Close Menu
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
    Subscribe
    • कविताएं
    • संपर्क
    • Vote for 2017 Best Seller
    • Best Seller 2018
    • सहयोग/ समर्थन
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    रोहिंटन मिस्त्री के उपन्यास में आखिर ऐसा क्या है?

    By October 21, 201042 Comments7 Mins Read
    आखिर भारतीय मूल के कनाडाई लेखक रोहिंटन मिस्त्री के उपन्यास ‘सच ए लांग जर्नी’  में ऐसा क्या है कि शिव सेना के २० वर्षीय युवराज आदित्य ठाकरे ने मुंबई विश्वविद्यालय के सिलेबस से बाहर करवाकर अपने राजनीतिक कैरियर के आगाज़ का घोषणापत्र लिखा.कह सकते हैं कि शिव सेना की युवा सेना के प्रमुख बनने का जश्न उन्होंने उस घटना के माध्यम से बनाया. आश्चर्य इस बात से हुआ कि महाराष्ट्र के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने पाठ्यक्रम से पुस्तक हटाये जाने की इस घटना का समर्थन किया. आखिर ऐसा क्या है रोहिंटन मिस्त्री के उपन्यास में कि उसके विरोध को लेकर शिवसेना और कांग्रेस दोनों एकमत दिखाई दे रहे हैं?
    सबसे पहले तो यह निवेदन कर दूं कि यह राजनीतिक उपन्यास नहीं है.इसमें मुंबई के खोदाबाद बिल्डिंग में रहने वाले गुस्ताद नोबेल की कहानी है जो बैंक में क्लर्क है और बड़ी मुश्किल से अपने परिवार का भरण-पोषण कर पा रहा है. अपनी पत्नी और तीन बच्चों को पालने के लिए संघर्ष कर रहा है. कहानी की पृष्ठभूमि ७० के दशक की है जब बंगलादेश युद्ध के बाद इंदिरा गाँधी को दुर्गा के रूप में बताया जा रहा था, ‘इंदिरा इज़ इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’ जैसे नारे गढे जा रहे थे. मजेदार बात यह है कि उपन्यास में गुस्ताद और उसके मित्र नेहरु-गाँधी परिवार को लेकर अधिक कटु हैं बजाय शिव सेना के. वास्तव में, कांग्रेस और नेहरु-गाँधी परिवार से मोहभंग शुरू होने का वही दौर था. उपन्यास में पारसी समाज की कहानी है इसलिए इंदिरा गाँधी के स्वर्गीय पति फिरोज गाँधी को लेकर उपन्यास में स्वाभाविक सहानुभूति है. एक जगह गुस्ताद कहता है कि नेहरु ने फिरोज गाँधी को घर से इसलिए निकलवाया क्योंकि वह प्रधानमन्त्री के घर में रहते हुए भी कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर करने लगा था, गरीबों-मजलूमों की बात करने लगा था जबकि नेहरु उस विचारधारा से दूर जा रहे थे. इसीलिए नेहरु ने अपनी बेटी इंदिरा और फिरोज गाँधी में दूरी पैदा की और आखिरकार उसे घर से ही निकाल दिया. अनेक सन्दर्भों में कांग्रेस सरकार और नेहरु-गाँधी परिवार पर उपन्यास के पात्र चुटकियाँ लेते दिखाई देते हैं. एक जगह पर दिन्शा और दिलनवाज़ की बातचीत के दौरान दिन्शा कहता है कि फिरोज गाँधी को नेहरु ने कभी भी पसंद नहीं किया. वह नहीं चाहते थे कि उसके प्रेम में पागल उनकी बेटी उससे शादी करे. इसीलिए उन्होंने अपनी बेटी का घर उजाड़ दिया. लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि फिरोज गाँधी को पड़ा दिल का दौरा भी वास्तविक नहीं था. यह भी आता है कि इंदिरा और उसका बेटा तमाम तरह के भ्रष्टाचार में संलग्न है और यहाँ तक कि स्विस बैंकों में उनके खाते भी हैं. दिलनवाज़ कहती है कि जब लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु हुई थी तब भी तमाम तरह की बातें की जा रही थीं.
