Close Menu
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
    Subscribe
    • कविताएं
    • संपर्क
    • Vote for 2017 Best Seller
    • Best Seller 2018
    • सहयोग/ समर्थन
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    75 साल का ‘अनटचेबल्स’

    By October 27, 2010290 Comments6 Mins Read
    ‘अनटचेबल्स’ के प्रकाशन के ७५ साल हो गए. मुल्कराज आनंद के पहले उपन्यास ‘अनटचेबल्स’ को आधुनिक भारतीय अंग्रेजी के भी आरंभिक उपन्यासों में शुमार किया जाता है.  दलित साहित्य की पहचान और प्रतिष्ठा के इस दौर में यह याद किया जाना चाहिए कि भारतीय अंग्रेजी के इस कद्दावर लेखक का पहले उपन्यास की कथा का आधार एक अछूत के जीवन का एक दिन था. आज भारतीय अंग्रेजी लेखन के बारे में सामान्य तौर पर यह कहा जाता है कि उसका अधिकांश भारतीय समाज के वास्तविक यथार्थ से कटा हुआ है. ऐसे में इस पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि भारतीय अंग्रेजी साहित्य का आरम्भ ऐसे उपन्यास से हुआ था जिसकी कथा के केंद्र में दलितों का जीवन था. समाज में सबसे निम्न समझे जाने वाले तबके की दुरवस्था का वर्णन था.
    मुल्कराज आनंद ने यह उपन्यास कैसे लिखा इसकी कथा भी बड़ी दिलचस्प है. कहते हैं कि जब वे इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ने के बाद लन्दन विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य में शोध कर रहे थे तब उनकी मित्रता इ. एम. फोर्स्टर, वर्जीनिया वुल्फ जैसे अंग्रेजी के धाकड़ लेखकों से हुई. कहते हैं कि वहीँ ब्लूम्सबरी ग्रुप के लेखकों के सुझाव पर उन्होंने ‘अनटचेबल्स’ लिखने के बारे में तय किया. कहते हैं कि उन दिनों वे जो भी लिखते थे फोर्स्टर को सुझाव के लिए दिखाते थे. एक दिन फोर्स्टर ने उनसे कहा कि कुछ ऐसा लिखो जिसमें भारतीय समाज का यथार्थ हो, उसके जीवन की विडंबनाओं का चित्रण हो. तब जाकर मौलिक लेखक कहलाओगे. १९२९ में पीएचडी करने के बाद वे भारत आये और यहाँ महात्मा गाँधी के विचारों से उनको अवगत होने का मौका मिला. महात्मा गाँधी के अछूतोद्धार के कार्यक्रम को जानने का मौका मिला. उनको अपने बचपन की एक घटना याद आई जब एक अछूत समझे जाने वाले लड़के ने उनका स्पर्श किया था और उसकी पिटाई हुई थी. भारत वापस लौटने के बाद उन्होंने महसूस किया कि जाति-व्यवस्था अभी भी समाज में उसी तरह है, उसकी जकडबंदी समाज में कम नहीं हुई है. तब उन्होंने यह उपन्यास लिखना शुरू किया.
    लिख तो लिया लेकिन छपवाना इतना आसान नहीं था. कहते हैं १९ प्रकाशकों ने बारी-बारी से इस उपन्यास को छापने से मन कर दिया था. वह भी उस लेखक मुल्कराज आनंद के उपन्यास को जिसको लेखक के रूप में पहचान मिलने लगी थी. लन्दन में रहते हुए वे टी. एस. इलियट की पत्रिका ‘क्रिटेरिया’ में पुस्तक समीक्षाएं लिखते थे. कुछ कहानियाँ-कुछ कवितायेँ लिख चुके थे. लेकिन ‘अनटचेबल्स’ छपवाना मुश्किल पड़ रहा था. आखिरकार इ. एम. फोर्स्टर की भूमिका के साथ उसे लन्दन का एक प्रकाशक छापने को तैयार हो गया. प्रसंगवश, यह बता दिया जाये कि फोर्स्टर वह लेखक थे जिनका आरंभिक भारतीय अंग्रेजी साहित्य के विकास में बड़ा योगदान रहा है. बाद में उन्होंने अहमद अली के उपन्यास ‘ट्विलाइट इन डेल्ही’ के प्रकाशन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया. फोर्स्टर ने ‘अनटचेबल्स’ की भूमिका में लिखा था कि इस तरह का उपन्यास केवल एक भारतीय ही लिख सकता था. वह भारतीय जिसने दूर से उस भारत को देखा हो. उन्होंने लिखा कि कोई यूरोपीय इस कृति को इसलिए नहीं लिख सकता था क्योंकि उसे भारतीय समाज के इस यथार्थ का वैसा ज्ञान नहीं हो सकता तथा कोई दलित इसकी रचना इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि वह आत्मदया का शिकार हो जाता.
    विषम सामाजिक यथार्थ की यथार्थ-कथा होने के कारण उनके इस पहले उपन्यास ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया. लेखक के रूप में उनकी पहचान को पुख्ता किया. वास्तव में, ‘अनटचेबल्स’ अछूतों के जीवन की कोई महाकाव्यात्मक कथा नहीं कहता है, न ही विस्तृत रूप में उनके जीवन का इसमें अंकन किया गया है. इसमें तो बाखा नामक एक भंगी या मेहतर के जीवन के एक दिन की कथा के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि वास्तव में, समाज के सबसे अंतिम पायदान के खड़े इन लोगों का जीवन कितना सख्त होता है, किस तरह कदम-कदम पर वह उनके लिए अपमानों की दास्तान बनाता चलता है. उनको छोटी समझी जाने वाली जाती में जन्म लेने की सजा भुगतनी पड़ती है. इसी बात को लेखक ने उसके जीवन के एक दिन के माध्यम से दिखलाने का प्रयास किया है. मैला साफ़ करने के अपने नीच समझे जाने वाले काम के कारण उसके प्रति समाज के तथाकथित सभ्य समझे जाने वाले लोग जानवरों जैसा बर्ताव करते हैं. अगर किसी से गलती से वह ‘छू’ जाये तो उसे पाप का भागी मन जाता. भोजन-पानी जैसे जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी उच्च-जाति पर निर्भर रहना पड़ता.
