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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    निदा फाजली के शब्दों में शकील बदायूंनी का अक्स

    By December 1, 201030 Comments9 Mins Read
    निदा फाजली ने कुछ शायरों के ऊपर बहुत रोचक ढंग से लिखा है. यहाँ उनका लेख शायर-गीतकार शकील बदायूंनी पर. कुछ साल पहले वाणी प्रकाशन से उनकी एक किताब आई थी ‘चेहरे’ उसमें उनका यह लेख संकलित है. 
    =============
    शेक्सपियर ने 1593 से 1600 के दरमियान एक सौ चौवन सॉनेट भी लिखे थे. उसमें से एक सॉनेट उन्होंने अपनी प्रेयसी के सौन्दर्य के बारे में कुछ मिसरे लिखे थे. उनका मुक्त अनुवाद इस तरह है:
    मेरे लफ़्ज़ों में ये ताकत कहाँ
    जो तेरी आँखों की तस्वीर बनायें
    तेरे हुस्न की सारी खूबियां दिखाएँ
    अगर ये मुमकिन भी हो,
    तो आने वाले ज़माने में
    किसको यकीन आयेगा
    कि तेरे जैसा कोई ज़मीं की जीनत था
    तू ख्वाब नहीं एक हकीकत था.’

    शकील बदायूंनी का व्यक्तित्व, बातचीत का ढंग और मुशायरों में उनके शेर पढ़ने का चमत्कार उनको देखने-सुनने वालों के लिए ऐसा ही अनुभव था.

    आज इन विशेषताओं के साथ वे भले कहानियों के किरदार महसूस हों, लेकिन बीते हुए ज़माने में वे चलती-फिरती हुई सच्चाई थी. गज़ल गायक जगजीत सिंह से सम्बंधित एक लेख में मैंने लिखा था कि ‘उनकी आवाज़ इतनी ख़ूबसूरत है कि उन्हें जब सुना जाता है; तो सुनने वाला उनके सुरों की समरसता को भूल जाता है.’

    शकील के अच्छे पहनावे और शेर सुनाने का ढंग जब मुशायरों के मंच पर जगमगाता था, तो अच्छे-अच्छे शिष्ट श्रोता भी उनके शब्दों के पारम्परिक बर्ताव और शेर के इकहरे और अनुकरणीय स्वभाव को भूल जाते थे. वे मुशायरों के बेहद लोकप्रिय शाइर थे. जिस मुशायरे में होते थे, शाइरी सुनाने के बाद सारा मुशायरा अपने साथ ले जाते थे.

    उनके ज़माने में कई खुशआवाज़ शाइर मुशायरों की शोभा थे. फना निजामी, शेरी भोपाली, दिल लखनवी, राज मुरादाबादी, मजरूह सुल्तानपुरी, खुमार बाराबंकवी, आदि सभी मुशायरों की ज़रूरत थे; मगर उनमें शकील कभी-कभी के ज़लवे अधिक दिलनवाज़ शख्सियत थे. फिल्मों में गीतकारी की व्यस्तता उन्हें अधिक मुशायरेबाज़ी का समय नहीं देती थी. अर्थशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार अगर सप्लाई कम हो जाए तो मूल्य में वृद्धि हो जाती है. मुशायरों में उनकी प्रसिद्धि से ही प्रभावित होकर संगीतकार नौशाद अली ने उनको फिल्मों में लिखने के लिए बुलाया था. मुशायरे फिल्मों में आने से पहले भी थे, लेकिन उस वक्त तक उनकी शायरी यू.पी. के कुछ इलाकों तक ही सीमित थी. फ़िल्मी चकाचौंध ने उसमें चार चाँद लगा दिए थे और उनके शब्दों को देश के कोने-कोने में पहुंचा दिया था.
    शकील का असली नाम ‘शकील अहमद’ था. जन्म का नाम गफ्फार अहमद और उपनाम ‘शकील बदायूंनी’ था. शकील के पिता मौलाना ज़लील अहमद कादरी बदायूं के उच्च प्रतिष्ठित विद्वान और उपदेशक थे. घर का वातावरण बेहद धार्मिक और शायराना था. उनके पिता भी शायर थे और ‘सोख्ता’ के उपनाम से शेर कहते थे. चाचा जिया उल कादरी नात, मंक्बत के उस्ताद शायर थे. उनकी लिखी हुई ‘शरहे कलामे मोमिन’ एक ज़माने में बहस और वाद-विवाद का विषय थी.

    शकील अगस्त 1916 में पैदा हुए और मौलाना जिया उल कादरी के मार्गदर्शन में चौदह वर्ष की उम्र में शेर कहने की शुरुआत की. बदायूं में उर्दू-फ़ारसी की शिक्षा हासिल करने के बाद शकील की शिक्षा का क्रम मुंबई और अलीगढ़ युनिवर्सिटी में ज़ारी रहा. लेकिन पिता की मृत्यु के देहांत ने जिन घरेलु उलझनों में उलझा दिया था, उसके कारण बी.ए. के बाद उन्हें नौकरी करनी पड़ी और वे देहली में सप्लाई विभाग में क्लर्की करने लगे.

    शकील की प्रसिद्धि में उनके तरन्नुम का बहुत बड़ा हाथ था. वे जिस दौर में शेर कह रहे थे वह ‘यगाना’, ‘फिराक’ और ‘शाद आरिफी’ का नई गज़ल तथा जोश, फैज़ और अख्तर उल ईमान की नज़्म में नए बदलाव का दौर था. नई काव्य-भाषा रची जा रही थी, नए जीवन-अनुभवों और नए दर्शनों से वातावरण जगमगा रहा था. प्रगतिशील तहरीक अपने यौवन का उत्सव मना रही थी. साथ में, हलक-ए-अरबा बेजोक(पंजाब में) शायरी में नए तेवर दिखा रही थी, लेकिन इस समय शकील की शायरी इसी काव्य परंपरा का साथ निभा रही थी; वे दाग के बाद पीढ़ी-दर-पीढ़ी दोहराई जा रही थी और मुशायरों में धूम मचा रही थी.

    क्या कीजिये शिकवा दूरी का मिलना भी गज़ब हो जाता है,
    जब सामने वो आ जाते हैं अहसासे-अदब हो जाता है.
    कोई आरज़ू नहीं है कोई मुद्दआ नहीं है,
    तेरा गम रहे सलामत मिरे दिल में क्या नहीं है?
    लब सर्फे-तकल्लुम है तो नज़रें हैं कहीं और,
    इन बातों से होता है मुहब्बत का यकीं और.
    दानिश्ता सामने से वो जो बेखबर गए
    दिल पर हज़ार तरह के आलम गुजर गए.

    उनके पहले संग्रह ‘रानाईयां’ में कुछ ऐसे ही शेरों की बुनियाद पर ‘जिगर’ मुरादाबादी’ ने अपनी भूमिका में शकील की इस तरह प्रशंसा की थी- ‘इस तरह के कुछ शेर भी अगर कोई व्यक्ति जीवन-काल में कह दे तो मैं उसे उचित अर्थों में शायर स्वीकार करने को तैयार हूँ.’

    शकील मुशायरों में अकेले नहीं जाते थे, जहाँ भी बुलाये जाते थे, अपने प्रशंसकों और शिष्यों का पुरा समूह अपने साथ ले जाते थे. इनमें शिफा ग्वालियर, सबा अफगानी, कमर भुसावली और बहुत से छोटे-बड़े शायर होते थे. इन सभी के खर्चे मुशायरा कमिटी के जिम्मे होते थे. इस हिसाब से वे काफी महंगे शायर थे, लेकिन उनकी आमद हर शहर के लिए ऐसी साहित्यिक घटना समझी जाती थी जो बरसों तक याद रखी जाती थी.

    मैंने पहली बार उनको ग्वालियर के मुशायरे में देखा और सुना था. गर्म सूट और टाई, ख़ूबसूरती से संवरे हुए बाल और चेहरे की आभा से वे शायर अधिक फ़िल्मी कलाकार नज़र आते थे. मुशायरा शुरू होने से पहले वे पंडाल में अपने प्रशंसकों को अपने ऑटोग्राफ से नवाज़ रहे थे. उनके होंठों की मुस्कराहट कलम के लिखावट का साथ दे रही थी. शकील को अपने महत्व का पता था. वे यह भी जानते थे कि उनकी हर हरकत और इशारे पर लोगों की निगाहें हैं.

    इस मुशायरे में ‘दाग’ के अंतिम दिनों के प्रतिष्ठित मुकामी शायरों में हज़रत नातिक गुलावटी को भी नागपुर से बुलाया गया था. लंबे पूरे पठनी जिस्म और दाढ़ी रोशन चेहरे के साथ वो जैसे ही पंडाल के अंदर घुसे सारे लोग सम्मान में खड़े हो गए. शकील इन बुज़ुर्ग के स्वभाव से शायद परिचित थे, वे उन्हें देखकर उनका एक लोकप्रिय शेर पढते हुए उनसे हाथ मिलाने के लिए आगे बढे:

    वो आँख तो दिल लेने तक बस दिल की साथी होती है,
    फिर लेकर रखना क्या जाने दिल लेती है और खोती है.

    लेकिन मौलाना नातिक इस प्रशंसा स्तुति से खुश नहीं हुए. उनके माथे पर उनको देखते ही बल पड़ गए. वे अपने हाथ की छड़ी को उठा-उठाकर किसी स्कूल के उस्ताद की तरह भारी आवाज़ में बोल रहे थे- ‘बरखुरदार, मियां शकील! तुम्हारे तो पिता भी शायर थे और चचा मौलाना जिया-उल-कादरी भी प्रामाणिक उस्ताद शायर थे. तुमसे तो छोटी-मोटी गलतियों की उम्मीद हमें नहीं थी. पहले भी तुम्हें सुना-पढ़ा था मगर कुछ दिन पहले ऐसा महसूस हुआ कि तुम भी उन्हीं तरक्कीपसंदों में शामिल हो गए हो, जो रवायत और तहजीब के दुश्मन हैं.’

