आज दुष्यंत की कुछ गज़लें-कुछ शेर. जीना, खोना-पाना- उनके शेरों में इनके बिम्ब अक्सर आते हैं. शायद दुष्यंत कुमार की तरह वे भी मानते हैं- ‘मैं जिसे ओढता-बिछाता हूँ/ वो गज़ल आपको सुनाता हूँ.
1
”मेरे खयालो! जहां भी जाओ।
मुझे न भूलो, जहां भी जाओ।
थके पिता का उदास चेहरा,
खयाल में हो, जहां भी जाओ।
घरों की बातें किसे कहोगे,
दिलों में रखो, जहां भी जाओ।
कहीं परिंदे गगन में ठहरे!
मकां न भूलो, जहां भी जाओ। ”
2
‘बडे शहरों अक्सर ख्वाब छोटे टूट जाते हैं
बडे ख्वाबों की खातिर शहर छोटे छूट जाते हैं
सलीका प्यार करने का जरा सा भी नहीं आता
हवाओं को मनाता हूं परिंदे रूठ जाते हैं
बहुत मजबूत लगते हैं ये रिश्ते हमें अक्सर
जरा सी भूल से लेकिन भरोसे टूट जाते हैं”
3
”सहरा में भी फूल खिले हैं मानो बरसों बाद मिले हैं
इतना भीगा हूं मैं तेरी यादों की इस बारिश में
लौट के आए ना जाने वाले बीत गई हैं उम्र मेरी
अपने पागल दिल को इतना समझाने की कोशिश में
उसके मन की करता जाउं अपने मन की बतलाकर
इतना सी फर्क रहा है मेरी उसकी ख्वाहिश में ”

