Author: administrator_06848b

जानकीपुल की नई पेशकश-युवा शायर। इस सीरीज के तहत उर्दू में लिखने वाले युवा शायर/शायरा की रचनाएँ प्रकाशित की जाएँगी। आप लुत्फ़ अंदोज़ हों। हौसला अफ़ज़ाई करें। आज पढ़ें पहला पोस्ट, सालिम सलीम की ग़ज़लें – त्रिपुरारि 1. कनार-ए-आब तिरे पैरहन बदलने का मिरी निगाह में मंज़र है शाम ढलने का ये कैसी आग है मुझ में कि एक मुद्दत से तमाशा देख रहा हूँ मैं अपने जलने का सुना है घर पे मिरा मुंतज़िर नहीं कोई सो अब के बार मैं हरगिज़ नहीं सँभलने का ख़ुद अपनी ज़ात पे मरकूज़ हो गया हूँ मैं कि हौसला ही नहीं तेरे…

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यूँ तो हिंदी में ‘बनारस’ पर कई कविताएँ लिखी जा चुकी हैं। फिर भी, हर नया कवि उस शहर की ओर आकर्षित होता है। हर एक आँख उस शहर को अपनी नज़र से देखती है। हर एक दिल उस शहर को अलग तरह से महसूस करता है। अपना अनुभव बयान करता है। बनारस, किसी के लिए इश्क़ है तो किसी के लिए महज़ उन्स। लेकिन उपासना के बनारस का रंग और ही है। आज जो कविताएँ आप पढ़ने जा रहे हैं, उनमें बनारस तो है ही। साथ में, एक कवि की स्मृति और आत्म-स्वीकृति भी है। और लिखने का अंदाज़ ऐसा,…

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हिंदी के कई लेखक ऐसे हैं, जो कविता और कहानी दोनों विधाओं में समान अधिकार के साथ लिखते हैं। उनमें एक नाम शेषनाथ पांडेय है। साहित्य से इतर शेषनाथ, फ़िल्म/टीवी के लिए पटकथा भी लिखते हैं। फ़िलहाल मुबई में रहते हैं और दोस्तों के बीच अपनी दिलदारी के लिए बेहद मशहूर हैं। आज जो कहानी आप पढ़ने जा रहे हैं, यह ‘रचना समय’ के ताज़ा अंक में प्रकाशित हुई है। लेकिन क्लामेक्स में कुछ तब्दीली के बाद उन्होंने जानकीपुल के पाठकों के लिए प्रस्तुत किया है। आइए पढ़ते हैं – त्रिपुरारि ========================================================== यह सर्दी की एक चढ़ती रात में हेमंत…

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पिछले साल उर्दू में एक किताब छपी थी। नाम है- रोहज़िन, जो रहमान अब्बास का लेटेस्ट नॉवेल है। ग़ौर करने लायक बात ये है कि छपने से लेकर आज तक इस किताब ने उर्दू की गलियों में धूम मचा रखी है। किताब से गुज़रते हुए कई बातें ख़याल में आती हैं। ज़ेहन का दरीचा कई पहलुओं की सिम्त खुलता है। पहले दरीचे से एक लड़का दिखाई पड़ता है- असरार। दूसरे दरीचे से एक लड़की दिखाई पड़ती है- हिना। मुहब्बत के साए में जब असरार और हिना पनाह लेते हैं, तो पूरी काएनात एक तिलिस्म में तब्दील हो जाती है। जहाँ…

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मारग्रेट एटवुड को आम तौर पर ‘ब्लाइंड असैसिन्स’ उपन्यास के लिए जाना जाता है. जिसके ऊपर उनको बुकर पुरस्कार मिला था. उनके उपन्यासों को पांच बार बुकर पुरस्कार के लिए शॉर्टलिस्ट किया जा चुका है. 77 साल की इस कैनेडियन लेखिका ने कविताएँ भी लिखी हैं. आज कुछ कविताएँ, जिनका अनुवाद प्रतिमा दवे ने किया है- त्रिपुरारि ===== चौखट फर्श के बीचोंबीच यह खिड़की बनाई है मैंने चौखटों से तो बिलकुल खिड़की ही लगती है इसमें से दिखती है मुझे एक सड़क, फुटपाथ और आसमान का नीला टुकड़ा जहाँ होम मूवी के कम्पन की तरह चिड़ियाँ उडती हैं पंख झटकारते…

