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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    भारतीय अंग्रेजी साहित्य का तीसमारखां

    By December 14, 20113 Comments6 Mins Read

    अपनी प्रेमिकाओं, शादियों, तलाक और विवादस्पद बयानों के लिए लगातार चर्चा में रहने वाले सलमान रुश्दी ने ३० साल पहले एक उपन्यास लिखा था ‘मिडनाईटस चिल्ड्रेन’, जिसने भारतीय अंग्रेजी साहित्य का परिदृश्य ही बदल दिया था. अब उस उपन्यास पर दीपा मेहता की फिल्म आने वाली है. ३० सालों में उस उपन्यास ने क्या मुकाम हासिल किए, उसका क्या प्रभाव रहा, इसको लेकर यह लेख- जानकी पुल.





    इस साल प्रसिद्ध फिल्म-निर्देशक दीपा मेहता ने श्रीलंका में ‘मिडनाईटस चिल्ड्रेन’ फिल्म की शूटिंग पूरी कर ली. फिल्म सलमान रुश्दी के उस प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित है जिसके प्रकाशन का यह 30 वां साल है. जब इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध गार्डियन वीकली ने २० वीं शताब्दी की सौ महान पुस्तकों की सूची पाठकों के मतों के आधार पर तैयार की थी तो ‘मिडनाईटस चिल्ड्रेन’ उसमें २५ वें स्थान पर था. प्रसंगवश, उस सूची में गाब्रियल गार्सिया मार्केज़ का उपन्यास ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिट्यूड’ ८ वें स्थान पर था. मार्केज़ के इस महान उपन्यास से सलमान रुश्दी के इस उपन्यास की तुलना करते हुए यह कहा जाता है कि भारतीय अंग्रेजी साहित्य के लिए ‘मिडनाईटस चिल्ड्रेन’ उसी तरह है जिस तरह लैटिन अमेरिकन साहित्य के लिए मार्केज़ का उपन्यास ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिट्यूड’. दोनों ने अपनी भाषा, अपने क्षेत्र के साहित्य को अंतर्राष्ट्रीय फलक पर स्थापित कर दिया.
    प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार(१९८१) से सम्मानित इस उपन्यास की कथा सलीम सिनाई नामक ३० वर्षीय वह युवक सुनाता है जिसका जन्म अन्य कुछ बच्चों के साथ १५ अगस्त १९४७ की आधी रात को उस समय हुआ था जब देश आज़ाद हुआ था. यह केवल सलीम सिनाई की कथा ही नहीं है उसके साथ-साथ देश के बनते सपनों और उनके बिखरने की दास्तान भी इस उपन्यास में लेखक ने कही है. सलीम सिनाई का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जिसने अपनी यात्रा कश्मीर से शुरु की थी, ऑक्सफोर्ड दीक्षित उसके डॉक्टर दादा १३ अप्रैल १९१९ को अमृतसर के जलियांवाला बाघ में मौजूद थे जहाँ उस दिन भयानक नरसंहार हुआ था. १९४२ का आंदोलन उसके माता-पिता ने आगरा में देखा था. भारत-विभाजन के  जैसे इतिहास के प्रसंगों के गुमनाम गवाह की तरह उसके पुरखे मौजूद रहे थे उसी तरह सलीम सिनाई आज़ादी के बाद देश की घटनाओं का गवाह बनता है. इक तरह से यह उपन्यास २० वीं शताब्दी के पहले ७५ साल की कथा कहता प्रतीत होता है, वह भी सामान्य आदमी के ‘पॉइंट ऑफ व्यू’ से. आज़ाद भारत में अल्पसंख्यक करार दे दिए गए समुदाय के एक सामान्य आदमी की जुबान से.
    लेकिन आज ‘मिडनाईटस चिल्ड्रेन’ को याद करने का कारण उसकी यह खंडित महाकाव्यात्मक कथा नहीं है, न ही वह राजनीति जिसने इस उपन्यास को लगातार प्रासंगिक बनाये रखा है. हो सकता है इसकी असाधारण कीर्ति के उपरोक्त कारण भी हों लेकिन इसके कई अनेक कारण भी हैं. सबसे पहला तो कारण यह दिखाई देता है कि इसने भारतीय अंग्रेजी साहित्य को विश्व स्तर पर स्थापित किया. १९३० के दशक में आर. के. नारायण, राजा राव, अहमद अली जैसे भारतीय उपन्यासकारों ने जब अंग्रेजी में लिखना शुरु किया था तब उनको अपनी किताबें छपवाने के लिए ही बड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी क्योंकि औपनिवेशिक गुलामी झेल रहे देश के लेखक अंग्रेजी में लिख सकते हैं, प्रकाशकों-आलोचकों को इस बात पर ही विश्वास नहीं होता था. करीब ५० साल बाद सलमान रुश्दी ने न केवल एक ऐसा उपन्यास लिखा जिसने भारतीय अंग्रेजी साहित्य का लोहा मनवाया बल्कि भारतीय अंग्रेजी लेखन का एक नया मुहावरा भी तैयार किया, जो अगले २०-२५ सालों तक भारतीय अंग्रेजी गल्प के मुहावरे के तौर पर जाना जाता रहा.
