युवा शायर सीरीज में आज पेश है अक्स समस्तीपुरी की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ====================================================== ग़ज़ल-1 जुदाई में तेरी आंखों को झील करते हुए सबूत ज़ाया किया है दलील करते हुए मैं अपने आप से खुश भी नहीं हूँ जाने क्यों सो खुश हूँ अपने ही रस्ते तवील करते हुए न जाने याद उसे आया क्या अचानक ही गले लगा लिया मुझको ज़लील करते हुए कहीं तेरी ही तरह हो गया न हो ये दिल सो डर रहा हूँ अब इसको वकील करते हुए तमाम उम्र दिया मैं ने खुद को ही धोका गुज़ारी उम्र ये चेहरा शकील करते हुए हुआ ये…
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पिछले 2-3 बरसों में एक ग़ज़ल बहुत सुनाई पड़ी। ‘वो हम-सफ़र था मगर उस से हम-नवाई न थी’ …लेकिन कम लोगों को मालूम है कि मोहब्बत भरी ये ग़ज़ल, दरअसल सन्1971 में हुए इंडो-पाक जंग के बाद लिखी गई थी। बाद में जब पाकिस्तानी टीवी सीरियल ‘हमसफ़र’ के टायटल सॉन्ग के तौर पर इस्तेमाल की गई तो बहुत मशहूर हुई। ग़ज़ल के शायर नसीर तुराबी ‘ज़िंदगी गुलज़ार है’ सहित कई सीरियल्स के लिए गीत लिख चुके हैं। उनका जन्म सन् 1945 में, हैदराबाद में हुआ था लेकिन भारत-पाकिस्तान बंटवारे के वक़्त उन्हें पाकिस्तान जाना पड़ा। उनकी शायरी की किताब ‘अक्स-ए-फ़रियादी’…
आज प्रस्तुत हैं रविदत्त मोहता की कविताएँ – संपादक ========================================================= यादें कभी अस्त नहीं होती मैं यादों के आसमान का पक्षी हूँ सदियां हो गयीं मैं सो नहीं पाया यादों के आसमानों का सूर्यास्त हो नहीं पाया कोई कहता है मैं किताब हूं कोई कहता हिसाब हूं पर मैं तो पंछी हूं डाल पर सो नहीं पाता और यादों के आकाश में सूर्यास्त हो नहीं पाता… गंध रात की कोई गंध नहीं होती पर बेइंतहा पसंद होती है सुबह में सुगन्ध होती है पर वहां तुम नहीं होती दिन नोकरी करने दफ्तर चला जाता है और शामें.. मां-बाप सी बूढ़ी…
खुशवंत सिंह की आत्मकथा ‘सच, प्यार और थोड़ी-सी शरारत’ पर युवा लेखक माधव राठौड़ की टिप्पणी – संपादक =================================================== अंग्रेजी के प्रसिद्ध पत्रकार, स्तम्भकार और विवादित कथाकार खुशवंत सिंह की आत्मकथा अपनी शैली में लिखा गया अपने समय का वह कच्चा चिटठा है, जिसका दायरा रेगिस्तानी गाँव की गर्मी भरे दिनों से होकर क्नॉट प्लेस होते हुए लन्दन व पेरिस की सुनहरी शामों तक फैलता है। यह आत्मकथा अपने समय की घटनाओं में पाठक को पुनः झाँकने के लिए लिए एक बेहतरीन मौका मुहैया करवाती है। देश के आजाद होने से लेकर आज के भारत के निर्माण प्रक्रिया को उन्होंने बड़ी…
युवा शायर सीरीज में आज पेश है स्वप्निल तिवारी की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ====================================================== ग़ज़ल-1 मेरे चारों सिम्त पहले जमअ तन्हाई हुई दिल-कचहरी में मिरी तब जा के सुनवाई हुई रेत पर लेटी हुई थी शाम लड़की सी किसी धूप से साहिल पे पूरे दिन की सँवलाई हुई धीरे धीरे ख़ाब की सब मछलियाँ भी मर गयीं रफ़्ता रफ़्ता कम मिरी नींदों की गहराई हुई धूप के भीगे हुए टुकड़े हैं पैलेट* में फ़क़त कैनवस पर इक धनक है रंग में आई हुई कैमरे की इक पुरानी रील अचानक मिल गयी पर जो तस्वीरें बनीं वो सब थीं धुँधलाई हुई…