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जो लोग उर्दू-हिंदी लिटरेचर से तआल्लुक़ रखते हैं, उनके ज़ेहन में होली के ख़याल के साथ नज़ीर अकबराबादी की नज़्म ‘होली की बहारें’ ज़रूर आती होगी। मन गुनगुनाने लगता होगा, ‘जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की’। ये बहुत मशहूर नज़्म है। लेकिन इसके अलावे भी उर्दू में होली पर कई शायरों ने नज़्में कही हैं। आज होली के मौक़े पर आइए पढ़ते हैं कुछ बेहतरीन शायरों की ख़ुशरंग नज़्में। जानकीपुल की ओर से आप सभी को होली मुबारक! ===================================================== साग़र ख़य्यामी की नज़्म- छाई हैं हर इक सम्त जो होली की बहारें पिचकारियां ताने वो हसीनों की…

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हुआ यूँ कि जानी मानी थिएटर आर्टिस्ट/लेखिका विभा रानी ब्रेस्ट कैंसर की शिकार हुईं और अपनी मजबूत जिजीविषा के कारण इस बीमारी से उबर भी गईं। लेकिन बीमारी के दौरान वो अपने मन की बात काग़ज़ों पर दर्ज़ करती रहीं। वो बातें, एक कविता संग्रह के रूप में प्रकाशित हुई हैं। संग्रह का नाम है- समरथ। दरअसल, ‘समरथ’ उस निजी अनुभव का बयान है, जो व्यक्ति को व्यक्ति के रूप में और परिपक्व करता है। किताब से गुज़रते हुए कुछ बातें- त्रिपुरारि समय ने छेड़ी है एक नई तान देह में दिए हैं अनगिन विरहा गान मन की सीप में…

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औरत को लेकर हर किसी का अपना एक नज़रिया होता है। होना भी चाहिए। यहाँ तक कि ख़ुद औरतों का भी। कोई किसी से इत्तिफ़ाक़ रखे या न रखे, ये अलग बात है। आज पूरी दुनिया #WomensDay मना रही है। यहाँ भी आप सुबह से कई पोस्ट पढ़ चुके हैं। मगर अब तो दिन के दरवाज़े पर शाम भी दस्तक दे कर जा चुकी है। आइए पढ़ते हैं आज का आख़िरी पोस्ट। उर्दू की एक नज़्म, जिसे लिखा है पास्कितान के युवा शायर अली ज़रयून ने। जानकीपुल के पाठकों के लिए ये नज़्म उपलब्ध कराने के लिए शायर दोस्त महेंद्र…

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हिंदी सिनेमा के दर्शक मुख्य रूप से दो तरह के लोग हैं। एक वो, जो पॉपुलर सिनेमा को पसंद करते हैं और दूसरे वो, जो सिनेमा में आर्ट की तलाश करते हैं। इन्हें शाहरुख़/सलमान के फ़ैन और इरफ़ान/नवाज़ुद्दीन के फ़ैन्स में बाँटा जा सकता है। ठीक इसी तर्ज़ पर उर्दू शायरी के चाहने वाले भी दो तरह के लोग हैं। एक पॉपुलर मुशायरा पसंद करने वाले और दूसरा संजीदा शायरी पसंद करने वाले। जौन एलिया के साथ (वफ़ात के बाद ही सही) सबसे अच्छी बात ये हुई कि उनके दीवाने दोनों तरह के लोग हैं। एक वो, जिन्होंने यूट्युब पर…

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कहते हैं- इंसान उम्र नहीं तजरबा से बड़ा होता है। जो शायर अपने तजरबे को जितनी ख़ूबसूरती से क्राफ़्ट में ढालता है, उसकी शायरी उतनी ही चमक रखती है। मौजूदा वक़्त में जहाँ हर कोई अपने जज़्बात का बयान लिखकर कर ज़ाहिर करने पर अमादा है, ऐसे में बहुत कम लोग हैं जिन्हें लिखने का हुनर हासिल होता है। ऐसा ही एक हुनरमंद नौजवान शायर है- शहबाज़ ‘रिज़वी’। आइए पढ़ते हैं कुछ ग़ज़लें। पसंद आए तो हौसला अफ़ज़ाई ज़रूर कीजिएगा – त्रिपुरारि 1. उसने मुझसे तो कुछ कहा ही नहीं मेरा ख़ुद से तो राबता ही नहीं कुजागर रोज़ दस्त…

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