Close Menu
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
    Subscribe
    • कविताएं
    • संपर्क
    • Vote for 2017 Best Seller
    • Best Seller 2018
    • सहयोग/ समर्थन
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    प्रोफ़ेसर से तमाशगीर

    By December 8, 201036 Comments9 Mins Read
    आजकल एनडीटीवी की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है. ‘संडे गार्डियन’ ने उसके आर्थिक घपलों पर स्टोरी की है, उसके एक वरिष्ठ पत्रकार को राडिया टेप में जोड़-तोड़ करते सुना गया है. १९९४ में समाजवादी विचारक किशन पटनायक ने प्रणय राय के फिनोमिना पर यह लेख लिखा था. जो आज अधिक विश्वसनीय लग रहा है.

    देश के अंग्रेजी न जानने वाले लोग प्रणय राय को नहीं जानते होंगे. लेकिन प्रणय राय को जानना ज़रूरी है क्योंकि वह एक नई सामाजिक घटना का प्रतिनिधित्व करते हैं. प्रणय राय की प्रसिद्धि शुक्रवार को दूरदर्शन पर चलनेवाले साप्ताहिक विश्वदर्शन कार्यक्रम से बनी है. जिस अंदाज़ से कोई जादूगर तमाशा(शो) दिखाता है उसी अंदाज़ से टी.वी. दर्शकों का ध्यान केंद्रित करके दूरदर्शन द्वारा चुने हुए समाचारों या वक्तव्यों के प्रति श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करके रखना दूरदर्शन की एक खास विधा बन गई है. प्रीतीश नंदी का शो, प्रणय राय का साप्ताहिक विश्वदर्शन आदि इस विधा के श्रेष्ठ प्रदर्शन हैं.
    देश के बुद्धिजीवियों में ऐसे लोग शायद बिरले ही होंगे जो अत्यंत बुद्धिशाली होने के साथ-साथ बीच बाज़ार में तमाशा भी कर सकें. ऐसे बिरले प्रतिभाशाली बुद्धिजीवियों की तलाश टेलीविजन व्यवसायियों को रहती है. उनके माध्यम से टेलीविजन के प्रदर्शन-व्यवसाय को कुछ बौद्धिक प्रतिष्ठा मिल जाती है, जिससे बहुत-से भद्दे और अश्लील कार्यक्रमों को चलाना सम्मानजनक भी हो जाता है.
    जब शुक्रवार के विश्वदर्शन कार्यक्रम के चलते प्रणय राय टी.वी. के दर्शकों के प्रिय हो गए, तब उनको सरकार की आर्थिक नीतियों के बारे में सूचना देने का कार्यक्रम दिया गया. पिछले साल के बजट से नई अर्थनीति का यह दूरदर्शन-प्रयोग शुरू हुआ, और इस साल उसकी अवधि और उस पर पैसा काफी बढ़ा दिया गया है(संभवतः एक विदेशी कंपनी इसके लिए पैसा दे रही है). फरवरी, 1994 की 28 तारीख की शाम को वित्तमंत्री ने जो बजट भाषण संसद में दिया उसका सीधा प्रसारण किया गया. भाषा की जटिलता के कारण बहुत कम लोग बजट की बातों को समझ पाते हैं, ज़्यादातर लोग इंतज़ार करते हैं कि कोई उस बजट की व्याख्या करके उन्हें सुनाये. जो लोग अंग्रेजी जानते हैं और बजट को समझकर दूसरों को भी समझाना चाहते हैं, ऐसे मत-निर्माता समूह (ओपिनियन मेकर्स)- व्यापारी, प्राध्यापक, लेखक, पत्रकार, राजनैतिक नेता आदि बजट की व्याख्या तत्काल सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं. ये लोग लगभग दो लाख होंगे जो करीब 50 लाख या शायद एक करोड़ पढ़े-लिखे लोगों तक अपनी बात पहुंचाते हैं. ये सारे लोग 28 फरवरी की शाम सात बजे से रात दस बजे तक अपने-अपने घरों में टेलीविजन देख रहे थे. इस बार की बजट व्याख्या दो किस्तों में करीब डेढ़ घंटे चली और एक घंटा तो खुद वित्तमंत्री मनमोहन सिंह प्रणय राय के पास बैठे रहे और सवालों के जवाब देते रहे. सवाल सचित्र आ रहे थे- लंदन, हांगकांग और न्यूयॉर्क से; मुंबई, कलकत्ता और बेंगलूर से. अनुमान है कि प्रणय राय को इस ‘शो’ के लिए करीब दस लाख रुपये मिले होंगे.
