साहिर लुधियानवी का लिखा हुआ यह गीत यूँ तो 1958 में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘साधना’ के लिए इस्तेमाल किया गया था। लेकिन ज़रा ग़ौर से सोचें तो समझ में आता है संदर्भ भले ही बदल गया हो, औरतों के प्रति ज़्यादातर मर्दों की सोच वहींं ठहरी हुई है। यही वजह है कि यह नज़्म आज भी ताज़ा और मानीख़ेज़ लगती है – संंपादक औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के…
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विशाल भारद्वाज निर्देशित फ़िल्म ‘रंगून’ हाल में रिलीज़ हुई और बहुत चर्चा में है। जानकीपुल पर भी कई रिव्यू पढ़ा जा चुका है। लेकिन कम लोग जानते हैं कि विशाल कविताएँ भी लिखते हैं। जल्द ही उनकी कविताओं का संग्रह हमारे बीच होगा। फ़िलहाल पढ़ते हैं विशाल भारद्वाज की कविता, जो उन्होंने अपनी वाइफ़ रेखा भारद्वाज के लिखा है – संपादक अकेला छोड़ के घर में न मुझको जाया करो ऑन होता नहीं है टीवी तुम न देखो तो और ताला भी कहाँ खुलता है अलमारी का तुम्हारे जाते ही नल को ज़ुकाम होता है टपकने लगता है टप टप…
इन दिनों एक ओर हिंदी के हार्ट लैंड दिल्ली में जश्न-ए-रेख़्ता यानी उर्दू का फेस्टीवल चल रहा है। दूसरी ओर मुम्बई में एक यंग सा लड़का ‘हुसैन हैदरी’ अपने आप को हिंदुस्तानी मुसलमां होने की बात कहता है। सवाल ये है कि क्या हिंदुस्तानी मुस्लमां जैसी कोई चीज़ होती है? क्या हिंदुस्तान में मुसलमानों को अपने होने का सबूत देना पड़ेगा? इस मुद्दे पर अलग अलग लोगों की राय अलग अलग हो सकती है, लेकिन इतना तो तय है कि हुसैन ने हिंदुस्तानी मुसलमां की एक नई परिभाषा दे दी है। आइए फ़िलहाल पढ़ते हैं ये नज़्म, जिसका उनवान है- हिंदुस्तानी…
इला जोशी की कविताएँ पढ़ते हुए यूँ महसूस होता है, जैसे किसी परिंदे को इस शर्त पर रिहाई मिले कि उसके पंख काट दिए जाएँगे। इन कविताओं में एक अजीब क़िस्म की बेचैनी दफ़्न है, जिसे किसी पवित्र स्पर्श की प्रतीक्षा भी है और उस स्पर्श से छिल जाने का डर भी। एक तरह की ऊब, जिसका सिरा उस बाज़ार में खुलता हो जहाँ प्रेम के नाम पर प्रेमिकाओं का गोश्त बिकता है। एक भटकती हुई इच्छा, जो समंदर की रेत पर धूप सेंकते हुए मर जाना चाहती है। एक सपना, जो नींद में घुलते ही आँखें बंजर कर देता…
‘बिहार-यूपी के किसी छोटे गाँव से सत्तू-अचार भरी पेटी लिए, अपने पिता से पाए गए आईएएस बनने के सपने के साथ अधिकतर लोग दिल्ली यूनिवर्सिटी पढ़ाई करने आते हैं। इनमें से बहुतों का एक निज़ी सपना होता है: एक दूधिया गोरी पंजाबी लड़की के साथ सोना।’ इसी प्लॉट पर लिखे गए उपन्यास के लेखक हैं पंकज दुबे, जो अपनी पहली ही किताब ‘लूज़र कहीं का’ से ग़ैरपाठकों को भी पाठक बनाने की इच्छा रखते हैं। किताब का लोकार्पण आज यानी 19 जनवरी ‘14 को पिंक सिटी प्रेस क्लब, जयपुर में और 29 जनवरी 2014 को दिल्ली में होना है। पंकज…
हाल में ‘संवदिया’ पत्रिका का युवा हिंदी कविता अंक (अतिथि संपादक : देवेंद्र कुमार देवेश) आया है। पत्रिका में 92 युवा कवियों की कविताओं के साथ-साथ “वर्तमान समय में हिंदी कविता के समक्ष चुनौतियाँ” विषय पर कई वरिष्ठ कवियों के विचार भी प्रस्तुत किए गए हैं। आप भी पढ़िए : जानकीपुल================================================================चंद्रकांत देवताले: हम जिस भूमंडलीकरण के बाजारवादी हड़कंप में खड़े हैं, यह देशीयता–स्थानिकता–बोली–भाषा और साहित्य विरोधी है। इतना ही नहीं अब तो विगत दो–ढाई दशकों में पर्यावरण की लूट के साथ करोड़ों हाशिए पर पड़े लोगों का चैन और उनकी नींद पर भी हमले हो रहे हैं। संगठित अपराधियों के…
