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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    घासलेटी साहित्य से लुगदी साहित्य तक

    By July 24, 20108,242 Comments11 Mins Read

    हिन्दी के लोकप्रिय उपन्यास
    इन दिनों हिन्दी के दो लोकप्रिय जासूसी उपन्यास-लेखकों की अंग्रेजी में बड़ी चर्चा है। पहला नाम है इब्ने सफी। आजादी के बाद के आरंभिक दशकों में कर्नल विनोद जैसे जासूसों के माध्यम से हत्या और डकैती की एक से एक रहस्यमयी गुत्थियां सुलझानेवाले इस लेखक के उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद प्रसिद्ध प्रकाशक रैंडम हाउस ने छापा है। खबर है कि हाउस ऑफ फियर नामक इस अनुवाद को जिस तरह से पाठकों ने हाथोहाथ लिया है कि प्रकाशक उनके अन्य उपन्यासों के अनुवाद छापने की योजना बना रहे हैं। इब्ने सफी मूल रूप से उर्दू में लिखते थे। प्रकाशक हार्पर कॉलिंस ने जासूसी दुनिया तथा इमरान सीरीज़ के उनके 15 उपन्यासों का उर्दू से हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किया है।
    दूसरे लेखक हैं सुरेन्द्र मोहन पाठक। बंगलोर के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने इनके एक उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद किया। पाठकों की प्रतिक्रिया इतनी उत्साहर्द्धक रही कि जल्दी ही उनकी दूसरी पुस्तक का अनुवाद भी छपकर आ गया। पिछले साल एक और खबर ने ध्यान खींचा था जिसका संबंध जासूसी उपन्यासों से था। फिल्म फेस्टिवल आयोजित करनेवाली संस्था ओसियान ने मुंबई में हिन्दी के जासूसी उपन्यासों के करीब 150 कवर्स की प्रदर्शनी लगाई। संस्था के निदेशक का कहना था कि इन किताबों के कवर को लोकप्रिय कला के एक माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए। जिस साहित्य को हिंदी के पब्लिक स्फेयर में कभी घासलेटी साहित्य तो कभी लुगदी साहित्य की संज्ञा दी गई आज अंग्रेजी प्रकाशक-पाठक क्लासिक के रूप में देख रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय, जे.एन.यू. के इतिहास विभागों में इनके ऊपर शोध किए जा रहे हैं, इनकी व्याप्ति का आकलन किया जा रहा है।
    किसी जमाने में हिन्दी के लोकप्रिय उपन्यासों को चवन्नी छाप भी कहा जाता था क्योंकि इलाहाबाद की जिस पत्रिका में इनका प्रकाशन किया जाता था उसकी कीमत तब चार आने होती थी। यही नहीं बनारस के एक प्रकाशक ने जब ऐसी पुस्तकों का प्रकाशन शुरु किया तो उनकी कीमत रखी चार आने। इस सीरीज को लोग आपसी बातचीत में चवन्नी जासूस कहा करते थे। उन चार आने की पत्रिकाओं में कभी राही मासूम रजा की गजलें भी छपा करती थीं और इब्ने सफी के उपन्यास भी। कहते हैं कि हिन्दी के अनेक साहित्यिक लेखक तब पापी पेट के लिए छद्म नामों से इन पत्रिकाओं में उपन्यास लिखा करते थे। हिन्दी के विद्वान इस बात को लेकर लगभग सहमत दिखाई देते हैं कि हिन्दी में जासूसी उपन्यासों ने पाठक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया। इस तरह के लोकप्रिय साहित्य पढ़नेवाले पाठक की रुचि बाद में परिष्कृत होती है और वह गंभीर साहित्य का पाठक बनता है।
