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    जब सौ मासूम मरते होंगे, तब एक कवि पैदा होता होगा

    administrator_06848bBy administrator_06848bJanuary 28, 201329 Comments18 Mins Read

    हाल में ‘संवदिया’ पत्रिका का युवा हिंदी कविता अंक (अतिथि संपादक : देवेंद्र कुमार देवेश) आया है। पत्रिका में 92 युवा कवियों की कविताओं के साथ-साथ “वर्तमान समय में हिंदी कविता के समक्ष चुनौतियाँ” विषय पर कई वरिष्ठ कवियों के विचार भी प्रस्तुत किए गए हैं। आप भी पढ़िए : जानकीपुल
    ================================================================
    चंद्रकांत देवताले: हम जिस भूमंडलीकरण के बाजारवादी हड़कंप में खड़े हैं, यह देशीयता–स्थानिकता–बोली–भाषा और साहित्य विरोधी है। इतना ही नहीं अब तो विगत दो–ढाई दशकों में पर्यावरण की लूट के साथ करोड़ों हाशिए पर पड़े लोगों का चैन और उनकी नींद पर भी हमले हो रहे हैं। संगठित अपराधियों के झुंड के झुंड हम पर अनेक लिबासों–मुखैटे सहित हावी हैं।
    लगभग चार सदी पूर्व संत तुकाराम ने कहा था। ‘‘दिन–रात हम शामिल हैं एक युद्ध में, भीतर अपने ही और बाहर दुनिया से।’’ अब इस संग्राम को जो आज लंपट पूँजी और हड़पनेवालों की ताकत के बवंडर के बीच जारी है, बता पाना संभव नहीं लगता। यह तो कविता की नाव में प्रदूषित नदी को लादने जैसा विकट कर्म है।
    वर्तमान कभी इकहरा सिर्फ अभी–आज का नहीं होता। अतीत और आगत के बीच हिचकोले खाता समय होता है, हमें विचार करने और दूर तक देखनेवालों के लिए। कविता के समक्ष हमेशा संकट रहा हैµहर समय में। बस उसकी शक्ल बदलती रही है। एक संकट यह भी कि सिर्फ शब्दकोश के शब्दों में वह न रहे। आवाजों का घर हो वह दहकता।
    एक और सचाई कि कविता कोई निरपेक्ष या स्वतंत्र प्रवस्तु तो नहीं। और कवि भी जीवन–समाज में असंपृक्त दिव्यलीन व्यक्तिमात्र नहीं। अर्थात् यही कि आम आदमी के सामने जो दमन, अन्याय, असमानता, शोषण और गरिमावंचित किए जाने की समस्याएँ हैं, वे ही आज कविता के समक्ष चुनौतियाँ हैं। कविता की चिंता धरती, जंगल, मनुष्य और ‘सबार उपर मानष सत्य’ से जुदा नहीं।
    जिस तरह मनुष्य और मनुष्यता पेशा नहीं, उसी तरह कवि और कविताई भी नहीं। इसके लिए जनपक्षधरता, प्रतिबद्धता और विचारधारा से लैस होना कवि की नियति है। जब सौ मासूम मरते होंगे, तब एक कवि पैदा होता होगा।
    देश के तमाम इलाकों में रचनाकार पश्न करते प्रहार कर रहे हैं। डोंडी पीट रहे हैं। संदेह और प्रश्नों के गुबार उड़ा रहे हैं। आरोपित समाधान और गुमराह करनेवाले आशावाद से उनका कोई वास्ता नहीं है, न होना चाहिए।
    कविता कभी मानव–विरोधी नहीं हो सकती, यह गलतफहमी भी बनी हुई हैय जबकि हम देख रहे हैं धर्म, मजहब, संस्कृति के नाम पर सरे आम हत्याएँ–संहार हो रहे हैं। राहत की बात इतनी कि युवा कवि चौकन्ने–सतर्क हैं।
