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    विवाह का बदलता स्वरूप : साहित्य समाज और कानून

    administrator_06848bBy administrator_06848bJune 10, 201734 Comments11 Mins Read
    विवाह संस्था को लेकर विभिन्न लोगों का विभिन्न मत हो सकता है, होना भी चाहिए। समकालीन विवाह के बदलते स्वरूप पर माधव राठौड़ का लेख – संपादक
    ==========================================================
    अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर हमेशा महिलाओं के इतिहास और वर्तमान  स्थिति पर ही चर्चा  होती है। उनके अधिकारों,मांगों और कानूनों पर ही चर्चा होती है जो बन चुके है मगर उस हलचल और बदलाव के संकेत जो हमारे आसपास नजर आ रहे हैं, उसकी तरफ ध्यान बरबस नही जाता ।जो आने वाले वर्षो में हमारे जीवन में अनिवार्य अंग बनेंगे,इसलिए आज भविष्य की उस  आहट पर बात करना प्रासंगिक होगा, जो कल हमारा वर्तमान बनकर खड़ा होंगे।ऐसे मुद्दो पर निरपेक्ष चिन्तन हो ताकि मानव विकास की सतत प्रक्रिया की कड़ी को समझ सकेंगे। कोई भी अवधारणा पहले समाज में आती है फिर समसामयिक साहित्य उस पर चिन्तन मनन करता है और तत्पश्चात उसके अच्छे और बुरे पक्ष  से बनते है सामाजिक,नैतिक और प्राकृतिक  कानून।इस तरह सृष्टि के प्रारम्भ से हमारी बदलती मूर्त और अमूर्त धारणाओं के साथ मानव विकास की प्रक्रिया सतत चल रही है।आज हम जिस चरण में खड़े है उससे पूर्व कई चरणों से होकर हम गुजरे भी हैं । कुछ परम्पराएँ,नियम और कानून जो कभी तत्कालीन समाज के अनिवार्य अंग थे, कालान्तर में उन्हें समेटते हुए और नष्ट होते हुए देखा गया है। जरूरत के अनुसार कुछ नई  युगीन विचारधारा शुरू हुई जिनका प्रारम्भ में परम्परावादियों ने नकारा,मजाक उड़ाया और समाज के लिए खतरा बता कर घोर विरोध किया मगर धीरे धीरे वे हमारे जीवन का हिस्सा बनती गई।
    कभी मानव विकास के प्रथम चरण में खाना, खोजना और कन्दराओं में सोना ही  लक्ष्य था तो दूसरा चरण शुरू हुआ वो था चिन्तन का दौर ,जिसने मानव को अलग किया अन्य प्राणियों से। उसके विवेक ने उसे संसार के समस्त प्राणियों पर श्रेष्ठता का तमगा दिलाया। कबीले बने, समाज बने, नियम और कानून कायदे बने और इस सतत क्रम से निर्माण हुआ कई सभ्यताओं और संस्कृतियों का। कुछ मिटी, कुछ बनी ,वो जो उदार थी,जिसमें लचीलापन था,बदलाव की स्वीकार्यता थी ।आज इस सृष्टि के विकास के क्रम में सरोगेट मदर और लिव इन रिलेशन ऐसे मुद्दे हैं जिनकी शुरुआत के इतिहास में हम साक्षी माने जायेंगे क्योंकि महिला और पुरुष के इस सहभागिता में दोनों व्यापक स्तर पर विवाह संस्था में आमूलचूल बदलाव  लायेंगे।विश्व की पुरातन संस्कृतियों का गहन अध्ययन करें तो पातें हैं कि विवाह का रूप हर जगह अलग और बदलते स्वरूप में नजर आता है।
    वर्तमान में विवाह के स्वरूप पर बात करें तो अपनी सहमति से ,विवाह के बिना लिव-इन-रिेलेशनशीप में रहना हो , बिन गर्भ धारण किये सरोगेट  माँ बनना हो या बिन ब्याह किये तुषार कपूर और करण जौहर का सिंगल पेरेंट  बनना हो ; यह कुछ ऐसी घटनायें हैं जो हमें विवाह के बदलते स्वरूप की और इशारा करती है कि  पिता बनने के लिए जरूरी नहीं है कि शादी ही की जाये। तुषार कपूर और करण जौहर के इस कदम ने उन लोगों के बने बनाये भ्रम को तोड़ा हैै जो परिवार नामक संस्था के लिए विवाह को बेहद पवित्र और अनिवार्य इकाई  मानते थे। यह इस बदलाव की और इशारा है कि प्रकृति की रुचि केवल अपने अस्तित्व की रक्षा में है और इसका विवाह से  कोई लेना-देना नहीं।वक्त के साथ इसमें बदलाव आते रहे कभी मातृसत्तात्मक तो कभी पितृ सत्ता के रूप में, मगर प्रकृति हमारे नैतिक मूल्यों और संस्कारों से बेपरवाह होकर अपने पथ पर सतत  विकासमान रही  है ।