    वास्तव में, जीवन के २३ साल मुंबई में बिताने वाले रोहिंटन मिस्त्री के उपन्यासों में पारसी समाज समाज का गहन और यथार्थवादी चित्रण होता है और अगर इस तरह के प्रसंग उनके उपन्यासों में आते हैं तो इसका कारण भी यही है कि इसके माध्यम से वे यह दिखाना चाहते हैं कि अल्पसंख्यक समाज के सबसे बड़े हितैषी समझे जानेवाले नेहरु-गाँधी परिवार और कांग्रेस पार्टी को लेकर उस दौर में भी पारसी समाज क्या सोचती थी जब ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देकर इंदिरा गाँधी ने देश में उम्मीद की एक नई लहर पैदा कर दी थी. लेकिन अपने समुदाय के नायक फिरोज गाँधी की बर्बादी को पारसी समाज बरसों बाद भी नहीं भूल पाया था इसीलिए वह इंदिरा गाँधी को भी माफ नहीं कर पाया था. जिसने प्रधानमन्त्री बनने के अपने सपने को पूरा करने के लिए फिरोज गाँधी से किनारा कर लिया था. यह उपन्यास है कोई ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं इसलिए इसमें से कुछ सच हो यह कोई आवश्यक नहीं क्योंकि अंततः उपन्यास का स्वरुप गल्पात्मक होता है. हो सकता है उसमें लिखी गई हर बात सच हो लेकिन उसके सच होने का दावा कदापि नहीं किया जा सकता है.
    लेकिन यह सब लिखने के दौरान शायद मैं भूल ही गया कि इस उपन्यास को मुंबई विश्वविद्यालय के के वैकल्पिक पाठ्यक्रम से हटवाने में कांग्रेस की भूमिका नहीं थी बल्कि शिवसेना के यूथ आइकन २० वर्षीय आदित्य ठाकरे ने उसके माध्यम से अपना और अपने परिवार का राजनीतिक रुतबा दिखाया है. तो ज़ाहिर है उन्होंने इसलिए तो इस पुस्तक को पाठ्यक्रम में रखे जाने का विरोध नहीं किया होगा कि इसमें नेहरु-गाँधी परिवार को लेकर कटूक्तियां हैं. नहीं.
    असल में उपन्यास में शिवसेना और और उसके मुखिया बाल ठाकरे की भी खबर ली गई है. लेकिन इसके लिए उस पृष्ठभूमि को भी समझना होगा. मुंबई भारत का सबसे पुराना कोस्मोपौलिटन शहर रहा है. जहाँ अलग-अलग समुदायों के लोग न सिर्फ रहते आए थे बल्कि मुंबई के उत्थान में उनका भी वैसा ही योगदान रहा है. पारसी समाज तो मुंबई की पहचान का हिस्सा रहा है. लेकिन ७० के दशक में मराठी माणूस के नाम पर शिवसेना ने अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ जिस तरह से जिहाद बोला उससे पहली बार यहाँ रहने वाले पारसियों के मन में भी मुंबई को लेकर बेगानापन का भाव भरने लगा. मन में संशय का भाव भरने लगा. एक जगह गुस्ताद अपने बेटे सोहराब के भविष्य की चिंता करते हुए कहता है कि फासिस्ट शिव सेना और मराठी भाषा की राजनीति के कारण अल्पसंख्यकों का यहाँ यानी मुंबई में कोई भविष्य नहीं रह गया है. आगे पता नहीं क्या होनेवाला है. एक और प्रसंग में शिवसेना के नेता को हिटलर और मुसोलिनी के पूजक के रूप में याद किया गया है.   