    अंत में यह कि इस अर्थव्यवस्था के अनाचार और अनेकरूपी शोर–शराबे में कविता–पुस्तकोंµसच्ची साहसी आवाजों के लिए जगह नहीं। करोड़ों अक्षर से वंचित हैं। निहत्थे कवि क्या करें ? यह प्रश्न सतत बेधता रहता है। दूसरे एक तरह से सोचने–बोलनेवाले भी एकजुट नहीं। बहुत बड़ी त्रासदी परस्पर की खेमेबाजी। और बाजारवाद का कुप्रभाव उत्सवी प्रतिमा और प्रतिष्ठा के कारनामों को साहित्यिक संस्कृति के बतौर परोसा–प्रचारित किया जा रहा है।
    और अंत में,
    यह वक्त वक्त नहीं, / एक मुकदमा है/ या तो गवाही दे दो/ या गूँगे हो जाओ/ हमेशा के वास्ते।
    इतना ही।
    डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी : कवि एक स्तर पर नागरिक होता है और दूसरे पर कवि। उसका एक नागरिक धर्म है और दूसरा कवि कर्त्तव्य। एक नागरिक के रूप में वह जीवन की अनेकानेक समस्याओं से टकराते हुए जो अनुभव अर्जित करता है, उसकी अभिव्यक्ति उसकी कविता में भी स्वाभाविक है। संसार–सागर की तरंगों से ही कवि के भाव और विचार निर्मित होते हैं। मगर एक कवि के रूप में उसे अपने भावों और विचारों को एक नयापन देना होता है। यही कवि–कौशल है कि कैसे वह अपनी अभिव्यक्ति को अधिक सक्षम और ताजा बना सकता है। कवि के सामने यह प्रश्न भी चुनौती के रूप में होना चाहिए कि क्यों कविता के पाठक कम हो रहे हैं और कैसे वह अपने को अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचा सकता है, या किन प्रयोगों के द्वारा अपना एक एक अलग पाठक वर्ग तैयार कर सकता है। इस चुनौती को कवि को स्वयं झेलना है, स्वयं ही उसे अपने रास्तों का पुनराविष्कार करना है। इसके लिए कोई आलोचक या कोई अन्य न उसे दिशा–निर्देश दे सकता है, न किसी को देना चाहिए। बल्कि कवि को किसी आलोचक से कोई दिशा–निर्देश लेना भी नहीं चाहिए।
    पुराने आचार्य के शब्द उधार लेकर कहूँ, तो ‘‘कवि ही अपने काव्य–संसार का प्रजापति होता है।’’ नागरिक धर्म के पालन के लिएतो उसे कोई सलाय या उपदेश तक, दिया जा सकता है, पर कवि–कौशल के निर्वाह के लिए नहीं। हाँ, एक सुझाव दिया जा सकता है कि वह अनुकरण से और अपने को दुहराने से बचे। इस समय भारत की राजनीतिक–सामाजिक– आर्थिक स्थितियाँ बहुत जटिल हो रही हैं, अत: युवा कवि का कर्त्तव्य भी निश्चय ही कठिनतर होगा।
    अशोक वाजपेयी : सबसे पहले तो यह कि किसी भी कविता के सामने सबसे बड़ी चुनौती तो यही होती है कि वह कविता बनी रहे : उसके कविता न बने रहने के अनेक प्रलोभन आज हैं–उदाहरण के लिए गद्य, अलोकप्रियता, अखबारीपन आदि। ये प्रलोभन नए नहीं हैं, लेकिन उनका दबाव और प्रभाव बढ़ते जाते हैं। कविता उन्हीं को लिखना चाहिए, जिनका उसके बिना काम नहीं चलता और जिन्हें लगता है कि उनकी मानवीयता सबसे अधिक कविता में ही चरितार्थ होती है।
