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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    तू खेलता है नूर से मेरे यक़ीन के

    By May 6, 20119 Comments9 Mins Read

    समकालीन हिंदी लेखकों में मनीषा कुलश्रेष्ठ का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. हाल में ही उनका उपन्यास आया है ‘शिगाफ’, जो कश्मीर की पृष्ठभूमि पर है. प्रस्तुत है उसका एक रोचक अंश- जानकी पुल.





    रोड टू लामांचा ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम ( अमिता)
    ‘
    ला मांचा‘ सोचते ही पवनचक्कियां दिमाग़ में उभरती हैं… और यकीन मानिए कुछ ही मिनटों बाद वे मेरे सामने थीं। सूरज चुपचाप उनपर ठिठका हुआ उनकी निगरानी कर रहा था। भूरी मिट्टी के महीन कणों से बोझिल हवा और कभी हौले से घूम जाती पवनचक्कियां। बाईक रोक कर इयान दृश्य की किताबी खामोशी में डूबा हुआ था…मैं आत्मविस्मृत हो कई मृत – विस्मृत सदियों पर से तेज़ी से गुज़र रही थी…और भूल गई थी कि मैं कौन हूँ, यह काल, परिवेश कौनसा है, मेरे यहाँ होने के संदर्भ आखिर क्या हैं। मुझे उन सुनसान रास्तों पर खच्चरों पर सवार दो आकृतियां गुज़रती महसूस हुईं- एक ट्रेजिकॉमिकल चरित्र ‘डॉन किहोते‘ और उसका चालाक खेतिहर नौकर ‘सांचो पैंज़ा‘ …बीत चुके अतीत से आदर्श शूरवीरों को लौटा लाने के उद्देश्य से पनचक्कियों को ‘दानव‘ समझ कर अपनी तलवारों से उलझते हुए बेमतलब चले जा रहे हैं। 

    ”क्या ये पवनचक्कियां सोलहवीं सदी से यहीं हैं?” पनचक्कियों की एकदम सफेद, स्थूल और बौनी मीनार में एक दरवाज़ा और दो खिड़कियां और ऊपर काले विशाल पंखे देख मेरे होंठ बुदबुदाए। ऊपर आकाश अविश्वसनीयता की हद तक नीला था और सफेद, गदबदी, मोटी भेड़ों जैसे बादल भी मुझे सोलहवीं सदी के लग रहे थे, मानो युगों से इसी आसमान को चारागाह बनाए ये उन घिसी हुई पहाड़ियों के पीछे से निकल आते हों। 
    ”
    हाँ…लगता है न कि जैसे वक्त यहाँ से गुज़रा ही न हो। माना ‘ला मांचा‘ रूखा – सूखा इलाका है मगर यही तो असली स्पेन है। वह सब उथले सैलानियों के लिए है कि जल्दी – जल्दी भव्य गिरजे और गोथिक इमारतें देखीं। मैड्रिड और बार्सेलोना जैसे शहरों में टूरिस्ट बस में बैठे और दर्शनीय जगहों की सैर कर ली। गाईड ने जो बताया वह सुन लिया। पार्क , म्यूज़ियम और आर्ट गैलेरियों के फोटो खींचे तड़क – भड़क वाले रेस्तरांओं में शराब पी…और लौट गए।” इयान मुग्ध था अपने असली देश पर।

    हम फिर चल पड़े। हर गुज़रते पल में दृश्य तो पीछे छूटते गए मगर यह अहसास ज़िन्दा रहा कि ज़मीन का यह रहस्यमय टुकड़ा, जिन अजनबी इतिहासों का गवाह रहा है, उन्हें मुझे रोक कर सुनाना भी चाहता है…एक पहाड़ी पर ढहता हुआ किला…टूटे बुर्ज। सूनी सड़क पर बिना दरवाज़ों वाला घर…उसके भीतर दिखता सूना आंगन। रास्ते में एक गांव में एक बाड़े वाला घर देखकर मेरी कल्पना में फिर डॉन किहोते की ‘अलौकिक‘ प्रेमिका डैलसीना का घर और उसका गांव ‘टोबोसो‘ जीवंत हो गया। 

