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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    संगीत सीखने के लिए एक जन्म काफी नहीं है

    By June 16, 2011125 Comments8 Mins Read



    पटियाला घराने की तीन गायिकाओं गिरिजा देवी, परवीन सुल्ताना और निर्मला अरुण(फिल्म अभिनेता गोविंदा की माँ) के ऊपर आज संगीतविद वंदना शुक्ल का लेख प्रस्तुत है- जानकी पुल.

    ब्रह्मांड में असंख्य जीव हैं असंख्य वनस्पति, हरेक की एक अलग जाति-प्रजाति, उनकी जातिगत विशेषताएं. जो प्रकृति द्वारा प्रदत्त और तयशुदा हैं, और एक दूसरे से स्वयं को अलग करती हैं! क्या ये प्रकृति ही है जिसने मनुष्य नामक जीव को भी ब्रह्मांड के निश्चित (तयशुदा)नियमों के अनुसार समान अंग प्रत्यंग दिए हैं नाक कान मुंह सब ,लेकिन बावजूद इसके अरबों मनुष्यों के चेहरों की बनावट अलग अलग? ,ना सिर्फ चेहरे बल्कि आवाज, दृष्टि, श्रवण शक्ति,घ्राण शक्ति सब भिन्न भिन्न ! मनुष्य के वे अन्तर्निहित गुण व विशेषताएं जिनको परिष्कृत कर वो स्वयं को सबसे अलग अनूठा पाने का स्वप्न देखता है पर क्यूँ चुनिन्दा कलाकार ही अपने लक्ष्य में सफल हो पाते हैं? क्या ये सचमुच भाग्य है, करिश्मा या मेहनत?
    आज सुविधाओं कि कमी नहीं, किताबों से लेकर इलेक्ट्रोनिक उपकरणों तक ज्ञान, जानकारियों का कमोबेश हर क्षेत्र में भण्डार भरा पड़ा है, लेकिन ये भी सच है कि कुछ बातें किताबों से पढकर या दृश्य देखकर नहीं सीखी जा सकतीं! क्यूंकि हर कला एक अन्तः-अनुभूति है,एक फीलिंग … वस्तुतः कला एक फूलों से भरी गहरी घाटी कि तरह होती है ,जिसमे जितने भीतर उतरेंगे उतनी खुशबू और सौंदर्य से सराबोर होंगे! ना सिर्फ स्वयं बल्कि कला प्रेमियों को भी अभीभूत करने कि अद्भुत क्षमता को परिष्कृत कर पायेंगे! ये सच है कि मनुष्य स्व निहित गुण अपनी बुद्धि और श्रम से उभारता है उन्हें जाग्रत करता है, लेकिन इन्ही चेष्टाओं से निर्मित कुछ चमत्कार ऐसे भी होते हैं जो हमारी समझ और ज्ञान-परिधि से बाहर होते हैं, और अंततः जिसे हम सिर्फ ईश्वरीय देन मान सकते हैं, कोई ऐसी विशेषता या हुनर, जो सबमे होते हुए भी किसी कलाकार, साहित्यकार को भीड़ से अलग करता हो, उसकी अपनी अलग पहचान के साथ, यही चमत्कार है यही दैवी शक्ति !जैसे संगीत में अनूठी आवाज़ और गूढ़ समझ! शास्त्रीय संगीत की परम्परा में अनेक श्रेष्ठ गायिकाएं संगीत जगत में अपनी कलात्मक उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं जिसमे हीरा बाई बदोड़कर, गंगूबाई हंगल, मालविका कानन, मालिनी राजुरकर, शोभा गुर्टू, किशोरी अमोनकर,प्रभा अत्रे, आरती अंकलेकर, अश्विनी भिडे आदि अत्यंत प्रसिद्द शास्त्रीय/उप शास्त्रीय संगीत गायिकाएं रही हैं! आज शास्त्रीय संगीत की कुछ ऐसी ही महान गायिकाओं का स्मरण करेंगे जिनकी आवाज़ में वो कशिश रही जिसमे श्रोताओं के दिल को पार कर आत्मा तक को स्पर्श करने कि तासीर रही !
    स्वर साम्राज्ञी –बेगम परवीन सुल्ताना