    स्थिति यह है कि कविता का भूगोल सामाजिक सचाई के नाम पर दरअसल सिकुड़ता गया है : इन दिनों उसमें प्रेम, निजता, प्रकृति, कोमलता, लालित्य, सौंदर्य, पुरखों, कृतज्ञता, मृत्यु और नश्वरता आदि के लिए बहुत कम जगह है। अपने समय, समाज, आत्म आदि को संबोधित करने के लिए ये अभाव और अनुपस्थितियाँ बाधा हैं। दूसरी चुनौती यह है कि कविता का भूगोल विस्तृत हो और वह निजता और सामाजिकता के नकली द्वैत से मुक्त हो।
    आज की अधिकांश कविता में जीवन की थोड़ी–बहुत धड़कन भले सुनाई दे, उसमें व्यापक अंतर्ध्वनियाँ नहीं हैं। आज की कविता को पढ़कर अक्सर पहले की कोई कविता या कविताएँ याद नहीं आतीं। अधिकांश कविताएँ आज ही लिखी जा रही कविताओं की प्रतिध्वनियाँ लगती हैं। समकालीनता तभी सघन–समृद्ध लगती है, जब उसमें परंपरा अंतर्ध्वनित हो।
    एक बड़ी चुनौती अभिधा की तानाशाही से मुक्त हो सकने की है। दशकों पहले कथन की उलझनों से मुक्ति के लिए हममें से कुछ ने सपाटबयानी का समर्थन किया था। वह सपाटबयानी अब अपनी सारी संभावनाएँ खो चुकी है और कविता को दयनीय और दरिद्र एक साथ बना रही है। अब उसके अतिक्रमण का क्षण आ गया है।
    हिंदी कविता में इस समय युवा कविता तो है पर अवाँ गार्द नहीं है। कुल मिलाकर कविता उसी शिल्प में लिखी जा रही है, जो स्वयं युवाओं ने नहीं उनके पूर्ववर्तियों ने अपने हिसाब से अपने काम के लिए गढ़ा था। शिल्प के स्तर पर कोई नवाचार नजर नहीं आता और पिछले रूढ़ हो गए शिल्प को तोड़–फोड़ कर नया शिल्प गढ़ने–पाने की कोई चेष्टा नहीं दिखाई देती। इसका एक आशय यह भी है कि अगर अंतर्वस्तु नई हो तो वह नया शिल्प भी माँगेगी। अगर नया शिल्प नहीं है तो नई अंतर्वस्तु भी नहीं होगी।
    हमारी कविता की शब्द–संपदा इस दौर में बहुत कम और क्षीण है। अगर कविता का एक जरूरी काम भाषा को सजीव रखना है तो उसमें हमारी घर की कविता का अवदान कुल मिलाकर स्वल्प ही है। बहुत कम शब्दों से कविता आज लिखी जा रही है, जिसके कारण उसमें न तो ताजगी है और न ही प्रत्याशित से अलग जाकर कुछ खोजने–रचने का जोखिम और सुख। भाषाई शिथिलता या वागर्थ की अल्पता इस बात का प्रमाण है कि कविता में साहस, कल्पनाशीलता और विकल्प की खोज का अभाव है। इस अभाव को दूर कर सकना एक और चुनौती है।
    ये चुनौतियाँ सिर्फ युवाओं के सामने नहीं हैं, उन सबके सामने हैं, जो कविता में भाषा को वहाँ ले जाने का जोखिम उठाना चाहते हैं, जहाँ वह पहले न गई हो।
