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          ऐ मेरे रहनुमा: पितृसत्ता के कितने रूप

    By June 3, 2023138 Comments7 Mins Read

      

     युवा लेखिका तसनीम खान की किताब ‘ऐ मेरे रहनुमा’ पर यह टिप्पणी लिखी है दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय गया की शोधार्थी अनु रंजनी। उनकी लिखी विस्तृत टिप्पणी पढ़िए-

    ==========================

         ‘ऐ मेरे रहनुमा’ यह शीर्षक ऐसा भाव देता है जैसे अपने सबसे प्रिय व्यक्ति को संबोधित किया जा रहा हो, लेकिन जब हम इस पुस्तक के भीतर प्रवेश करते हैं तो यह रुमानी भ्रम टूट जाता है। इस उपन्यास में लेखिका उन पुरुषों को सामने लाती हैं जो स्त्रियों के रहनुमा (रहम करने वाला) बनने का दावा तो करते हैं लेकिन स्त्रियों के हिस्से जो स्थायी रूप से आता है वह दुख और तकलीफ़ ही है। पितृसत्ता एक ऐसी व्यवस्था है, ऐसी संरचना है जो प्रत्येक स्तर पर स्त्री के अस्तित्व को बाँधने का काम करती है, या यूँ कहें कि पितृसत्ता स्त्रियों के अस्तित्व को स्वतंत्र रूप से बनने ही नहीं देती। इसमें यह क़तई ज़रूरी नहीं कि केवल पुरुष ही इस व्यवस्था के कर्ता-धर्ता हैं, बल्कि स्त्रियाँ भी इस व्यवस्था की एजेंट के रूप में कार्य करती हैं, जिनकी निर्मिति सोद्देश्य की जाती है। अतः पितृसत्ता इन विभिन्न एजेंटों द्वारा अलग-अलग रूपों में हमारे सामने आती है । लेखिका इस पुस्तक के जरिए यह कार्य बखूबी करती हैं।

          यह उपन्यास अलग-अलग स्त्रियों के जीवन के माध्यम से यह स्पष्ट करता है कि प्रत्येक घर में पितृसत्ता है, बस उसके रूप भिन्न हैं। इसके लिए अनम, ताहा, नजमा, इन तीनों का एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। ताहा अपने भाषण में इस बात पर ज़ोर देती है कि “महिलाओं के सशक्त होने की पहली शर्त है नौकरी और जब आप कुछ बन जाते हैं, आर्थिक तौर पर सशक्त होते हैं तो सारी परेशानियाँ अपने आप दूर हो जाती हैं।” लेकिन जब हम उपन्यास में थोड़ा ही आगे बढ़ते हैं तो यह भ्रम टूट जाता है। अनम आज की लड़की है, जो बतौर पत्रकार कार्यरत है, शादीशुदा है तथा एक बच्ची की माँ भी है। लेकिन उसके शौहर आलिम की उम्मीद यह है कि घर चलाने का लगभग सारा खर्च अनम उठाए। इस उम्मीद से, नौकरी के बावजूद, आर्थिक स्वतंत्रता के बावजूद अनम के हिस्से झल्लाना आता है, जिसका अपने ही पैसे पर हक़ नहीं रहता।

          पितृसत्ता कितनी पेचीदगी से भरी है इसका भी एक संकेत आलिम की मानसिकता से मिल जाता है। वह यह चाहता है कि उसकी पत्नी कमाना छोड़ कर घर उसकी बेटी संभाले- “न तुम अच्छे से घर को संभाल रही हो, ना बेटी को। इस पर नौकरी की धौंस। कल ही अपना इस्तीफ़ा दे आना और घर पर बैठो।” ठीक इसी समय उनकी बेटी माहिरा का बड़ी होकर क्या बनेगी? इस सवाल पर आलिम जवाब देता है ( जो कि निर्णय की तरह ही प्रतीत होता है) “मेरी बेटी तो एस्ट्रोनाट बनेगी और चाँद पर जायेगी।” यह कैसा मनोविज्ञान है जिसके जरिए पुरुष अपनी बेटी की पहचान बनते देखना चाहता है लेकिन अपनी पत्नी को इससे रोकना चाहता है!

           उपन्यास में आगे बढ़ने के लिए लेखिका फ्लैशबैक शैली का बेहतरीन प्रयोग करती हैं। किसी रचना में फ्लैशबैक के जरिए किसी एक कहानी को प्रस्तुत करना प्राय: अब तक सामने आया है, लेकिन इस उपन्यास में लेखिका फ्लैशबैक शैली का इस्तमाल करते हुए दो स्त्रियों की ज़िन्दगानी को पितृसत्ता किस तरह बरबाद करती है, इसका ब्यौरा प्रस्तुत करती हैं। इसमें भी खास बात यह है कि यह दो जिंदगानियाँ दो पीढ़ियों की हैं, इससे यह भी स्पष्ट होता कि पीढ़ियाँ बदल गईं लेकिन पितृसत्ता बरकरार है।

