आप पढ़ रहे हैं तन्हाई का अंधा शिगाफ़। मीना कुमारी की ज़िंदगी, काम और हादसात से जुड़ी बातें, जिसे लिख रही हैं विपिन चौधरी। आज पेश है चौथा भाग – त्रिपुरारि ======================================================== स्टारडम की राह यानी रेड कारपेट का खुलना बैजू बावरा के हिट होते ही मीना कुमारी, रातों-रात स्टार बन गयी। इसके बाद तो लगातार हर साल ही उन्होंने हिट फ़िल्में दीं। लेकिन मीना कुमारी के जीवन में सब कुछ इतना आसान नहीं था जैसे-जैसे मीना कुमारी, प्रसिद्धी के शिखर पर चढ़ती गयी, वैसे-वैसे उनका जीवन कठिन होता गया. उनके पिता अली बक्श का शिकंजा उनपर कसता चला गया, उनके…
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आप पढ़ रहे हैं तन्हाई का अंधा शिगाफ़। मीना कुमारी की ज़िंदगी, काम और हादसात से जुड़ी बातें, जिसे लिख रही हैं विपिन चौधरी। आज पेश है तीसरा भाग – त्रिपुरारि ======================================================== बैजू की ‘गौरी’ ने जीवन के किनारे पर जड़ दी सुनहरी गोट विजय भट्ट द्वारा निर्देशित फिल्म ‘बैजू बावरा’, तानसेन के समकालीन गायक बैजनाथ मिश्रा (1542-1613) के जीवन पर आधारित थी. बैजनाथ मिश्रा को स्थानीय ग्रामीण प्रेम से ‘बैजू’ पुकारते थे. बैजू के लिए उसकी प्रेमिका ‘गौरी’ सबसे बड़ी प्रेरणा स्त्रोत थी. गौरी के इसी किरादर को मीना ने अपने पूरे भावनात्मक मनोवेग से निभाया। हर सफल फिल्म…
आप पढ़ रहे हैं तन्हाई का अंधा शिगाफ़। मीना कुमारी की ज़िंदगी, काम और हादसात से जुड़ी बातें, जिसे लिख रही हैं विपिन चौधरी। पहला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। आज पेश है दूसरा भाग – त्रिपुरारि ======================================================== छोटी सी ‘मुन्ना’ की अनोखी कहानी अक्सर बच्चे स्कूल जाने के नाम पर रोने लगते हैं लेकिन 1 अगस्त 1933 को मीतावाला चाल, बम्बई के जन्मी यह छोटी बच्ची जिसका नाम महजबीं बानों बक्श था, स्कूल जाना चाहती थी. लेकिन बच्ची की इस जिद को बाल- सुलभ हरकत मान कर अनदेखा कर दिया जाता रहा. सात साल की उम्र में…
ख़ुद ही को तेज़ नाख़ूनों से हाए नोचते हैं अब हमें अल्लाह ख़ुद से कैसी उल्फ़त होती जाती है – मीना कुमारी भारतीय सिनेमा की मशहूर अदाकारा मीना कुमारी के बारे में हम सब टुकड़ों-टुकड़ों में बहुत कुछ जानते हैं। लेकिन बहुत कुछ है जो अनकहा है, अनसुना है। आज उनके जन्मदिन के मौक़े पर हम एक नया सीरीज शुरू कर रहे हैं, जिसका नाम है- तन्हाई का अंधा शिगाफ़। इस सीरीज के तहत हिंदी की लोकप्रिय कवयित्री विपिन चौधरी, मीना कुमारी की ज़िंदगी, काम और हादसात से जुड़े कई पहलुओं पर बात करेंगी। आज पेश है पहला भाग –…
आज प्रस्तुत हैं विवेक चतुर्वेदी की कविताएँ – संपादक ===================================================== पसीने से भीगी कविता एक पसीने की कविता है जो दरकते खेत में उगती है वहीं बड़ी होती है जिसमें बहुत कम हो गया है पानी उस पहाड़ी नाले में नहाती है अगर लहलहाती है धान तब कजरी गाती है इस कविता में रूमान बस उतना ही है जितनी खेत के बीच फूस के छप्पर की छाँव है या खेत किनारे अपने आप बढ़ आए गुलमोहर का नारंगी रंग है इस कविता को रेलगाड़ी में चढ़ा शहर लाने की मेरी कोशिशें नाकाम हैं ये कविता खलिहान से मंडी तक बैलगाड़ी…
