युवा शायर सीरीज में आज पेश है अज़ीज़ नबील की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ग़ज़ल-1 ख़ामुशी टूटेगी, आवाज़ का पत्थर भी तो हो जिस क़दर शोर है अन्दर, कभी बाहर भी तो हो मुस्कुराना किसे अच्छा नहीं लगता या-रब मुस्कुराने का कोई लम्हा मयस्सर भी तो हो बुझ चुके रास्ते, सन्नाटा हुआ, रात ढली लौट कर हम भी चले जाएं मगर घर भी तो हो बुज़दिलों से मैं कोई मार्का जीतूँ भी तो क्या कोई लश्कर मेरी हिम्मत के बराबर भी तो हो रात आएगी, नए ख़्वाब भी उतरेंगे, मगर नींद और आँख का रिश्ता कभी बेहतर भी तो हो छोड़कर…
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हिंदी में किसी भी विषय पर कविता-सीरीज लिखने की परम्परा रही है। ‘चिनार’ रमा भारती के कविता संग्रह का नाम है। आइए आज इसी सीरीज की कुछ कविताएँ पढ़ते हैं। चिनार बहाने ज़िंदगी के कई पहलुओं पर बात करती हैं ये कविताएँ अपने में एक विशेष अर्थ रखती हैं – सम्पादक ====================================================== चिनार 1. पहाड़ों के सीने की धुकधुकी बढ़ी हुयी है डल सुनती है हौले से कान लगाए गुमसुम सूने शिकारे में बैठी लड़की परदेसी की याद में गाती है विरह गीत चिनारों की आतिशी कतारें खड़ी हैं किसी मुखविर सी मौसम की नव्ज़ पकड़ते ही धू -धू…
कुछ फ़िल्में ऐसी होती है जो लीक से हटकर होती हैं। जिसे कुछ ख़ास तरह के लोग पसंद करते हैं। ऐसी ही फ़िल्म है मुक्ति भवन। फ़िल्म के बारे में युवा लेखक नागेश्वर पांचाल ने लिखा है। आप भी पढ़िए – सम्पादक ======================================================== गुस्ताव फ्लौबेर्ट कहते है “देयर इज नो ट्रुथ, देयर इज ओनली परसेप्शन.” मौत की बात करते वक़्त क्या हम इस विचार से मुत्तफ़िक़ हो पाते है. मौत अंतिम सत्य है या कोई परसेप्शन यहाँ भी गठित होता है. युवा लेखक और निर्देशक शुभाशीष बड़े अनूठे तरीके से मुक्तिभवन के जरिये मौत, परिवार, जीवन और प्रकृति की बात…
युवा शायर सीरीज में आज पेश है विपुल कुमार की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ================================================== ग़ज़ल-1 जल्द आएँ जिन्हें सीने से लगाना है मुझे फिर बदन और कहीं काम में लाना है मुझे इश्क़ पाँव से लिपटता है तो रुक जाता हूँ वर्ना तुम हो तो तुम्हें छोड़ के जाना है मुझे मेरे हाथों को ख़ुदा रक्खे तिरे जिस्म की ख़ैर मसअला ये है तुझे हाथ लगाना है मुझे दिल को धड़का सा लगा रहता है वो जान न ले और फिर जब्र तो ये है कि बताना है मुझे माँग लेता हूँ तिरे ग़म से ज़रा सरदारी एक दुनिया है…
माइक इवरेट्ट अमेरिकी आंचलिक उपन्यासकार हैं। लेख, कविता और कहानी भी लिखती हैं। माइक का एक परिचय यह भी है कि इनके लिखे एक कथन (जो कि एक लेख का हिस्सा है) को इंटरनेट पर दस लाख से ज़्यादा दफ़े कोट किया जा चुका है। वो कथन है, “When a writer falls in love with you, you can never die.” आइए पढ़ते हैं कुछ कविताएँ। अनुवाद मैंने ही किया है – त्रिपुरारि प्रोसोपैगनोसिया (फेस ब्लाइंडनेस) 1. मैं तुमसे पहले जागती हूँ और तुम्हारे चेहरे पर फिसलती हुई धूप देखती हूँ। तुम्हारे जबड़े पर खूटियाँ (दाढ़ी) गिनती हूँ। कल जो बाल दस इंच…