    लीलाधर जगूड़ी : आज के कवियों के सामने अलग तरह की चुनौतियाँ हैं और कविता के सामने अलग तरह की चुनौतियाँ हैं। पहली चीज तो कवि होने की जो कठिनाइयाँ हैं, वो कवियों में आजकल झलकती नहीं हैं। ‘कोई भी कवि हो जाए, सहज संभाव्य है’ वाली स्थिति मुझे नजर आती है। उसकी वजह शायद यह है कि जो ‘फ्रीवर्स’ में यानी गद्यरूप में कविता लिखने की जो आजादी मिली है, उससे लोगों ने यह समझ लिया है कि अगर पंक्ति टेढ़ी–मेढ़ी हो तो वह कविता है और अगर सीधी–सीधी रूप में हो तो वह गद्य है। जबकि ऐसा नहीं है।
    कविता का गद्य आज खतरे में पड़ गया है। कविता के गद्य को बचाने की एक बड़ी चुनौती है कवियों के सामनेय और कवि समझ नहीं रहे हैं। कवि सामान्य गद्य में और कविता के गद्य में अंतर नहीं कर रहे हैं, जबकि यह बहुत जरूरी है। कविता तो पहले भी गद्य में ही लिखी जाती थी और आज भी गद्य में ही लिखी जाती है। पहले चूँकि बीच में पद्य भी था, छंद जैसी लयकारी भी थी और और भी कई सारी चीजें थीं। तो सारी चीजों को हटाकर केवल गद्य की शरण में जानाµगद्यं शरणं गच्छामि। उससे कविता कमजोर होती जा रही है।
    कविता के गद्य को अलग से सँवारा जाना चाहिए। गद्य तो रहेगा ही, गद्य का विरोध नहीं है। विरोध गद्य हो जाने का है। कविता भी गद्य हो गई है पूरी तरह सेय और अब पद्य तो हो नहीं सकती। तुकबंदी का नाम था, मात्राएँ गिनने और छंद का नाम था। छंद में भी केवल पद्य तुकबंदी को ही लोगों ने छंद माना, यह भी एक दुर्गुण आ गया था। आज की कविता के सामने जो सबसे बड़ा खतरा मुझे लगता है, वो है कि टेढ़ा–मेढ़ा लिखा जाना कविता नहीं है। कविता को आप सीधे–सीधे गद्य के पैराग्राफ की तरह भी लिखेंगे तो कविता तत्त्व उसमें होना चाहिए। ये दिखना चाहिए कि कविता बनी कि नहीं बनीय और कविता भी क्या बनी। केवल शब्दों का ढेर लगा देने से, अनुभव का भी ढेर लगा देने से कविता नहीं बनती। भाषा और अनुभव के बीच कविता को घटित करना, ये कवियों के लिए चुनौती है कि वे कविता को कविता की तरह घटित होने दें गद्य में भी। गद्य में भी कविता को कविता की तरह घटित होना है, जो कि आजकल नहीं दिखाई दे रहा है।
    मुझे नहीं मालूम कि बाकी लोगों को क्या लगता है, लेकिन मुझे ये लगता है कि जो एक विज्ञापन की भाषा है, एक विज्ञापन की शैली है, टेढ़ी–मेढ़ी लिखी हुई। गद्य टेढ़ा–मेढ़ा लिखा हुआ है और कविता भी टेढ़ी–मेढ़ी लिखी हुई है, तो क्या टेढ़ा–मेढ़ा लिखा हुआ कविता मान ली जाई, ऐसा संभव नहीं। इसलिए शिल्प मत देखिए, उसके भीतर का कथ्य देखिए। गल्प क्या है उसमें, और भाषा का नया प्रयोग क्या है ? भाषा के नए–नए प्रयोग खत्म होते जा रहे हैं। नए शब्द नहीं आ रहे हैं, नए शब्दों का अभाव हो गया है कविता में। वो आते हैं, जो अखबारी शब्द हैं।
