एक बार?

    प्रिलेस्ता (कृष्ण को ध्यान से देखकर) – ऐसे भी देख सकती हूँ तुम में गहरा दुख… अब उसको और बढ़ाना चाहते हो?

    कृष्ण – तब तक हृदय से दुख नहीं छुटता जब तक बढ़कर उतना बड़ा न होए कि हृदय में समा ही न सके… शांति मिलती भी है तो बस कड़वे जल के कुएँ के तल के नीचे…

    प्रिलेस्ता – अब देख सकती हूँ कि तुम योग्य हो मेरी भविष्यवाणी के… श्वेत दाढ़ीवाले ऋषि के प्रकार जो बोलते हो… लेल को भी कब से कुछ बताना था… (चेली को बुलाते हुए) ज़ोर्याना! पानी लाओ!

    युवती पानी से भरा एक सुंदर पात्र लाकर प्रिलेस्ता के हाथों में दे देती है, फिर चली जाती है। हाथों में पात्र लिए और आँखें बंद किए प्रिलेस्ता कुछ देर के लिए स्तब्ध रह जाती है, बस उसके होठ कुछ फुसफुसा रहे हैं। फिर आँखें खोलकर वह ध्यान से पानी को घूर रही है।

    प्रिलेस्ता – तुम दोनों के स्वभावों में समानताएँ पर्याप्त हैं, सुंदर देवों…पर भाग्यों में धरती-गगन का अंतर है। एक को है भूला जाना जब दूसरे को विश्व-भर में फैलना… और इन दोनों में कौनसा भाग्य श्रेष्ठ है – उतना आसान नहीं है यह कहना… कि एक फूल को खिलते ही उखाड़ा जाना है, दूसरे को उगकर, वृक्ष बनकर उनको भी छाया देना है जो इसका मूल्य समझेंगे ही नहीं… जिसकी कहानी छोटी है, उसकी बताती हूँ पहले… हाँ, लेल, तुम भूले जाओगे… पता है, तुम्हारी यह महत्वाकांक्षा भी नहीं है कि लोग तुम्हें स्मरण रखें, किंतु… इस भूमि की जो मौज-मस्ती व सुंदरता है वह तब तक ही बनी रहेगी जब तक तुम्हारे सौंदर्य भरे गीतों को गुनगुनाती रहे… तब तक स्वस्थ जोड़ियाँ एक दूसरे का हाथ थामे ग्रीष्म संक्रांति की रात के अलाव के ऊपर से छलांग लगाएंगी… और चांदनी के सिवा कुछ न पहने सुंदरियाँ नदी में मोमबत्तियों से सजे फूलों के सेहरे बहाएंगी अपने प्रेम-पात्र की ओर… उस सब में पूर्णता तथा शुद्धता रहेगी… पर जिस दिन प्रेम की सहजता व दिव्यता खो जाए तथा प्रकृति-पूजा बंद हो जाए तब मृत्यु देवी झूम उठेगी तथा पक्षी सी मुक्त चेतना के पंख तोड़ डालेगी…

    लेल – सुनने में तो डरावना ही लगता है… तुमने सही कहा, प्रेम-देव बने रहने की कोई महत्वाकांक्षा मेरी नहींहै, न कोई आपत्ति है भूले जाने से… किंतु सुरीली स्लाविक चेतना का यह भाग्य… यह सब क्यों होगा अंततः?

    प्रिलेस्ता – बाहर से अंधकार तभी आ पाता है जब अंदर का दीया बुझ जाए… समुद्रों पार से जो भी त्रासदी आए उसके टिक पाने का आयोजन तो यहीं पहले से होता है… युद्धों व प्रतिदिन की कठिनाइयों के कारण स्वयं के दिव्य होने पर से लोगों का विश्वास उठेगा… फिर दक्षिण से विचित्र धारणाओं का प्रचार आकर फैलेगा जिस से लोगों की सोच बहकावे में फंसे अब तक अनजाने दास्य भाव को पालने में लगेगी… फिर मानव को प्रकृति से और आत्मा को परमात्मा से जिस गर्भनाल ने जोड़ रखा था वही कट जाएगा… यीशू के नाम!

    कृष्ण (आश्चर्य से) – यीशू? पहले भी कई बार यह नाम भविष्यवाणियों में उभरा है, इतना सुना है मैंने… उसी को लेकर यह जगत घबराया क्यों लगता है? उससे पहले भी तो आ जाएंगे कई महान पुरुष। सिद्धार्थ को ही ले लो… उतना कोलाहल तो नहीं है उसको लेकर !