    कहते हैं कि देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों की तिलिस्मी-ऐयारी की कथाओं को पढ़ने के लिए बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में लोग हिन्दी सीखने लगे थे। उसी दौर में गोपाल प्रसाद गहमरी ने जासूस नामक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। आरंभ में अंग्रेजी, बांग्ला भाषाओं से जासूसी कहानियों का अनुवाद करके हिन्दी में छापा जाता था। उन दिनों जासूसी उपन्यासों-कहानियों की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि राष्ट्रीयतावादी साहित्यकारों ने इसे घासलेटी साहित्य का नाम दिया यानी ऐसा साहित्य जो समाज में घासलेट या मिट्टी तेल की तरह बदबू फैलाता हो। विशाल भारत के संपादक पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी ने गंभीर साहित्य की तुलना घी से की जो खुश्बू फैलाता है और पढ़नेवालों के मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखता है जबकि जासूसी उपन्यास जैसे घासलेटी साहित्य समाज में बदबू तो फैलाते ही हैं पढ़नेवालों में दुर्गुणों का प्रसार करते हैं। बहरहाल, 1940 में उर्दू में जासूसी उपन्यास लिखना शुरु करनेवाले इब्ने सफी ने अपने मृत्युपर्यंत 1980 तक करीब दो सौ उपन्यास लिखे और पाठकों का ऐसा बड़ा वर्ग था जो उनके उपन्यासों की प्रतीक्षा किया करता था। वे उस चवन्नी छाप दौर के सबसे बड़े और व्यावसायिक मानकों पर सबसे सफल लेखक थे।
    चवन्नी छाप पुस्तकों के बाद एक रुपल्ली पुस्तकों का दौर आया। साठ के दशक में हिन्द पॉकेट बुक्स ने पेपरबैक में किताबें छापनी शुरु कीं और उनका दाम रखा एक रुपया। इसने घरेलू लाइब्रेरी योजना की शुरुआत की जिसमें पाठकों को पांच रुपए की वीपीपी से एक-एक रुपए की छह पुस्तकें भेजी जाती थीं। पोस्टेज फ्री होता था। सत्तर का दशक आते-आते इस योजना की सदस्य संख्या पौने छह लाख तक पहुंच गई। प्रकाशन की ओर से हर माह करीब अड़तीस हजार पैकेट भेजे जाते थे, हिन्द पॉकेट बुक्स के कंपाउंड में तीन अस्थायी पोस्ट ऑफिस घरेलू लाइब्रेरी योजना के पैकेट भेजने के काम में लगे रहते थे। जासूसी उपन्यासों की लोकप्रियता को इस दौर में पारिवारिक कहे जानेवाले रोमांटिक उपन्यासों की धारा ने पीछे छोड़ दिया। एक रुपए कीमत होने के कारण इन भावुकतापूर्ण उपन्यासों को उस जमाने में गंभीर साहित्यिकों ने तंजिया सस्ता साहित्य कहना भी शुरु कर दिया। कुशवाहा कांत, प्यारेलाल आवारा, प्रेम वाजपेयी, राजवंश, रानू जैसे लेखकों की पहचान इसी सस्ता साहित्य के दौर में बनी।
    सस्ता साहित्य के सबसे बड़े लेखक थे गुलशन नंदा जिनके उपन्यास झील के उस पार की पांच लाख प्रतियां बिकीं जो उस जमाने में प्रकाशन जगत की सबसे बड़ी घटना बनी। पत्थर के होंठ, घाट का पत्थर, काली घटा, नीलकमल, नया जमाना जैसे उपन्यासों के लेखक गुलशन नंदा ने लोकप्रिय साहित्य के क्षेत्र में व्यावसायिकता के नए मानक स्थापित किए। लोकप्रिय उपन्यासकार तो बहुत हुए लेकिन वे अकेले थे जिनके उपन्यासों पर सबसे अधिक फिल्में बनीं। काजल, शर्मीली, पत्थर के सनम, खिलौना, झील के उस पार, नीलकमल, महबूबा, पाले खां उन कुछ फिल्मों के नाम हैं जिनका निर्माण दिल्ली के इस लेखक की कृतियों को आधार बनाकर किया गया। उनके उपन्यासों ने हिन्दी की पारिवारिक फिल्मों में सफलता के नए मानक स्थापित किए। कहा जाता था कि गुल तो बहुत हैं मगर एक है गुलशन!