    प्रणय राय दूरदर्शन की सेवा शुरू करने से पहले दिल्ली में अर्थशास्त्र की एक प्रसिद्ध अध्ययन और अनुसन्धानशाला में प्रोफ़ेसर थे(दिल्ली में प्रोफेसरों को बहुत अच्छी तनख्वाह मिलती है). प्रापर सूचना के अनुसार वे न सिर्फ एक अच्छे विद्वान थे, बल्कि प्रगतिशील धारा से भी उनका घनिष्ठ सम्बन्ध था तथा उनके निबन्धों में प्रगतिशीलता का रुझान स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता था. अध्ययन, अनुशीलन और अनुसन्धान के कार्यक्षेत्र को छोड़कर प्रणय राय दूरदर्शन के कार्यक्रम के निर्माता बन गए. एक सामाजिक  घटना के तौर पर इसका महत्व इस बात में है कि तीक्ष्ण बुद्धि के एक प्रगतिशील बुद्धिजीवी को अपना मध्यवर्गीय जीवन-स्तर काफी ऊंचा होते हुए भी अध्ययन और अनुसंधान के कार्यकलाप को छोड़ देने में कोई झिझक नहीं हुई और काफी नाम तथा धन कमाने के लिए (यानी एक प्रचलित जायज उद्देश्य के लिए) वह खुशी-खुशी दूरदर्शन का एक तमाशगीर (यह एक मराठी शब्द है जिसे ‘शो मैन’ के लिए हम व्यवहार कर रहे हैं) बन गया.
    28 फरवरी को यह बजट-दर्शन बहुत ही कुशलतापूर्वक दिखाया गया. एक मशहूर व्यापार-पत्रिका के संपादक को पास बैठाकर उसे बजट पर बातचीत के द्वारा प्रणय राय ने बजट की मुख्य बातें बता दीं. ज़ाहिर था कि इस शुरुआती बातचीत का उद्देश्य बजट सम्बन्धी चर्चा के मुख्य बिंदुओं को तय करना था और ये बिंदु उदारीकरण के मानदंड से चिन्हित किये गए थे. जिन चार-पांच मुख्य बातों को प्रणय राय ने रेखांकित किया, बाद के पूरे बजट-कार्यक्रम में सिर्फ उनकी पुष्टि की जा रही थी. बजट में अत्यधिक घाटे, सीमा-शुल्क में भारी रियायत, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के ऋण की समय से पहले अदायगी आदि इसकी मुख्य बातें थीं. सारी बातचीत इन्हीं तीन-चार मुद्दों पर केंद्रित रही. जब देश के महानगरीय व्यवसायियों की बारी आई तो उन्होंने भी इन्हीं बातों को कुछ नम्रतापूर्वक रखा. मुंबई के शेयर बाज़ार से खबर आई कि भाव गिर रहा है. मगर क्यों? इसलिए कि व्यापारियों ने ‘इससे भी बढ़िया’ बजट की उम्मीद कर रखी थी. लेकिन कोई खास परेशानी की बात नहीं. कुल मिलाकर बजट ‘सही दिशा’ में चल रहा है. शेयर बाज़ार कुछ दिनों में फिर अपनी रफ्तार में आ जायेगा. वित्तमंत्री ने एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा भी कि ‘रातोंरात सब कुछ’ नहीं हो जायेगा.
    जब बजट-कार्यक्रम का सारा समय अंतर्राष्ट्रीय और महानगरीय व्यापारियों से बातचीत में चला गया तब प्रणय राय को (या दूरदर्शन को) याद आया कि कुछ साधारण आदमियों से यानी किसान, महिला, युवा और उपभोक्ता नागरिक से भी बजट सम्बन्धी बातचीत दिखाई जाए, नहीं तो बजट-कार्यक्रम शायद अधूरा रह जायेगा.
