इस बात में कोई दो राय नहीं कि फणीश्वरनाथ रेणु हिंदी साहित्य के संत लेखक थे। लेकिन जब यही बात निर्मल वर्मा जैसे लेखक की क़लम कहती है तो बात में वजन आ जाता है। निर्मल वर्मा लिखते हैं– “रेणु जी पहले कथाकार थे जिन्होंने भारतीय उपन्यास की जातीय सम्भावनाओं की तलाश की थी।” यह लेख निर्मल वर्मा ने उस वक़्त लिखा था जब रेणु के निधन पर सारा हिंदी साहित्य परिवार सोगवार था। आज ‘रेणु’ जी का जन्मदिन है। इस अवसर पर प्रस्तुत है उस लेख का एक अंश- त्रिपुरारि
===========================================
मैं उनसे केवल दो-तीन बार मिला था, पर आज भी मैं आँखें मूँदकर उनका चेहरा हूबहू याद कर सकता हूँ – उनके लम्बे झूलते बाल, एक संक्षिप्त-सी मुस्कुराहट, जो सहज और अभिजात सौंदर्य में भीगी रहती थी । कुछ लोगों में एक राजसी, ‘अरिस्टोक्रेटिक’ गरिमा होती है, जिसका उँचे या नीचे वर्ग से सम्बंध नहीं होता– वह सीधे संस्कारों से सम्बंध रखती है । रेणु जी में यह अभिजात भाव एक ‘ग्रेस’ की तरह व्याप्त रहता था । किंतु जिस चीज़ ने सबसे अधिक मुझे अपनी तरफ खींचा वह उनका उच्छल हल्कापन था । वह छोटे छोटे वाक्यों में संन्यासियों की तरह बोलते थे और फिर शरमा कर हँसने लगते थे । उनका ‘हल्कापन’ कुछ वैसा ही था जिसके बारे में चेखव ने एक बार कहा था, “कुछ लोग जीवन में बहुत भोगते-सहते हैं– ऐसे आदमी ऊपर से बहुत हल्के और हँसमुख दिखाई देते हैं । वे अपनी पीड़ा दूसरों पर नहीं थोपते, क्योंकि उनकी शालीनता उन्हें अपनी पीड़ा का प्रदर्शन करने से रोकती है।”
रेणु जी ऐसे ही ‘शालीन’ व्यक्ति थे। पता नहीं ज़मीन की कौन सी गहराई से उनका हल्कापन ऊपर आता था । यातना की कितनी परतों को फोड़कर उनकी मुस्कुराहट में बिखर जाता था– यह जानने का मौक़ा कभी नहीं मिल सका।
अब वह नहीं हैं, मेरे लिए यह अब भी एक अख़बारी अफ़वाह है, जिस पर मैं विश्वास नहीं कर पाता। उनकी मृत्यु अभी तक मेरे लिए सत्य नहीं बनी है। मुझे हैरानी होती है कि उनकी बार-बार की बीमारी की ख़बर मुझे इस भयानक ख़बर के लिए तैयार नहीं कर पायी। हम कुछ मित्रों की बीमारी के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं जैसे उनकी कुछ जानी-पहचानी आदतों के– मृत्यु से उसका संबंध बिठाना असम्भव और असहनीय जान पड़ता है । मुझे अपना दुख भी असम्भव जान पड़ता है। जिस व्यक्ति को केवल दो-तीन बार देखा था उसके न रहने से मुझे अपनी लिखने की दुनिया इतनी सूनी और सुनसान जान पड़ने लगेगी, मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था।
अब सोचता हूँ तो समझ में आता है, हमारी चीज़ों को चाहे बहुत कम लोग पढ़ें किंतु हम लिखते बहुत कम लोगों के लिए हैं। मैं जिन लोगों को ध्यान में रखकर लिखता था उनमें रेणु सबसे प्रमुख थे। मैं हमेशा सोचता था, पता नहीं मेरी यह कहानी, यह लेख, यह उपन्यास पढ़कर वह क्या सोचेंगे। यह ख़्याल ही मुझे कुछ छद्म और छिछला, कुछ दिखावटी लिखने से बचा लेता था। कुछ लोग हमेशा हम पर सेंसर का काम करते हैं– सत्ता का सेंसर नहीं, जिसमें भय और धमकी छिपी रहती है– किंतु एक ऐसा सेंसर, जो हमारी आत्मा और ‘कांशस’, हमारे रचनाकर्म की नैतिकता के साथ जुड़ा होता है। रेणु जी का होना, उनकी उपस्थिति ही एक अंकुश और वरदान थी। जिस तरह कुछ साधु-संतों के पास बैठ कर ही असीम कृतज्ञता का अहसास होता है, हम अपने भीतर घुल जाते हैं, स्वच्छ हो जाते हैं, रेणु जी की मूक उपस्थिति हिंदी साहित्य में कुछ ऐसी पवित्रता का बोध कराती थी।
