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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    किन्नर कौन होते हैं?

    By September 28, 20119 Comments10 Mins Read

    प्रसिद्ध लेखक एस. आर. हरनोट की कहानियां अक्सर हमें कुछ सोचने के लिए विवश करती हैं. उनकी अनेक कहानियों में हिमाचली संस्कृति, वहां की परम्पराओं के प्रति गहरी चिंता दिखाई देती है. आज उनकी एक कहानी ‘किन्नर’. किस तरह किन्नौर के लोगों के लिए प्रयुक्त होने वाला यह शब्द कालांतर में एक समुदाय विशेष के लिए रूढ़ हो गया. कहानी में इसी बात को लेकर विमर्श भी है- जानकी पुल.

    हिमाचल के जनजातीय जिला किन्नौर को कालान्तर में ‘किन्नर देश’ के नाम से जाना जाता था। इसके निवासी ‘किन्नर’ कहलाते थे। आजादी के बाद हिमाचल प्रदेश का जब पुनर्गठन हुआ तो यह प्रदेश का स्वतन्त्र जिला बना और इसी आधार पर इसका नामकरण हुआ ‘किन्नौर’। यहां रहने वाली जनजाति आज भी ‘किन्नर और किन्नौरा’ से जानी जाती है जिसे 1956 में भारतीय संविधान की अनुसूची में शामिल किया गया । फिर ‘हिजड़ा समुदाय’ को प्रिंट, इलैक्ट्रौनिक मीडिया,फिल्म जगत और कुछ तथाकथित लेखकों द्वारा ‘किन्नर’ कहना इस जाति का अपमान नहीं……? आश्चर्य तो तब होता है जब हमारा वह वर्ग जिसे हमारा देश बुद्धिजीवी वर्ग कहता है जिसमें लेखक सबसे समझदार और सजग माना जाता है, वही किन्नर शब्द का प्रयोग हिजड़ा समुदाय के लिए करने लग जाए तो उसे क्या माना जाए……अज्ञानता या बेवकूफी…..? मधुर भंडारकर की फिल्म ‘ट्रैफिक सिगनल’ इसीलिए हिमाचल में रिलीज नहीं हुई थी कि उन्होंने प्रमुखता से मीडिया में किन्नर शब्द का इस्तेमाल हिजड़ा समुदाय के लिए किया था! हिमाचल प्रदेश विधान सभा ने दो बार इस शब्द को गलत अर्थ में इस्तेमाल को लेकर कड़ा नोटिस लिया और निंदा प्रस्ताव पास किया। यही नहीं लोकसभा ने भी इसकी निंदा की है और उन्होंने भी सभी संस्थानों को पत्र लिख कर इस शब्द को गलत अर्थ में प्रयोग न करने का निवेदन किया है। यह जानकारी एक प्रोफेसर मित्र ने अभी दी है। किन्नर को लेकर राहुल सांकृत्यायन की कई पुस्तकें हैं जिनमें ‘किन्नर देश’ प्रमुख है। उन्होंने विस्तार से इस शब्द की और जनजाति की व्याख्या की है! इसके बाद दर्जनों पुस्तकें और शोध ग्रन्थ किन्नर साहित्य, इतिहास और लोकगीतों के साथ किन्नर जनजाति पर उपलब्ध है……इसलिए जो लोग किन्नर का अर्थ हिजड़ा करते हैं क्या फिर यह उपलब्ध साहित्य हिजडों का साहित्य है…? क्या यह हमारे संविधान, विधान सभा, हिमाचल प्रदेश, किन्नौर जिला और वहां के निवासी किन्नरों का सीधा-सीधा अपमान नहीं है…! अगर हमारे साहित्यकार बंधु ही इस शब्द को गलत अर्थ में प्रयोग करने लग जाएंगे तो हमारी उम्मीद किससे होगी….?
    2ः   ‘तोशिम किम’ किन्नौर का एक सांस्कृतिक त्यौहार है जिसे सर्दियों के दिनों में वहां के युवा और युवतियां किसी अकेले घर को चुन कर साथ रह कर मनाते हैं। इसे स्नेह और आदर का प्रतीक भी माना जाता है।
                 