    शुरू में देश के महानगरों के व्यवसायी-संगठनों आदि की प्रतिक्रिया बताई गई. लेकिन बाद में जब वित्तमंत्री आ गए तो उनसे बातचीत करने और सवाल पूछने के लिए हमारे दूरदर्शन का द्वार विश्व के लिए खुल गया और बजट का ग्लोबीकरण हो गया. लंदन, वाशिंगटन और हांगकांग में बैठे हुए विदेशी व्यापारियों ने सीमा-शुल्क घटाने के वायदे को पूरा करने के लिए धन्यवाद देते हुए मनमोहन सिंह के मुंह पर यह पूछा कि इतना घाटा क्यों रखा गया है? बरकरार राजकीय अनुदानों को खत्म क्यों नहीं किया गया? घाटे के परिणामस्वरूप मूल्य आदि की अस्थिरता के कारण क्या विदेशी व्यापारियों का उत्साह कम नहीं हो जायेगा? सारी दुनिया के सामने उन विदेशी व्यापारियों द्वारा भारत सरकार के बजट पर भारत सरकार के वित्तमंत्री से से इस तरह के सवाल पूछने का इसके सिवा क्या अर्थ क्या है कि हमारे बजट को धनी देशों के व्यापारियों के प्रति पूर्ण रूप से जवाबदेह होना चाहिए. यह उदारीकरण के मानदंड से बजट की समीक्षा थी. एक किसान को दिखाया गया जो बुजुर्ग था और विलायती ढंग से सूत पहने हुए था. उसके अंग्रेजी बोलने में व्याकरण की कोई गलती नहीं थी और उसका अंग्रेजी उच्चारण भी बढ़िया था. यह दूरदर्शन पर नई आर्थिक नीति के किसान की छवि थी. उसने सिर्फ एक सवाल पूछा और मनमोहन सिंह के जवाब के बाद वह शांत हो गया. जब कार्यक्रम समाप्त होने में बस एक-दो मिनट बाकी रह गया था तब ज़ल्दी में बेंगलूर महानगर के किसी दफ्तर में कुछ लोगों को दिखाया गया(कुछ साधारण आदमियों और उपभोक्ताओं को दिखाना था). एक बेरोजगार युवक की हैसियत से जिससे बेरोजगारी के सम्बन्ध में सवाल पूछना था, उसने बेरोजगारी का नाम तो लिया मगर सवाल यह पूछा कि घाटे के बजट को देखकर पूंजीनिवेश करनेवाले हतोत्साहित होंगे तो रोजगार कैसे बढ़ेगा. बिलकुल अंत में एक-दो सेकेंडों में एक महिला ने उपभोक्ताओं से सम्बंधित एक सवाल रखा और वित्तमंत्री का जवाब पाकर संतुष्ट हो गई. उसे महिला और उपभोक्ता दोनों की भूमिकाओं में दिखाकर प्रणय राय ने सोचा होगा कि पूरे समाज को उन्होंने बजट से जोड़ दिया और देश के सभी वर्गों की प्रतिक्रिया भी आ गई.
    जिस तरह इण्डिया टुडे का संपादक कुछ महानगरों के विद्यार्थियों से बातचीत का हवाला देकर देश की युवा पीढ़ी के बारे में एक खास तरह का निष्कर्ष और एक खास तरह की छवि प्रचारित करने की कोशिश करता है, ठीक उसी तरह की कोशिश दूरदर्शन पर प्रणय राय कर रहे हैं. सर्वप्रथम हांगकांग और अमरीका के व्यापारी, दूसरे क्रम में मुंबई और कलकत्ता के व्यापारिक संघ और शेयर बाज़ार, तीसरे क्रम में सूट-बूट पहने हुए भूस्वामी और चौथे क्रम में कुछ हद तक महानगरीय खाते-पीते मध्यम वर्ग के लोग. बाकी सभी लोग और समूह बजट के लिए बिलकुल अप्रासंगिक हैं क्यों हो गए हैं? इस प्रश्न का उत्तर हमें मिल सकता है यदि हम प्रणय राय को एक नए किस्म के बुद्धिजीवी वर्ग के उभार के प्रतिनिधि के रूप में देखें, जिसका जनता से लगाव खत्म हो चुका है. यहाँ हम प्रणय राय को एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक सामजिक घटना के रूप में देखने की कोशिश करें, क्योंकि प्रणय राय की वर्तमान भूमिका कोई अकेली दुर्घटना नहीं है. इसकी व्याप्ति काफी बढ़ गई है. एक मध्यवर्गीय प्रतिभा-संपन्न बुद्धिजीवी, जिसका अपनी