    टेलिविजन नहीं आया था और मध्यवर्गीय परिवारों में साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग जैसी पारिवारिक पत्रिकाएं पढ़ने, पारिवारिक सिनेमा देखने या रोमांटिक-पारिवारिक उपन्यास पढ़ने का चलन था। शिवानी के उपन्यास भी इसी दौर में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के पन्नों पर धारावाहिक छपकर लोकप्रिय हुए। बीच के इस दौर में जासूसी उपन्यास किशोरों के लिए लिखे जाने लगे। राजन-इकबाल सीरीज खासा लोकप्रिय था जिसके लेखक थे एस. सी. बेदी। इसकी लोकप्रियता को देखकर अनेक लेखकों के नाम से अनेक प्रकाशकों ने राजन-इकबाल सीरीज की पुस्तकों का प्रकाशन शुरु किया लेकिन पाठक एस. सी. बेदी का नाम लेखक के स्थान पर देखकर ही राजन-इकबाल सीरीज की किताब खरीदते थे। ऐसी लोकप्रियता थी एस. सी. बेदी की।
    अस्सी का दशक आते-आते रोमांटिक-पारिवारिक उपन्यासों का जलवा उतरने लगा। ऐसे में जासूसी उपन्यासों का दौर नए अवतार में नए सिरे से आया- थ्रिलर या अपराध-कथाओं के रूप में। जासूसी उपन्यासों के पहले दौर में इलाहाबाद-बनारस के प्रकाशकों का योगदान था तो इस नए दौर की सफलता-गाथा लिखी मेरठ-दिल्ली के प्रकाशकों ने। दो लेखकों की चर्चा के बिना इस नए दौर के जासूसी-अपराध केंद्रित उपन्यासों की चर्चा अधूरी ही कहलाएगी। ऊपर दिल्ली के लेखक सुरेंद्र मोहन पाठक का जिक्र आया था। दूसरे लेखक हैं मेरठ के वेद प्रकाश शर्मा। उस जमाने में दिल्ली-मेरठ के करीब 40 प्रकाशक इनके जैसे लेखकों की किताबों के प्रकाशन में मुनाफा कमाते थे। जासूसी उपन्यास लेखक वेद प्रकाश कांबोज को अपना गुरु माननेवाले वेद प्रकाश शर्मा के बारे में कहा जाता है कि इसने लोकप्रिय साहित्य के लेखकों को भी लोकप्रियता के मायने नए सिरे से सिखाए।
    गुलशन नंदा अगर रोमांटिक धारा के सबसे लोकप्रिय लेखक थे तो वेद प्रकाश शर्मा जासूसी-अपराध केंद्रित उपन्यासों की धारा के। गुलशन नंदा के उपन्यास झील के उस पार की तो कुल पांच लाख प्रतियां बिकीं वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास वर्दी वाला गुंडा की तो पांच लाख प्रतियों का संस्करण एक ही दिन में निकल गया। कहते हैं इस उपन्यास का कथानक पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या पर आधारित था। उनके लड़के शगुन शर्मा, जो सबसे कम उम्र में 100 उपन्यास लिखने वाले लोकप्रिय उपन्यासकार के रूप में जाने जाते हैं, ने हाल में एक इंटरव्यू में बताया कि वर्दी वाला गुंडा की अब तक आठ करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं। लगभग पौने दो सौ किताबों के इस लेखक का अस्सी के दशक में कोई उपन्यास एक लाख से कम नहीं छपा। वे अकेले लुगदी लेखक हैं जिनका अपना प्रकाशन है- तुलसी प्रकाशन, मेरठ। आजकल इस प्रकाशन का काम शगुन शर्मा देखते हैं।
    उन्होंने विक्रांत सीरीज के जासूसी उपन्यास लिखे जिनके परिप्रेक्ष्य अंतरराष्ट्रीय होते थे। बाद में उनका एक पात्र केशव पंडित तो इतना लोकप्रिय हुआ कि बाद में केशव पंडित को लेखक के रूप में अवतार लेना पड़ा। केशव पंडित के छद्म नाम से अनेक उपन्यास छपे और लोकप्रिय हुए। आजकल जी टीवी पर केशव पंडित नामक धारावाहिक भी आ रहा है. अस्सी के दशक के में देश भर के छोटे-छोटे शहरों के पाठक हर महीने इंतजार करते थे कि वेद प्रकाश शर्मा का नया उपन्यास आए। बाद के दौर में गुलशन नंदा की ही तरह वेद प्रकाश शर्मा ने भी अनेक फिल्में लिखीं जिनमें अक्षय कुमार की खिलाड़ी सीरीज की फिल्में हैं। बाद में जब टीवी धारावाहिकों का दौर शुरु हुआ तो वेद प्रकाश शर्मा ने कहानी घर-घर की जैसे सफल धारावाहिकों की निर्माता कंपनी बालाजी टेलिफिल्म्स के लिए धारावाहिक लेखक और सलाहकार के रूप में काम किया।