     
    कहानी
    किन्नर               
    सर्दियों के दिन थे। किन्नर कैलाश पर हल्की बर्फबारी हुई थी। अब कभी भी पूरा ‘किन्नर देश’ बर्फ की चादर ओढ़ सकता था। इसलिए गांव के लोग अपने-अपने घरों में राशन, लकडि़यां और पशुओं के लिए घास-पत्ती जुटाने में व्यस्त थे। लोगों ने अंगूरी शराब का स्टाक भी जमा कर लिया था। हर घर में दो-चार बकरे मांस के लिए पहले से ही मौजूद थे। बर्फ गिरते ही उनका ‘देश’ बाकि दुनिया से कुछ महीनों के लिए कट जाएगा। युवा लड़कों और लड़कियों में गजब का जोश था। उन्हें ‘तोशिम किम’ त्यौहार का इन्तज़ार था।
                  बेलीराम किन्नर जिला परिषद का सदस्य हो गया था। यह पहली बार था जब किसी युवा ने राजनीति में प्रवेश करके और वह भी एक बिना किसी पार्टी के समर्थन के इलैक्शन जीता था। सत्ता और विपक्ष से जो उम्मीदवार खड़े हुए थे उनकी ज़मानत तक न बची थी। उसके घर में त्यौहार जैसा माहौल था। दिनभर लोग अपने-अपने काम में लगे रहते और शाम ढलते ही बेली राम के घर जुट जाते थे। खूब महफिल जमती। शराब चलती। बकरा कटता। खाने-पीने के बाद रात भर नाटी लगी रहती। सभी मिलकर गाते-बजाते और नाचते-झूमते। बेलीराम को भी नाचना पड़ता। उसे भीतर से खींच-खींच कर लोग ले आते और नाटी (माला नृत्य) में शामिल कर लेते। वह उनकी बाहों में बाहें डाल कर झूमने लगता। उसके पांव ढोल, नगाड़ों, शहनाई और करनाल के संगीत के साथ थिरकने लग जाते। गांव की ज्यादातर लड़कियां और लड़कें पारम्परिक पहनावों में नृत्य में शामिल होते। उनकी टोली में धीरे-धीरे लोग शामिल होने लगते। आंगन में लम्बी माला बन जाती मानो कूंजने आसमान में उड़ रही हों।
                  बेलीराम का पिता कई सालों तक पंचायत का प्रधान रहा था। इलाके में बड़ा रुतबा था। कोई भी सलाह-मशविरा उसके बगैर पूरा नहीं होता था। साठ साल में भी वह काफी चुस्त-दुरुस्त था। कद छः फुट के करीब। सिर के बाल बिल्कुल काले। चौड़ा माथा, लम्बी नाक और भरा हुआ चेहरा। सामने का एक दांत हल्का सा ओंठों के बीच से बाहर निकला दिखाई देता रहता। बिल्कुल उसी तरह जैसी कोई बच्चा दरवाजे की ओट से झांक रहा हो। उस दांत के मध्य रोपी छोटी सी सोने की तिल्ली रोशनी पड़ते ही ऐसे चमकने लगती जैसे भोर की कोई किरण जमी हुई बर्फ से टकराकर चौंध जाती हो। चेहरे पर झुर्रियां तो उग आईं थीं पर वे परधानी की ठीस और बड़े जमींदार की सम्पन्नता की ओट में ढलती उम्र का जरा भी एहसास नहीं होने देतीं। कानों में सोने के गोल रिंग पहने होते जो उभरे हुए मांसीली चमड़ी की परतों में भीतर को धंसते चले जा रहे थे। ऊनी लम्बे कुरते पर कमर में बंधी गाची खूब जचती। सिर की हरी टोपी में हमेशा सफेद फूल सजे रहते। भारी वोटों से बेटे की जीत की खुशी ने आंखों की चमक और भी तेज कर दी थी। पर भीतर हल्का सा यह मलाल भी था कि जिस कांग्रेस पार्टी की बरसों सेवा की उससे बेलीराम ने इलैक्शन नहीं लड़ा। यह कुछ-कुछ पार्टी के खि़लाफ बगावत जैसा भी था। बेली राम किन्नर की दो बहनें थीं। एक की शादी हो गई थी। दूसरी अभी दसवीं में पढ़ रही थी। बड़ी बहन भी इन दिनों मायके आई थी। मां के साथ दोनों कामकाज में हाथ बंटाया करतीं।