    शकील इस अचानक आक्रमण से घबड़ा गए लेकिन बुजुर्गों का सम्मान उनके स्वभाव का हिस्सा था. वे सबके सामने अपनी आलोचना को मुस्कराहट से छिपाते हुए उनसे पूछने लगे, ‘हज़रत आपकी शिकायत वाजिब है लेकिन मेहरबानी करके गलती की निशानदेही भी कर दें तो मुझे उसे सुधारने में सुविधा होगी’

    ‘बरखुरदार, आजकल तुम्हारा एक फ़िल्मी गीत रेडियो पर अक्सर सुनाई दे जाता है, उसे भी कभी-कभार मजबूरी में हमें सुनना पड़ता है और उसका पहला शेर यों है:
    चौदहवीं का चाँद हो या आफताब हो,
    जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो.

    मियां इन दोनों  मिसरों का वज़न अलग-अलग है. पहले मिसरे में तुम लगाकर यह दोष दूर किया जा सकता था. कोई और ऐसी गलती करता तो हम नहीं टोकते, मगर तुम हमारे दोस्त के लड़के हो, हमें अजीज़ भी हो इसलिए सूचित कर रहे हैं. बदायूं छोड़कर मुंबई में भले ही बस जाओ मगर बदायूं की विरासत का तो निर्वाह करो.

    शकील अपनी सफाई में फिल्मों में संगीत और शब्दों के रिश्ते और उनकी पेचीदगी को बता रहे थे. उनकी दलीलें काफी सूचनापूर्ण और उचित थीं., लेकिन मौलाना ‘नातिक’ ने इन सबके जवाब में सिर्फ इतना ही कहा- ‘मियां हमने जो ‘मुनीर शिकोहाबादी’ और बाद में मिर्ज़ा दाग से जो सीखा है उसके मुताबिक़ तो यह गलती है और माफ करने लायक नहीं है. हम तो तुमसे यही कहेंगे, ऐसे पैसे से क्या फायदा जो रात-दिन फन की कुर्बानी मांगे. उस मुशायरे में नातिक साहब को शकील के बाद अपना कलाम पढ़ने की दावत दी गई थी. उनके कलाम शुरू करने से पहले शकील ने खुद माइक पर आकार कहा था- हज़रत नातिक इतिहास के जिंदा किरदार हैं. उनका कलाम पिछले कई नस्लों से ज़बान और बयान का जादू जगा रहा है, कला की बारीकियों को समझने का तरीका सीखा रहा है और मुझ जैसे साहित्य के नवागंतुकों का मार्गदर्शन कर रहा है. मेरी गुज़ारिश है आप उन्हें सम्मान से सुनें.

    शकील पुरबहार इंसान थे. उनके स्वभाव का लचीलापन उनके धार्मिक मूल्यों की पहचान था. वे प्रगतिशील लोगों के खिलाफ थे, अगर कहा जाए तो गलत होगा. अपनी एक नज़्म ‘फिसीह उल मुल्क’ में दाग के हुज़ूर में उन्होंने ‘साइल देहलवी, बेखुद सीमाब और नूह नार्वी आदि का उल्लेख करते हुए दाग की कब्र से वादा भी किया था:

    ये दाग, दाग की खातिर मिटा के छोड़ेंगे,
    नए अदब को फ़साना बना के छोड़ेंगे.

    पता नहीं उन्होंने नए अदब को फ़साना बनाया या खुद इसके विरोध में अफसाना बन गए लेकिन सच्चाई है कि अपने आखिरी दौर में वे अदब के उन बदलावों से प्रभावित होने लगे थे, जो शुरू में उन्हें पसंद नहीं थे. गज़ल में नए शब्दों का प्रयोग और विषय की खासियतें उनकी रवायतपसंदी को स्वीकार करने लगी थीं. इस परिवर्तन को सँवारने-निखारने की उन्हें फुर्सत नहीं मिली:
    अजब होती जाती है कुछ हालते दिल,
    कोई छीन ले जैसे पढ़ने में नावेल.

    मेरी बर्बादी को चश्मे मोतबर से देखिये
    मीर का दीवान ग़ालिब की नज़र से देखिये.
    अल्लाह तो सबकी सुनता है, जुर्रत है शकील अपनी-अपनी,
    ‘हाली’ ने जुबां से कुछ न कहा ‘इकबाल’ शिकायत कर बैठे.

    आखिरिऊ गज़ल उन्होंने बीमारी के बिस्तर पर लिखी थी, उसका शेर है:

    वो उठे हैं लेके खुमो-सुबू, अरे ऐ शकील कहाँ है तू?
    तेरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे.

    उन्हें जाम अजीज़ था लेकिन कुदरत की नज़र में सब कुछ नाचीज़ था.    
      

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