    प्रिलेस्ता – जैसे सूर्योदय की प्रतीक्षा प्रकृति करती है सुखद मौन में, वैसे ही यह धरती प्रतीक्षारत है सिद्धार्थ के जनम की… किंतु यीशू का आना रक्त से रंगी एक भोर है… यद्यपि वास्तव में वह एक महात्मा ही है।

    लेल – महात्मा से क्या हानि हो सकती है फिर?

    प्रिलेस्ता (दुखपूर्वक मुस्कुराकर) – महात्मा से नहीं, उसको महात्मा कहनेवालों से… जब दास्य-भाव से पीड़ित लोगों के समाज में अचानक कोई एक अपनी मुक्ति व दिव्यता की खोज कर ले और उससे प्रेरित होकर बोले : “देखो, मैं भगवान हूँ!” तो कितनी आशा है कि लोग यह बात समझेंगे सही ढंग से? (कृष्ण से) तुम ही बताओ, तुम्हारे देश के साधु तपस्या और ध्यान करके जब यह घोषित करते हैं कि  “मैं ही परमात्मा हूँ!” तो सुननेवाले उससे क्या संदेशा प्राप्त करते हैं?

    कृष्ण – यही कि मानव चेतना को ब्रह्मांड की चेतना से अपनी अखंडता का अनुभव हुआ है। अहं ब्रह्मस्मि! सिद्धांत के रूप में तो सब जानते हैं यह बात पर घोषित बस वही करेगा जिसने गहरे से जाना हो…

    प्रिलेस्ता – वही तो! उसी शरीर को वे परमेश्वर समझकर उसी की पूजा तो नहीं करने लगेंगे न! और कर भी लें तो प्रतीकवादी ढंग से। कोई नहीं कहेगा  : “यही परमात्मा है जो मानव बनकर उतर आया है हमारे बीच, और शेष सब झूठे हैं!” पर यीशू का यह भाग्य देखो! उसके परमात्मा होने का सीधा सा अर्थ निकालेंगे वे लोग! और दूसरे जो न मानेंगे इस बात को उसकी हत्या कर देंगे सूली पर चढ़ाकर! और माननेवालों के नए धर्म में यीशू के जीवन की तुलना में उसकी उस मृत्यु का अधिक महत्व रहेगा, वही चित्रित करते फिरेंगे सभी स्थान। फिर ऊपरवाले का अपना यह कृत्रिम व भयानक रूप विश्व भर पर थोपने का प्रयास करेंगे शेष सारी धारणाओं व सोचों को पाप से भरे व राक्षसी ठहराकर, उन सब को नष्ट करते हुए! यीशू से उनका तथाकथित “प्रेम” महाहिंसा को सुकर्म कहने का मात्र तर्क रहेगा! ब्रह्मांड की चेतना के उदाहरण के रूप में स्वयं को देना चाहकर यीशू रह जाएगा केवल महाबुत बनकर… उसी की अपनी भूल वह होगी… अपने समाज में परिवर्तन लाने का इच्छुक वह उत्सुकता से सत्य बोलेगा समाज की “योग्यता” को बिना भांपे! उतनी भयानक मृत्यु भी इसीलिए तो होगी… और उसके अनुयायी फिर आ जाएंगे यहाँ और लेल जैसे सहज व दिव्य पात्रों के हर स्मरण का विनाश करेंगे…

    लेल (आश्चर्य में हथेली से माथा पकड़के) – धारणा तो कोई भी अपनाओ, परंतु… दूसरों पर क्यों वह थोपा जाए! आध्यात्मिक सोच किसी की भिन्न हो – यह शत्रुता का कोई कारण है?!

    प्रिलेस्ता – जो मानसिक तथा धार्मिक पाबंदियों से स्वयं को बांधकर अंदर दुखी रहता है, वह दूसरों को सुखी क्यों होने देगा! यही सब से बड़ा संकट है आनेवाले युग का, अंदरूनी असंतुष्टता का कारण समझने और समाधान ढूँढ लेने के बजाय उसको हिंसा में परिवर्तित होने देंगे लोग। यीशू तथा उसके पश्चात आनेवाले मुहम्मद के शिष्यों का यही रक्तरंजित दान रहेगा आध्यात्मिकता के पतन में… और कृष्ण का देश भी बचकर न रह पाएगा  उस से…

    कृष्ण (कड़वी मुस्कान से) – शिष्यों से ही अधिकतर आते हैं संकट… इसीलिए “गुरु” कहलाना व्यर्थ है, कहीं अपने ही चेलों पर लज्जा न आए फिर…

