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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है!

    By February 15, 201110 Comments13 Mins Read

    ‘टाइम‘ पत्रिका ने गुरुदत्त की फिल्म ‘प्यासा‘ को पांच सर्वकालिक सबसे रोमांटिक फिल्मों में शुमार किया है, इस अवसर पर प्रस्तुत है स्वतंत्र मिश्र का एक सुन्दर आलेख जो गुरुदत्त के जीवन और सिनेमा को लेकर है- जानकी पुल.

                                
    गुरुदत्त का नाम जेहन में आते ही उनकी फिल्म प्यासा के नायक कवि विजय की याद ताजा हो जाती है। फिल्म के एक-एक दृश्य आंखों के सामने से गुजरने लग जाते हैं। गीतों के बोल हमारी और आपके होठों पर लहराने लग जाते हैं। जैसा कि आप सबको पता है कि प्यासा के गीत कई वर्षों तक लोगों की जुबान पर बने रहे। निश्चित तौर पर अगर आज भी गुरुदत्त की फिल्म प्यासा के बारे में चर्चा होगी तो कोई साहिर लुधियानवी के गीतों के बोल ‘हर इक जिस्म घायल हर इक रूह प्यासी, ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’ पर बात किए बिना आगे नहीं बढ सकता। गानों के बोल और गुरु दत्त के चित्रांकन की अद्भुत बारीकियों के तालमेल की वजह से ही साहिर के इन गीतों को सदियों तक लोग अपनी यादों में जिंदा रख सकेंगे। गुरु को आखिरकार किन परिस्थितियों ने गुरु दत्त बनाया, यह समझना बहुत दिलचस्प होगा। किसी अभिनेता, निर्देशक या कलाकार के व्यक्तित्व पर चर्चा तभी पूरी हो सकती है, जब उसकी पृष्ठभूमि को जानने-समझने की कोशिश की जाए।
    9 जुलाई 1925 को शिवशंकर पादुकोण और वसंती पादुकोण के घर विश्व सिनेमा की एक महान प्रतिभा गुरुदत्त का जन्म हुआ। बंबई में गुरुदत्त का शुरुआती वर्ष तंगहाली और छोटी जगह में बीता। वह जिस बिस्तर पर सोते थे, वह आधा अंदर के आंगन में था और आधा बाहर के आंगन में। लेकिन इस बात की शिकायत उन्होंने कभी किसी से नहीं की। वह परिस्थितियों से तंग और परेशान तो होते थे लेकिन उसका मुस्तैदी से सामना करते थे। उससे पार पाने की जिद ने ही उसे विश्व स्तर के फिल्मकार और कलाकार के बीच सम्मान का दर्जा दिलाया। दरअसल, उनके पूरे जीवन को आप देखेंगे तो वह आपको कभी रोमांचित करेगा तो कभी निराशा के गहरे भंवर में भी डुबा देने के लिए काफी होगा। दुनिया में महानता दो तरीकों से हासिल की जाती रही है। एक तो आप जो भी क्षेत्र चुनते हैं, उसमें आपकी पहले की पीढ़ियों का कुछ-न-कुछ योगदान रहा हो। आप इस मामले में कपूर खानदान में पृथ्वीराज कपूर के योगदान को देख सकते हैं। उनके बेटे राज कपूर, शशि कपूर और रणधीर कपूर की सफलता में पृथ्वीराज की फिल्म की पूर्व तैयार पृष्ठभूमि का भरपूर योगदान मिला। उसके बाद की पीढ़ियां शायद इसलिए सफल हो पाईं क्योंकि उनके साथ कपूर खानदान का स्टांप लगा हुआ था। लेकिन दूसरा रास्ता बहुत मुश्किलों भरा होता है। गुरुदत्त, दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, मीना कुमारी और नरगिस जैसे नायक व नायिकाओं  को मनमाफिक मुकाम पाने के लिए इन्ही कांटों भरी राहों से गुजर कर अपने मुकद्दर की तलाश में वर्षों भटकना पड़ा।