उम्र से लम्बी सड़कों पर ‘गुलज़ार’ 19 जनवरी की शाम गुलज़ार रही, गुलज़ार के नाम रही। मौक़ा था कवि-चिकित्सक विनोद खेतान लिखित पुस्तक “उम्र से लम्बी सड़कों पर गुलज़ार” के लोकार्पण का। ‘वाणी’ से प्रकाशित इस पुस्तक में लेखक ने बड़े आत्मीय ढंग से गुलज़ार के फ़िल्मी गीतों की परतों में पोशीदा कविता-तत्व को रेखांकित किया है। ‘जानकीपुल’ के पाठकों के लिए कुछ ऐसे गीत जो कम सुनने को मिले, लेकिन कविता की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं : त्रिपुरारि कुमार शर्मा============================================== 1. फ़िल्म : देवताजब एक क़ज़ा से गुज़रो तो इक और क़ज़ा मिल जाती है मरने की घड़ी मिलती…
विनीत कुमारयुवा लेखक विनीत कुमार का यह लेख वर्चुअल स्पेस पर मौजूद हिंदी के उन लेखकों की ‘सर्जरी’ है, जो तुरत-फुरत समाधान में विश्वास रखते हैं और वह भी बिन किसी तैयारी के। ‘मांझी-गोस्वामी प्रकरण’ के बहाने विनीत ने उन मठाधीशों की भी ख़बर ली है, जो “मर्द लेखक-संपादक” होने के लिए किसी लेखिका को छिनाल-चालबाज कहना ज़रूरी समझते हैं : जानकीपुलमुझे याद है, आज से कोई चार साल पहले हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने डरते-डरते (जैसे उनके कम्प्यूटर की कीबोर्ड दबाते ही हिन्दी भवन के आगे पोखरण परमाणु परीक्षण हो जाएगा और जो आग के गोले उठेंगे,…
भानु भारती के निर्देशन में गिरीश कर्नाड के नाटक ‘तुगलक’ का भव्य मंचन दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में हुआ. इस नाटक की प्रस्तुति को लेकर बहुत अच्छी समीक्षा लिखी है अमितेश कुमार ने- जानकी पुल.================================“निर्देशक का यह मूलभूत कर्तव्य है कि वह नाटक के अर्थ को सशक्त दृश्यबिंबों के ऐसे क्रम में जमा दे कि दर्शको को अनजाने में ही उसका ग्रहण सुलभ हो जाय।” इब्राहिम अलकाज़ी ने यह ‘तुगलक़’ के निर्देशकीय में कहा था. तुगलक देखे के लौटा तब से यह लाईन घूम रही थी दिमाग में. घर आया नाटक निकाला और पढ़ा. अब तुगलक को देखने का…
ओमा शर्मा हमारे दौर के प्रमुख कथाकार हैं. उनको ‘रमाकांत स्मृति कथा-सम्मान’ दिए जाने की घोषणा हुई है. प्रस्तुत है उनकी पुरस्कृत कहानी : जानकी पुल======================================================================वह पूरेइत्मीनानसेसोयीपड़ीहै।बगलमेंदबोचेसॉफ्टतकिएपरसिरबेढंगापड़ाहै।आसमानकीतरफकिएअधखुलेमुंहसेआगेवालेदांतोंकीकतारझलकरहीहैं।होंठ कुछ पपडा़ से गए हैं,सांस का कोई पता ठिकाना नहीं है। शरीर किसी खरगोशकेबच्चेकीतरहमासूमियतसेनिर्जीवपड़ाहै।मुड़ी-तुडी़ चादरकादोतिहाईहिस्साबिस्तरसेनीचेलटकापड़ाहै।सुबहकेसाढ़ेग्यारहबजरहेहैं।हरछुट्टीकेदिनकीतरहवहयूंसोयीपड़ीहैजैसेउठनाहीनहो।एक-दो बार मैंने दुलार से उसे ठेला भी है … समीरा, बेटा समीरा, चलो उठो … ब्रेक फास्ट इज़ रेडी …। मगर उसके कानों पर जूँ नहींरेंगीहै।उसकेमुड़ेहुएघुटनोंकेदूसरीतरफखुलीत्रिकोणीयखाड़ीमेंकिसीठगकीतरहअलसाएपड़ेकास्पर(पग) नेजरूरआंखेंखोलीहैंमगरकुछबेशर्मीउसपरभीचढ़आयीहै।बिगाड़ाभीउसीकाहै।वैसे वहसोतीहुईहीअच्छीलगतीहै।उठकरकुछनकुछऐसा-वैसा जरूर करेगी जिससे अपना जी जलेगा। नाश्ते में परांठे बने हों तो हबक देने की मुद्रा में यूँ ‘ऑक’ करेगी … कि नाश्ते में परांठे कौन खाता है। दलिया; नो।…