    दूसरा खतरा जो कविता के लिए बहुत बड़ा है, कि जो अखबार का सत्य है, वही कविता का सत्य हो रहा है। कविता का सत्य और अखबार का सत्य भिन्न होना चाहिए। भले ही निष्कर्ष यह निकलता हो कि वह भी उस तरफ जा रहा है, लेकिन उसका भाषिक संसार, कविता का भाषिक विन्यास अखबार के भाषिक विन्यास से एकदम भिन्न होना चाहिए। कविता का मुहावरा भी भिन्न होना चाहिए। मुहावरे तो आ ही नहीं रहे कविता में। वही आ रहे हैं, जो समाचारपत्रों में, चुटकुलों में जो मुहावरे आते हैं। इससे मुझे लगता है कि कविता कुछ कमजोर होती जा रही हैय और कविता एक दिन खतरे में पड़ जाएगीय और कविता को बचाना बहुत जरूरी है, क्योंकि कविता हमारी अभिव्यक्ति की सबसे प्राचीनतम विधा है। वह इतनी प्राचीनतम होते हुए भी अत्यंत आधुनिक है। इसलिए उसे बचाना बहुत जरूरी है।
    नंदकिशोर आचार्य : साइबरनेटिक्स ने देश–काल के हमारे बोध और उस बोध को अभिव्यक्त करनेवाली भाषा को बुनियादी रूप से प्रभावित किया है। यह ठीक ही कहा गया है कि तकनीकी की ताकत, गतिशीलता और त्वरा के कारण हमें स्थिर वस्तुएँ भी गतिशील दिखाई देने लगती हैं। तकनीकी परिचित को अपरिचित और अपरिचित को तीव्रता से परिचित बना सकती है। दरअस्ल, वह केवल परिवेश को ही नहीं, परिवेश के हमारे बोध को भी बदल देती है। श्रव्य से पठ्य या मुद्रित संप्रेषण की स्थिति में आने के कारण कविता और कथासाहित्य में भी बुनियादी परिवर्तन घटित हुए है। लेकिन अब उत्तर–आधुनिक संचार–माध्यमों और साइबरनेटिक्स ने संप्रेषण परिस्थिति में नए परिवर्तन संभव किए हैं, जिनका प्रभाव आनेवाली सभी संप्रेषण–प्रक्रियाओं पर पड़ना लाजिमी है और इसलिए भाषिक संप्रेषण पर भी। कविता अनिवार्यत: एक ग्रहण–संप्रेषण प्रक्रिया भी है, अत: उसकी संरचना और स्वरूप पर भी भाषिक संप्रेषण की नई परिस्थिति का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
    नई परिस्थिति में कविता के सम्मुख एक चुनौती यह आती है कि वह मूर्त अनुभव और अनुचिंतन को एकमेक कर दे। ऐसा अनुचिंतन के अनुभूतीकरण से हो सकता है और अनुभव को ही अनुचिंतन की तरह ग्रहण करने से भी। कविता देखने का, अनुभव करने का एक ढंग हैµअनुभव से पहले अनुभव करने का ढंग। इसलिए अनुभव का नया ढंग शायद यह होगा कि कविता में अनुभव और अनुचिंतन में भेद किया जाना असंगत होता चला जाएगा अर्थात् या तो अनुचिंतन अनुभव के रूप के रेशे–रेशे में व्यंजित हो रहा होगा अथवा अनुचिंतन स्वयं ही अनुभूति की तीव्रता के कारण ऐंद्रिक अनुभव की तरह महसूस होने लगा।
    इस अनुमान की पुष्टि में यह तर्क भी दिया जा सकता है कि भविष्य में तकनीकी और विज्ञान के ही नहीं, चेतना के उत्तर–मानवीय आयाम भी खुल सकते हैं और उससे कविता की संरचना में कोई ऐसा परिवर्तन संभव है, जो विचार और संवेदन के अंतर को मिटा दे। मानवीय अनुभव को किसी एक वैचारिक निष्कर्ष तक ले जाने की प्रवृत्ति आज की मानवीय चेतना का एक गुण है, लेकिनय अब इस प्रक्रिया के अधूरेपन के ज्ञान के साथ–साथ यह भी स्पष्ट होता जा रहा है कि अनुभव को किसी वैचारिक चैखटे में रखकर देखना या उसे किसी एक वैचारिक निष्कर्ष तक ले जाने का प्रयास उसकी अनंत आयामिता को सीमित कर देना है। यह कविता की संभावना और ताकत को कम करना है। इस ताकत को तभी बढ़ाया जा सकता है, जब ज्ञान और संवेदना में फर्क न रहेµवह फर्क भी नहीं, जो ज्ञानात्मक संवेदन या संवेदनात्मक ज्ञान जैसे पदों के प्रयोग में झलकता रहता है।
