कुछ महीने पहले हमने लोकनायक जयप्रकाश नारायण की कहानी ‘टामी पीर’ को आप तक पहुँचाई थी. बाद में प्रो. मंगलमूर्ति जी से यह पता चला कि जेपी ने एक और कहानी लिखी थी ‘दूज का चाँद’. वास्तव में, ‘हिमालय’ में प्रकाशित यह कहानी उनकी पहली कहानी थी जो उन्होंने हिंदी में ही लिखी थी. शिवपूजन सहाय हिमालय के संपादक थे. अंग्रेजी के विद्वान और सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर मंगलमूर्ति जी शिवपूजन सहाय के पुत्र भी हैं. उन्होंने न केवल उस कहानी की प्रति उपलब्ध करवाई बल्कि उसकी पृष्ठभूमि को लेकर एक नोट भी लिखा. प्रस्तुत है जेपी की वह दुर्लभ कहानी ‘दूज का चाँद’ तथा मंगलमूर्ति जी की भूमिका– जानकी पुल.
इस कहानी की कहानी कुछ पहले से शुरु होती है. जयप्रकाश नारायण १२ अप्रैल १९४६ को आगरा जेल से छूट गए थे. शिवपूजन सहाय एक पारिवारिक-बरात में सिताबदियारा में उनसे समधी-मिलन में गले मिले. जेल से छूटने के कुछ ही पहले ६ अप्रैल को जेपी ने बेनीपुरीजी को ‘हिमालय’ के प्रकाशन पर अपनी सम्मति लिख भेजी थी जिसे शिवपूजन सहाय ने ‘हिमालय’ के तीसरे अंक अप्रैल १९४६ की अपनी सम्पादकीय में उद्दृत किया था- “हिमालय पसंद आया. अच्छी चीज़ है. लेकिन एक बात लिखूंगा. इधर हिंदी के कुछ लेख पढकर मुझे अपनी बुद्धि पर अविश्वास हो चला है. फिर भी चूँकि इस देश के अधिकांश पाठक मुझ-जैसे ही अल्प-बुद्धि होंगे इसलिए मैं तो यही चाहूँगा कि हिंदी के साहित्यिक हमें ऐसी चीज़ें दें जिन्हें हम समझ सकें. मुझे ऐसा लगता है कि बाज लेखक तो कुछ कहने के बदले इसी कोशिश में रहते हैं कि किस प्रकार अपनी विद्वत्ता का तथा देश-विदेश के कवियों और दर्शानाचार्यों से अपने घनिष्ठ परिचय का प्रकाशन किया जाए. मेरी तो सदा से यह धारणा रही है कि जिसे कुछ कहना है वह बराबर यही कोशिश करेगा कि अपनी बात को, जहाँ तक हो सके, सीधे और सरल रीत से कहे जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोग उसे समझ सकें. हाँ, जिनके पास कहने को कुछ नहीं है उनके लिए घटाटोप शब्दाडंबर आवश्यक है. आशा है शब्दाडंबर से बचने की कोशिश हिमालय करेगा.”
‘हिमालय’ अपने समय में प्रकाशित एक युगान्तकारी पत्र था जिसके संपादक शिवपूजन सहाय, बेनीपुरी और दिनकर थे. बाद में दिनकर और अंत में बेनीपुरी उनसे अलग हो गए थे. ‘हिमालय’ का पहला अंक फरवरी, १९४६ में पटना के पुस्तक-भण्डार से प्रकाशित हुआ था. ‘हिमालय’ के दसवें अंक में जयप्रकाशजी की पहली हिंदी कहानी ‘दूज का चाँद’ छपी थी. फिर उसके अगले यानी ११वें अंक में दूसरी कहानी ‘टामी पीर’ छपी थी.
सद्य:प्रकाशित ‘शिवपूजन सहाय साहित्य समग्र’ में जयप्रकाशजी और अज्ञेय जी के पत्रों तथा शिवजी की डायरी प्रविष्टियों से इन प्रसंगों पर और प्रकाश पड़ता है. इसी प्रसंग में यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि ‘हिमालय’ के पहले पांच अंकों में राजेन्द्र बाबू की आत्मकथा के प्रारंभिक अंश भी पूर्णतः असंपादित अपने सर्वथा मूल रूप में छपे थे. राजेन्द्र बाबू ने भी आत्मकथा जेल में ही लिखी थी और उनकी रिहाई के तुरंत बाद उनकी आत्मकथा के वे अंश हिमालय में प्रकाशन के लिए बेनीपुरी जी के विशेष प्रयास से प्राप्त हुए थे. यद्यपि पांच किस्तों के बाद अचानक राजेंद्र बाबू के सचिव चक्रधर शरण के विशेष आग्रह पर आगे के अंशों का प्रकाशन रोकना पड़ा था, और मूल प्रति लौटा दी गई थी. बाद में शिवपूजन सहाय ने पूरी आत्मकथा का विधिवत संपादन किया था, जो साहित्य संसार, पटना से प्रकाशित हुई.
आज लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा लिखी गई पहली कहानी ‘दूज का चाँद’. कहानी के साथ उनका नाम छपा हुआ है देशमान्य श्री जयप्रकाश नारायण.