    गुरुदत्त के साथ दो और प्रतिभाएं फिल्मों में अपनी जगह बनाने के लिए पूना इकट्ठा पहुंची थीं। एक तो सदाबहार हीरो देव आनंद साहब और दूसरे चरित्र अभिनेता रहमान। उस जमाने में फिल्म में नाम और काम को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की होड़ में कहीं कोई कमी नहीं दिखती है। बावजूद इसके फिल्म से जुड़े लोगों के बीच सदाशयता का अभाव भी नहीं दिखता है। प्रभात स्टुडियो में देव आनंद, गुरुदत्त, रहमान और रामसिंह ने साथ-साथ कुछ वर्षों तक काम किया। बाद के समय में भी वे कई फिल्मों में एक टीम की तरह दिखाई पड़ते हैं। गुरुदत्त वहां नृत्य निर्देशक की हैसियत से और बाकी तीनों अभिनय में हाथ आजमाने पहुंचे थे। हालांकि गुरु का यह कोई अंतिम लक्ष्य नहीं था। वह फिल्मों में इसके जरिये घुसपैठ बढ़ा कर अपने निर्देशन के बलबूते छा जाना चाहते थे। यही वजह है कि वह छोटी-बड़ी सारी भूमिकाओं को स्वीकार करते चले गए। उनकी कुछ शुरूआती फिल्में ऐसी थीं’ जिसमें उनके परिवार के लोगों को यह खोजना पड़ता था कि गुरुदत्त कहां हैं। ऐसी ही उनकी फिल्म ‘मोहन’ थी। इस फिल्म में देव आनंद मुख्य किरदार की भूमिका में थे और गुरु बहुत छोटी सी भूमिका में। यह सिलसिला कई सालों तक चलता रहा। देव आनंद और रहमान की पहली फिल्म ‘हम एक हैं’ आई। फिल्म सफल हो गई। इस फिल्म में गुरु दत्त को बहुत छोटी सी भूमिका अदा करने को मिली। प्रभात स्टुडियो में जब वे तीनों इकट्ठा काम कर रहे थे तब पूना की सड़कों पर साइकिल पर साथ-साथ घूमा करते थे। तीनों लगभग एक ही उम्र के थे। गुरुदत्त और देव आनंद ने दोस्ती की इसी गर्माहट में आकर एक दिन एक-दूसरे से वादा कर लिया कि अगर किसी को निर्देशन को मौका मिला तो वह एक-दूसरे को फिल्म में काम करने का मौका देंगे। ‘हम एक हैं’ के हिट होते ही देव आनंद ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
    कुछ वर्षों तक प्रभात में काम करने के बाद देव आनंद मुंबई आ गए और स्वतंत्र होकर काम करने लगे। गुरुदत्त का भी मन वहां नहीं लग रहा था इसलिए वह प्रभात को छोड़कर मुंबई आ गए थे। काम छूट गया और एक बार फिर से उनका परिवार मुफलिसी को ढोने के लिए मजबूर हो गया। लाख कोशिश करने के बाद भी आर्थिक तंगियों से उनका परिवार बाहर निकल ही नहीं पा रहा था। उनकी मां वसंती इस तंगी को दूर करने के लिए स्कूल में पढ़ाने के बाद प्राइवेट ट्यूशन भी देने लगी थी। छोटे भाई आत्माराम को पढ़ाई छोड़कर काम तलाशने की जरूरत आन पड़ी। गुरुदत्त एक साल तक दर-ब-दर की ठोकरें खाने को मजबूर रहे। शायद यही वजह है कि जीवन के यही कड़वे अनुभव उनकी फिल्मों में प्रमुखता से जगह पाते हैं। इसी तंगी और बदहाली के दिनों में उन्होंने फिल्म ‘प्यासा’ का पहला ड्राफ्ट लिखा। पैसों की दिक्कत और उनके माता-पिता के बीच की परेशानी की वजह से परिवार में बढ़ती अशांति ने गुरु दत्त के भीतर सफल होने की प्यास को बढ़ाने का काम किया। इसी वजह से उनके भीतर पहचान बनाने की भूख बढ़ती चली गयी।
