Author: administrator_06848b

युवा शायर सीरीज में आज पेश है महेंद्र कुमार ‘सानी’ की ग़ज़लें। पढ़िए और लुत्फ़-अंदोज़ होइए – त्रिपुरारि =============================================================== ग़ज़ल-1  काम कुछ भी नहीं था करने को हम को भेजा गया है मरने को.. तुम जो सिमटे हुए से रहते हो यानी बेताब हो बिखरने को.. आइना देखते नहीं अपना और आ जाते हैं सँवरने को.. जिस को दरिया में मौज आने लागे वो कहाँ चाहे पार उतरने को.. हम ने भी इश्क़ यूँ क़ुबूल किया एक इल्ज़ाम सर पे धरने को.. न वो इज़्ने-सफ़र ही देता है न मुझे कहता है ठहरने को मेरी सोचों में शेर की बाबत शक्ल…

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युवा शायर सीरीज में आज पेश है मोहम्मद मुस्तहसन जामी की ग़ज़लें। जामी, पाकिस्तानी शायरी में एक उभरती हुई आवाज़ हैं। वो आवाज़, जो अपने आप में धूप की नर्मी और बर्फ़ की गर्मी एक साथ समेटे हुए है। वो आवाज़, जो ख़्वाब देखना तो चाहती है मगर जिसे ताबीर की जल्दबाज़ी नहीं है। फ़िलहाल उनकी कुछ ग़ज़लें पढ़िए और लुत्फ़-अंदोज़ होइए – त्रिपुरारि =============================================================== ग़ज़ल-1  रूखी-सूखी खा सकते थे तेरा साथ निभा सकते थे काट के जड़ इक-दूजे की हम कितने फूल उगा सकते थे हम तलवार उठा नहीं पाए हम आवाज़ उठा सकते थे ग़ुर्बत का एहसान था हम…

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युवा शायर सीरीज में आज पेश है इरशाद ख़ान ‘सिकंदर’ की ग़ज़लें। इरशाद की शायरी में रोज़मर्रा की ज़िंदगी के हालात और हर हाल में जीने का हौसला कुछ इस तरह मुँह जोड़ के चलते हैं, जैसे अंधेरे की बाँहों में रोशनी ने अपनी बाँहें डाल दी हों। एकदम अपनी ही तरह के लहजे में ग़ज़ल कहने वाले इरशाद के दो ग़ज़ल-संग्रह आ चुके हैं। आँसूओं का तरजुमा और दूसरा इश्क़। फ़िलहाल उनकी कुछ ताज़ा ग़ज़लें पढ़िए और लुत्फ़-अंदोज़ होइए – त्रिपुरारि =============================================================== ग़ज़ल-1  आसमाँ से ज़मीं पे लाये गये सब ख़ुदा, आदमी बनाये गये मुझको रक्खा गया अँधेरे में मेरे…

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‘मौजूद की निस्बत से’ महेंद्र कुमार सानी का पहला शे’री मज्मूआ है जो रेख़्ता से प्रकाशित हुआ है । इसकी भूमिका प्रसिद्ध शा’इर और सम्पादक आदिल रज़ा मंसूरी ने लिखी है। उन्होंने सानी के मुख़्तलिफ़ तख़्लीक़ी पहलुओं पर इस तरह रौशनी डाली है कि क़ारी की अपेक्षाएँ बढ़ जाती हैं । किताब का उन्वान ‘मौजूद की निस्बत से’ है और आदिल रज़ा मंसूरी कहते हैं कि ‘किताब का नाम मुसन्निफ़ की फ़िक्र का आईना होता है’, उनका ये क़ौल इस किताब पर सादिक़ उतरता है । यहाँ ये महत्त्वपूर्ण नहीं है कि सानी की निस्बत किस मौजूद से है ;…

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चंद नाम ऐसे होते हैं, जिनके साथ RIP लिखते हुए हमारी उंगलियाँ काँप उठती हैं। 16 अक्टूबर 1950 को जन्मे, मुम्बई के मशहूर शायर अब्दुल अहद साज़ ऐसा ही एक नाम है, कल जिनका इंतकाल हो गया। ग़ज़ल और नज़्म की दुनिया का मोतबर नाम, जिसे महाराष्ट्र स्टेट उर्दू आकादमी अवार्ड से नवाज़ा गया और जिसे महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड का हिस्सा भी बनाया गया। उन्होंने ‘ख़ामोशी बोल उठी’ और ‘सरग़ोशियाँ ज़मानों की’ जैसी किताबें लिखीं। आइए ये दुआ करें की उनकी रूह को सुकून मिले और पढ़ते हैं उनकी एक नज़्म ‘ज़ियारत’- त्रिपुरारि ——————————————————————————————————– बहुत से लोग मुझ में मर चुके हैं…. किसी की मौत को…