    कानून की पेचीदगियां वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों की लोकप्रियता का बड़ा कारण मानी जाती रही हैं। केशव पंडित उनका एक ऐसा पात्र है जिसने वकालत की पढ़ाई नहीं की लेकिन कानून के ज्ञान में बड़े-बड़े वकीलों के कान काटता है। परिवेश पर पकड़ सुरेन्द्र मोहन शर्मा के उपन्यासों की लोकप्रियता का बड़ा कारण मानी जाती रही हैं। वे वेद प्रकाश शर्मा के समकालीन लेखक हैं और महानगरों के अपराध के नए-नए तरीकों की गुत्थियों को सुलझाने में उन्होंने जैसी महारत दिखाई है पाठकों में पाठक जी की अचूक विश्वसनीयता का यही बड़ा कारण है। कहते हैं कि जिन मामलों को पुलिस नहीं सुलझा पाती पाठकजी के पात्र चुटकी बजाते सुलझा लेते हैं। अंग्रेजी अनुवाद के द्वारा वे लोकप्रियता के नए आयामों को छू रहे हैं। विमल सीरीज की लोकप्रियता आज भी बनी हुई है। एक उपन्यास के करीब चार लाख रूपए लेने वाला यह लेखक लगभग सत्तर साल की उम्र में भी साल में चार उपन्यास लिख लेता है। वे इस तरह से अनसुलझे हत्याकांडों की गुत्थियां सुलझाते हैं जिनके ऊपर कोई ऑटो चलानेवाले, किसी ऑफिस के बाहर या हाउसिंग सोसायटी के बाहर चौकीदारी करनेवाले, छोटे शहरों के लॉज में रहकर पढ़ाई करनेवाले आंखें मूंदकर विश्वास करते हैं।
    नब्बे के दशक में परिदृश्य बदलने लगा। जैसे-जैसे केबल टीवी की लोकप्रियता बढ़ती गई एक तरफ धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान जैसी पत्रिकाएं बंद होती चली गईं तो दूसरी ओर भारत की सबसे अधिक बिकनेवाली पत्रिका मनोहर कहानियां, सत्यकथा जैसी पत्रिकाएं भी बंद होती चली गईं। इस दौर में लोकप्रिय उपन्यासों की लोकप्रियता भी कम होती चली गई। अच्छे दिनों में वेद प्रकाश शर्मा का कोई उपन्यास एक लाख से कम नहीं बिका बाद में उनके उपन्यासों के बीस-तीस हजार के संस्करण आने लगे। उन्होंने तो उपन्यास लिखना भी कम कर दिया। यही हालत सुरेन्द्र मोहन पाठक की भी हुई। उपन्यास-लेखन में वे दो सौ पचास नॉट आउट हैं लेकिन अब उनके उपन्यासों के संस्करण पचास हजार से अधिक के नहीं होते।
    अस्सी के दशक में जहां चालीस के करीब प्रकाशक थे अब महज छह-सात प्रकाशक रह गए हैं। आज भी रितुराज, अनिल मोहन, विक्की आनंद, परशुराम शर्मा, रीमा मोहन, पवन, ओम प्रभाकर समेत करीब 20 लेखक हैं जो इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन आज भी हमारे अपने देशी जेम्स हेडली चेज और अगाथा क्रिस्टी की सहज उपलब्धता बनी हुई है। रेलवे स्टेशनों या बस स्टैंडों पर यात्री भागते-भागते चालीस रुपए में एक उपन्यास खरीद लेता है या सड़क पुस्तकालयों से भाड़े पर लेकर पढ़ लेता है। उनकी कीमत आज भी इतनी कम है कि सस्ता साहित्य के रूप में उनकी पहचान कायम है। साहित्यिक कृतियों से इनकी तुलना नहीं की जानी चाहिए लेकिन कम कीमत और निजी साधनों द्वारा जिस प्रकार लोकप्रिय साहित्य की लोकप्रियता बनी हुई है वह सीखी जा सकती है। साहित्यिक प्रकाशक-लेखक आज भी प्रचार-प्रसार के लिए सरकार की बाट जोहते रहते और इस बात का रोना रोते रहते हैं कि सरकार साहित्य के प्रसार के लिए उचित प्रयास नहीं कर रही है।
    इन जासूसी-रोमांटिक उपन्यासों की लोकप्रियता अगर इस टीवी युग में भी बनी हुई है तो यह इस बात की ओर संकेत करती है कि हिन्दी के पाठक आज भी बने हुए हैं साहित्यिक प्रकाशकों द्वारा ऐसे प्रयास नहीं किए जाते हैं जिससे उन पाठकों तक पहुंचा जा सके। लोकप्रिय उपन्यास पाठकों तक पहुंचने के नए-नए हथकंडे अपनाते हैं। जिनमें टीवी के लोकप्रिय कार्यक्रमों के बीच में प्रचार करने से लेकर बसों, सार्वजनिक सवारी गाड़ियों के पीछे लिखित रूप में प्रचार करना, रेडियो पर प्रचार करना शामिल हैं। यही नहीं संचार के नए-नए माध्यमों के अनुकूल होने में भी लोकप्रिय कथा-लेखक आगे रहते हैं। ई-रीडर की लोकप्रियता के इस दौर में वेद प्रकाश शर्मा के पचास के करीब उपन्यास आधे डॉलर की कीमत में ई-रीडर के लिए डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध हैं। मात्र मनोरंजन के उद्देश्य से लिखे गए इन उपन्यासों से नाक-भौं सिकोड़ने की बजाय अगर मनोरंजन के एक माध्यम के रूप में इनका अध्ययन किया जाए तो कुछ रास्ता निकल सकता है। जबकि सारा यथार्थ फॉर्मूला लगने लगा हो तो क्या पता इस फॉर्मूला लेखन में ही कुछ यथार्थ दिख जाए।

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