युवावस्था में प्रगतिशीलता की तरफ झुकाव हो जाता है, दिल्ली के एक प्रतिष्ठित शिक्षाकेन्द्र में प्राध्यापक था. उसे तनख्वाह के रूप में अच्छी रकम मिलती थी जिससे वह आर्थिक रूप से सुरक्षित था. अपने प्रगतिशील रुझान के कारण वह जनसाधारण से जुड़ाव महसूस करता था. चार-पांच साल पहले टेलीविजन के माध्यम से एक नई विज्ञापनी संस्कृति का अनुप्रवेश होता है. देश की अर्थनीति में ऐसे परिवर्तन तेजी से होने लगते हैं कि वह मध्यवर्गीय उच्चशिक्षित, मेधावी, प्रगतिशील रुझानवाला युवा बुद्धिजीवी अब मध्यवर्गीय न रहकर साल में पचीस-तीस लाख की कमाई कर सकता है. टेलीविजन और नई अर्थनीति का संयोग उसके लिए अपने को विज्ञापित करने और साथ ही प्रचुर धन हासिल करने का आकर्षण पैदा कर देता है. वह इसकी गिरफ्त में आ जाता है और उस पर धन की हविस तथा आधुनिक मीडिया की चकाचौंध हावी हो जाती है. उसका सामाजिक लगाव छूट जाता है. भारत के करोड़ों साधारण जन उसके लिए अप्रासंगिक हो जाते हैं. बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ उसको काफी धन देकर उसकी मेधा का इस्तेमाल करने के लिए होड़ लगाती हैं. इस बात की होशियारी बरती जाती है उसे पता न चले कि वह एक बिकाऊ माल है, इसलिए उसे ऐसे ही काम में लगाया जाता है जिसमें उसे यही आभास हो कि चमत्कारी ढंग से एक बौद्धिक कार्य में लगा हुआ है. वह स्वयं को खुशी-खुशी बेच सके इसके लिए यह ज़रूरी है कि उसके काम की एक बौद्धिक छवि हो तथा वह स्वयं के बारे में यह धारणा बना सके कि देश आगे बढ़ रहा है. प्रणय राय के इस तरीके देश को आगे बढाने के लिए यह ज़रूरी है कि करोड़ों साधारण जनों को अप्रासंगिक मानकर देश के बारे में सोचा जाए.
    नई आर्थिक नीति तथा आधुनिक संचार माध्यमों के संयोग से एक नए बुद्धिजीवी वर्ग का उदय हो रहा है. इस वर्ग के पहले उभार में वे महानगरीय बुद्धिजीवी हैं जो अपने को विज्ञापन का हिस्सा बनाने के लिए और करोड़ों साधारण जनों को अप्रासंगिक मानने के लिए तैयार हो गए हैं.
    विकल्पहीन नहीं है दुनिया से साभार         

    Related Posts

    Драгон Мани: Мифический Зверь и Реальные Выигрыши

    June 20, 2026

    Tropicana Online casino Nj Applications on the internet Gamble

    June 19, 2026

    Regulamentação do jogo como a lei pode impactar apostadores e operadores

    June 19, 2026
    View 36 Comments
    Leave A Reply Cancel Reply

    Recent Posts

    • Драгон Мани: Мифический Зверь и Реальные Выигрыши
    • Tropicana Online casino Nj Applications on the internet Gamble
    • Regulamentação do jogo como a lei pode impactar apostadores e operadores
    • Najkorzystniejsze automaty online Graj po slot urządzenia vinyl kasyno bezpłatnie
    • Ultimat Casinon Utrike 2026

    Recent Comments

    No comments to show.
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
    Facebook X (Twitter) Instagram Pinterest Vimeo YouTube
    © 2026 jankipul. Designed by jankipul.

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.