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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    झील की वेदनामयी खामोशी के बीच

    By July 7, 20106 Comments6 Mins Read

    द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इटली में उभरने वाले महान फिल्म-निर्देशकों एंतोनियोनी, फेलिनी के साथ पासोलिनी की भी गणना की जाती है। उनकी गणना उच्चकोटि के गद्य-लेखकों में भी की जाती रही है। उन्होंने अनेक यादगार कहानियाँ लिखीं। 1960 के दशक में प्रसिद्ध उपन्यासकार अल्बर्तो मोराविया के साथ वे भारत यात्रा पर आए थे। यह गद्यांश उनके इसी भारत-यात्रा के अनुभवों पर आधारित है, जो अंग्रेजी में ‘सेंट ऑफ इंडिया’ के नाम से प्रकाशित है।
    ========================

    भारतीय मध्यवर्ग के दो चेहरे

    मध्यवर्ग को संसार की सबसे मुश्किल विशिष्टताओं में से एक माना जाता है। हालाँकि भारतीय मध्यवर्ग में अनिश्चितता का एक ऐसा भाव है जो व्यक्ति में दया और भय का भाव भर देता है। भारतीय समाज में जीवनस्तर में समानुपातिकता नहीं दिखाई देती है।
    यह सचाई है कि भारतीय मध्यवर्ग का जन्म इस नर्क के भीतर से हुआ है- अविकसित और भूखे शहरों में, मिट्टी-गोबर से बने ग्रामीण घरों में, भूख और महामारी के बीच उसका जन्म हुआ है। इन सब वजहों से वह मानसिक तनाव में दिखाई देता है। इसकी वजह से वे गुमसुम से दिखाई देते हैं। इसी कारण शहर में दुकानदारों या अन्य प्रकार के व्यवसायियों के चेहरे पर भय का भाव बना रहता है, संवेदनशून्यता का भाव।
    दक्षिण भारत के टेक्काडी में मुझे दो तरह के मध्यवर्ग के दर्शन हुए और दोनों में काफी भिन्नता थी।
    टेक्काडी एक पर्यटन स्थल है, यहाँ जंगल के बीच में कृत्रिम झील के किनारे होटल बने थे। लोग वहाँ इसलिए जाते क्योंकि कहा जाता था कि वहाँ कुछ जंगली जानवर रहते हैं। जबकि वास्तव में हमें कुछ दिखाई नहीं दिया, यह आनंद तो अफ्रीका के जंगलों में मिला था। वहाँ पर हमने खुले में जानवरों को घूमते देखा था।
    जिस दिन हम टेक्काडी आए वह भारत की आजादी की दसवीं सालगिरह का दिन था। गाँव में हम जहाँ से भी गुजरे हमें इस महान राष्ट्रीय पर्व को लेकर सादगी भरा माहौल ही दिखाई दिया, क्योंकि जौसा कि मैं कह रहा था कि भारत बड़ा ही सादा और ग्रामीण देश है। ताड़वनों के बीच बनी झोंपडि़यों के ऊपर तिरंगे लहरा रहे थे, सड़कों पर बच्चों की कतारों थीं तथा उस धूलभरे गाँव के चौराहे पर औपचारिक रूप से लोग जुटे हुए थे।
    अनेक समूह त्योहार मनाने के विचार से टेक्काडी आए थे, लेकिन यह बात साफ रहनी चाहिए कि उनमें सादगी और गरीबी झलक रही थी। वैसे माहौल कुछ उसी तरह का था जैसा कि यूरोप में रविवार के दिन किसी पर्यटन स्थल का होता है।
    दिन के भोजन से पहले मैं मोराविया(यहाँ प्रसिद्ध उपन्यासकार अलबर्तो मोराविया का संदर्भ है) के साथ होटल से लगी सड़क पर टहलने निकला। जब टहल रहा था तब काली रंग की एक फिएट कार हमारे सामने आई। उसमें चार हट्टे-कट्टे नौजवान बैठे थे। हमें सामने देखकर वे जोर-जोर से गाड़ी का हॉर्न बजाने लगे। फिर जोर-जोर से कुछ बोलते हुए चले गए। वैसे इसके सिवा उन्होंने और कुछ भी नहीं किया। लेकिन हम जब तक भारत में रहे उस दौरान ऐसा उग्र और आक्रामक व्यवहार हमारे साथ एक ही बार हुआ, कुछ-कुछ मिलान या पोलेर्मो की तरह। निश्चित तौर पर भारतीय मध्यवर्ग के विकास का यह ढंग नहीं रहा है। लेकिन देखने पर खतरा तो लगता ही है। कमजोर में हिंसक हो जाने की जबरदस्त प्रवृत्ति होती है। यह भयानक होगा कि चालीस करोड़ निवासियों का यह देश, जो संसार में ऐतिहासिक और राजनीतिक तौर पर इतना भार वहन कर रहा है उसका यांत्रिक और घटिया तरीके से पश्चिमीकरण हो। कुछ दूर आगे बढ़ने पर हमारा सामना स्कूल के छात्रों और उनके शिक्षकों के एक झुंड से हुआ। उनमें उन चार लड़कों जैसा कुछ भी नहीं था।
    उन सबने सफेद कपड़े पहन रखे थेः नए और सफेद क्योंकि यह उनकी छुट्टी का दिन था, क्योंकि यह उनकी आजादी का दिन था। कमर में उन्होंने धोती लपेट रखी थी जो सामने से खुली हुई थी, ऊपर उन्होंने तहमद लपेट रखी थी, सिर में सफेद साफा, सब कुछ सफाई और सादगी से। वे झील के किनारे खड़े थे। हम उनके सामने वाले ढलान पर जाकर बैठ गए, बीच-बीच में संकोचवश एक दूसरे को देख भी लेते थे। ये कितने अलग थे। इनका व्यवहार कितना अच्छा था। वे चुपचाप आपस में या अपने शिक्षकों से फुसफुसाकर बातें कर रहे थे। हालांकि उस अवसर की खुशी उनके साँवले चेहरे पर गहरी काली आँखों में झलक रही थी। वे मोराविया और मुझे देखते रहे, कभी-कभी यूं ही, कभी मुस्कुरा भी देते। न उन्होंने कुछ कहा न हमने ही। मानो उन छात्रों-शिक्षकों को यही उचित लगा हो कि चुपचाप हमें देखकर मुस्कुराते रहें।
    कुछ समय के बाद उनमें से एक लड़के ने बाँसुरी निकाली, वह हमारे पास आ गया, कुछ देर झिझक में बैठा रहा, फिर बजाने लगा। यह एक पुरानी भारतीय धुन थी, क्योंकि भारत संगीत पर किसी तरह के पाश्चात्य प्रभाव का विरोध करता हैः सचमुच मुझे तो यह लगता है कि भारतीय शारीरिक तौर पर भी अपने अलावा किसी और तरह के संगीत सुनने में समर्थ नहीं हैं। बाँसुरी बजाने के बाद लड़के ने हमारी तरफ ऐसे देखा जैसे उसने बाँसुरी बजाकर ही हमसे बात की हो। फिर उसने अपने और अपने साथियों के बारे में एक लंबी तकरीर दी।
    हमें देखिए, वह कहने लगा, हम गरीब नन्हें भारतीयों को, जो बमुश्किल कपड़े से अपने तन को ढक सकता है, हमें जानवरों, भेंड़ या बकरियों की तरह नग्न रहना पड़ता है। हम स्कूल जाते हैं, यह सच है कि हम पढ़ते हैं। आप हमारे साथ बैठे हमारे शिक्षकों को देख सकते हैं। हमारा अपना प्राचीन धर्म है, जटिल और कुछ भय पैदा करने वाला, इसके अलावा आज हम आजादी का उत्सव मना रहे हैं।
    लेकिन अभी हमें कितना और चलना है। हमारे गाँव मिट्टी और गाय के गोबर से बने हैं। हमारे शहर महज़ बाजार की तरह हैं, धूलभरे और साधनहीन। सभी प्रकार की बीमारियाँ हमें डराती रहती हैं, प्लेग और छोटी चेचक ने तो जैसे यहाँ घर ही बना लिया है, साँपों की तरह। और कितने छोटे बच्चे पौदा होते हैं, जिनके खाने के लिए हम मुट्ठीभर चावल का इंतजाम भी नहीं कर सकते हैं। हमारा क्या होगा। हमें क्या करना चाहिए! हालाँकि इन दुखों के बीच हमारे दिलों में कुछ है जो खुशी नहीं तो खुशी जैसी ही हैः यह मानवता का भाव है जो संसार के प्रति हमारे अंदर है…. आप जब अपने देश लौटेंगे तो हमें याद रखेंगे, हम गरीब भारतीयों को…
    वह इसी तरह काफी देर तक बाँसुरी बजाता रहा और बोलता रहा,
    झील की वेदनामयी खामोशी के बीच।

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