    हालाँकि पश्चिम ने तो इस अवधारणा को पहले ही स्वीकार कर लिया था। इससे तो विवाह नामक संस्था ही बिखर जायेगी, समाज में अनाचार फैलेगा ,अवैध बच्चे पैदा होंगे, वर्ण संकर पैदा होंगे जिनकी बुद्धि सीमित होगी।इस तरह के कई सवाल भी खड़े हुए है ।मगर प्रकृति के बदलाव को कौन रोक पाया। ऐसे विवाह रहित समाज की, कम्यून की ओशो ने भी परिकल्पना की थी मगर साकार नहीं हो पाई।
    खैर,अब हमने इसे सहज स्वीकार करना शुरू कर दिया हालाँकि अभी यह बदलाव मेट्रो में ही आये है क्योंकि हमारे यहाँ बदलाव,क्रांति,फैशन फतवे दिल्ली और मुंबई से ही आते है और हाँ,बीमारियाँ और महामारी भी…
    हम हमेशा बदलाव के लिए दिल्ली की और मुँह किये हुए ताकते रहते हैं चाहे वह सफाई अभियान हो या घर में शौचालय बनवाना हो।
    मेट्रो में बदलाव की वजह यह कि पश्चिम की आबोहवा इनको जल्दी लगती है, लगेगी भी क्योंकि यह पूरी दुनिया घूमते है देखते है,दोस्त बनाते है तो इनका दायरा बड़ा होता है। इधर परम्परावादियों ने उस हर चीज के आने पर चिंता जताई और संस्कृति के नष्ट करने की साजिश की दुहाई दे विरोध दर्ज किया, जबकि वो समस्त विरोध आज उनके जीवन का मूलभूत अंग बन गये।
    मुद्दा यह नहीं कि विवाह संस्था को खत्म किया जाये बल्कि इस बदलते परिवेश को स्वीकारने पर है और इस प्रश्न पर सोचने का है कि विवाह का यह बदलता स्वरूप हमारे सामने क्यों आ रहा है।
    कुछ समाज शास्त्री इसे  दाम्पत्य- जीवन पर पड़ने वाले असह्य दबाव के विरुद्ध व्यक्त जबरदस्त प्रतिक्रिया के रूप में देखते है।क्योंकि वर्तमान समय में  भागते मेट्रो के लोगों से वैवाहिक जीवन संभाला नहीं जा रहा है ।इसलिए शायद तुषार और करण ने यह कदम उठाया।इसके बारे में करण जौहर कहते है कि “इस निर्णय पर पहुंचने के लिए मैंने स्वयं को मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से तैयार करने के अलावा हर प्रकार की तैयारी कर ली थी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मेरे बच्चों को मेरा अपार प्रेम, देखभाल और ध्यान मिल सके. मेरे बच्चे ही अब मेरी दुनिया और प्राथमिकता हैं।”
    सरोगेट मदर  से पहले परम्परागत दाम्पत्य के खिलाफ उठी एक प्रतिक्रिया  ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ थी। पिछ्ले एक दशक से महिलाओं के लिए जो अनुकूल सामाजिक परिवेश तैयार हुआ है उसने इस  नई जीवन शैली को जन्म दिया है।यद्यपि यह कांसेप्ट अभी तक महानगरों मे ही फ़ैल रहा है क्योंकि अभी तक इसे व्यापक स्तर पर समाज में स्वीकार्यता नहीं मिली।जिसकी वजह  पारम्परिक संस्कार और नैतिक मूल्यों का आड़े आना।जो भी इन बदलते हुए सामाजिक परिवेश व मूल्यों के बीच अब यह जरूरी हो गया है कि इस विषय पर  नये सिरे से  स्वतंत्र चिन्तन अनिवार्य है।
    चिन्तन की कड़ी में अगर इतिहास के पन्ने पलते तो हमें  “नियोग” परम्परा मिलती है जिसमें विधवा स्त्री या बिन ब्याही  माँ बन सकती थी,मगर पिता को गुप्त रखा जाता था मगर अब  सरोगेसी परम्परा में पिता ज्ञात है और माँ अज्ञात होती है।हमें इस कटु सच को स्वीकार करना होगा कि लड़के या लड़कियां  अब शादी की जटिल होती उलझनों से घबराने लगे हैं और इस घबराहट का नाम  तुषार और जौहर है ।
    जब भी समाज में बदलाव आता है नई अवधारणा आती है तो उस पर कानून भी विचार करता है।
