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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    युवा शायर #7 अज़ीज़ नबील की ग़ज़लें

    administrator_06848bBy administrator_06848bApril 19, 20171 Comment4 Mins Read

    युवा शायर सीरीज में आज पेश है अज़ीज़ नबील की ग़ज़लें – त्रिपुरारि

    ग़ज़ल-1

    ख़ामुशी टूटेगी, आवाज़ का पत्थर भी तो हो
    जिस क़दर शोर है अन्दर, कभी बाहर भी तो हो

    मुस्कुराना किसे अच्छा नहीं लगता या-रब
    मुस्कुराने का कोई लम्हा मयस्सर भी तो हो

    बुझ चुके रास्ते, सन्नाटा हुआ, रात ढली
    लौट कर हम भी चले जाएं मगर घर भी तो हो

    बुज़दिलों से मैं कोई मार्का जीतूँ भी तो क्या
    कोई लश्कर मेरी हिम्मत के बराबर भी तो हो

    रात आएगी, नए ख़्वाब भी उतरेंगे, मगर
    नींद और आँख का रिश्ता कभी बेहतर भी तो हो

    छोड़कर ख़्वाब का सैयारा कहाँ जाऊं ‘नबील’
    कुर्रे.ए.शब पे कोई जागता मंजर भी तो हो

    ग़ज़ल-2

    मेरी वहशत को फ़ुर्सत अब नहीं है
    तुम्हें पाने की चाहत अब नहीं है

    मेरी कश्ती में बैठे हो तो सुन लो
    उतरने की इजाज़त अब नहीं है

    चलो तन्हाइयो! अब तुम भी जाओ
    तुम्हारी भी ज़रूरत अब नहीं है

    नए दुख मिल रहे हैं अब भी लेकिन
    वो पहली सी अज़ीयत अब नहीं है

    समझ में आ रही है मुझको दुनिया
    किसी से भी शिकायत अब नहीं है

    सिरहाने ख़्वाब रख्खे हैं बहुत से
    अकेले-पन की आदत अब नहीं है

    ‘नबील’ आख़िर तुम्हें कैसे बताऊं
    मुझे तुमसे मुहब्बत अब नहीं है

    ग़ज़ल-3

    ये किस मुक़ाम पे लाया गया ख़ुदाया मुझे
    कि आज रौंद के गुज़रा है मेरा साया मुझे

    मैं जैसे वक़्त के हाथों में एक ख़ज़ाना था
    किसी ने खो दिया मुझको किसी ने पाया मुझे

    ना जाने कौन हूँ, किस लम्हा-ए-तलब में हूँ
    नबील चैन से जीना कभी ना आया मुझे

    इसी ज़मीं ने सितारा किया है मेरा वजूद
    समझ रहे हैं ज़मीं वाले क्यों पराया मुझे

    मैं एक लम्हा था और नींद के हिसार में था
    फिर एक रोज़ किसी ख़्वाब ने जगाया मुझे

    एक आरज़ू के तआकुब में यूं हुआ है ‘नबील’
    हवा ने रेत की पलकों पे ला बिठाया मुझे

    ग़ज़ल-4  

    कुछ देर तो दुनिया मिरे पहलू में खड़ी थी
    फिर तीर बनी और कलेजे में गड़ी थी

    आँखों की फसीलों से लहू फूट रहा था
    ख़्वाबों के जज़ीरे में कोई लाश पड़ी थी

    सब रंग निकल आए थे तस्वीर से बाहर
    तस्वीर वही जो मिरे चेहरे पे जड़ी थी

    मैं चाँद हथेली पे लिए झूम रहा था
    और टूटते तारों की हर एक सिम्त झड़ी थी

    अल्फ़ाज़ किसी साये में दम लेने लगे थे
    आवाज़ के सहरा में अभी धूप कड़ी थी

    फिर मैंने उसे प्यार किया, दिल में उतारा
    वो शक्ल जो कमरे में ज़माने से पड़ी थी

    हर शख़्स के हाथों में था ख़ुद उस का गरीबाँ
    एक आग थी साँसों में, अज़ीयत की घड़ी थी

    ग़ज़ल-5  

    हयातो-कायनात पर किताब लिख रहे थे हम
    जहाँ-जहाँ सवाब था अज़ाब लिख रहे थे हम

    हमारी तिश्नगी का ग़म रक़म था मौज मौज पर
    समुंद्रों के जिस्म पर सराब लिख रहे थे हम

    सवाल था कि जुस्तजू अज़ीम है कि आरज़ू
    सो यूं हुआ कि उम्र-भर जवाब लिख रहे थे हम

    सुलगते दश्त, रेत और बबूल थे हर एक सू
    नगर-नगर, गली गली गुलाब लिख रहे थे हम

    ज़मीन रुक के चल पड़ी, चराग़ बुझ के जल गए
    कि जब अधूरे ख़्वाबों का हिसाब लिख रहे थे हम

    मुझे बताना जिंदगी वो कौन सी घड़ी थी जब
    ख़ुद अपने अपने वास्ते अज़ाब लिख रहे थे हम

    चमक उठा हर एक पल, महक उठे क़लम दवात
    किसी के नाम दिल का इंतिसाब लिख रहे थे हम

    ग़ज़ल-6  

    हर एक मंज़र भिगोना चाहती है
    उदासी ख़ूब रोना चाहती है

    मुझे एक पल की यकसूई अता हो
    गज़ल तख़लीक़ होना चाहती है

    इन आँखों की कहानी है बस इतनी
    नज़र आवाज़ होना चाहती है

    तुम्हारे हुस्न के हैरत-कदे में
    मेरी बीनाई खोना चाहती है

    किसी की याद की ख़ामोश बारिश
    मिरे सब ज़ख़्म धोना चाहती है

    वही मासूम सी बचपन की हसरत
    बहलने को खिलौना चाहती है

    उदासी थक चुकी है रोते-रोते
    ज़रा सी देर सोना चाहती है

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