    वाल्टर बेंजामिन ने लिखा है कि तकनीकी ने मानवीय संवेदन क्षेत्र को एक संश्लिष्ट प्रक्रिया में दीक्षित कर दिया है (Technology has subjected the human sensorium to a complex kind of training) और इस संश्लिष्टता का काव्य–भाषा और काव्य–संरचना में रूपायन आगामी कविता के सम्मुख एक बड़ी संभावनापूर्ण चुनौती है। आगामी कवि परिवेश और तकनीकी द्वारा कविता के सम्मुख प्रस्तुत चुनौती का सर्जनात्मक प्रत्युत्तर किस प्रकार रचते हैं, यह अभी नहीं कहा जा सकता–लेकिन आगामी कविता यदि इन चुनौतियों की पहचान का सम्यक् साक्ष्य भी देती है तो माना जा सकता है कि वह चेतना के नए रूपों के आविष्कार की प्रक्रिया में बराबर की हिस्सेदार होना चाहती है। चेतना के नए आयामों और रूपों का प्राकट्य ही जीवन की विकास–यात्रा का आगे बढ़ना है और इनका साक्षात्कार ही कविता का प्रयोजन और उसकी सार्थकता।
    राजेश जोशी : पिछले दिनों कवि मित्र मदन कश्यप ने बताया था कि विगत एक–दो वर्षों में चालीस से अधिक ऐसे कवियों के संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जो उन कवियों के पहले कविता–संग्रह हैं। इनमें तकरीबन दस संग्रह स्त्री कवियों के हैं और अनेक संग्रह उन कवियों के हैं, जो आदिवासी तथा भारतीय समाज के अन्य दमित और उपेक्षित समुदायों से आए हैं। यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है, जिसे रेखांकित किया जाना चाहिए और इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। संभवत: भक्तिकाल के बाद यह पहला मौका है, जब समाज के सबसे दमित और उपेक्षित समुदायों से कवि अपने अनुभवों और संघर्षों के साथ हिंदी कविता में आए हैं। यह एक स्तर पर फर्स्ट हैंड एक्सपीरियंस (स्वानुभव) की कविता है। यह एक ऐसा संकेत है, जो इक्कीसवीं सदी की कविता को देखने के लिए एक नई दृष्टि की दरकार रखता है। इससे हिंदी कविता का फलक और अधिक विस्तृत होता दिख रहा है। इससे न केवल नए अनुभवों और नए दृश्यों का प्रवेश कविता में होगा, बल्कि इससे कविता की भाषा बदलेगी। मध्यवर्गीय जड़ता और जकड़न टूटेगी और भाषा में नए शब्दों और मुहावरों का आगमन होगा।