    किसी जमाने में अवैध बच्चों का सम्पत्ति पर कोई हक नहीं होता था मगर आज माता -पिता की सम्पत्ति पर हक मिलता है। पहले विधवा को हिस्सा नहीं मिलता था मगर आज उसे पति का हिस्सा जायदाद में मिलता है।
    पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अगर दो वयस्क व्यक्ति आपसी रजामंदी से, शादी के बगैर साथ रहते हैं तो इसमें कुछ गलत नहीं है,यह अपराध नहीं है। साथ रहना जीवन का अधिकार है,यह टिप्पणी निस्संदेह लोकतंत्र और व्यक्ति-स्वतंत्रता की भावना और निष्ठा को एक नयी ऊंचाई देने वाली है।यह मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद 21 का दायरा और ज्यादा बड़ा कर देता है कि लिव-इन-रिलेशनशिप व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीने के मूलभूत अधिकार को एक नया आयाम देता है.
    सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन-रिलेशनशिप पर जो निर्णय दिया  इसके बाद एक बार फिर ‘परिवार’ नामक सामाजिक संस्था के अस्तित्व पर बहस छिड़ गई है। यद्यपि बॉलीवुड में कई सितारे लिव इन रह चुके है।
    यद्यपि लिव इन रिलेशनशिप अभी डेवलपिंग कंसेप्ट है इसकी मान्यता और उत्पन्न बच्चों की वैधता के बारे में भी कानून मौन है हालाँकि “आयशा बनाम उदय ” के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि इन पर डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट लागू होगा और भरण पोषण भी देना होगा।
    दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि कहीं इससे द्वि-विवाह को प्रोत्साहन न मिलने लगे। एक सवाल यह है कि यदि बाल-बच्चों वाला शादीशुदा पुरुष और एक सिंगल महिला लिव-इन रिश्ते में रहते हैं तो ऐसी स्थिति में पहली पत्नी की क्या परिस्थिति होगी? ऐसे में महिलाओं की बराबरी और मुक्ति की घोषणा से शुरू हुए इस रिश्ते का महिला विरोधी रूप उभर कर सामने आ जाएगा।
    मगर जब तक संसद कोई कानून नहीं बनाती तब तक वैधता और सार्थकता को लेकर बहस जारी रहेगी।
    दूसरी तरफ सरोगेसी पर भी कई तीखे सवाल और नैतिकता की नजरें हजारों प्रश्न चिह्न लिए खड़ी है।
    कोख पर उस माँ का अधिकार हो जो जन्म देती है या फिर उस पिता की जो किराये की कोख से बच्चे को पाते है। बच्चे की वैधता और अधिकार पर क्या कानून हो। जैविक पिता और सरोगेट मदर की अनुमति कब और किन्हें दी जाये ताकि इसका आनेवाले समय में दुरूपयोग न हो।यद्यपि इस बारे में कानून अभी विचाराधीन है ।वर्तमान प्रस्तावित सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016 के तहत अविवाहित पुरुष सरोगेसी के लिए आवेदन नहीं कर सकते वहीं सरोगेसी के जरिए बच्चे को जन्म देने वाली महिला का शादीशुदा होना जरूरी है और केवल वे ही शादीशुदा जोड़े, जिनकी शादी के पाँच साल बाद भी  कोई संतान नहीं है तो ही सरोगेसी के लिए आवेदन कर सकते हैं।अगर यह कानून बन जाता तो शायद करण जौहर बाप नहीं बन पाते।
    बहरहाल, इस दरमियाँ  शिवमूर्ति की कहानी “कुची का कानून”  सरोगेसी मदर के किराये की कोख के समांतर एक और नई बहस लेकर  हमारे सामने खड़ी हुई है। जिसमें एक विधवा अपने बूढ़े सास ससुर की सेवा करते हुए इसलिए गर्भवती हो जाती है कि बुढ़ापे में उसका सहारा बने और उसका वारिस बने।
    समाज की पंचायत इसे अधर्मजता और अन्य का बीज होने के कारण और बाप की औलाद ही उसकी वारिस होगी के आधार पर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे को चुनौती देती है। कुची अपने कोख पर माँ का अधिकार बताते हुए इतिहास से लेकर आज तक के कानूनों के सामने सवाल रखती है कि कोख पर किसका अधिकार स्त्री का या पुरुष का ???