    लेकिन यह उपन्यास की मूल कथा नहीं है. यह तो उसके पारसी चरित्रों के मन के संशय हैं, अविश्वास है, मन में बढ़ता बेगानापन है जो इस तरह के संवादों के माध्यम से प्रकट होता है. बात रोहिंटन मिस्त्री और उनके उपन्यास की हो रही है तो मैं बता दूं १९९१ में प्रकाशित उनके पहले उपन्यास ‘सच ए लांग जर्नी’ को पढते हुए मुझे पता नहीं क्यों ‘पेस्तनजी’ फिल्म की याद आ जाती है. शायद इसका कारण यह है कि उनके इस उपन्यास में पारसी समाज के खान-पान, उनके रहन-सहन, उनकी परम्पराओं का इतनी गहनता से वर्णन किया गया है कि उससे कहीं-कहीं तो बहुत महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है लेकिन कहीं-कहीं वह उपन्यास को बोझिल भी बना देता है. उपन्यास के आरम्भ में ही चिकन लाने और उसे पकाने का इतना लंबा वर्णन है कि कि उबाऊ लगने लगता है. वैसे अगर पारसी समाज के रीति-रिवाजों, परम्पराओं, खान-पान के बारे में जानना हो तो यह उपन्यास उसका एक विश्वसनीय स्रोत है.
    पारसी समाज मुंबई की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है उसके गुस्ताद और उसके परिवार के माध्यम से उसके जीवन-संघर्ष को लेखक ने उपन्यास में बड़ी बारीकी से उकेरा है. उपन्यास को आत्मकथात्मक भी कहा जा सकता है क्योंकि कथानायक गुस्ताद की ही तरह रोहिंटन मिस्त्री भी बैंक में क्लर्क रह चुके थे. खैर, ‘सच ए लॉन्ग जर्नी’ ही वह उपन्यास है जिसने रोहिंटन मिस्त्री को विश्वप्रसिद्ध बना दिया. एक कद्दावर लेखक के तौर पर स्थापित कर दिया. लेकिन फिलहाल यह चर्चा का कारण नहीं है.
    मारियो वर्गास ल्योसा ने लिखा है कि उपन्यासकार अपने उपन्यास में एक कल्पित समाज की रचना करता है जो वास्तविक समाज के समतुल्य होता है तथा जितनी उसकी वास्तविक समाज से समानता होती है उतना ही वह सफल होता है. लेकिन ‘सच ए लॉन्ग जर्नी’ के गल्पात्मक सत्य की वास्तवक समाज से ऐसी समतुल्यता है कि उसने परस्पर-विरुद्ध दो ध्रुवान्तों को एकमत कर दिया है. कहा जाता है कि साहित्य लेखन इसीलिए सबसे मुक्त विधा होती है क्योंकि उसमें लेखक को कुछ भी लिखने की स्वतंत्रता होती है क्योंकि अंततः उसमें सब काल्पनिक होता है. लेकिन यह घटना बताती है कि कभी-कभी कल्पना भी यथार्थ पर भारी पड़ जाता है.
    सोचता हूँ कि कहीं यह नए प्रकार की सेंसरशिप की शुरुआत तो नहीं है. कुछ अरसा पहले इसी तरह लेखक कृष्ण बलदेव वैद को अश्लील ठहराने के क्रम में दिल्ली में कांग्रेस-भाजपा एक हो गए थे. उनको हिंदी अकादमी का शलाका सम्मान नहीं दिया जा सका था. इस बार यह देश के सबसे बड़े कॉस्मोपोलिटन में हुआ है.

    Related Posts

    Драгон Мани: Мифический Зверь и Реальные Выигрыши

    June 20, 2026

    Tropicana Online casino Nj Applications on the internet Gamble

    June 19, 2026

    Regulamentação do jogo como a lei pode impactar apostadores e operadores

    June 19, 2026
    View 42 Comments
    Leave A Reply Cancel Reply

    Recent Posts

    • Драгон Мани: Мифический Зверь и Реальные Выигрыши
    • Tropicana Online casino Nj Applications on the internet Gamble
    • Regulamentação do jogo como a lei pode impactar apostadores e operadores
    • Najkorzystniejsze automaty online Graj po slot urządzenia vinyl kasyno bezpłatnie
    • Ultimat Casinon Utrike 2026

    Recent Comments

    No comments to show.
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
    Facebook X (Twitter) Instagram Pinterest Vimeo YouTube
    © 2026 jankipul. Designed by jankipul.

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.