    मैं सम्मोहित थी और हवा तेज़। हम बात नहीं कर रहे थे। बस अपने – अपने आनंद में डूबे थे। तभी इयान बान्ड की आवाज़ हवा की सनसनाहट को चीरती हुई गूंजी – ”जानती हो ‘ला मांचा‘ का अर्थ?”
    ”
    नहीं तो!”
    ”
    एक दाग़ यानि धब्बा…। मगर इब्रेरियन पेनिनसुला का दिल है ‘ला मांचा‘। तुम्हें पता है। मेरा ननिहाल यहीं था। वाल्डेपेन्यास में…मेरे दूर के रिश्तेदार हो सकता है अब भी हों यहाँ। तब आसान नहीं थी यहाँ की ज़िन्दगी। बहुत लम्बा लगा करता था गर्मियों का दिन। सुलगता हुआ। गर्मियों में सूखा और सर्दियों में बहुत ठण्डा । कड़ी ज़मीन… सूखा… हर गर्मियों के बाद की नियति था। मेरे बचपन के कुछ बढ़िया दिन यहाँ बीते हैं क्योंकि यहाँ के लोग उत्सवप्रिय हैं…मैं ने त्यौहारों और पारंपरिक उत्सवों पर यहाँ जितनी भीड़ उमड़ती देखी है…वो पूरे स्पेन में कहीं नहीं देखी है। अब हम ‘वाल्डेपेन्यास‘ पहुँचेंगे। विश्व का सबसे बड़ा वाइनयार्ड है।तुम्हें ‘वाल्डेपेन्यास‘ के स्वार्गिक स्वाद लेना चाहिए। “

