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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    सिनेमा में हिंदी प्रदेशों को अपराध के पर्याय के रूप में ही क्यों दर्शाया जाता है?

    By March 9, 201110 Comments7 Mins Read

    प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने अपने इस लेख में यह दिखाया है कि किस तरह हिंदी सिनेमा में पंजाब को प्रेम के पर्याय के रूप में दर्शाया जाता है, जबकि सारे अपराधी हिंदी प्रदेशों के ही होते हैं. दुर्भाग्य से हिंदी प्रदेशों से आने वाला फिल्मकार भी इसी रूढ़ि से चिपके रहने में ही अपनी भलाई समझता है. उनका यह लेख सोचने को विवश कर देता है- जानकी पुल.

     आदित्य चोपड़ा की ‘बदमाश कंपनी’ की नायिका की कोई पृष्ठभूमि नहीं बतायी जाती, संवादों के सहारे सिर्फ इतनी जानकारी मिलती है कि वह जयपुर से आयी है।
    हालांकि अधनंगी होकर पूरी दुनिया घूमती और नायक के साथ लिव इन रिलेशनशिप बिताती नायिका यदि जयपुर से आयी नहीं भी बतायी जाती तो कहानी पर कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन यह शायद नामुमकिन था कि हिन्दी में ‘बदमाश कंपनी’ तैयार हो और उसमें कोई भी हिन्दी प्रदेश से न हो। इसके पूर्व भी आदित्य चोपड़ा ने ‘बंटी और बबली’ बनायी थी, तो संयोग नहीं कि उसमें नायक और नायिका दोनों ही कानपुर से निकलते हैं, और पूरे देश में अपनी ठगी का आतंक मचाते हुए मुम्बई पहुंचते हैं।
    हिन्दुस्तान की नकारात्मकता के केन्द्र में हिन्दी प्रदेशों को चित्रित करने का शगल हिन्दी सिनेमा के लिए नया नहीं, लेकिन हाल के दिनों में इसे खास तौर से रेखांकित करने की शुरूआत हुई है। आश्चर्य यह कि हिन्दी सिनेमा की इस कोशिश में सिर्फ चोपड़ा और जौहर नहीं बल्कि प्रकाश झा, विशाल भरद्वाज और इम्तियाज अली जैसे फिल्मकार और भी ज्यादा मुखर दिखते हैं।
    इम्तियाज अली की फिल्म ‘जब वी मेट’ में नायक और नायिका जब भटिंडा, पंजाब पहुंचते हैं, तो संयुक्त परिवार के प्रेम, त्याग और स्नेह के अद्भुत दर्शन होते हैं। गीत, संगीत के सहारे पंजाब के रंगारंग संस्कृति का इन्द्रधनुषी परिदृश्य बनाया जाता है। लेकिन नायक-नायिका जब रतलाम; मध्यप्रदेश स्टेशन उतरते हैं तो सबसे पहले उनका सामना गुंडों से होता है, जो नायिका की इज्जत लूटने की कोशिश करते हैं। गुंडों से बचकर आगे बढ़कर होटल पहुंचते हैं तो वहां उन्हें घन्टे की दर से कमरा दिया जाता है। जैसे इतना ही काफी नहीं उसी रात होटल पर पुलिस की रेड भी पड़ जाती है, और बाकी लोगों की तरह नायक-नायिका को भी मुंह छिपाकर भागना पड़ता है। हो सकता है यह संयोग हो, लेकिन यह संयोग वाकई चिन्ताजनक है कि आखिर क्यों अपराध और हिंसा की परिकल्पना की जाती है तो उसके लिए आधार हिन्दी प्रदेशों में ही ढूंढा जाता है? इम्तियाज अली तो आज के झारखंड और कल के बिहार के निवासी हैं, उन्हें भी हिन्दी प्रदेश की सरलता, सहजता आकर्षित नहीं करती, हिन्दी प्रदेशों की सांस्कृतिक परम्परा में उन्हें कुछ भी उल्लेख्य नहीं मिलता। मानवीय स्वभाव की श्रेष्ठता ढूंढने के लिए उन्हें पंजाब पहुंचना होता है।