    पटियाला घराने की मूर्धन्य सुप्रसिद्ध गायिका बेगम परवीन सुल्ताना मूलतः आसाम की हैं! बचपन से उन्हें संगीत में गहरी रूचि रही !उन्होंने अपना सबसे प्रथम संगीत कार्यक्रम बारह वर्ष कि आयु में दिया था !उन्होंने पहले पंडित लहरी से संगीत की शिक्षा अर्जित की और उसके बाद उस्ताद दिलशाद खान से, जो बाद में उनके शौहर बने !यूँ तो संगीत के इतिहास में अनेक संगीत कलाकारों ने अपनी कला से आकर्षित किया, श्रोताओं को अभीभूत किया, जिसमे उनकी आवाज़, रियाज़ और लगन का बड़ा हाथ रहा लेकिन परवीन सुल्ताना उन चुनिन्दा शास्त्रीय गायिकाओं में से एक हैं जिन्हें ईश्वर ने एक ऐसी अनोखी और खूबसूरत आवाज़ से नवाजा जिसका कोई सानी नहीं था ना तब ना अब !और ,जिसे उनकी लगन और तालीम ने ‘’सोने में सुहागा’’बनाया ,खूबसूरत आवाज़ और एक गरिमामय व्यक्तित्व का एक रेयर कॉम्बिनेशन बख्शा गया उन्हें ईश्वर की तरफ से इसीलिए तो उन्हें ‘’Queen of Indian classical music ‘’कहा जाता है !तीन सप्तकों में स्वरों कि एक निर्विघ्न आवाजाही .इतनी सरलता और आसानी से इसे केवल कुदरत या खुदा का करिश्मा ही कहा जा सकता है! हालांकि इस तरह के दावे लोग अपने प्रस्तुतीकरण से करते रहे हैं ,लेकिन इतनी मुलामियत और सहजता से इतने कठिन स्वरों को लगाना जैसे स्वर इनके इशारे पर बह रहे हों अद्भुत होता है! वे चुनिन्दा खूबसूरत गायिकाओं में से एक रहीं !हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान के बाहर उनके प्रसंशकों की भारी संख्या है ! वो उन कलाकारों में से एक रहीं हैं, जिनके नाम मात्र से सभाग्रह पैक हो जाते थे ! ग्वालियर का तानसेन संगीत समारोह, देश के गिने चुने शास्त्रीय संगीत के आयोजनों में से एक होता था एक से एक विख्यात कलाकार अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे ,लेकिन शास्त्रीय संगीत के दो ही दिग्गज कलाकार ऐसे थे जिनके कर्यक्रम पूरी रात चलने के बावजूद, अमूमन वहां का विशाल पंडाल खचाखच भरा रहता था ,वो थे बेगम परवीन सुल्ताना और सुप्रसिद्ध सरोद वादक उस्ताद अमज़द अली खान !परवीन सुल्ताना की जादुई आवाज़ और अमजद अली खान के चमत्कारिक स्वरों के करिश्मे के अलावा इन्हें लोग सिर्फ सुनने ही नहीं देखने भी आते थे !
    यूँ तो परवीन सुल्ताना ने कुछ फिल्मों में भी गाया , जिनमे गदर,कुदरत,पाकीज़ा आदि हैं लेकिन कुदरत फिल्म का गीत ‘’हमें तुमसे प्यार कितना ,ये हम नहीं जानते,मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना (संगीत निर्देशक आर दी बर्मन) और फिल्म ‘’पाकीज़ा’’का कौन गली गयो श्याम ‘’सबसे अधिक पसंद किया गया !शास्त्रीय संगीत में जहा ख़याल गायन में इनको प्रवीणता हासिल रही वहीं शास्त्रीय सुगम संगीत में ठुमरी ,दादरा ,चैती ,कजरी,आदि बेहद पसंद की गईं! राग हंसध्वनी का तराना श्रोताओं की विशेष फरमाइश होता था वहीँ कबीर के भजन भी उतनी ही खूबसूरती से प्रस्तुत किये गए !फिल्म परवाना में 1971 में आशा भोंसले के साथ उन्होंने ‘’पिया की गली’’(संगीत-मदन मोहन )गीत गाया था !गज़ल भी वो उतनी ही मधुरता और डूब कर गाती , जितना शास्त्रीय संगीत का ख्याल !’’ये धुआं सा कह से उठता है’’उनके द्वारा गाई गई गज़ल काफी चर्चित रही !उप शास्त्रीय संगीत में ‘’टप्पा’’एक विधा है जिसे गाना सभी के वश कि बात नहीं होती इसकी वजह यह है कि इसमें आवाज़ और स्वरों को घुमाते हुए एक विशेष तरीके से बहुत संतुलित क्रम और सधे हुए स्वरों में गाया जाता है इस एहतियात के साथ कि जटिल स्वर-संरचना (composition) के बाद भी स्वर बिखरें नहीं! परवीन सुल्ताना को टप्पे में भी महारथ हासिल थी! उनकी आवाज़ जैसे बारिश की रिमझिम फुहारें! उनकी तानें झरने की तरह बहती तो अलाप उतने ही गंभीर और गहरे जैसे किसी गहरे कूप में से ऊपर को उठती ध्वनियाँ…! जितनी मिठास तार सप्तक में उतनी ही बुलंदी मंद्र सप्तक के स्वरों में, ये विविधता निस्संदेह एक कठिन साधना है !कठिन से कठिन तानें वो इतनी आसानी से लेती कि श्रोता आश्चर्य चकित रह जाते थे !


