अभिषेक कुमार पाण्डेय युवा कथाकार हैं। अभी जो कहानी आप पढ़ने जा रहे हैं, उसे ग्रामीण परिवेश और वहाँ के जनजीवन को आधार बना कर लिखी गई है। स्वाभावत: ग्रामीण शब्दावली भी प्रयोग हुआ है, जिससे कहानी का लुत्फ़ दोबाला हो जाता है। – संपादक ======================================================== सुलक्षिणी ने दुआर बुहारने के बाद अपनी बकरी के आस-पास के मल-मूत्र से भींगे पुआल को बटोरकर बाहर दुआर पर डाल दिया और बकरी को बरामदे से खोलकर दुआर पर लगे पपीते के पेड़ में बांधने के बाद उसके आस-पास पुआल बिछाने लगी. बकरी के दोनों बच्चे उसके आगे पीछे घूम-घूमकर दूध पीने के…
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हाल में मैंने उर्दू के लेखक रहमान अब्बास के लेटेस्ट नॉवेल ‘रोहज़िन’ पर लिखा था। जिसे यहाँ पढ़ा जा सकता है। आज ललिता दासगुप्ता (जो डिफ़ेंस रिसर्च एंड डेवलेपमेंट ऑरगेनाइजेशन, दिल्ली में सांइटिस्ट हैं) ने एक टिप्पणी लिख भेजी है। आप भी पढ़िए – त्रिपुरारि ======================================================= रोहज़िन उर्दू लेखक रहमान अबबास का एक ऐसा उपन्यास है जो अंतर-आत्मा में चलते हुए निरन्तर द्वंद्व को अत्यन्त भावप्रवण, आध्यात्मिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि में प्रस्तुत करता है। यह केवल युवा युगल की प्रणय कथा नहीं, बल्कि व्यक्ति की जीवन यात्रा के अनगिनत अनुभवों को जोड़ती हुई संस्मरण गाथा है। यह मुंबई की भी कहानी है जो अपने आप…
युवा शायर सीरीज में आज पेश है विजय शर्मा की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ==================================================== ग़ज़ल-1 यमन की धुन पे ये किसका बदन बहलता है हर एक शाम ये साहिल पे कौन चलता है किसी के होंठ की गर्मी जबीं को मिलते ही बदन का ग्लेशियर आँखों से बह निकलता है बदन तो अपना सलामत ही लाये हैं, लेकिन, ये घर अँधेरे में क्यों क़ब्र सा दहलता है हवस बदन को है कैसी गुनाहगारी की, अभी जो हिज्र की पाकीज़गी में जलता है मुहब्बतों की अज़ाँ हो रही है मुझ में ‘अर्श’ सो मेरे जिस्म का हर ज़र्रा आँख मलता है…
युवा शायर सीरीज में आज पेश है प्रखर मालवीय ‘कान्हा’ की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ==================================================== ग़ज़ल-1 आग है ख़ूब थोड़ा पानी है ये यहाँ रोज़ की कहानी है ख़ुद से करना है क़त्ल ख़ुद को ही और ख़ुद लाश भी उठानी है पी गए रेत तिश्नगी में लोग शोर उट्ठा था यां पे पानी है ये ही कहने में कट गए दो दिन चार ही दिन की ज़िंदगानी है मेरे ख़ाबों में यूँ तिरा आना मेरी नींदों से छेड़खानी है सारे किरदार मर गए लेकिन रौ में अब भी मिरी कहानी है ग़ज़ल-2 बहुत उकता गया जब शायरी से लिपट…
रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हम हज़ारों तरह की परिस्थितियों से गुज़रते हैं। लेकिन एक वक़्त आता है, जब यह ‘गुज़रना’ हमारा अनुभव बन जाता है। उन अनुभवों को लिखना उतना ही मुश्किल है, जितना एक रूह को पैकर देना। अनुशक्ति की कविताएँ ज़िंदगी के नए ‘डायमेंशन’ की तरफ़ इशारा करती हैं। जहाँ सबकुछ घट चुकने के बाद भी प्रेम अपने वास्तविक स्वरूप में शेष रह जाता है। आइए पढ़ते हैं अनुशक्ति सिंह की (अ)कविताएँ – त्रिपुरारि १) उस महीने जब पेड़ से पत्ते बिखर रहे होते हैं कुछ टूटता जाता है हमारे अंदर भी मार्च की बीतती अफरा तफरी में दिन…