    प्रिलेस्ता (हँसकर) – लज्जा से तुम तो बच गए, पर चेलों से नहीं! हाँ, “गुरु” बनकर तुमने कभी नहीं सिखाया है, तुमने जिया है पूर्णता से, बस! तुम्हारी जीवनी के तो ग्रंथ रचेंगे, मंदिर बनेंगे भी तुमको समर्पित। विस्मरण का नहीं है कोई लक्षण। किंतु तुम्हारी दिव्य जीवन-शैली से प्रभावित होकर तुम्हारे भी उस “अहं ब्रह्मस्मि” को भिन्न प्रकार से समझने लगेंगे लोग… बचपन से ही रहे तुम उतने आकर्षक और मुक्त कि मिथकों में तुम प्रारंभ से ही रहोगे आदर्श – सरूप देवता, नारायण, आदिपुरुष… सब बोलेंगे : “भगवान हुआ अवतरित, स्वयं विष्णु!”  और विष्णु के अवतार से कोई भूल हो ही नहीं सकती… कोई नहीं कहेगा : “स्वयं की दिव्यता विकसित की उसने ढेर सारी कष्ट उठाकर”… उनकी दृष्टि से तुम जनम से अतिचेतना लेकर आए थे, अपनी भूलों से सीखते आत्मविकास का अधिकार नहीं मिलेगा तुमको… तुमने जो कुछ किया हो जीवन में, “भगवान की लीला” वह कहलाएगा। बचपन की सब लड़ाइयों का भी निकलेगा  “दिव्य अर्थ”। जिन पशुओं को भी मार डाला था आत्मरक्षा करते हुए, क्रोध में या डर से, वे सब निकलेंगे “राक्षस“ जो आये थे दुष्ट योजना लेकर तुमहारा वध करने की…

    कृष्ण (आश्चर्य से) – अरे! यह तो निरादर हो गया उन जीवों का!

    प्रिलेस्ता (हँसकर) – मनुष्य से पशु तो बुद्धिमान हैं इस विषय में,  अपनी सुख्याति की चिंता नहीं पड़ी है उनको। तुम जीवन सीख रहे थे… और मरने-मारने का यथार्थ प्रकृति से अधिक कहाँ मिलता है देखने को…

    कृष्ण –  हाँ, मैं अधिक ही चंचल था प्रारंभ से ही, अतिसक्रिय, जोश से भरा… ऐसे बच्चों से क्या नहीं होता है, विशेषकर जब स्वतंत्रता-प्रिय परिवेश में पाले जाएँ।

    प्रिलेस्ता – हाँ, बुद्धिजीवियों तथा प्रकृति-प्रेमियों के परिवेश में तुम बड़े हुए जिस में बच्चे का भी परामर्श लेने से लज्जा नहीं करते थे वृद्ध, हाँ  यदि परामर्श वह अच्छा हो। किंतु… तुम्हारी जीवनी प्रतीकों से नहीं भरेगी कुछ अधिक ही? भविष्य वालों को तो सीधा अर्थ निकालने की बहुत आदत रहेगी।  कई तो सच मान बैठेंगे यह बात कि इंद्र के क्रोध से अपने लोगों को बचाने के लिए तुमने उंगली  पर वह पहाड़ उठाया था!

    कृष्ण (हँसकर) – अरे नहीं! मैंने बस इतना कहा था बड़ों से कि प्रकृति के परिवेश में रहकर अदृश्य देवों की यह पूजा छोड़ो, इतना जब सौंदर्य भरा है जीवन चारों ओर तो इसी की स्तुति गाओ! चाहो तो इस पहाड़ी को ही पूजो जो इंद्र से तुम्हारे कहीं अधिक  निकट तथा विद्यमान है, जबकि इतना सारा कुछ मिलता है हम को इससे! वृद्धों ने प्यार से तब सराही मेरी बात। वर्षा भी रुक गई कुछ दिनों में तो परिहास के रूप में सब कहने लगे कि मैंने ही रुकवाई!

     प्रिलेस्ता – अच्छा हुआ वह सब, किंतु अपने असपास की प्रकृति को अधिक भाव न देकर कितने लोग जाएंगे उसी पहाड़ी का परिक्रमा लगाने, जानते हो? (कृष्ण बेबसी के भाव से सिर हिलाता है) विचित्र नहीं लगेगा लोगों को कि ऐसे चमत्कार बस मिथकों में होते हैं तथा उनको प्रदर्शित करनेवाले पात्र केवल अतीत-भविष्य में… वर्तमान में असंभव!