    देव आनंद ने ‘नवकेतन फिल्म्स’ की नींव रखी। अपने वादे को पूरा करते हुए उन्होंने गुरुदत्त को बतौर निर्देशक ‘बाजी’ फिल्म की जिम्मेदारी निभाने को दी। बड़े आयाम के व्यक्ति गुरु को शायद इसी दिन का इंतजार था। बाजी एक फामूर्ला फिल्म थी। यह एक हलकी-फुलकी अपराध कथानक वाली फिल्म थी। इस फिल्म का सबसे बेहतरीन पक्ष गानों का भव्य चित्रांकन रहा। इस फिल्म में उनके निर्देशन को तारीफ मिली। उनके चित्रांकन की इस शैली को आगे चल कर गुरुदत्त की शैली और उनकी विशेषता के तौर पर गिना जाने लगा। 1950 में रिलीज हुई इस फिल्म में देव साहब के टैक्सी ड्राइवर की भूमिका वाले पात्र मदन को इतनी लोकप्रियता मिली कि चेतन आनंद ने 1954 में इसकी प्रेरणा से ‘टैक्सी ड्राइवर’ नाम की एक अलग फिल्म ही बना डाली। हालांकि इस फिल्म में गुरुदत्त अपनी एक झलकी भर दिखाते हैं। दरअसल, वह पाश्चात्य फिल्म निर्देशक अल्फ्रैड हिचकॉक का अनुसरण कर रहे होते हैं। हिचकॉक ऐसा करके दर्शकों का ध्यान कहानी में प्रवेश कराने की सफल कोशिश करते थे। गुरु को लोग अब फिल्म इंडस्ट्री में पहचानने लगे। इसके बाद दूसरी फिल्म ‘जाल’ आई। इस फिल्म की कहानी भी क्राइम थ्रिलर थी। बाजी और जाल दोनों की नायिकाएं इस विश्वास में नकारात्मक भूमिका वाले नायकों को दिल दे बैठती हैं कि प्यार से किसी को भी काबिल बनाया जा सकता है। हालांकि, बाजी के बाद देव आनंद के भाई चेतन आनंद से गुरु के मनमुटाव की स्थिति पैदा हो जाने से उन्होंने अगली फिल्म जाल के लिए नया निर्माता फिल्म आर्ट्स के टी. आर. फतेहचंद को ढूंढ़ लिया। इस फिल्म में भी अभिनेता के तौर पर देव आनंद ही थे। इस फिल्म में ईसाई मछुआरे समुदाय का बहुत बारीक चित्रण करने में गुरुदत्त सफल रहे और उनके काम की प्रेस ने बहुत तारीफ की। इसके बाद उन्होंने हरिदर्शन कौर के साथ मिलकर एच. जी. फिल्म्स नाम की कंपनी बना ली।
    एच. जी. फिल्म्स के बैनर तले गुरु दत्त ने अपनी पहली फिल्म ‘बाज’ में पहली बार फुलटाइम अभिनेता के तौर पर काम किया। देव आनंद मशहूर हो गए थे और उन्हें भारी-भरकम मेहनताना देना उनके वश की बात नहीं थी। सो उन्हें मजबूरी में बतौर नायक फिल्म में काम करना पड़ा। वह अपने बार में हमेशा यह सोचते थे कि वह एक्टिंग नहीं कर सकते हैं। ‘आर-पार’ के लिए शम्मी कपूर और ‘मिस्टर एंड मिसेज ५५’ में सुनील दत्त को वह अभिनेता के तौर पर लेना चाहते थे। प्यासा में भी वह दिलीप कुमार को अभिनेता बनाना चाहते थे। लेकिन किसी संयोगवश ऐसा संभव नहीं हो सका। इसी मजबूरी में उनके भीतर का कलाकार रूपहले पर्दे पर जीवंत हो उठा। उन्होंने फिल्म में अभिनेता के तौर पर काम इसलिए किया कि क्योंकि वह अपने किसी प्रोजेक्ट को रोकना नहीं चाहते थे। उनके भीतर काम की इस प्रतिबद्धता को उनके साथी कलाकार सनकीपना कहा करते थे। लेकिन सच तो यह है कि इस सनकीपन के बगैर गुरुदत्त इस मुकाम को कभी भी हासिल नहीं कर पाते। उनके अभिनय की बारीकियों के लोग कायल होते चले गए। ‘प्यासा’ और ‘साहब बीबी और गुलाम’ उनकी दो बेहतरीन फिल्मों के तौर पर गिनी जाती रहेंगी। हालांकि उनकी बेहतरीन फिल्मों में कागज के फूल, सी. आई. डी. और आर-पार आदि को भी गिना जाता है।   