    लेकिन इस छुआछूत के अपने विरोधाभास भी थे. इसे उपन्यास में उन्होंने पंडित कालीनाथ की कथा के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है. पंडित कालीनाथ अछूत-कन्या सोहिनी को अकेले में अपने करीब लाने का प्रयास करता है, लेकिन जब वह इसका विरोध करती है तो वह यह कहने लगता है कि सोहिनी ने उसे अपवित्र कर दिया-उसको छू दिया. सोहिनी लोगों को सच बताने का प्रयास करती है लेकिन लेकिन उसकी बात कोई नहीं सुनता. उपन्यास में उनकी दारुण दशा का केवल वर्णन ही नहीं है उनके लिए आशा का एक दीप भी झिलमिलाता दिखाई देता है.
    बाखा कहानी वाले दिन गाँधी की सभा में जाता है जहाँ वह कुछ लोगों को यह बातचीत करते सुनता है. वे आधुनिक कमोड के बारे में बातें कर रहे होते हैं जिसमें मनुष्य का मल फ्लश कर दिया जाता है. उसे लगता है कि कमोड आयेगा तो उसके जैसों को अपने अमानवीय जीवनावस्था से मुक्ति मिल जायेगी. उसे उस दिन यह अहसास होता है कि उसके समाज की मुक्ति धर्म-परिवर्तन या वहां से भागने में नहीं है. वह मुक्ति कमोड की आधुनिक तकनीक में है. परंपरा के विषम बंधनों से मुक्ति आधुनिकता को अपनाने में है- कहीं न कहीं उपन्यास इस तरह का सन्देश भी देता दिखाई देता है.
    कहते हैं मेहतर के जीवन के कुछ पहलुओं का चित्रण इस उपन्यास में इतनी गहराई से किया गया है कि काफी दिनों तक इसने भारत के सामाजिक भेदभाव की एक छवि पश्चिम में रूढ़ कर दी. मजेदार बात यह है कि बरसों बाद जब हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता मार्लन ब्रांडों ने अपनी जीवनी लिखी ‘द सांग्स मई मदर टौट’ तो उसमें अपनी भारत यात्रा के बारे में भी लिखा है. उस यात्रा-वर्णन में उन्होंने बिहार यात्रा के वर्णन के क्रम में वहां के समाज में प्रचलित छुआछूत का भी वर्णन किया है. उसने दावा तो यह किया कि बिहार की अवस्था का उसने आँखों देखा वर्णन किया है मगर वह वर्णन आश्चर्यजनक रूप से इसी उपन्यास के वर्णनों से मिलता-जुलता है.
    बहरहाल, आज जिस तरह से भारतीय अंग्रेजी-लेखक अपने लेखन से अधिक उसको लेकर मिलने वाले एडवांस को लेकर चर्चा में रहते हैं वैसे में यह समझ पाना मुश्किल प्रतीत होता है कि मुल्कराज आनंद जैसे भारतीय अंग्रेजी के आरंभिक लेखक की पहचान अपने विषय, अपने लेखन के लिए थी. वे धन कमाने या विदेशों में लोकप्रिय होने के लिए नहीं लिख रहे थे. उनका उद्देश्य औपनिवेशिक भारत की विडंबनाओं को सामने लाना होता था. यह बताना होता है कि अंग्रेजी शासन द्वारा भारत को आधुनिक बनाने के तमाम दावों के बावजूद उसमें किस हद तक भेदभाव व्याप्त था. किस कदर शोषण था.
    ‘अनटचेबल्स’ उपन्यास इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कहा जा सकता है.
      

    Related Posts

    Драгон Мани: Мифический Зверь и Реальные Выигрыши

    June 20, 2026

    Tropicana Online casino Nj Applications on the internet Gamble

    June 19, 2026

    Regulamentação do jogo como a lei pode impactar apostadores e operadores

    June 19, 2026
    View 290 Comments
    Leave A Reply Cancel Reply

    Recent Posts

    • Драгон Мани: Мифический Зверь и Реальные Выигрыши
    • Tropicana Online casino Nj Applications on the internet Gamble
    • Regulamentação do jogo como a lei pode impactar apostadores e operadores
    • Najkorzystniejsze automaty online Graj po slot urządzenia vinyl kasyno bezpłatnie
    • Ultimat Casinon Utrike 2026

    Recent Comments

    No comments to show.
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
    Facebook X (Twitter) Instagram Pinterest Vimeo YouTube
    © 2026 jankipul. Designed by jankipul.

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.