    वास्तव में इम्तियाज अली की यह मजबूरी भी हो सकती है। परम्परा से बाहर निकलना जोखिम भरा होता है, जिसे स्वीकार करना इम्तियाज अली जैसे युवा निर्देशक के लिए आसान नहीं हो सकता। हिन्दी सिनेमा में प्रेम और परिवार का एक ही मान्य प्रतीक है, पंजाब। ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ से लेकर ‘लव आज कल’ तक चाहे ‘वीरजारा’ हो या ‘सिंह इज किंग’, ‘दिल बोले हड़िप्पा’ हो या ‘प्यार तो होना ही था’, हिन्दी सिनेमा में प्यार पंजाब का पर्याय माना जाता रहा है। पंजाब की ऊर्जा से लवरेज संस्कृति को प्यार का प्रतीक बना देना कोई ऐतराज की बात भी नहीं। निश्चित रूप से लंबे समय तक आतंक की आग में झुलसते पंजाब को वह छवि सुकून भी देती है। लेकिन सवाल है सिर्फ पंजाब ही क्यों? और फिर पंजाब के ‘प्रेम’ को दर्शाने के लिए हिन्दी प्रदेशों को ‘घृणा’ से दर्शाना क्यों अनिवार्य हो जाता है हिन्दी सिनेमा के लिए?  सवाल यह भी है कि क्या हिन्दी प्रदेशों में प्रेम नहीं होते? शायद प्रेम के कारण ‘शहीद’ होने वाले सबसे अधिक जोड़े हिन्दी प्रदेश से होते हैं। चाहे जाति का मामला हो या गोत्र का प्रेम, कहानियां सबसे अधिक यहीं जटिल होती हैं, बावजूद इसके यदि यहां की प्रेम कहानियां यहां के फिल्मकारों के लिए भी आकर्षण का कारण नहीं बनती तो सिवा पूर्वाग्रह के इसे और क्या कहा जा सकता है।
    विशाल भारद्वाज उत्तरप्रदेश की माटी से हैं, अभिषेक चौबे उत्तरप्रदेश से हैं, दोनों उत्तरप्रदेश की माटी पर फिल्म परिकल्पित करते हैं ‘इश्किया’। कहानी भोपाल से चलकर गोरखपुर में ठहर जाती है। जहां दिखती है आपसी बातचीत में गालियां, परिवारिक वैमनस्य, गुरबत, षड्यंत्र और जातीय हिंसा। फिल्म में पांच साल का बालक सरे आम हाथों में पिस्तौल लिए दौड़ता दिखता है। आठ साल का बालक कहता है, मेरे गांव में तो लोग गांड़ धोने से पहले बंदूक चलाना सीख जाते हैं। हो सकता है यह सच्चाई भी हो लेकिन क्या उस गोरखपुर को इसीलिए याद किया जाना चाहिए, जो गोरखपुर पूरी दुनिया में जानी जाती है तो सिर्फ धर्मिक पुस्तकों के लिए। जैसे इतना ही काफी नहीं, हिन्दी समाज की वीभत्सता दर्शाने के लिए पति को पत्नी की हत्या की कोशिश करते तो पत्नी को पति के खिलाफ षड्यंत्र करते, शादीशुदा महिला को अपने ही गांव में दो अजनबी लोगों के साथ रहते और उन्हें अपने आकर्षण के जाल में फँसाते भी अभिषेक चौबे दिखाते हैं। क्या यही उबड़-खाबड़ समाज हिन्दी क्षेत्र की सच्चाई है?