    कृष्ण (हँसकर) – सही कहा है तुमने, उससे बड़ा तो यह था चमत्कार कि गंभीरता से मेरी बात सुनी थी मेरे उन अपनों ने जिनको बहुत सताया था बचपन से… वह मेरी नटखटी ही मेरी दृष्टि से पर्याप्त है कि मानव का बच्चा ही समझा जाए मुझको!

    प्रेलेतस्ता – यही तो दिक्कत है कि स्वयं के बच्चों को देव न मानकर तुम्हारे उन किस्सों का आनंद लोग उठाएंगे। अपना बच्चा करे – तो डांट या मार!

    कृष्ण – ऐसा नहीं है कि मुझे नहीं पड़ती थी!

    प्रिलेस्ता – किंतु सिखाएंगे वही कि परमेश्वर होकर वह करे कुछ भी, पर तुम रहो सीमाओं में, नहीं तो पाप लगेगा! और थोड़े बड़े होकर वे अधिक प्रश्न न उठाएँ इसलिए जो रास-लीलाएँ तुमने रचाईं  गोपियों के साथ उनसे शारीरिकता हटवाएंगे, मधुर मिलन का मात्र आध्यात्मिक पक्ष ही प्रकाश में लाकर। संदेह न हो तो यह भी दावे से बताया जाएगा कि तुम छोटी आयु के थे उन सब घटनाओं के समय… अब सोचो जिस प्रेम-लीला से तुम्हारी राधा के मन-शरीर दोनों को ही आध्यात्म को प्राप्त होने का अनुभव मिला था, वह एक दस वर्षीय  बालक की कैसे हो देन?

    कृष्ण (माथा सहलाते हुए) – समझ में नहीं आता है हँसूँ या रोऊँ… अब कुछ भी प्रतीकात्मक ढंग से देखा या समझाया जाए, कुछ तर्क तो होना चाहिए उस में! शारीरिकता से इतना बैर क्यों?!

    प्रिलेस्ता – सब वस्तुओं-घटनाओं के मूल कारण मैं भी नहीं देख पाती हूँ… बस ये कई उदाहरण दिए हैं कि प्रकृति से होती जाती दूर मानव की चेतना में जीवन-विकास का सहज क्रम कितनी कृत्रिमता से समेटा जाएगा… इतना मैं कह सकती हूँ कि उन्ही यीशू तथा मुहम्मद की नई धारणाओं में अपना शरीर ही मानव का प्रथम शत्रु बनेगा… और ऐसा हो तो मानस कैसे स्वस्थ रहे! उस सब का छाप तुम्हारे अतिसुंदर भारतवर्ष पर भी पर्याप्त पड़ेगा… तुम, कृष्ण, भूले नहीं जाओगे किंतु लोगों के तुमको समझने-पहचानने में विकृतियाँ आ जाएंगी… (मुस्कुराकर) फिर भी उससे तुम्हारा यह चरित्र कम उज्ज्वल तथा आकर्षक नहीं बनेगा। इन सब विचित्र परिवर्तनों में भी तुम चेतना-पुनर्जन्म की एक संभावना बनकर लोगों को प्रेम और दिव्यता की ओर खींचते रहोगे, भला वह उनका अनुभव किया खिंचाव अचेत भी क्यों न हो!

    कृष्ण मौन में उदासी और कृतज्ञता भरी दृष्टि से प्रिलेस्ता को देख रहा है।

    लेल (मुस्कुराकर) – जैसा भी हो, इस बात की तो प्रसन्नता हुई है कि उस बदले हुए संसार को भी चमकाते तुम रहोगे, भाई! उसी से हम सभी की जीत प्रमाणित होगी प्रलय-युग में!

    कृष्ण (भावुकता से) – तुम्हारा ही तो दूसरा नाम हूँ, भाई! (मुस्कुराकर) उतना तो अवश्य चमकाने का प्रयत्न करूँगा कि तुम भी स्मरण आओ लोगों को एक दिन…

    प्रिलेस्ता (थकी हुई, पानी में देखते हुए) – बस! आगे कुछ नहीं दिखता… धुंधला सा हो गया…

    कृष्ण – कैसे नहीं होगा, पहले से जो इतना झमेला है! बस, रहने दो, देवी… (हाथ जोड़कर) साधुवाद!

    लेल कृतज्ञता में अपना दाया हाथ अपने हृदय पर रखकर हलका सिर झुकाता है। प्रिलेस्ता हलका मुस्कुराकर पानी का पात्र सामने धरती पर रखती है और स्वयं विश्राम-मुद्रा में बैठी हुई आँखें बंद कर लेती है।

    लेल (चंचलता से) – बस एक ही बात समझ में नहीं आई। अधिक प्रसन्नता की बातें तो नहीं बताई  तुमने… फिर क्यों बताना चाह रही थी मुझको यह इतने दिनों से? मेरे हँसते हुऐ चेहरे से ऊब गई थी क्या?