    संगीत की देवी-निर्मला देवी

    पटियाला घराना की एक और सुविख्यात गायिका निर्मला देवी उर्फ निर्मला अरुण! प्रसिद्द फिल्म अभिनेता गोविंदा की माँ! उनका विवाह उस समय (1940) के प्रसिद्द फिल्म कलाकार अरुण आहूजा से हुआ! मूलतः वो बंगाली महिला थीं ! उन्होंने ‘’राम तेरी गंगा मैली’’,बावर्ची, शमा परवाना आदि सहित 25 फिल्मों में गीत गाये !1942 में फिल्म ‘सवेरा’’ में अभिनय भी किया !ख्याल के साथ साथ ठुमरी,चैती,दादरा,कजरी,झूला,सावनी आदि उतनी ही खूबसूरती से गातीं थी !उनकी गाई ठुमरी ‘’मैंने लाखों के बोल सहे’’और ‘’सावन बीता जाये’’,और चेती ‘’येही ठियाँ मोतिया हेराई गली रामा ‘’बहुत प्रसिद्द थे !’’ना मारो पिचकारी’’राग काफी में ये होली भी उनकी पसंद थी जो अक्सर वो कार्यक्रम के अंत में गाती थीं !पटियाला घराने की ही सुप्रसिद्ध गायिका लक्ष्मी शंकर (प्रसिद्द नृत्य निर्देशक उदय शंकर जी की पत्नी)और निर्मला देवी कि जुगलबंदी आज भी श्रोता याद करते हैं !उनके पुत्र प्रसिद्द फिल्म अभिनेता गोविंदा उन्हें अपना प्रथम और अंतिम गुरु मानते हैं !उनके अनुसार वो एक धार्मिक और साधू प्रवृत्ति कि महिला थीं !उनका जीवन का तरीका अत्यंत सादगी-पूर्ण था !

    उप शास्त्रीय संगीत कि मलिका –गिरिजा देवी
    इन महान संगीत गायिकाओं के साथ एक और नाम जुड़ा है वो है पद्मश्री, पद्मविभूषण बनारस घराने कि सुप्रसिद्ध गायिका गिरिजा देवी! गिरिजा देवी को संगीत विरासत में मिला! ज़मींदार पिता ,जो संगीत के बहुत शौक़ीन थे ,ने पांच वर्ष की आयु से उन्हें संगीत शिक्षा दिलवाई !उनके गुरु पंडित सरजू प्रसाद मिश्र शास्त्रीय संगीत के मूर्धन्य गायक थे !गिरिजा देवी कि खनकती हुई आवाज़ जहा दुसरी गायिकाओं से उन्हें विशिष्ट बनाती है वहीँ उनकी ठुमरी ,कजरी और चैती में बनारस का खास लहज़ा और विशुद्धता का पुट उनके गायन में विशेष आकर्षण पैदा करता है !उनकी उप- शास्त्रीय गायकी में परम्परावादी पूरबी अंग की छटा एक अलग ही सम्मोहन पैदा करती है ! ख्याल गायन से कार्यक्रम का आरम्भ करने वाली ये गायिका ठुमरी ,चैती,कजरी ,झूला आदि भी उतनी ही तन्मयता और खूबसूरती से गाती हैं कि श्रोता झूम उठते हैं ! उनकी एक कजरी’’बरसन लगी’’बहुत प्रसिद्द है! उन्हें ‘’Queen of Thumri’’भी कहा जाता है !उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था कि’’ मै भोजन बनाते हुए रसोई में ,अपनी संगीत कि कॉपी साथ रखती थी और तानें याद करती थी !कभी कभी रोटी सेकते वक़्त मेरा हाथ जल जाता था क्यूँ कि तवे पर रोटी होती ही नहीं थी ,ऐसे मैंने संगीत के जुनून में बहुत बार उँगलियाँ जलाई हैं अपनी ‘’सच है चाहे कोई भी विधा हो ,सिर्फ रूचि या सिर्फ हुनर होना भर काफी नहीं होता उसके लिए एक तन्मयता एक जुनून होना ज़रूरी है !प्रसिद्द गायिका लता मंगेशकर कहती हैं ‘’संगीत सीखने के लिए एक जन्म काफी नहीं है’’!

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