    सामान्य तौर यह कह दिया जाता है कि इस उपन्यास की शैली ‘जादुई यथार्थवाद’ की है, उसी तरह जैसे ‘वन हंड्रेड इयर्स’ के लेखक मार्केज़ की रही है. लेकिन इतिहास और स्मृति की इस कथा को केवल मार्केज़ की परंपरा का लेखक नहीं कहा जा सकता. स्वयं सलमान रुश्दी भी यह मानते रहे हैं कि उनके लेखन पर जर्मन लेखक गुंटर ग्रास का गहरा असर रहा है. उन्होंने गुंटर ग्रास के निबन्धों के एक संकलन की भूमिका में यह लिखा भी है कि उनके उपन्यासों में सीधे-सीधे राजनीतिक कथा नहीं दिखाई देती है लेकिन यही गहरे अर्थों में उसकी राजनीति है. स्वयं सलमान रुश्दी के इस उपन्यास के बारे में भी यही बात कही जा सकती है. गुंटर ग्रास के ‘टिन ड्रम’ की तरह ही ‘मिडनाईटस चिल्ड्रेन’ में भी इतिहास और वर्तमान की मुठभेड़ है, ‘कॉस्मिक-कॉमिक’ का चक्कर है और एक विखंडित महाकाव्य रचने का उपक्रम है. सलमान रुश्दी के उपन्यास का नायक इतिहास का बोझ अपने कंधे पर उठाकर नहीं चलता बल्कि वह इतिहास की धूल को झाड़ता चलता है, कहीं-कहीं तो वह इतिहास बोझ की तरह लगने लगता है.
    केवल कथा के स्तर पर ही नहीं वर्णनात्मकता के स्तर पर भी ‘मिडनाईटस चिल्ड्रेन’ अनेक अर्थों में मील के पत्थर की तरह है. न तो इसमें ‘क्वींस लैंग्वेज’ में दक्षता प्रदर्शित करने का भाव है, न ही इसमें भारत के सपने का गौरव-गान है. भारत में अंग्रेजी में लिखा गया यह शायद पहला उपन्यास है, जो तार्किकता की पश्चिमी परंपरा के स्थान पर देशी मौखिक परंपरा को महत्व देता है. इसी कारण इसको उत्तर-औपनिवेशिक उपन्यास परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण उपन्यास माना जाता है क्योंकि भाषा और लेखन दोनों ही स्तरों पर यह इतिहास की तथ्यपरकता नहीं उस मौखिक परंपरा को महत्व देता है जो ऐतिहासिकता दबाव से पूरी तरह से मुक्त है. यह एक ऐसी लोकप्रिय शैली बनी जो बाद में एक तरह से उत्तर-औपनिवेशिक अंग्रेजी लेखन की पहचान बन गई. जैसे स्पैनिश भाषा में लिखे जाने के बावजूद मार्केज़ के उपन्यास ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिट्यूड’ को अनुवाद के माध्यम से हर भाषा और समाज ने अपनाया, उनको यह उपन्यास अपना-अपना लगा. उसी तरह से सलमान रुश्दी के इस उपन्यास ने तीसरी दुनिया, विशेषकर भारतीय उप-महाद्वीप की पहचान का मुहावरा बन गया, जिसको ‘एक्जाटिक’ कहा गया. कहा गया कि अंग्रेजी के पाठक सीधी-सरल कथाओं से ऊबे हुए थे, उनको ‘मिडनाईटस चिल्ड्रेन’ के माध्यम से सलमान ने एक नया परिवेश दिया, नई कथात्मकता दी.
    अकारण नहीं है कि इस उपन्यास से भारतीय उप-महाद्वीप के अंग्रेजी लेखन का ‘बड़ा’ बाज़ार तैयार हुआ. देखते-देखते अमिताव घोष, विक्रम सेठ, अरुंधती रे जैसे न जाने कितने लेखक अंग्रेजी साहित्य के बड़े ब्रांड नेम बन गए. बड़े-बड़े एडवांस चेक, बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों ने उनकी धमक दुनिया भर में जमाई. आज भले भारतीय अंग्रेजी उपन्यासों का वह सुनहरा दौर बीत चुका है, और अफगानिस्तान-पकिस्तान के अंग्रेजी लेखकों की चर्चा सुनाई दे रही है. लेकिन इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस चर्चा के पीछे कहीं न कहीं सलमान रुश्दी के ‘मिडनाईटस चिल्ड्रेन’ की गूँज सुनाई देती है.
    तीस सालों में ‘मिडनाईटस चिल्ड्रेन’ ने अपनी लोकप्रियता, महानता को अनेक स्तरों पर साबित किया है. जब १९९३ में बुकर पुरस्कारों के २५ साल पूरे हुए तो उस अवसर इस उपन्यास को ‘बुकर ऑफ बुकर्स’ का पुरस्कार दिया गया, २००८ में बुकर पुरस्कार के ४० साल पूरे होने के अवसर पर इसे बुकर पुरस्कार प्राप्त होने वाले उपन्यासों में सर्वश्रेष्ठ उपन्यास घोषित किया गया. तीस सालों बाद निस्संदेह दीपा मेहता की फिल्म सलीम सिनाई के मुँह से कही गई कथा को नया आकार देगी, उसके सपनों को नया विस्तार देगी. ‘मिडनाईटस चिल्ड्रेन’ एक ऐसे यथार्थ की कथा है जिसने भारतीय अंग्रेजी साहित्य को जादुई विस्तार दिया.
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