    दूर – दूर तक फैले अंगूरों और जैतूनों के बागों पर नवम्बर की आलसी धूप फैली थी। रास्ते में पड़ने वाले घरों के चबूतरों पर, जैतून के सिरके वाले अचार भरे मर्तबान धूप में रखे थे। मीठी और तुर्श गंध मीलों तक फैली थी। मेरी हैरानी के लिए, बीच – बीच में फैले जामुनी फूलों वाले ज़़ाफरान के खेत काफी थे। मुझे पाम्पोर के पठार याद आ गए। जहाँ बचपन में दादा जी के दोस्त अली ज़फर काका के घर जाते थे… ज़ाफरान के फूल तोड़ने के दिनों में उनके दालान में कश्मीर की सबसे सुन्दर नाज़ुक उंगलियों वाली औरतें इकट्ठा होती थीं…। इकट्ठा ढेर सा कहवा बनता और शीरनी भी।
    ”
    यहाँ यह भी…।”
    ”
    हाँ, यहाँ विश्व की बेहतरीन सेफ्रन होती है।”
    ”
    कश्मीर में…भी।”
    ”
    यहाँ से बढ़िया नहीं होती होगी…यहाँ इसे औरतें अपने नाज़ुक हाथों से चुनती हैं। नाज़ुक और प्यारी काले सिरों वाली औरतें।”
    ”
    वहाँ भी।”
    ”
    अच्छा!” उसने मेरे कहे पर अविश्वास भरा तंज़ किया।
    ”……
    ।”
    ”
    यही नहीं…यह पूरा इलाका…बढ़िया जैतून के तेल, ज़ाफरान और अंगूर की वाईन के लिए जाना जाता है।” 
    हमने ‘वाल्डेपेन्यास‘ पहुँच कर एक बड़ी वाइनरी देखीं जहाँ भीतर गोदाम में लकड़ी के विशालकाय लकड़ी के ‘कास्क‘ और ‘बैरल‘ रखे थे … जिनमें वाईन मेच्योर करने के लिए रखी थी। हमने वहीं कई तरह की वाईन्स चखीं। मुझे ताक़ीद की थी…इयान ने कि चख कर थूक दूं…यहाँ इतनी वैरायटी है कि वह बहुत ज्य़ादा हो जाऐगी।थूकने के बावज़ूद वाइन्स के क़तरे मेरे पूरे वज़ूद पर सतरंगी बादलों की तरह छा चुके थे। मैं हल्का – सा लड़खड़ा रही थी। मुझे याद है, हमने वहाँ से निकल कर कस्बे के किसी पुराने रेस्तरां में खाना खाने के लिए मोटरसाइकिल भीतरी गलियों के गुंजल में मोड़ ली थी और फिर एक बहुत ही संकरी गली के बाहर पार्किंग में खड़ी कर दी। इस भीड़ भरी गली में हमारा बिना कन्धे टकराए चलना मुश्किल था। उसके स्पर्शों ने वाईन के असर के साथ मुझे अस्थायी सम्मोहन में डुबो लिया था। हम रेस्तरां पहुँचे ‘ प्लाज़ा दे इस्पाना‘। थोड़ी भीड़ थी, मगर माहौल खूबसूरत था। ढलती दोपहर का रेतीला पीलापन हर जगह बिछा था। सड़क पर…रेस्तरां के बाहर और रेस्तरां की खुली खुली खिड़कियों पर। प्यालों और ग्लासों पर। रेस्तरां में ऑर्केस्ट्रा पर कोई स्थानीय संगीत बज रहा था। स्पेनिश गिटार और ड्रम का प्रयोग माहौल को जादुई बना रहा था। 
    हमने पारंपरिक खाना खाया। रैड वाईन के साथ आलू के चिप्स और गैलेगा स्पाइस। टमाटर की ब्रेड के साथ ‘गम्बास डे पाल्मोस‘ और ‘पिकिलो पेपर्स स्टफ्ड विद ट्यूना कॉनफिट‘ और साल्सा। केसर और जैतून के तेल का प्रयोग…मुझे यह सब खाते हुए एक साथ कितने कश्मीरी ज़ायके याद आ गए… नादुर मुंजी, गोश्ताबा …तबक़माज़…यख़नी।

    खाने की मेज़ पर बैठते ही इयान ने मुझे ग़ौर से देखा। मेरे गले में स्कार्फ फरफरा रहा था।
    ”
    मैं ने तुम्हारा ब्लॉग पढ़ा था। तुम अच्छा लिखती हो। हालांकि अंग्रेज़ी पढ़ना मेरे लिए मेहनत का काम होता है पर तुमने कुछ चीजें बहुत बढ़िया लिखी हैं। तुम इस विषय पर किताब क्यों नहीं लिखतीं… ब्लॉग पर अपनी प्रतिभा ज़ाया कर रही हो।”
    ”
    ब्लॉग पर तुरंत प्रतिक्रिया मिलती है। हर तरह के लोगों से…कोई अच्छा कहता है, कोई विरोध करता है, कोई गाली… हं…।” मैं ने सोफे के पिछले हिस्से पर ढहते हुए जवाब दिया और आंखें मूंद लीं।
    ”
    क्या बचकानी बात है।किताब आख़िर किताब होती है…।”
    ”
    वो तो है…लेकिन…।”
    ”
    एक बात कहूँ… मुझे लगता है तुम्हारा कश्मीर मसला… कुछ – कुछ हमारे ऐतिहासिक बास्क संघर्ष से मिलता है डियर। हमने भी तो हल निकाला था। हमारे यहाँ बास्क समुदाय की अपनी स्वतन्त्र पहचान हैं। वे अपने हितों का फैसला खुद करते हैं। जहाँ तुम रह रही हो नवारा…यह स्वायत्तशासी बास्क स्टेट है।” 
    ”
    अच्छा। हाँ मैं ने पाम्पलोना की गलियों में गैरबास्क लोगों के इमिग्रेशन को लेकर दीवारों पर दर्ज विरोध देखे हैं… मगर विस्तार से यह सब मुझे नहीं पता था।हमारे यहाँ हल निकालना इतना आसान नहीं है… कश्मीर अकेले में ही हम तीन तरह के कश्मीरी हैं। कश्मीरी हिन्दु, कश्मीरी सुन्नी और कश्मीरी शिया…सूफी और खानाबदोशों की बात अलग से करें… फिर लेह बौद्धबहुल और जम्मू हिन्दुबहुल है। यहाँ धार्मिक पहचान ज्य़ादा बड़ा मसला है।हल बेहद मुश्किल।”
    ”
    हमारे यहाँ भी उन दिनों यही सोचा गया था कि इस संघर्ष का हल नहीं निकलेगा…सदियां गुज़र जाऐंगी… पर आखिरकार हल निकला… निकला ना।
    ”
    हं…मगर…।” मैं उलझ गई थी…कि इसे कैसे समझाऊं? क्या बताऊँ कि ‘के इश्यू‘ अब भारत और पाकिस्तान के बीच ही नहीं रहा है, इसके सुलझावों और उलझावों के बीच चीन और अमेरिका भी अपना कांटा डाल चुके हैं। उनकी भी वार स्ट्रैटजी का वाइटल पार्ट है ‘के मसला‘।