अच्छी शायरी करना एक बात है और अच्छा इंसान होना दूसरी बात। अज़हर इक़बाल, जितनी अच्छी शायरी करते हैं उतने ही बेहतर इंसान भी हैं। उनसे मिलते हुए यूँ महसूस होता है, जैसे कभी बिछड़े ही न थे। बात करते हुए लगता है कि गुफ़्तगू कभी ख़त्म न हो। ऐसा प्यारा शख़्स, जिसकी शख़्सियत किसी ख़ुशरंग रूह की तस्वीर जैसी है और शायरी बहती हुई नदी की रवानी लिए हुए। जो न सिर्फ़ अपने तजरबे को इज़्ज़त बख़्शता है, बल्कि उसे उसी रूप में पेश भी करता है। आज युवा शायर सीरीज में पढ़िए अज़हर इक़बाल की ग़ज़लें – त्रिपुरारि…
युवा शायर सीरीज में आज पेश है नकुल गौतम की ग़ज़लें – त्रिपुरारि ग़ज़ल-1 अब मेरे दिल में नहीं है घर तेरा ज़िक्र होता है मगर अक्सर तेरा हाँ! ये माना है मुनासिब डर तेरा आदतन नाम आ गया लब पर तेरा भूल तो जाऊँ तुझे पर क्या करूँ उँगलियों को याद है नम्बर तेरा कर गया ज़ाहिर तेरी मजबूरियां टाल देना बात यूँ हँस कर तेरा शुक्र है! आया है पतझड़ लौट कर बाग़ से दिखने लगा फिर घर तेरा वो मुलाक़ात आख़िरी क्या खूब थी भूल जाना लाश में खंजर तेरा हैं कलम की भी तो कुछ मजबूरियाँ…
इन दिनों उर्दू के जानने-चाहने वालों के बीच उर्दू ज़बान के बनने को लेकर चर्चा गर्म है। ऐसा नहीं है कि ये चर्चा पहली दफ़ा शुरू हुआ है। (उर्दू में चर्चा (पु.) होता है, जबकि हिंदी में चर्चा (स्त्री.) होती है) गाहे-बगाहे ये चर्चा शुरू होकर ख़त्म हो जाता है। लेकिन इस दफ़ा हम एक नया सीरीज शुरू कर रहे हैं। जिसका नाम है- दास्तान-ए-उर्दू। इस सीरीज में उर्दू ज़बान के बनने की कहानी होगी। जिसे लिख रहे हैं बकुल देव। बकुल, अच्छे शायर हैं (जल्द ही, हम उनकी शायरी भी पढ़ेंगे)। फ़िलहाल जानकीपुल के पाठकों के लिए पेश है दास्तान-ए-उर्दू की पहली…
युवा शायर सीरीज में आज पेश है आलोक मिश्रा की ग़ज़लें – त्रिपुरारि 1- लबालब दुःख से था क़िस्सा हमारा मगर छलका नहीं दरिया हमारा असर उस पर तो कब होना था लेकिन तमाशा बन गया रोना हमारा मगर आने से पहले सोच लो तुम बहुत वीरान है रस्ता हमारा अजब तपती हुई मिट्टी है अपनी उबलता रहता है दरिया हमारा तुम्हारे हक़ में भी अच्छा नहीं है तुम्हारे ग़म में यूँ जीना हमारा 2- इक अधूरी सी कहानी मैं सुनाता कैसे याद आता भी नहीं ख़ाब वो बिछड़ा कैसे कितने सायों से भरी है ये हवेली दिल की ऐसी…
युवा शायर सीरीज में, आज पेश है पूजा भाटिया की ग़ज़लें – त्रिपुरारि 1. यूँ ही चलते रहने से भी क्या होगा अपना कहने को बस इक रस्ता होगा सहरा, जंगल, दश्त न वीराना कोई दीवाने का घर जाने कैसा होगा तुम भी दरिया को दरिया बन कर देखो तुम सा ही उसका चेहरा सूखा होगा मैं पानी के सहरा में भटकी थी जब वो भी रेत के दरिया में डूबा होगा उसको लगता है मैं बिल्कुल तनहा हूँ किसके साथ मुझे उसने देखा होगा! उसका डर मेरे डर से मिल कर बोला हम न हुए तो इन दोनों का…