    प्रिलेस्ता (बिना आँखें खोले हँसकर हलका सिर हिला लेती है) – बहाना ढूँढ रही थी तुमसे बात करने का। यह डायन तो बिना डराए भला किसी से बात करती है क्या! तुम कम डरते हो मुझसे तो यही उपाय था। संसार का भाग्य जाए भाड़ में…

    लेल (उसको ध्यान से देखकर) – मात्र नैन बंद होने से आँसू  नहीं छुपते… इतनी भी साहसी मत दिखा करो… भारी तो पड़ रहा है तुमको यह सब जानना…

    प्रिलेस्ता (आँसू भरे आँखें खोलकर, कठोरता से) – अब तुम लोग जाओ! (लेल से) कल कृष्ण जा रहा है न? इसको जब छोड़कर लौटो तो आ जाना रात को…

    लेल और कृष्ण भावुकता-भरे मौन में उठकर प्रिलेस्ता को प्रणाम करते हैं, फिर मंच से चले जाते हैं। कुछ देर तक प्रिलेस्ता उनको जाते हुए देखती है, उसकी आँखों से आंसू बह रहे हैं… फिर जैसे होश में आकर वह सिर हिला लेती है, आंसू पोंछती है।

    प्रिलेस्ता (चेलियों को पुकारते हुए) – ज़ोर्याना, क्विताना! इस स्थान को ठीक करो, सामान ले जाओ! शहद की मदिरा फिर लेकर आना घर पर! आज पीना है मुझे …

    उठकर मंच से चली जाती है। युवतियाँ आकर पानी भरा पात्र, डफली आदि लेकर चली जाती हैं।           

                     

                                                           दृश्य 4

    भोर का समय। स्लाविक बस्ती के बाहर का चौराहा। दूर से प्राचीन उक्राइनी लोक-गायन सुनाई देता है। कृष्ण मंच पर आता है। शॉल  ओढ़ा हुआ है, कंधे पर प्राचीन प्रकार का कढ़ाई वाला थैला। रुककर प्रेम-करुणा भाव से अपने असपास देख रहा है। फिर लेल भी दोड़कर आता है।

     

    लेल – थोड़ी सी देर लगी, एक काम था, भाई… तुम्हारा मन नहीं बदला है? रुकते और थोड़ा…

    कृष्ण (मुस्कुराकर) – आजीवन भी यदि रुकता तो थोड़ा न भरता हृदय इन गीतों से! किंतु अपनी धरती की भी पुकार अद्भुत होती है… तुम भी आ जाना किसी दिन! (हँसकर) किंतु उसके लिए तुम्हें यहाँ एक महायुद्ध रचवाने की आवश्यकता नहीं है! (थोड़ा हिचककर) अभी साथ जाने को नहीं बुला रहा हूँ, क्योंकि…

    लेल (भावुकता से) – जानता हूँ! अकेले में तुम्हारे इस प्रस्थान का मैं महत्व भाँप सकता हूँ, भाई… यह भी लगता है कि यदि एक वर्ष पश्चात मैं आ भी जाऊँ तो तुम नहीं मिलोगे…

    कृष्ण भावुक होकर उसको गले लगाता है। फिर थोड़ी चिंता के साथ आसपास दृष्टि घुमाता है।

    कृष्ण – रुसावा नहीं आई… यद्यपि जानती है कि जा रहा हूँ…

    लेल (मुस्कुराकर) – यही तो काम था! उसके घर की फूलवाड़ी देखकर आ रहा हूँ… वहीं थी वह, पौधों की ओस बटोर रही थी… सुरीले आनंद में तुम्हारा नाम भी गा रही थी… एक बूंद भी दुख नहीं था उसमें! मैं स्पष्ट सा अनुभव कर पाया, भाई, वह है प्रबोधन, बावलापन नहीं…

    कृष्ण (प्रसन्न होकर) – जय हो तुम्हारी, भाई, तथा तुम्हारी प्रेम भरी धरती की! अब मेरी यात्रा निश्चय होगी शुभ!

    लेल – महानता में अनुपम भारतवर्ष को हमारा देना प्रेम!

    दूर के गायन का स्वर थोड़ा ऊंचा बजता है। दोनों फिर गले लगाते हैं। फिर भिन्न भिन्न ओर मंच से चले जाते हैं। 

     

     

    क्रमश:

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