आज युवा शायर सीरीज में पेश है सौरभ शेखर की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ====================================================== ग़ज़ल-1 भई देखो इस बात में कोई दो मत नईं प्यार छुपाया जा सकता है, नफ़रत नईं सच सुनने की हरगिज़ उसकी हसरत नईं और तकल्लुफ़ करना अपनी आदत नईं यार कमाया है हमको तो ख़र्च करो संदूकों में रखने की हम दौलत नईं घर से बाहर निकले तो मालूम हुआ एक सड़क है दुनिया, कोई पर्वत नईं कुछ इच्छा भी तो हो मिलने-जुलने की वर्ना ऐसा थोड़ी है कि फुर्सत नईं एक ज़रा सा दम घुटता सा लगता है बाक़ी इस माहौल से हमको दिक्क़त नईं…
विवाह संस्था को लेकर विभिन्न लोगों का विभिन्न मत हो सकता है, होना भी चाहिए। समकालीन विवाह के बदलते स्वरूप पर माधव राठौड़ का लेख – संपादक ========================================================== अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर हमेशा महिलाओं के इतिहास और वर्तमान स्थिति पर ही चर्चा होती है। उनके अधिकारों,मांगों और कानूनों पर ही चर्चा होती है जो बन चुके है मगर उस हलचल और बदलाव के संकेत जो हमारे आसपास नजर आ रहे हैं, उसकी तरफ ध्यान बरबस नही जाता ।जो आने वाले वर्षो में हमारे जीवन में अनिवार्य अंग बनेंगे,इसलिए आज भविष्य की उस आहट पर बात करना प्रासंगिक होगा, जो कल हमारा…
युवा शायर सीरीज में आज पेश है अभिषेक शुक्ला की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ====================================================== ग़ज़ल-1 हर्फ़ लफ़्ज़ों की तरफ़ लफ़्ज़ म’आनी की तरफ़ लौट आए सभी किरदार कहानी की तरफ़ होश खो बैठा था मैं ज़र्दी-ए-जाँ से और फिर इक हवा आई उड़ा ले गई पानी की तरफ़ पहले मिसरे में तुझे सोच लिया हो जिसने जाना पड़ता है उसे मिसरा-ए-सानी की तरफ़ दिल में इक शख़्स की उम्मीद का मरना था कि बस धड़कनें खिंचने लगीं मर्सिया-ख़्वानी की तरफ़ चश्म-ए-वीरां को बहरहाल ख़ुशी है इसकी ख़्वाब राग़िब तो हुए नक़्ल-ए-मकानी की तरफ़ जब फ़िज़ा उसके बदन-रंग की हो जाएगी…
रमज़ान का महीना शुरू हो गया है। मुझे याद आता है रहमान अब्बास का उर्दू नॉवेल (ख़ुदा के साए में आँख मिचोली), जिसमें एक किरदार कहता है- “मैं भूखा हूँ रोज़ादार नहीं हूँ।” बता दूँ कि 2011 में छपे, रहमान के इसी नॉवेल पर महाराष्ट्र साहित्य अकादमी का बेस्ट नॉवेल का अवार्ड मिला था। यह नॉवेल मज़हबी समाज में एक लिबरल आदमी की ज़िन्दगी पर आधारित है। आइए पढ़ते हैं, नॉवेल का एक छोटा सा हिस्सा – त्रिपुरारि ========================================================== रमज़ान का महीना अब्दुल्स सलाम के लिए रहमतों भरा नहीं बल्कि अज़ीयतों भरा होता। रोज़ा नहीं रखता था लेकिन पूरा दिन रोज़ादारों की सी…
युवा शायर सीरीज में आज पेश है अब्बास क़मर की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ==================================================== ग़ज़ल-1 मेरी परछाइयां गुम हैं मेरी पहचान बाक़ी है सफ़र दम तोड़ने को है मगर सामान बाक़ी है अभी तो ख़्वाहिशों के दरमियां घमसान बाक़ी है अभी इस जिस्मे-फ़ानी में ज़रा सी जान बाक़ी है इसे तारीकियों ने क़ैद कर रक्खा है बरसों से मेरे कमरे में बस कहने को रौशनदान बाक़ी है तुम्हारा झूट चेहरे से आयां हो जाएगा इक दिन तुम्हारे दिल के अंदर था जो वो शैतान बाक़ी है गुज़ारी उम्र जिसकी बंदगी में वो है ला-हासिल अजब सरमायाकारी है नफ़ा-नुक़सान बाक़ी है…