    इयान बान्ड ने अपने संघर्ष के दिनों की दास्तान सुनाना शुरू कर दिया कि किस तरह बहुत पहले उसके दादा एक प्रकाशन संस्था चलाते थे, फर वे स्पेनिश सिविल वार से प्रभावित हुए। वे बास्क थे। उनका पूरा परिवार हवाई हमलो में नष्ट हो गया था। उनके पिता ने शहर दर शहर भटक कर छोटी – मोटी नौकरी करके घर का खर्च चलाया। एक वाईनरी में काम करते हुए उन्हें वाइनरी के मालिक की लड़की से प्यार हो गया जो कि उसकी मां थीं । वे कुछ अमीर परिवार की इकलौती बेटी थीं…बहुत से अवरोधों के बाद उन्होंने शादी की। वह उस दंपत्ति का सबसे बड़ा बेटा है और वाईन की जगह किताबें और उनकी ताज़ा सियाही की खुश्बू से प्रेम करना उसके खून में था इसलिए जवानी में ही, मां की मर्ज़ी के ख़िलाफ जाकर उसने अपने नाना से विरासत में मिले एक पुराने ग्रेप फार्म को बेचा और बैंक लोन लेकर यह पब्लिशिंग हाऊस खरीदा था। 
    वह चल निकला। उन्होंने कुछ अच्छी किताबें छापीं। फिर… सफलता के शुरूआती दौर में ही कैसे उन्होंने बड़ी रॉयल्टी पर एक नोबल प्राईज़ विजेता का दूसरा उपन्यास छापा जो कि बुरी तरह फ्लॉप हो गया। वह टीवी का दौर था लोग किताबों से भाग रहे थे।…तो फिर कैसे इस प्रकाशन संस्थान और बल्कि पूरे प्रकाशन जगत के बुरे दिन आए। वह बहुत बड़ा सबक था ज़िन्दगी का। घर, कार सब गिरवी रखना पड़ा था। तनाव और असफलता के परिणाम स्वरूप दांपत्य भी बिखर गया। उसकी पत्नी भी सात साल की बेटी को लेकर चली गयी थी। 
    ”
    तब से मैं ने सफलता को गंभीरता से लेना बंद कर दिया है।”
    ”…
    ।”
    मैं उसे बहुत ध्यान से सुनती रही , एक बहुत भिन्न इयान बान्ड को देखती हुई। अचानक उसने एक झटका देकर मुझे एकाग्रता से सुनने वाली मुद्रा से निकाल कर चौंका दिया।
    ”
    मुझे रहस्यमय लोग आकर्षित करते हैं और मुझे तुम रहस्यमय लगती हो।”
    ”
    मैं रहस्यमय

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