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    गाँधी टू हिटलर’ की कहानी ‘ज़रा हटके’ है

    By July 28, 2011430 Comments3 Mins Read


    फिल्म “गाँधी टू हिटलर’’ का कांसेप्ट प्रभावित करता है. द्यितीय विश्वयुद्ध के सबसे बड़े खलनायक हिटलर को लेकर, उसके अर्श से फर्श या कहें कि ‘बंकर’ तक का सफर फिल्म की कहानी का मुख्य हिस्सा है. इस कहानी से भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दो महानायक जुड़ जाते हैं, दो विचारधाराएँ जुड़ जाती हैं. गाँधी ने हिटलर को १९३९ में एक चिट्ठी लिखी थी इस महाविनाश को रोकने के लिए. दूसरी तरफ नेताजी सुभाष चंद्र बोस हैं जिनका मानना था कि आखिर जर्मन भी तो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे हैं, दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, इसलिए जर्मनी का साथ देने में कोई बुराई नहीं है. चाहे उसका नेतृत्व हिटलर जैसा मानवता का दुश्मन ही क्यों न कर रहा हो. प्रसंगवश, फिल्म में आज़ाद हिंद फौज को लेकर, उसके सैनिकों की भी कहानी है. यह कहानी इस तरह से शायद हिंदी फिल्म में पहली बार आई है. ये सारे प्रसंग मिलकर फिल्म को रोचक बना देते हैं. कहानी ही इस फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण है. दर्शक उसकी उत्सुकता में इस फिल्म को ज़रूर देखना चाहेंगे. यह अलग बात है कि ज़्यादातर लोग आजकल सिनेमा हॉल में नहीं घर में पाइरेटेड सीडी ही देखना पसंद करते हैं. लेकिन यह उत्सुकता उनको फिल्म की तरफ लाएगी ज़रूर.  
    बहरहाल, सिनेमा केवल कहानी ही तो नहीं होती. हिटलर की भूमिका निभाई है रघुवीर यादव ने. इस शानदार अभिनेता से उम्मीदें बहुत अधिक होती हैं. लेकिन उनका अभिनय ही फिल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी है. वे हिटलर की पैरोडी अधिक लगे हैं. मेरे जैसे रघुवीर यादव के चाहने वालों को बड़ी निराशा होगी. लेकिन उसकी प्रेमिका इवा ब्राउन के रूप में नेहा धूपिया का अभिनय प्रभावशाली बन पड़ा है. हिटलर के सहयोगी गोयबल्स की भूमिका में नलिन सिंह ज़रूर ध्यान खींचते हैं. पहली ही फिल्म में यह अभिनेता बड़ी संभावनाएं जगाता है और उसकी भूमिका याद रह जाती है. अमन वर्मा आज़ाद हिंद फौज के फौजी के रूप में खूब जमे हैं. अभिजीत दत्ता ने गांधी के रूप में ठीक-ठाक ही काम किया है.
    फिल्म का विषय जितना गंभीर है व्यावसायिक मजबूरी के कारण फिल्म वैसा गंभीर प्रभाव नहीं छोड़ पाती. यह शायद बाजार की मजबूरी होती है. क्योंकि कैसी फि फिल्म हो उसका बाज़ार वही है. और उस बाज़ार के खरीदारों के पास फिल्म को मापने का एक ही फॉर्मूला होता है. फिल्म में गाने भी हैं, लेकिन कुछ खास नहीं. गीत लिखे तो ठीक ही गए हैं, संगीत बहुत खराब है. फिल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी इसका संगीत ही है. वह सिनेमा के साथ मैच करता नहीं लगता.
    अपने पहले ही फिल्म में इतने साहसी विषय को उठाकर निर्देशक राकेश रंजन कुमार ने ध्यान तो खींचा ही है. कैसे कम बजट में ‘पीरियड फिल्म’ का प्रभाव छोड़ा जा सकता है यह इस फिल्म को देखकर समझ में आता है. फिल्म की कहानी पर व्यावसायिक दबाव बहुत अधिक दिखाई देते हैं लेकिन उनको कुशल संपादन के माध्यम से निर्देशक ने सँभालने का अच्छा प्रयास किया है. कुल मिलकर, फिल्म से उनका निर्देशन कौशल तो दिखाई देता ही है. एक बेहतर सम्भावना. मुम्बइया भाषा में कहें तो ‘कुछ हटकर’ बनाने का साहस ही उनको अलग पंक्ति में खड़ा कर देता है. राकेश रंजन कुमार को शुभकामनाएं दी जानी चाहिए कि उन्होंने का ऐसी फिल्म बनाई जिसे एक बार देखना अखरेगा नहीं. कौतुहल बना रहता है. कहानी भी चालू, मुम्बइया नहीं है. 

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