    इसके पूर्व भी विशाल भारद्वाज ‘ओंकारा’ बनाते है तो हिंसा का वीभत्स रूप वहां दिखता है। कहने को राजनीतिक अपराध पर आधरित इस कहानी में बाप को बेटी के खिलाफ षड्यंत्र करते देखते हैं और पत्नी को पति की हत्या करते तो पति को पत्नी की। ‘ओंकारा’ ऐसी विरले फिल्मों में होगी जिसमें सारे चरित्र अन्त तक मार दिये जाते हैं। होगी यह शेक्सपीयर की ‘ओथेलो’, लेकिन ओथेलो का आधार उत्तरप्रदेश ही स्थापित क्यों किया जाता है? क्यों विशाल के लिए हिन्दी प्रदेश को स्थापित करना अनिवार्य हो जाता है?
    इसका उत्तर जितना विशाल भारद्वाज से वांछित है उतना ही प्रकाश झा से भी। ‘अपहरण’, ‘गंगा जल’ दोनों ही फिल्में बिहार की सच्ची घटना पर आधरित बतायी जाती हैं। कमोबेश हैं भी। लेकिन एक बिहारी, जो बिहार को प्रतिष्ठित करने की राजनीति भी कर रहा हो, उसे भी बिहार की सच्चाई के नाम पर अपहरण और भागलपुर अंखपफोड़वा कांड की ही याद आती है तो चिन्ता होती है। क्या बिहार के गांव में ‘दिलवाले दुल्हनिया’ नहीं फिल्मायी जा सकती? ठीक है वह उतनी ग्लौसी नहीं हो सकती, लेकिन प्रेम की सहजता और ईमानदारी तो यहां के खेतों में भी दिखायी जा सकती है।
    ‘नदिया के पार’ अभी भी भूले नहीं हैं हम। सवाल नीयत का है. क्या बिहार या अन्य हिन्दी प्रदेशों की संस्कृति को हम अपने सिनेमा से प्रतिष्ठित करना चाहते है? उत्तर है, नहीं। नहीं, इसलिए की हिन्दी प्रदेश सिनेमा का बाजार नहीं है। मैं बिहार, यूपी के चवन्नी के दर्शकों के लिए फिल्में नहीं बनाता, जो बात सुभाष घई बेधड़क बोल डालते हैं वही ये फिल्मकार अपनी फिल्मों में साकार करते हैं। उन्हें पता है बाजार में पंजाब का प्रेम और हिन्दी प्रदेश की हिंसा बिक रही है तो भला क्यों वे जोखिम उठाना चाहेंगे? होगी यह बुद्ध- महावीर की भूमि, होगी यह विद्यापति जैसे प्रेमिल कवि की भूमि होगी, यह शरतचंद्र को रचनात्मक ऊर्जा देने वाली भूमि, होगी यह बिस्मिल्लाह खान के शहनाई को सुर प्रदान करने वाली भूमि होगी, उनकी बला से। वास्तव में यह भूमि इन फिल्मकारों के लिए भी सरोकार से ज्यादा व्यापार की वजह है। इसीलिए वे अपनी ओर से किसी ‘नदिया के पार’ की कल्पना नहीं कर सकते, किसी ‘गंगा जमुना’ को साकार नहीं कर सकते। इन्हें भी सहूलियत होती है हिन्दी फिल्मकारों की भीड़ में शामिल हो जाने में जिनके लिए हिन्दी प्रदेश अपराध और हिंसा का या तो अजस्त्र स्रोत होता है या फिर उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है।
    वर्षों पहले आई ‘जोश’ ने गोवा में जो व्यक्ति कागजों की हेरा-फेरी कर सम्पत्ति पर अवैध कब्जा दिलाने का काम करता है, वह बिहार का दिखाया जाता है। हिंसा के दौर पंजाब ने भी देखे, लेकिन आज हिन्दी सिनेमा में कोई उसे याद करना नहीं चाहता। यह तथ्य है कि हर्षद मेहता से लेकर ललित मोदी तक जो भी आर्थिक घोटाले के केन्द्र में रहे हैं, उसमें से शायद ही कोई नाम हिन्दी प्रदेशों से हो। देश के खिलाफ जासूसी करते जितने भी लोग अभी तक पकड़े गये हैं उसमें से भी हिन्दी प्रदेश से गये नाम

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