                  बेलीराम के पिता ने अपने लम्बे-चैड़े आंगन में खूब रोशनी की थी। घर के ऊपर बड़े बल्ब लगाए थे। घर बहुत बड़ा था। इस दो मंजिले मकान में सोलह कमरे और दो बड़े हाल थे। सामने बरामदा था। सलेटों की छवाई वाले इस घर की शोभा देखते ही बनती थी। अब चारों तरफ झमझमाती बिजली की रंग-बिंरगी लडि़यों ने तो इसमें चार चांद लगा दिए थे। घर के पिछवाड़े अस्थाई रसोई बनाई गई थी जहां पुश्तैनी कामकाजी रसोइए धाम पकाने में मशगूल रहते। आंगन के एक ओर लकडि़यों का बड़ा धूना जलता रहता पर उसके पास कोई नहीं बैठता। संगीत और शराब के नशे की गर्मी में सराबोर सभी नाचते रहते हैं।
                  इस ‘देश’ की यही रीत थी। परम्पराएं और ख़ासियत भी थी कि जब कोई खुशी आती तो लोग मिलजुल कर उसे बांटा करते। वे जितनी मेहनत करते उतना ही मनोरंजन भी होता। जैसे संगीत यहां के लोगों की नस-नस में भरा हो। लोग जब इकट्ठे होकर नाचते-गाते तो लगता ही नहीं कि कहीं कोई बैर भी रहा होगा। सभी एक परिवार, एक गांव और एक परगना हो जाते थे।
                  बेलीराम किन्नर को अपनी जीत के साथ ‘तोशिम’ का इंतजार भी था। पिछले ‘तोशिम’ में उसका एक लड़की सुनम से प्रेम हो गया था। सुनम ने बी0ए0 के बाद ला किया था और उसका सपना एक अच्छे वकील बनने का था। शहर में दोनों कभी-कभार एक दूसरे से मिलते-जुलते तो थे पर प्रेम जैसी कोई चीज उनमें कभी नहीं रही। इस बार सितम्बर में हुई किन्नर-कैलाश यात्रा में भी वे साथ गए थे। पर सुनम को अपनी सहेलियों से ही फुर्सत नहीं मिलती थी। इस कठिन और रोमांचकारी यात्रा के रात्री-पड़ाव में यात्रियों सहित बेलीराम और सुनम के दल इकट्ठे होकर नाटी डालते थे। इस तरह कभी-कभार उनकी आंखें जरूर दो-चार हो जाया करती। यह यात्रा ‘किन्नर देश’ की बड़ी धार्मिक यात्रा मानी जाती थी जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपार श्रद्धा और आस्था से किया करता था, इसलिए किसी के मन में भी कोई उल्टे-सीधे खयालात नहीं आते। बेलीराम किन्नर और सुनम हालांकि मन ही मन एक दूसरे को चाहने लगे थे लेकिन इसका इज़हार इस यात्रा में वे कभी नहीं कर पाए थे। किन्नर कैलाश पर पहुंच कर जब उन्होंने विशाल शिवलिंग और शिव-पार्वती के निवास स्थान के दर्शन किए तो वे अगाध स्नेह और श्रद्धा से आच्छादित हो गए। वह यात्रा तो समाप्त हो गई थी परन्तु उन दोनों के भीतर एक दूसरी ही यात्रा शुरू हो गई जिसे जाने-अनजाने वे दोनों अपनी-अपनी तरह से महसूस करने लगे थे। इसके बाद बेलीराम को किसी काम से शहर जाना पड़ा और फिर चुनाव के दिनों में ही आना हुआ था। हांलाकि एक-दो बार उस लड़की से मुलाकात तो हुई पर खुल कर बातें न हो सकीं। इसका उन दोनों को ही मलाल था।
         
