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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    हमें फिर खुदा ने दिखाई बसंत

    By February 8, 201131 Comments4 Mins Read

    नजीर अकबराबादी की नज्मों के साथ सबको वसंतपंचमी मुबारक- जानकी पुल.
    १.
    फिर आलम में तशरीफ़ लाई बसंत
    हर एक गुलबदन ने मनाई बसंत
    तवायफ ने हरजां उठाई बसंत
    इधर औ उधर जगमगाई बसंत
    हमें फिर खुदा ने दिखाई बसंत
    मेरा दिल है जिस नाज़नीं पे फ़िदा
    वो काफिर भी जोड़ा बसंती बना
    सरापा वो सरसों का बन खेत सा
    वो नाज़ुक से हाथों से गडुआ उठा
    अजब ढंग से मुझ पास लाई बसंत.
    वो कुर्ती बसंती वो गेंदे का हार
    वो कमबख्त का ज़र्द काफिर इजार
    दुपट्टा फिर ज़र्द संजगाफदार
    जो देखी मैं उसकी बसंती बहार
    वो भूली मुझे याद आई बसंत
    वो कड़वा जो था उसके हाथों में फूल
    गया उसकी पोशाक को देख भूल
    कि इस्लाम तू अल्लाह ने कर कबूल
    निकला इसे और छिपाई बसंत.
    वो अंगिया जो थी ज़र्द और जालदार
    टंकी ज़र्द गोटे की जिस पर कतार
    वो दो ज़र्द लेमू को देख आश्कार
    खुशी होके सीने में दिल एक बार
    पुकारा कि अब मैंने पाई बसंत.
    वो जोड़ा बसंती जो था खुश अदा
    झमक अपने आलम की उसमें दिखा
    उठा आँख औ नाज़ से मुस्करा
    कहा लो मुबारक हो दिन आज का
    कि यां हमको लेकर है आई बसंत.
    पड़ी उस परी पर जो मेरी निगाह
    तो मैं हाथ उसके पकड़ खामख्वाह
    गले से लिपटा लिया लिया करके चाह
    लगी ज़र्द अंगिया जो सीने से आह
    तो क्या क्या जिगर में समाई बसंत
    वो पोशाक ज़र्द और मुँह चांद सा
    वो भीगा हुआ हुस्न ज़र्दी मिला
    फिर उसमें जो ले साज़ खींची सदा
    समां छा गया हर तरफ राग का
    इस आलम से काफिर ने गाई बसंत.
    बंधा फिर वह राग बसंती का तार
    हर एक तान होने लगी दिल के पार
    वो गाने की देख उसकी उस दम बहार
    हुई ज़र्द दीवारो दर एक बार
    गरज़ उसकी आँखों में छाई बसंत
    ये देख उसके हुस्न और गाने की शां
    किया मैंने उससे ये हंसकर बयां
    ये आलम तो बस खत्म है तुम पे यां
    किसी को नहीं बन पड़ी ऐसी जां
    तुम्हें आज जैसी बन आई बसंत
    ये वो रुत है देखो जो हर को मियां
    बना है हर इक तख़्तए ज़अफिरां
    कहीं जर, कहीं ज़र्द गेंदा अयां
    निकलते हैं जिस ओर बसंती तबां
    पुकारे हैं ऐ वह है आई बसंत
    बहारे बसंती पे रखकर निगाह
    बुलाकर परीजादा औ कज कुलाह
    मै ओ मुतरिब व साकी रश्कमाह
    सहर से लगा शाम तक वाह वाह
    नजीर आज हमने मनाई बसंत.
    २.
    जहां में फिर हुई ऐ ! यारो आश्कार बसंत
    हुई बहार के तौसन पै अब सवार बसंत
    निकाल आयी खिजाओं को चमन से पार बसंत
    मची है जो हर यक जा वो हर कनार बसंत
    अजब बहार से आयी है अबकी बार बसंत

    जहां में आयी बहार औ खिजां के दिन भूले
    चमन में गुल खिले और वन में राय वन फूले
    गुलों ने डालियों के डाले बाग़ में झूले
    समाते फूल नहीं पैरहन में अब फूले
    दिखा रही है अजब तरह की बहार बसंत

    दरख्त झाड़ हर इक पात झाड़ लहराए
    गुलों के सर पै पर बुलबुलों के मंडराए
    चमन हरे हुए बागों में आम भी आए
    शगूफे खिल गए भौंरे भी गुंजने आए
    ये कुछ बहार के लायी है बर्गो बार बसंत

    कहीं तो केसर असली में कपड़े रंगते हैं
    तुन और कुसूम की जर्दी में कपड़े रंगते हैं
    कहीं सिंगार की डंडी में कपड़े रंगते हैं
    गरीब दमड़ी की हल्दी में कपड़े रंगते हैं
    गरज़ हरेक का बनाती है अब सिंगार बसंत

    कहीं दुकान सुनहरी लगा के बैठे हैं
    बसंती जोड़े पहन औ पहना के बैठे हैं
    गरीब सरसों के खेतों में जाके बैठे हैं
    चमन में बाग में मजलिस बनाके बैठे हैं
    पुकारते हैं अहा! हा! री जर निगार बसंत

    कहीं बसंत गवा हुरकियों से सुनते हैं
    मजीरा तबला व सारंगियों से सुनते हैं
    कहीं खाबी व मुंहचंगियों से सुनते हैं
    गरीब ठिल्लियों और तालियों से सुनते हैं
    बंधा रही है समद का हर एक तार बसंत

    जो गुलबदन हैं अजब सज के हंसते फिरते हैं
    बसंती जोड़ों में क्या-क्या चहकते फिरते हैं
    सरों पै तुर्रे सुनहरे झमकते फिरते हैं
    गरीब फूल ही गेंदे के रखते फिरते हैं
    हुई है सबके गले की गरज कि हार बसंत

    तवायफों में है अब यह बसंत का आदर
    कि हर तरफ को बना गड़ुए रखके हाथों पर
    गेहूं की बालियां और सरसों की डालियां लेकर
    फिरें उम्दों के कूचे व कूचे घर घर
    रखे हैं आगे सबों के बना संवार बसंत

    मियां बसंत के यां तक तो रंग गहरे हैं
    कि जिससे कूचे और बाजार सब सुनहरे हैं
    जो लड़के नाजनी और तन के कुछ इकहरे हैं
    वह इस मजे के बसंती लिबास पहरे हैं
    कि जिन पै होती है जी जान से निसार बसंत

    बहा है जोर जहां में बसंत का दरिया
    किसी का जर्द है जोड़ा किसी का केसरिया
    जिधर तो देखो उधर जर्द पोश का रेला
    बने हैं कूच ओ बाज़ार खेत सरसों का
    बिखर रही है गरज आके बे शुमार बसंत

    ‘नज़ीर‘ खल्क में यह रुत जो आन फिरती है
    सुनहरे करती महल और दुकान फिरती है
    दिखाती हुस्न सुनहरी की शान फिरती है
    गोया वही हुई सोने की कान फिरती है
    सबों को ऐश की रहती है यादगार बसंत

    (संपादन एवं प्रस्तुति: संजय गौतम)

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