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आज पेश है युवा शायर विजय शर्मा की कहानी लिविंग थिंग – त्रिपुरारि ==================================================== छुट्टियों वाले दिन नींद अक्सर जल्द खुल जाया करती है..यदि छुट्टी सोमवार की हो, तो शायद और भी जल्द.. सुबह के नौ बज चुके थे और अयान अबतक अपनी बिस्तर में क़ैद था.. हालाँकि पिछले दो घंटे से वह जगा हुआ था किन्तु अब तक बिस्तर से बाहर नहीं आ सका..इस दो घंटे में उसने लेटे लेटे घर की उन जगहों को कई बार देख चुका था, जहाँ तक उसकी नज़र आसानी से जा सकती थी.. यह फ़ुर्सत की नज़र थी… आये दिन वह अपने काम…

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आज पेश है शहनाज़ रहमत की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ====================================================== ग़ज़ल-1 दर्दे दिल हूँ मैं किसी का या कोई सूनी नज़र कुछ पता मुझको नहीं है कौन हूँ मैं क्या ख़बर गर्दिशें मुझको जलातीं अपनी भट्टी में अगर, ख़ूब सोने सी निखरती और जाती मैं सँवर मुझ से मेरा रास्ता मत पूछ ऐ ठंडी हवा, खो चुकी हूँ उलझनों में आज अपनी रहगुज़र तेरी उल्फ़त ने किया है हाल क्या मेरा कि अब, बाँट टुकड़ों में बिखरती जा रही हूँ दर ब दर पाँव के छालों से कह दो फूट कर दें हौसला, थक के बैठे राहगीरों की ज़रा अब…

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युवा शायर सीरीज में आज पेश है अभिषेक कुमार ‘अम्बर’ की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ====================================================== ग़ज़ल-1  वो मुझे आसरा तो क्या देगा, चलता देखेगा तो गिरा देगा। क़र्ज़ तो तेरा वो चुका देगा, लेकिन अहसान में दबा देगा। हौसले होंगे जब बुलंद तेरे, तब समंदर भी रास्ता देगा। एक दिन तेरे जिस्म की रंगत, वक़्त ढलता हुआ मिटा देगा। हाथ पर हाथ रख के बैठा है, खाने को क्या तुझे ख़ुदा देगा। लाख गाली फ़क़ीर को दे लो, इसके बदले भी वो दुआ देगा। ख़्वाब कुछ कर गुज़रने का तेरा, गहरी नींदों से भी जगा देगा। क्या पता था कि…

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हिंदी में गद्य कविता एक ऐसी विधा है, जिसे अभी एक्सप्लोर किया जाना बाक़ी है। कुछ लोग कभी-कभार हाथ आज़माते रहते हैं। लेकिन दूसरी भाषाओं में ये काम निरंतर हो रहा है। कभी कभी ख़याल आता है कि अगर अनुवाद की सुविधा न होती, तो हम अपनी ज़िंदगी में कितनी ही ख़ूबसूरत चीज़ों से वंचित रह जाते। आज जो कविताएँ हम पढ़ने जा रहे हैं, वो ‘अनिमा एंड दि नैरेटिव लिमिट्स’ सीरीज़ का हिस्सा हैं, जिसे नबीना दास ने लिखा है। नबीना अंग्रेज़ी की लेखिका हैं और उनकी चार किताबें- ब्लू वेसेल्स (कविता संग्रह), दि हाउस ऑफ़ ट्विनिंग रोज़ेज़ (कहानी…

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युवा शायर सीरीज में आज पेश है वर्षा गोरछिया की नज़्में – त्रिपुरारि ====================================================== नज़्म-1 तुम आओ एक रात कि पहन लूँ तुम्हें अपने तन पर लिबास की मानिंद तुम को सीने पे रख के सो जाऊँ आसमानी किताब की मानिंद और तिरे हर्फ़ जान-ए-जाँ ऐसे फिर मिरी रूह में उतर जाएँ जैसे पैग़म्बरों के सीने पर कोई सच्ची वही उतरती है नज़्म-2 ख़याल तेरे ख़याल कुछ यूँ बिलखते हैं सीने में जैसे गुनाह पिघलते हों जैसे लफ़्ज़ चटकते हों जैसे रूहें बिछड़ती हों जैसे लाशें फंफनाती हों जैसे लम्स खुरदुरे हों जैसे लब दरदरे हों जैसे कोई बदन कतरता…

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