नश्तर ख़ानक़ाही एक बेचैन रूह का नाम है। जिसने अपनी शायरी से न सिर्फ़ उर्दू अदब की ख़िदमत की, बल्कि कई आवाज़ों को रोशनी भी बख़्शी। उसकी ग़ज़ल हम आज भी सुनते हैं, गुनगुनाते हैं। आज अचानक एक ग़ज़ल सुनी तो सोचा क्यूँ न कुछ और ग़ज़लें पढ़ी जाए और जानकीपुल के पाठकों के लिए पेश भी की जाए। आइए पढ़ते हैं नश्तर ख़ानक़ाही की कुछ चुनिंदा ग़ज़लेंं- त्रिपुरारि ======================================================= ग़ज़ल-1 सौ बार लौह-ए-दिल से मिटाया गया मुझे मैं था वो हर्फ़-ए-हक़ कि भुलाया गया मुझे इक ज़र्रा-ए-हक़ीर तेरी रहगुज़र का था लाल-ए-यमन न था कि गँवाया गया मुझे लिख्खे…
मज़दूर दिवस पर पेश हैं कुछ नज़्में – संंपादक ======================================================== मज़दूरों का गीत – असरार-उल-हक़ मजाज़ मेहनत से ये माना चूर हैं हम आराम से कोसों दूर हैं हम पर लड़ने पर मजबूर हैं हम मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम गो आफ़त ओ ग़म के मारे हैं हम ख़ाक नहीं हैं तारे हैं इस जग के राज-दुलारे हैं मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम बनने की तमन्ना रखते हैं मिटने का कलेजा रखते हैं सरकश हैं सर ऊँचा रखते हैं मज़दूर हैं हम मज़दूर हैं हम हर चंद कि हैं अदबार में हम कहते हैं खुले बाज़ार में हम हैं…
युवा शायर सीरीज में आज पेश है विकास शर्मा ‘राज़’ की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ==================================================== ग़ज़ल-1 चल रहे थे नज़र जमाये हम मुड़ के देखा तो लड़खड़ाये हम खोलता ही नहीं कोई हमको रह न जाएँ बँधे-बँधाये हम प्यास की दौड़ में रहे अव्वल छू के दरिया को लौट आये हम एक ही बार लौ उठी हमसे एक ही बार जगमगाये हम जिस्म भर छाँव की तमन्ना में ‘उम्र भर धूप में नहाये हम’ ग़ज़ल-2 पसे-ग़ुबार आई थी सदा मुझे फिर उसके बाद कुछ नहीं दिखा मुझे मैं ख़ामुशी से अपनी सिम्त बढ़ गया तिरा फ़िराक़ देखता रहा मुझे मुक़ाबला…
कुछ टॉपिक्स ऐसे होते हैं, जिन पर बहस कभी ख़त्म नहीं होती। जैसे कि भाषा, फ़ेमिनिज़्म, पॉर्न, फ़्रीडम, नेशन, वग़ैरह। ज़ाहिर है हर लिखने वाले का अपना नज़रिया होता है। जिसकी सोच जितनी गहरी होती है, वो उतने खुले दिमाग़ से चीज़ों को सोचता है। हाल में इंटरनेट पर महिलाओं द्वारा पॉर्न देखने का एकसेप्टेंस, कुछ ख़ास तरह के लोगों को नागवार गुज़रा है। इसी मुद्दे पर पेश है युवा रचनाकार भारती गौड़ का लेख – त्रिपुरारि ======================================================== सर्वे के परिणाम या आंकड़ों को लिखने से कुछ साबित नहीं होगा, लिहाज़ा नहीं लिखूंगी। डिज़िटल युग है ज़ाहिर सी बात है सबके…
युवा शायर सीरीज में आज पेश है मुदिता रस्तोगी की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ग़ज़ल-1 सुनो एक बात थी जो तुमसे कहनी थी…चलो छोड़ो है छोटी उम्र और है दास्ताँ लम्बी, चलो छोड़ो उठा कर, खेल कर, दिल तोड़ कर देखे कई उसने पता की क़ीमतें सबकी के फिर बोली, चलो छोड़ो यही बस सोच कर मैंने अधूरी हर ग़ज़ल छोड़ी तुम आओगे मुक़म्मल हो ही जायेगी, चलो छोड़ो वो बोसा लेने आये होंठ तक और हंस के यूं बोले के लो जाओ तुम्हारी ज़िंदगी बख़्शी, चलो छोड़ो ग़ज़ल-2 हमें अब रहा क्या है ऐसे में सुनना बुला कर कहा उसने…