वह समकालीन हिंदी साहित्य के संत लेखक थे।
यहाँ मैं संत शब्द का उसके सबसे मौलिक और प्राथमिक अर्थों में इस्तेमाल कर रहा हूँ– एक ऐसा व्यक्ति जो दुनिया की किसी चीज़ को त्याज्य और घृणास्पद नहीं मानता– हर जीवित तत्व में पवित्रता और सौंदर्य और चमत्कार खोज लेता है– इसलिए नहीं कि वह इस धरती पर उगने वाली कुरूपता, अन्याय, अँधेरे और आँसूओं को नहीं देखता, बल्कि इन सबको समेटने वाली अबाध प्राणवत्ता को पहचानता है; दलदल को कमल से अलग नहीं करता, दोनों के बीच रहस्यमय और अनिवार्य रिश्ते को पहचानता है। सौंदर्य का असली मतलब मनोहर चीज़ों का रसास्वादन नहीं, बल्कि गहरे अर्थ में चीज़ों के पारस्परिक सार्वभौमिक, दैवी रिश्ते को पहचानना होता है– इसीलिए उसमें एक असीम साहस और विवेक तथा विनम्रता छिपी रहती है। इस अर्थ में हर संत व्यक्ति अपनी अंतर्दृष्टि में कवि और हर कवि अपने सृजनात्मक कर्म में संत होता है। रेणु जी का समूचा लेखन इस रिश्ते की पहचान है, इस पहचान की गवाही है और यह गवाही वह सिर्फ़ अपने लेखन में ही नहीं, ज़िंदगी के नैतिक फ़ैसलों, न्याय और अन्याय, सत्ता और स्वतंत्रता की संघर्ष-भूमि में भी देते हैं।
रेणु जी ने परम्परागत यथार्थवादी उपन्यास के ढाँचे को एकाएक ढहा दिया था। मेरे विचार में यह रेणु की अविस्मरणीय देन और उपलब्धि है। मैला आँचल और परती परिकथा महज़ उत्कृष्ट आँचलिक उपन्यास नहीं हैं, वे भारतीय साहित्य में पहले उपन्यास हैं जिन्होंने अपने जमित ढंग से, झिझकते हुए भारतीय उपन्यास को एक नयी दिशा दिखाई थी, जो यथार्थवादी उपन्यास के ढाँचे से बिल्कुल भिन्न थी; उन्होंने उपन्यास की नैरेटिव, कथ्यात्मक परम्परा को तोड़ा था – उसे अलग अलग एपिसोड में बाँटा था, जिन्हें जोड़ने वाला धागा कथा का सूत्र नहीं, परिवेश का एक ऐसा लैंडस्केप था जो अपनी आत्यंतिक लय में उपन्यास को रूप और फॉर्म देता है। रेणु जी के यहाँ समय में बँधी घटनाएँ नहीं, ऊबड़खाबड़ ज़िंदगियों की यह लय, यह स्पंदन उपन्यास के हिस्सों को एक दूसरे से जोड़ता है। रेणु जी पहले कथाकार थे जिन्होंने भारतीय उपन्यास की जातीय सम्भावनाओं की तलाश की थी ; शायद सजग रूप से कहीं; शिल्प और सिद्धांत के स्तर पर तो अवश्य ही नहीं; बल्कि एक ऐसे रचनात्मक स्तर पर जहाँ ज़िंदगी का कच्चा माल स्वंय कलाकार के हाथों अपने प्राण, जो फॉर्म का दूसरा काम है, खींच लेता है, ताकि वह एक नये खुले, मुक्त ढाँचे में साँस ले सके। फ़ॉर्म की असली उपलब्धि इसी प्राणवत्ता में निहित है– बाक़ी सब प्रश्न तकनीकी और और शिल्प के हैं। आलोचक की बहस का विषय का ज़रूर हों, कथाकार का उनसे कोई नाता नहीं ।
मैं रेणु जी की मृत्यु को असामयिक नहीं कहूँगा। हर मृत्यु एक तरह से असामयिक होती है, क्योंकि ज़िंदगी का कारोबार किसी बिंदु पर पूरा नहीं होता, किंतु ख़ास इस दौर में– इमरजेंसी की यातना के बाद उनका अचानक हमारे बीच से चला जाना बहुत क्रूर और असहनीय जान पड़ता है। यह उनकी विजय का क्षण था और वह नहीं हैं।
