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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जब एक क़ज़ा से गुज़रो तो इक और क़ज़ा मिल जाती है

    administrator_06848bBy administrator_06848bJanuary 21, 2013147 Comments3 Mins Read

    उम्र से लम्बी सड़कों पर ‘गुलज़ार’
    19 जनवरी की शाम गुलज़ार रही, गुलज़ार के नाम रही। मौक़ा था कवि-चिकित्सक विनोद खेतान लिखित पुस्तक “उम्र से लम्बी सड़कों पर गुलज़ार” के लोकार्पण का। ‘वाणी’ से प्रकाशित इस पुस्तक में लेखक ने बड़े आत्मीय ढंग से गुलज़ार के फ़िल्मी गीतों की परतों में पोशीदा कविता-तत्व को रेखांकित किया है। ‘जानकीपुल’ के पाठकों के लिए कुछ ऐसे गीत जो कम सुनने को मिले, लेकिन कविता की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं : त्रिपुरारि कुमार शर्मा
    ============================================== 
    1. फ़िल्म : देवता
    जब एक क़ज़ा से गुज़रो तो
    इक और क़ज़ा मिल जाती है
    मरने की घड़ी मिलती है अगर
    जीने की सज़ा मिल जाती है
    इस दर्द के बहते दरिया में
    हर ग़म है, मरहम कोई नहीं
    हर दर्द का ईसा मिलता है
    ईसा का मरियम कोई नहीं
    साँसों की इजाज़त मिलती नहीं
    जीने की रज़ा मिल जाती है
    मैं वक़्त का मुजरिम हूँ लेकिन
    इस वक़्त ने क्या इंसाफ़ किया
    जब तक जीते हो, जलते जीते रहो
    जल जाओ तो कहना माफ़ किया
    जल जाए ज़रा-सी चिंगारी
    तो और हवा मिल जाती है
    कुछ ऐसे क़िस्मत वाले हैं
    कि जिनकी क़िस्मत होती नहीं
    हँसना भी मना होता है उन्हें
    रोने की इजाज़त होती नहीं
    बेनाम-सा मौसम जीते हैं
    बेरंग फ़ज़ा मिल जाती है
    (इस गीत को कवि केदारनाथ सिंह ने पढ़ा)
    2. फ़िल्म : फ़िलहाल
    दिल के सन्नाटे खोल कभी
    तन्हाई तू भी बोल कभी
    परछाइयाँ चुनता रहता है
    क्यों रिश्ते बुनता रहता है
    इन वादों के पीछे कोई नहीं
    क्यों वादे सुनता रहता है
    दिल के सन्नाटे खोल कभी
    तन्हाई तू भी बोल कभी
    बुझ जाएँगी सारी आवाज़ें
    यादें यादें रह जाएँगी
    तस्वीर बचेंगी आँखों में
    और बातें सब बह जाएँगी
    दिल के सन्नाटे खोल कभी
    तन्हाई तू भी बोल कभी
    3. फ़िल्म : भूल ना जाना
    पुकारो
    मुझे नाम लेकर पुकारो
    मुझे तुमसे अपनी ख़बर मिल रही है
    पुकारो…
    कई बार यूँ ही हुआ है सफर में
    अचानक से दो अजनबी मिल गए हों
    जिन्हें रूह पहचानती हो अज़ल से
    भटकते–भटकते वही मिल गए हों
    कुँआरे लबों की क़सम तोड़ दो तुम
    ज़रा मुस्कुरा कर बहारें सँवारो
    पुकारो…
    ख़यालों में तुमने तो देखी तो होंगी
    कभी मेरे ख़्वाबों की धुँधली लकीरें
    तुम्हारी हथेली से मिलती हैं जा के
    मेरी, हाथ की ये अधूरी लकीरें
    बड़ी सरचढ़ी है ये ज़ुल्फ़ें तुम्हारी
    ये ज़ुल्फ़ें मेरे बाज़ुओं पे उतारो
    पुकारो…
    4. फ़िल्म : यहाँ
    छन् से बोले चमक के जब चिनार बोले
    ख़्वाब देखा है आँख का ख़ुमार बोले
    ख़्वाब छलके तो आँख से टपक के बोले
    झरना छलके तो पूरा आबशार बोले
    उर्ज़ो उर्ज़ो दुर्कुठ…
    हरे ख़्वाब की ये हरी चूड़ियाँ
    कलाई में किसने भरी चूड़ियाँ
    उठी नींद से चली आई मैं
    साथ ही आ गईं मेरी चूड़ियाँ
    आँख बोले कि ख़्वाब–ख़्वाब खेलते रहो
    रोज़ कोई एक चाँद बेलते रहो
    चाँद टूटे तो टुकड़े–टुकड़े बाँट लेना
    गोल पहिया है रात–दिन धकेलते रहो
    उर्ज़ो उर्ज़ो दुर्कुठ…
    5. फ़िल्म : जहाँ तुम ले चलो
    कभी चाँद की तरह टपकी
    कभी राह में पड़ी पाई
    अठन्नी सी ज़िंदगी…ये ज़िंदगी
    कभी छींक की तरह खनकी
    कभी जेब से निकल आई
    अठन्नी सी ज़िंदगी…ये ज़िंदगी
    कभी चेहरे पे जड़ी देखी
    कहीं मोड़ पे खड़ी देखी…
    शीशे के मर्तबानों में दुकान पे पड़ी देखी
    अठन्नी सी ज़िंदगी…ये ज़िंदगी
    तमग़े लगा के मिलती है
    मासूमियत से खिलती है
    कभी फूल हाथ में लेकर शाख़ों पे बैठी हिलती है
    अठन्नी सी ज़िंदगी…ये ज़िंदगी
    6. फ़िल्म : हिप–हिप हुर्रे
    जब कभी मुड़के देखता हूँ मैं
    तुम भी कुछ अजनबी–सी लगती हो
    मैं भी कुछ अजनबी–
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