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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    सदैव की कविताएँ

    administrator_06848bBy administrator_06848bJuly 25, 20172 Comments5 Mins Read

    आज प्रस्तुत हैं सदैव की कविताएँ – संपादक
    ========================================================

    हम इस पेड़ को याद रखेंगे
    ———–

    तंग पगडंडियों से
    बियाबान जंगलों के बीच होकर
    दलदली जमीन में कमर तक धंसा
    घुप अंधेरे या भरी दोपहर
    खाली सवेरों-शामों से
    जब मैं चलता जाता था
    निर्जन पठारों पर कभी
    कभी बर्फीली हवाओं में कांपता, हांफता
    डरता अंधेरे से
    कभी लू के थपेड़ों से
    जूझता, गिरता
    तब मेरी कल्पना में
    एक साथी होता था।
    जब रातों को लेटा
    तारों को देखता
    तो सोचता इन कंधों का क्या उपयोग है
    मैं सोचता कि कोई होता
    इस दुनिया को मुझसे बांटने के लिए
    इस विशाल दुनिया का
    पूरा अकेलापन
    सदियों-सदियों तक का
    लगता जैसे मेरी पसलियों में धंस गया था।
    कसकर बांध लेता पसलियां।
    और चला जाता
    एक बार में कई-कई कोस।
    कई यात्री निकले होंगे
    गिनती ही नहीं
    आगे-पीछे, दांए-बांए से
    पसलियां कसे
    न मैं रूका
    न वो रूके।

    —————

    एक उदास सी शाम
    जब आसमान में बादल थे
    मन भारी था
    और अकेलेपन से
    पसलियां नीली पड़ चुकी थीं
    पता चला कि
    उस बरगद के बड़े पेड़ के नीचे
    मेरे अलावा
    एक यात्री और है।
    हम मुस्कुराए
    आज रात हम
    इस पेड़ को साझा करने वाले थे।
    हमने रात भर बातें कीं
    अपनी-अपनी यात्रा के किस्से सुनाए
    डरते-सकुचाते पास आए
    और पास आ गए
    हमारी पसलियों का दर्द जा रहा था
    हम कितना थके थे
    आज पता चल रहा था
    हमने पेड़ से कहा
    कि हमें रात लंबी चाहिए
    बरगद ने हमें ढक लिया
    कितनी रातें-कितने दिन
    हम बस सोए रहे पता नहीं
    पेड़ भी सोया रहा
    वह भी कई दिनों से अकेला था
    हम तीनों सपने में भी मिले।
    हमने सपने देखे कि हम उड़ रहे हैं
    हम एक-दूसरे को थामकर खूब उड़ते
    कभी-कभी पूरा दिन
    कभी पूरी रात
    फिर हम जागे
    एक दूसरे की बाहों से
    पेड़ हमें धूप से बचा रहा था।
    और हमारी पीठ पर
    एक-एक पंख था।
    एक पंख मेरे पास, एक उसके पास
    बरगद के पेड़ पर
    पता नहीं कौन से फूल खिले थे
    हम जिन पगडंडियों से आए थे
    उनके निशान मिट चुके थे
    यह सब क्या हो रहा था
    पता नहीं
    हमें आगे बढ़ना था
    और अब तक तो कितने कोस बढ़ जाना था
    फिर भी पता नहीं क्यों
    कुछ पछतावा नहीं था।
    यह पंख कैसे आए?
    इन पंखों का क्या करें?
    लगता है कि कई दिन सोए रहे
    छह साल- पेड़ ने कहा।

    अब जाना होगा
    बहुत देर हुई मैंने सोचा।
    हां अब जाना होगा
    उसने कहा।

    तुम दोनों साथ क्यों नहीं चले जाते?
    तुम्हारे पास पंख है, तुम उड़ सकते हो
    लेकिन हमारी यात्राएं अलग हैं
    हम दोनों के मुंह से एक साथ निकला।