दूज का चाँद
पुराने ज़माने की बात है. हिमाचल के अंचल में एक छोटा-सा राज था. प्रजा तो पहाड़ी जातियों की थी लेकिन राजवंश सूर्यवंशी क्षत्रियों का था. राजघराने में शादी-ब्याह या तो आपस में ही होता था या नीचे के मध्यदेश के क्षत्रिय घरानों में.
जिस समय की यह बात है- उस समय वहां प्रतिभाशाली, विद्वान, कलाप्रेमी और वीर राजा राज करता था. उसे संगीत से प्रेम था, दर्शन से प्रेम था, शिकार अच्छा खेलता था, लेकिन उससे प्रेम न था. अपने राज के विस्तार के लिए उसने कभी शस्त्र नहीं उठाया. लेकिन बड़े से बड़े राजाओं को उसने एक गज भी अपनी ज़मीन न लेने दी. आमृत्यु उसे कोई पराजित न कर पाया. उसकी यह सफलता तीन बातों पर कायम थी- (१) बाहर के किसी छोटे य बड़े राज्य पर उसने लोभ की आँखें कभी न उठाई; (२) उसकी अपनी सामरिक और राजकीय कुशलता; (३) उसके राज का प्राकृतिक बचाव.
अपनी वीरता, कार्यदक्षता, विद्या, नीति और न्यायपरता से वह राजा इतना सर्वमान्य हुआ कि राजाओं के परिषदों में उसे ऊंचा से ऊंचा स्थान मिलता- उसका परामर्श ध्यान और श्रद्धा से सुना जाता. अपने राज्य में तो उसे वह स्थान प्राप्त था जो कदाचित अपने काल में जनकादि को प्राप्त हुआ हो.
राजा चंद्रशेखर- यही उसका नाम था. ‘स्वान्तःसुखाय’ वीणा का अभ्यास करता और चित्र-लेखन करता. चित्रकला में तो उसने एक नई प्रणाली य शैली ही स्थापित की जिसका मुख्या लक्षण था- चित्र की रेखाओं की नज़ाकत, पतलापन, नुकीलापन. उसके चित्र तलवार की धार की तरह होते. वह आंकता भी ऐसी ही वस्तुएं जो लंबी, पतली, नुकीली और नाज़ुक होतीं- जिनमें बेंत की सी लचक होती और सिरिस-सुमन की नजाकत. वह आंकता दूज का चाँद, चमेली का फूल, सूर्यास्त की बारीक रंगीनियाँ, पतली नाकें, नुकीली तिरछी आँखे, भौएँ, पतले होंठ, नवोढा की नुकीली छाती, कमल की कली, फणधर की लपलपाती जीभें. चुटकी भर रेखाओं को लेकर उन्हें यों आड़े-तिरछे सजा देता कि तस्वीर तीर की तरह दिल में चुभ जाती.
उसकी प्रजा ठिगने कद की, चिपटी नाकवाली थी और उनके रूप-रंग में वह कोई गुण नहीं था जिसका वह आशिक था. यह अनुमान कदाचित किया जा सकता है कि नुकीलेपन का उसका यह इश्क शायद उसकी प्रजा की भीतरी सूरत का ही प्रतिवाद-रूप था.
उसके मनोरंजनों में दूज के चाँद का नियमित दर्शन भी था. दूज का चांद मानो उसकी कला का मूर्त रूप था और वह उसको देख-देखकर मानो नया-नया अनुभव प्राप्त करता- नई-नई प्रेरणाएँ तथा नया-नया रस. चाँद का यह क्षणिक दर्शन उसे इतना प्रिय था कि हर महीने शुक्ल-द्वितीया को, साँझ होने से पहले ही, वह महल की ऊंची से ऊंची अटारी पर जा बैठता या पहाड़ की ऊंची चोटी पर. और उगते और अस्त होते चाँद को पुलकित मन से निहारता! साथ में कभी रानी होती, कभी बंधु-बांधव- कवि-कलाकार, अमात्य, सामंत. जब तक वह जिया दूज के चाँद के दर्शनों से न चूका. उसकी देखादेखी राज्य के ऊंचे घरानों में भी द्वितीया को चाँद देखने की प्रथा चल पड़ी. धीरे-धीरे साधारण प्रजा में भी इसका चलन हो गया.
सत्तर वर्ष की आयु में वह परलोकवासी हुआ. कुरुक्षेत्र तक शोक फ़ैल गया. उसके पुत्र चंद्रकेतु के राज्याभिषेक के अवसर पर भरत-वंश का चक्रवर्ती सम्राट भी उपस्थित था.
राजर्षि चंद्रशेखर- उसकी प्रजा ने उसे ‘ऋषि’ कहकर उसका स्मारक अपने ह्रदय में बना लिया. उसके मरे हुए सैकड़ों-हज़ारों वर्ष बीत गए, लेकिन उस पहाड़ी राज में अब तक द्वितीया का मेला लगता, और जिस चोटी पर चंद्रशेखर खड़ा होकर वक्र चंद्र के दर्शन ‘स्वान्तः सुखाय’ करता था उस पर खड़े होकर चाँद देखने का और ब्राह्मणों को पूजा देने का आज बड़ा महातम माना जाता. स्त्रियां विशेषकर इस पर्व में भाग लेती हैं और यह तीर्थ पुत्र-दायक समझा जाता है.
ऊपर एक तस्वीर में जीपी शिवपूजन सहाय के साथ हैं.