    कहते है साहित्य समाज का दर्पण है जो समाज में घटित होता है उसे साहित्य में हम पाते है मगर कुछ साहित्य कालजयी और समयातीत भी होता है जो भविष्य में आने वाले सामाजिक बदलाव पदचाप को पहले ही पहचान लेता है।इसलिए कुची का कानून भी भविष्य की आहट है जो हमारे आसपास सेरोगेट मदर, लिव इन रिलेशन और एल.जी.बी. टी. आंदोलनों के बाद समाज की भावी स्थिति का रेखाचित्र पेश करती है।कल तक गे और लेस्बियन होना शर्म और हीनता का विषय था आज वे ही मुखर होकर अपने अधिकारों की मांग कर रहे है जिन्हें विश्व के कई देशों से मान्यता दी तो कुछ आनेवाले सालों में इसे क़ानूनी वैधता देंगे ही।
    क्योंकि कहानीकार की चेतना अपने परिवेश में  केवल वर्तमान तक ही सीमित नहीं रहती क्योंकि  भविष्य की सम्भावना और उसके संकेतों तक पहुँच  पाना साहित्य रचना का असली हेतु होता है। माँ के इस हक से तो सामाजिक ताने बाने में एक बहुत बड़ी उथल पुथल मच जाएगी। विवाह नामक संस्था भरभरा कर ढह  जाएगी ,यह भी एक डर बुद्धिजीवियों को सता रहा है। मगर जो भी हो ये बदलाव तो आकर रहेगा क्योंकि पूरे विश्व में सारी चीजें उसी दिशा में भाग रही है।
    इस तरह देखें तो यह सुगबुगाहट भविष्य की आहट नजर आती है।
    भारत के परिपेक्ष्य में बात करें तो भारतीय समाज अभी इतना उदार नहीं हुआ है कि वह स्त्री और पुरुष इस रूप में  उसके बच्चों के साथ अपना ले ।क्योंकि बिना विवाह के माँ या  पिता की भूमिका को स्वीकारने के लिए अभी हमारे समाज में कोई चेतना विकसित नहीं हुई  है।इसलिए ऐसे बदलावों की  अजीब-सी कशमकशाहट  से  सबसे अधिक प्रभावित बच्चे  ही होते हैं।
    कोई भी सामाजिक और आर्थिक बदलाव जब तक अंतिम व्यक्ति तक न पहुंचे, तब तक वो विकास की प्रक्रियाधीन ही माने जाते है जिन्हें कालान्तर में  मूर्त और क़ानूनी वैधता का अमली जामा भी समाज ही पहनाता है  क्योंकि कोई भी  कानून तभी प्रभावशाली होते हैं जब उन्हें समाज की चेतना और संवेदनशीलता का अवलंब मिलता है।इसलिए इन सम्वेदनशील मुद्दों पर अभी  समाज की स्वीकार्यता और कानून की मोहर लगने में वक्त लग सकता है।आज हम इन मुद्दों पर भले ही कितनी भी आँख मूंद ले या किनारा कर ले मगर आने वाले तीस चालीस साल बाद यह हमारे बदले हुए जीवन का अनिवार्य अंग बनेगे तब हम इसकी शुरुआत के साक्षी होने का दावा भी करेंगे और इस पहल के लिए तुषार कपूर और करण जौहर हमारे उदाहरण होंगे।
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