युवा शायर सीरीज में आज पेश है प्रदीप ‘तरकश’ की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ====================================================== ग़ज़ल-1 मैं अगर हूँ भी तो बाज़ार की सूरत में नहीं सो मैं तुझ ऐसे ख़रीदार की क़िस्मत में नहीं इतना कहना है मुझे प्यार बहुत है तुम से और ये भी कि ये कहना मेरी आदत में नहीं एक दुनिया के सब आज़ार यहाँ पाओगे एक बस लफ़्ज़-ए-वफ़ा अपनी हिक़ायत में नहीं उन से बेहतर न कोई है न कोई होगा ही मानिए मेरी क़सम से मैं मुहब्बत में नहीं मैं जो हैरत में हूँ इस बात में हैरत क्या है एक भी शख़्स तेरे…
आज प्रस्तुत हैं सदैव की कविताएँ – संपादक ======================================================== हम इस पेड़ को याद रखेंगे ———– तंग पगडंडियों से बियाबान जंगलों के बीच होकर दलदली जमीन में कमर तक धंसा घुप अंधेरे या भरी दोपहर खाली सवेरों-शामों से जब मैं चलता जाता था निर्जन पठारों पर कभी कभी बर्फीली हवाओं में कांपता, हांफता डरता अंधेरे से कभी लू के थपेड़ों से जूझता, गिरता तब मेरी कल्पना में एक साथी होता था। जब रातों को लेटा तारों को देखता तो सोचता इन कंधों का क्या उपयोग है मैं सोचता कि कोई होता इस दुनिया को मुझसे बांटने के लिए इस विशाल…
आज पेश है ज़ीस्त की एक नज़्म, जिसका उनवान है ‘इंक़लाब’ – संपादक ======================================================= मुझसे इस वास्ते ख़फ़ा हैं हमसुख़न मेरे मैंने क्यों अपने क़लम से न लहू बरसाया मैंने क्यों नाज़ुक-ओ-नर्म-ओ-गुदाज़ गीत लिखे क्यों नहीं एक भी शोला कहीं पे भड़काया मैंने क्यों ये कहा कि अम्न भी हो सकता है हमेशा ख़़ून बहाना ही ज़रूरी तो नहीं शमा जो पास है तो घर में उजाला कर लो शमा से घर को जलाना ही ज़रूरी तो नहीं मैंने क्यों बोल दिया ज़ीस्त फ़क़त सोज़ नहीं ये तो इक राग भी है, साज़ भी, आवाज़ भी है दिल के जज़्बात पे…
युवा शायर सीरीज में आज पेश है सग़ीर आलम की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ====================================================== ग़ज़ल-1 कैसे कैसे मंज़र मेरी आँखों में आ जाते हैं, यादों के सब खंजर मेरी आँखों में आ जाते हैं। मेरी प्यासी आंखें फिर भी रह जाती हैं प्यासी ही, यूँ तो सात समंदर मेरी आँखों में आ जाते हैं। किसकी याद का दरिया मेरे दिल से हो कर बहता है, किसके दर्द पिघलकर मेरी आँखों में आ जाते हैं। किसकी याद की ख़ुश्बू से मैं दिन भर महका रहता हूँ, किसके ख़्वाब संवरकर मेरी आँखों में आ जाते हैं। जब भी सोचने लगता हूँ मै…
हिंदी में छठे दशक के बाद लिखी गई कहानियों को केंद्र में रखकर, विजय मोहन सिंह और मधुकर सिंह द्वारा सम्पादित एक समीक्षात्मक किताब आई है. अब उस समीक्षात्मक किताब की समीक्षा कर रहे हैं माधव राठौर. आप भी पढ़िए- संपादक ======================================================= “60 के बाद की कहानियां” किताब विजय मोहन सिंह और मधुकर सिंह द्वारा सम्पादित संग्रह का नया संस्करण लोक भारती प्रकाशन ने हाल ही में प्रकाशित किया है जोकि शामिल किये गए चौदह कहानीकारों की कहानियों की बनावट -बुनावट और उनकी विशिष्टताओं को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह एक ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज है जो तत्कालीन…