    गुरुदत्त अपने पांचों भाई-बहनों में बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी और प्रतिभाशाली थे। इस काम में उनकी मां वसंती पादुकोण ने उनका भरपूर सहयोग दिया। मां के शब्दों में – ‘गुरुदत्त जब एक साल का था, किसी को देखकर बहुत हंसता था। किसी की बात नहीं मानता था। अपने दिल में अगर ठीक लगा तो ही वह मानता था, और बहुत गुस्से वाला था। कभी-कभी उसके प्रश्नों के जवाब देते-देते मैं परेशान हो जाती थी। लेकिन वह मुझे नहीं छोड़ता था। उससे बोलना ही पड़ता था।‘ उनका यह स्वभाव जीवन के अंतिम क्षणों तक बना रहा। फिल्म निर्माण की प्रक्रिया से जुड़े  उनके सभी सहयोगी व साथी उनके बारे में कुछ-कुछ ऐसा ही विचार प्रकट करते हैं। हर फिल्म के निर्माण की प्रक्रिया में वह एक-एक दृश्य को कई-कई बार करके पूरा करते थे। फिल्म प्यासा में उन्होंने माला सिन्हा के साथ एक दृश्य को पूरा करने के लिए 78 टेक लिए और अंततः कहा कि चलो कल देखेंगे। संयोगवश, वह दृश्य दूसरे दिन पहले ही टेक में पूरा हो पाया। वह फिल्म निर्माण या अभिनय के दौरान छोटी-छोटी बारीकियों को ध्यान में रखते थे। फिल्म में खासकर गानों के चित्रांकन के दौरान प्रकाश के प्रभाव को सत्यजीत रे के बाद अगर किसी ने बखूबी अंजाम दिया तो वह गुरु दत्त ही थे। आप उनकी तमाम फिल्मों में प्रकाश के प्रभाव के सटीक उपयोग को देख सकते हैं। बाजी, जाल, टैक्सी ड्राइवर, मिस्टर एंड मिस्टर 55, प्यासा, कागज के फूल, साहब बीबी और गुलाम सहित तमाम फिल्मों में उनके फिल्मांकन के बारीकियों से रु-ब-रु हो सकते हैं। प्यासा में फिल्म में कवि विजय की तंगहाली को दिखाने के लिए उड़ते हुए कागज के टुकड़ों को सांकेतिक तौर पर दिखाया गया है, वह शायद हिन्दी सिनेमा संसार में आपको फिर कहीं नहीं दिखता है।
    मनुष्य अपनी मृत्यु को लेकर शायद कुछ ज्यादा ही विवश दिखता है। शायद, इतनी विवशता उसके जीवन में दोबारा कहीं नहीं बन पड़ती है। अधूरे काम या कुछ और छूटे हुए काम की कड़ी मौत के दस्तक देते ही खत्म हो जाती है। इसके आगे कभी किसी की नहीं चलती। गुरुदत्त ने मृत्यु को तीन बार निमंत्रण दिया। जीवन के अंतिम दिनों में वह फ्ल्मि निर्माण के काम को पूरा करने के बाद घर लौटते और देर रात तक पीते रहते। उन्हें नींद के लिए गोलियों का सहारा लेना पड़ता था। उनके मित्र, बांग्ला कथाकार, उपन्यासकार और ‘साहब बीवी और गुलाम’ के पटकथा लेखक विमल मित्र ने अपनी पुस्तक ‘बिछड़े सभी बारी-बारी’ की भूमिका में लिखा है- ‘मेरे मन में यह सवाल कौंधता रहता है कि गुरुदत्त के पास इतना सबकुछ होते हुए भी वह बेचैन क्यों रहता था? कई-कई रातों तक वह व्यक्ति क्यों नहीं सोता था, क्या नहीं था उसके पास, यश, दौलत, सुंदर बीवी, तीन-तीन बच्चे। इतना कुछ होते हुए भी वह इतना प्यासा क्यों था. 