    तकरीबन दो दशक पहले मराठी कविता में दलित आंदोलन ने जिस तरह मराठी कविता की भाषा और उसके पूरे सौंदर्यशास्त्र और आलोचना के उपकरणों को बदल दिया था, उम्मीद करना चाहिए कि इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता भी हिंदी कविता को जाँचने–परखने के आलोचना के उपकरणों को बदल देगी। इस कविता के नाक–नक्श अभी स्पष्ट होना बाकी है, अभी इसके लिए धैर्य के साथ हमें उस पर निगाह रखना होगी और अपने आग्र्रहों और दुराग्रहों से बाहर आकर इसे देखना होगा। इस कविता के साथ जो नई कवयित्रियाँ आई हैं, उन्होंने स्त्री विमर्श के चले आ रहे रूढ़ हो चुके ढाँचों को भी तोड़ा है। स्त्री कवियों द्वारा और दलित समुदायों से आ रहे कवियों द्वारा अब विमर्श की सीमा से बाहर आकर ज्यादा बड़े संघर्ष के साथ जुड़ने के संकेत उनकी कविता में लक्ष्य किए जा सकते हैं। यह एक शुभ संकेत है।
    उदय प्रकाश : सबसे पहले समकालीन कविता की मुख्य, केंद्रीय और चर्चित परिदृश्य में जो बात दिखाई देती है, वह है पिछले लगभग तीन दशकों में हुए समूचे यथार्थ के साथ उसकी निरंतर, परंपरागत संगति से उसकी चिंताजनक विच्छिन्नता। यह ‘डिसकनेक्ट’ किन वजहों से हुआ, इसकी खोजबीन अभी बाकी है, हालाँकि अब यह एक आसन्न अनिवार्यता है। कहीं यह तो नहीं कि समूचे यथार्थ का इन पिछले दशकों में जो आंतरिक और प्रत्यक्ष बनावट में जो बदलाव हुआ, उसे पकड़ पाने में जिस दृष्टिकोण और भाषिक संरचना में बुनियादी बदलाव की जरूरत थी, उसकी तैयारी हो न सकी। या फिर कहीं हिंदी कविता की पिछले कुछ वर्षों की पारंपरिकता ही उसकी असफलता का मुख्य कारण बन गई। यह सच है कि हम अचानक हिंदी कविता की उदास और चिंतित कर देने वाली व्यापक असफलता के सामने खड़े हैं। हिंदी कविताएँ अपने अपेक्षित स्थान से ऐतिहासिक तौर पर विमुख हैं। वे अपनी ही स्थानिकता में फँसी, उसी में उपभुक्त और संतुष्ट हो रही हैं। क्या यह चकित–चिंतित करने वाला तथ्य नहीं है कि इस समय चंद्रकांत देवताले, नरेश सक्सेना, असद जैदी, विष्णु खरे जैसे पिछले कुछ वर्षों के परिधि में रहे कवि आज अचानक अधिक प्रासंगिक और निकट आ गए हैं। कहीं इसकी पृष्ठभूमि में यह वजह तो नहीं है कि पिछले जीवन–अनुभव, पिछली दिनचर्याएँ समूची राजनीति और पारंपरिक सोच के साथ बदल चुकी हैं और कविता कहीं अपने ही गतिरोध में उलझ कर ठिठकी रह गई है। न उसमें नए वैकल्पिक प्रतिरोध की आंतरिक चेतना है, न अपनी विभक्त जातीयता की पहचान और न वह भाषिक बुनावट जो सामाजिक–व्यवहृत भाषा के/से निहायत पिछड़ चुकी है और उसकी भरपाई या मरम्मत फारसी और जनपदीय शब्दों के इस्तेमाल से नहीं की जा सकती। मुझे लगता है, इसे स्वीकार करना चाहिए और इसे रचनात्मक ही नहीं, अकादमिक तरीके से भी संबोधित किया जाना चाहिए कि 90 के बाद के दो दशकों में नई वैश्विक आर्थिक–तकनीकी और सामाजिक संरचनाओं में होने वाले प्रभावकारी बदलावों की मौजूदा माँग क्या हो सकती है और इन बदलावों ने हमारे रोजमर्रा के अनुभवों–दबावों को किस हद तक आंतरिक और बाहरी तौर पर प्रभावित किया है। वंचित और उत्पीड़ित वर्गों और अस्मिताओं के प्रति राजनीतिक (जिसे विचारधारात्मक कहने का प्रचलन वर्षों से है) प्रतिबद्धताएँ अब न सिर्फ संदिग्ध और प्रश्नांकित हैं बल्कि उन्हें उन वर्गों और अस्मिताओं ने ही ठुकरा दिया है।