    ————————

    हमनें पंखों को झाड़ा
    एक-दूसरे को चूमा
    आज जाने का दिन था
    पेड़ कुछ खुश नहीं था
    हम भी नहीं थे
    लेकिन पता नहीं कहां से और कैसे
    हम जिन पगडंडियों से आए थे
    जो मिट चुकी थीं
    वे उभर रही थीं
    और हमारे पैर चलने के तैयार थे।
    सुबह वैसी ही थी
    जैसी वह शाम थी
    उदास और बादलों से भरी।
    हमने एक-दूसरे को देखा
    किसी ने कुछ नहीं कहा।
    मैंने उसे कमर से थामा
    और उसने मुझे कंधे से
    हमने पंख खोले और हम उड़ चले
    हम उड़े काफी दूर तक
    बहुत उंचे, बिना कुछ कहे
    इधर से उधर
    यह तो होना ही था
    हां हमें जाना ही था
    हम उड़ते रहे
    और और और उंचा
    हमारी सांसें उखड़ने लगीं
    तब हमने अपने पंख समेटे
    और गोता लगा दिया
    हम नीचे आ रहे थे
    बहुत तेजी से
    हमने एक दूसरे को इतनी जोर से थामा
    कि लगभग एक ही हो गए
    उसके बाल मेरे चेहरे पर थे
    उसकी महक बहुत अच्छी थी
    जमीन आने वाली थी
    हमने पंखों को फैला दिया

    ———————

    तुम दोनों साथ क्यों नहीं चले जाते?
    तुम्हारे पास पंख है, तुम उड़ सकते हो
    उड़कर कहीं भी जा सकते हो
    बरगद ने फिर कहा
    हमनें जवाब नहीं दिया।
    मैं अपना पंख निकालकर
    यहीं पेड़ के नीचे दबा देता हूं
    एक पंख किसी काम का नहीं।
    मेरा पंख भी बोझ ही बनेगा
    इसे भी दबा देते हैं।
    मैंने अपना पंख तोड़ा
    और उसने अपना
    बहुत दर्द हुआ, बहुत ही ज्यादा
    पर जताया नहीं
    पेड़ के नीचे एक गड्ढा खोदा
    धीरे से पंखों को उसमें रखा
    आखिरी बार उन्हें देखा
    और फिर जल्दी से मिट्टी भर दी।
    पंख क्यों उग आते हैं?
    पता नहीं
    क्या पंख फिर उगते हैं?
    पता नहीं
    उगते भी हैं, सुना है
    नए नहीं लेकिन
    यही फिर से उग आते हैं
    मैं अब उड़ना नहीं चाहता
    मुझे भी नहीं उड़ना
    कितना अच्छा होता कि हमें दो पंख उगते
    हां
    नहीं
    फिर तो सब अकेले ही उड़ लिया करते
    हां।
    हम इस पेड़ को याद रखेंगे
    सिर्फ इस पेड़ को
    और कुछ भी नहीं।

    —————–

    चलो अब विदा
    पीछे पलटकर मत देखना
    तुम भी
    ठीक है
    वादा?
    वादा
    तुमने अगर पीछे मुड़े
    तो मेरे पैर में कांटा चुभ जाएगा
    और अगर तुम पीछे मुड़े
    तो हम इस पेड़ का रास्ता भूल जाएंगे।
    और हम चले गए।

    आत्म वक्तव्य: 

    मेरा किसी काम में मन नहीं लगता लेकिन अपने आपको बहुत हीरो समझता हूँ। अब तक ऐसा कुछ ख़ास किया नहीं है लेकिन महापुरुष जैसा फील करता हूँ। कभी-कभी लगता है कि इस दुनिया को अब सिर्फ मेरे विचार ही बचा सकते हैं, लगता है कि जो मेरी सोच है वो बहुत ही फाडू है, लेकिन सच्चाई बस इतनी है कि मैं सिर्फ आलसी, कामचोर, मक्कार, लीचड़, नशेड़ी और ठरकी हूँ। और हद तो ये है कि अब मुझे अपने आप को ऐसा समझने में शर्म भी नहीं आती और किसी की परवाह भी नहीं होती, बल्कि मैं अब और ज्यादा सतही आदमी बनना चाहता हूँ।

    31 जनवरी 2017 को अखबार की नौकरी छोड़कर 9 फरवरी को मूँ उठाकर भोपाल से मोटरसाइकिल लेकर निकल पड़ा हूँ। वापस जाने का फ़िलहाल कोई इरादा नहीं है। गुजारा करने के लिए के लिए जहाँ जाता हूँ, होटल-रेस्टोरेंट्स, दुकानों में पेंटिंग का काम खोज लेता हूँ।

    -सदैव

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