9 अक्टूबर 1964 की रात अपने कई मित्रों को अपने घर बुलाकर उनसे ढेरों बातचीत की और खूब सारी नींद की गोलियां खाकर सदा के लिए सो गए। 10 अक्टूबर 1964 की सुबह साढ़े दस बजे तक जब दरवाजा नहीं खुला तो नौकर ने दरवाजा खुलवाने की नाकामयाब कोशिश की। दरवाजा तोड़ा गया तो वह टांगे उठाए हुए चित्त पड़े थे। मानों अभी भी कहीं जाने की तैयारी कर रहे हों। गुरुदत्त को रात के दो बजे भी अगर कोई मित्र यह सुझाव देता कि 350 मील दूर बैठी नृत्यांगना वहीदा रहमान उनकी फिल्म के लिए उपयुक्त हो सकती हैं तो अपने मित्रों के साथ गाड़ी भगाकर वह वहां जल्दी-से-जल्दी पहुंच जाना चाहते थे। शायद उन्हें इस बात का अहसास रहा हो कि वह ज्यादा नहीं जी सकेंगे। बॉलीवुड के लिए वहीदा रहमान, जॉनी वाकर, अबरार आल्वी और राज खोसला उनकी ही खोज थे। बल्कि बहुत हद तक यह भी सच है कि रहमान के कैरियर को परवान चढ़ाने में उनका ही सबसे ज्यादा योगदान रहा। उनकी पत्नी गीता दत्त अपने बच्चों के साथ जीवन के अंतिम दिनों में गुरुदत्त से अलग रहने लगी थीं। दोनों के बीच शादी के कुछ समय के बाद से ही झगड़ा शुरू हो गया था। इसकी वजह दोनों की अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि का होना था। लेकिन सबसे बड़ी वजह तो यह रही कि गुरु दत्त अपनी पत्नी और मशहूर गायिका गीता दत्त को गाने से मना करने लगे थे। वह उनसे गृहस्थी संभालने को कहने लगे थे। गीता दत्त उस जमाने की बहुत मशहूर गायिका थीं। लंदन से कंसर्ट करके बंबई एयरपोर्ट पर कदम नहीं पड़ते कि हैदराबाद गाना गाने की लिए कूच करना पड़ जाता। गीता ने गायन के क्षेत्र में बेमिसाल सोहरत यूं ही नहीं पाई थी। बहुत हाड़तोड़ मेहनत के बाद ही उन्हें यह मुकाम हासिल हो सका। इसलिए गुरुदत्त के रोके भला वह कैसे रूक सकती थीं. लेकिन यह भी सच है कि शुरुआती दौर में गुरु अपनी फिल्मों के गाने उन्हीं से गवाते थे। शायद दोनों के बीच क्लेश की स्थिति पैदा हो जाने से गुरु अपने अहंकार को पुष्ट करने के लिए गीता को गाने से रोकने लगे होंगे। अन्यथा उनकी फिल्मों में औरतें पारंपरिक न होकर आधुनिक और अपने इर्द-गिर्द जड़ हो चुकी परंपराओं से लड़ती और जूझती हुई दिखाई देती है। इन सबके बावजूद दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। यही वजह है कि गीता दत्त ने अपने नाम के साथ उनके ‘दत्त’ शीर्षक को मित्रों की सलाह पर भी कभी नहीं हटाया। दोनों ने सुलह की भी बहुत कोशिश की लेकिन एक छत के नीचे गुजारा करना संभव नहीं हो सका। संवेदना के इस महान पुजारी गुरुदत्त के मात्र 39 साल में ही दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी मृत्यु पर गीतकार कैफी आजमी ने एक कविता लिखी-‘रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई, तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई।‘

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