    ऐसे संकट के समय में कविता हमेशा अपनी नई निजता और खास वैयक्तिक बनावटों की खोज में चिंता और गंभीरता से उलझा करती है। वह अपने ही प्रचलन से कई–कई स्तरों पर मुठभेड़ करती हुई अपनी नई भूमिका और नया ‘फॉर्म’ तलाशती है। अगर धैर्य और ईमानदार फिक्र कहीं होते तो यह संभव हो भी जाता, लेकिन बदले हुए बहुत तीव्र सतही या प्रत्यक्ष सामाजिक बदलावों ने एक आसान–सा ‘एक्जिट–गेट’ या नुस्खा प्रदान कर दिया। जो ‘एक्जिट’ बना और जिसने कविता को एक बार फिर उसकी ‘तिर्यक’ (ट्रेजेक्टरी) से विचलित किया, वह वही थाय जिससे हम सब परिचित हैं। ‘स्त्री विमर्श’ के बहाने यौनिकता के छद्म रास्तों पर चली जाने वाली सामंती भाषा और विक्टोरियन मूल्यों की पारिवारिक बेड़ियों में जीती हुई नितांत अर्बन सवर्ण हिंदू नारी। यह कविता की आंतरिक चुनौतियों से गंभीरता से निपटने की जगह 1967 और 1980 के सरल ‘एक्जिट’ का ही नया उल्था साबित हुआ। (कृपया ‘दलित’ और ‘सेक्युलर’ वगैरह के विमर्शों को फिलहाल स्थगित ही यहाँ पर रखें।)
    दरअसल, संक्षेप में यह कहा जाएगा कि आज की कविता नए समय में अपना कोई भिन्न और विशिष्ट नया मुहावरा नहीं बना पा रही है। हर कविता का अपना एक अलग व्यक्तित्व होता आया है। उसी तरह जैसे हर कवि का भी अलग व्यक्तित्व हुआ करता है। (हालाँकि यह बात भी सैकड़ों बार दुहराई जा चुकी है।) अभी तक जो भी कविता लिखी गई या लिखी जा रही है, वह किसी सामूहिकता की बनावट–विन्यास और कथ्य की कविता है। अभी अलग और नई कविता के उभरने का अवसर अपेक्षित ही है। उसका नया और स्पष्ट समकालीन चेहरा अभी तक नहीं बन पाया है। बिलकुल युवा हिंदी पीढ़ियाँ जब जींस पहन रही हैं या देश के भीतरी अँधेरे इलाकों में आंदोलन कर रही हैं, वहाँ अभी तक मेट्रो या कैपिटल की स्थानिक कविताएँ या तो राजनीतिक एजेंडों और नई एलीट विचारधाराओं से ग्रस्त हैं। डर है कि कहीं अकविता का शुरुआती दौर न आ जाए या फिर उसकी कुछ दीर्घकालिक वापसी न हो जाए। पिछले दिनों पवन करण और अनामिका की ‘स्तन’ पर लिखी कविता पर जो बहस हुई, वह बहस पूरी तरह जेंडर डिसकोर्स पर थीं। कात्यायनी, शालिनी माथुर ने भी इस बहस में महत्त्वपूर्ण हिस्सा लिया था। ये कविता के नए यौनिक विषय तो लगते हैं, लेकिन पश्चिम की कविताओं में ये खासी ‘पॉप्युलर स्फियर’ की कविताएँ रही हैं, यहाँ तक कि उन्हें ‘कविता’ नहीं, बल्कि ‘गानों’ (सांग्स) की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। ‘लाफिंग या क्राइंग वेजाइना’ जैसे विषयों की तरह, जो निहायत ‘पॉप
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