                 
     ‘तोशिम’ शुरू होते ही गांव की लड़कियां एक खाली घर में इकट्ठी हो गई थीं। पहले दिन सभी ने मिल कर वहीं खाना बनाया और खाकर पूरी रात नाटी में झूमती रहीं थीं। दूसरे दिन उन्होंने गांव के सभी लड़कों को खाने पर आमन्त्रित किया था। अब यह सिलसिला तकरीबन पन्द्रह-बीस दिनों तक चलता रहेगा। लड़कियां अपने महमान लड़कों को तरह-तरह के पकवान बनाकर खिलाया करेगी। इनमें पोल्टू, रोटे, चिल्टे, सुतराले, रल, स्कन और सुनपोले के विशिष्ट व्यंजन होंगे। खूब शराब पिलाएगी। सभी साथ-साथ रहेंगे। गप्प-शप्प करेंगे। नाचेंगे। गांएगे। एक दूसरे को कथा-कहानियां सुनाएंगे। पहेलियां बुझाएंगे। हंसी-मजाक करेंगे। और इसी तरह आपस में कई जोड़ों के प्रेम सम्बन्ध भी बन जाएंगे ।
                 
                  लड़कियां दिन को अपने-अपने घरों में काम करतीं और सांझ होते ही उस खाली घर में इकट्ठी हो जाया करतीं। हालांकि इस में विवाहित महिला तथा पुरूष बहुत कम आते लेकिन विधुर तथा विधवाओं को अवश्य आमन्त्रित किया जाता।
                 
                  बेलीराम किन्नर को ‘तोशिम की पराम्परा’ कुछ अच्छी नहीं लगती थी। वह इस हक में नहीं था कि घर की बेटियां किसी पराए घर में साथ रहें और फिर लड़कों को बुला कर उनसे ठिठोलियां करें। प्रेम सम्बन्ध बढ़ाएं। इसके पीछे एक कारण यह भी था की उसके गांव की एक लड़की का पिछले ‘तोशिम’ में एक लड़के से प्रेम हो गया था। वे पूरे तोशिम में साथ-साथ रहे। कसमे-वादे हुए। जीवन भर साथ जीने-मरने की कसमें हुईं। लेकिन जब विवाह की बारी आई तो लड़के ने मना कर दिया। यह बात न केवल उनके मां-बाप को ही परेशान कर गई बल्कि गांव और परगने के लोगों ने भी इसका कड़ा नोटिस लिया। बात देवता समिति के पास गई। इससे पहले कि देवता लड़के को दण्डित करता वह घर से रफ्फूचक्कर हो गया। बारी आई उसके मां-बाप की। एक बकरा और बीस बोतलें शराब तथा पांच सौ एक रुपए जुर्माना भरना पड़ा। गांव-परगने में बेचारे मुंह दिखाने लायक न रहे। ऐसी औलाद से तो ना-औलाद ही भले। बात यहीं निपटती तो ठीक था पर लड़की का कलंक ऊपर से और लग गया। वह गर्भवती हो गई थी। जब उसे पता चला तो चुपचाप सतलुज में छलांग लगाकर किस्सा ही खत्म कर दिया।
                  जब बेलीराम किन्नर को खुद प्रेम का एहसास हुआ तो उसे ‘तोशिम’ अच्छा लगने लगा था। उनके गांव-इलाके में सरेआम लड़का-लड़की का मिलना अच्छा नहीं माना जाता था। पर ‘तोशिम’ या दूसरे त्यौहारों में इस तरह के मेल-जोल पर कोई पाबन्दी नहीं होती थी। इस दौरान यदि किसी लड़के का किसी लड़की से प्रेम हो जाता तो उन्हें शादी भी करनी पड़ती। इसके लिए दोनों पक्षों के घरवाले अपनी परम्पराओं के अनुसार उन

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