           नाजमा (पुकारू नाम गुड़िया) एक ऐसी लड़की है जिसके उदाहरण से यह समझा ज सकता है कि पितृसत्ता कैसे एक लड़की के मनोविज्ञान की निर्मिति अपने अनुकूल करती है। गुड़िया को पाँचवी तक की पढ़ाई के बाद घर के कामों में लगा दिया जाता है। एक ओर उसके पिता हैं, जो पढ़ाई जारी रखने के पक्ष में नहीं है, जिनके अनुसार विवाह अत्यधिक आवश्यक है और दूसरी ओर गुड़िया के भाई हैं, जो चाहते हैं कि गुड़िया अपनी पढ़ाई जारी रखे। इसी बात पर बकझक के दौरान गम्भीरता बढ़ते देख गुड़िया अपनी इच्छा को मिटा देती है- “अब्बा की गम्भीरता बढ़ते देख गुड़िया ने अपने मन के किसी कोने में छिपे पढ़ने के ख्वाब को वहीं समेट दिया। दिल ही दिल में उस पर तेजाब डाल दिया, ताकि उस ख्वाब का कोई कतरा बच जा सके।” यही तो आज तक होता आया है कि लड़कियों का मनोविज्ञान ही इस तरह बनाया जाता ह कि वे बहुत ही सरलता से अपने पिता या परिवार के सामने आत्मसमर्पण कर देती हैं। गुड़िया के माध्यम से जगह-जगह पर स्त्री निर्मिति के सूक्ष्म से सूक्ष्म उदाहरण प्रस्तुत हुए हैं, मसलन यह कि “वो उनके निर्देशों की इतनी आदी है कि कोई उससे आकर कहे कि एक दिन उसे अपने मन मुताबिक ज़िन्दगी जीना है, तो उसे समझ ही ना आये कि अपनी मर्जी से कैसे जिया जाता है? वो तो कठपुतली थी कि जहाँ डोर खींच दी, वहीं मुड़ गयी… पूरा इख़्तियार वो अपने ख़ुदा यानी वालिद को दे चुकी थी या यूँ भी कि वो इख़्तियार उसके पैदा होते ही उससे छीन लिया गया था।”

            कम उम्र में विवाह को लेकर जो अज्ञानता रहती है, साथ ही इसके प्रति जो एक रुमानी ख़्याल रहता है उसका भी स्पष्ट उल्लेख है। एक लड़की के दिमाग में बचपन से ही शादी के प्रति एक खुशनुमा ख्याल बिठाया जाता है, जिससे लड़की सोचती है कि उसके लिए विवाह की सब कुछ है, शादी में नए-नए कपड़े, नए-नए गहने मिलते हैं, शादी के बाद जमाने भर की सारी खुशियाँ मिल जाती हैं, और क्या चाहिए इसके अलावा? अब सोचिए कि क्या इस माहौल में पली-बढ़ी लड़की के मन में कभी यह भी आ सकता है कि यह सब तो बाद की चीजें हैं, पहली बात तो यही है कि उसे अब आगे की ज़िंदगी एक नए व्यक्ति के साथ बितानी है, तो उसके साथ जीवन कैसा होगा? क्या कुछ बुरा भी हो सकता है? यदि हाँ तो इसके लिए वह क्या कर सकती है? उन परिस्थितियों से निकलने के लिए या उसे संभालने के लिए क्या किया जा सकता है? जाहिर है, इसकी संभावना कम होती है और ठीक यही स्थिति गुड़िया की भी होती है। वह शादी के ऊपरी स्तरों को तो जान-देख ख़ुश होती रहती है, लेकिन उसका पति कैसा होगा? उसके साथ कैसा व्यवहार करेगा?  इस ओर वह सोच ही नहीं पाती। अंतत: उसकी परिणति होती है कि पति उससे बात करता ही नहीं केवल अपने शरीर की ज़रूरत के लिए जबरदस्ती करता है। गुड़िया सिर्फ कल्पनाओं में उससे बात करती है, और वह पुरुष रोज़ रात को आकर सिर्फ जबरदस्ती संबंध बनाता है और सो जाता है। इसके अलावा बहू से ससुराल की अपेक्षाएँ अपनी जगह हैं, शादी के महीने भर में जब गुड़िया को पीरियड आता है तो उसके हिस्से पोता न दे पाने का ताना आता है और अंतत: कुछ समय बाद आती है एक दोपहर जब वह दरवाज़ा खोलती है तो सामने अपने पति को नई पत्नी के साथ दूल्हा-दुल्हन के रूप में पाती है।

           इस विवाह में दोनों की ओर से प्रेम नहीं था, ( ऐसा भी नहीं कि लड़की का पहले से ही प्रेम था। वह तो उसकी शादी तय कर दी गई तो उसके पास इस पुरुष से प्रेम करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था) इससे किसी के भी मन में यह निष्कर्ष आ सकता है कि प्रेम न होने के कारण दोनों का विवाह सफल नहीं हो पाया लेकिन आगे ताहा की परिणति से लेखिका यह भ्रम भी दूर कर देती हैं।

              ताहा एक पढ़ने-लिखने वाली लड़की है, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है, अपने साथ-साथ अन्य लड़कियाँ को भी जागरुक करने के लिए प्रतिबद्ध है, प्रेम करती है, बल्कि उस प्रेम संबंध को खुल कर जीती है, जिसे प्रेमी भी समझदार मिलता है, लेकिन फिर भी यहाँ भी जब ताहा की नौकरी करने की बात आती तो प्रेमी नाराज़ होता है, एक साल के अबोले के बाद वापस दोनों जुड़ते हैं, परिवार में सबको शादी के लिए राज़ी भी करते हैं लेकिन बार- बार ताहा के ऊपर नौकरी छोड़ने का दबाव बनाया जाता है । झगड़े होते हैं, स्वाभाविक है इससे प्रेम संबंध पर प्रभाव होना, यह हुआ भी और अंततः तमाम यंत्रणाओं और दबावों के फलस्वरूप ताहा को ब्रेन ट्यूमर और उससे मौत मिलती है, यानी कि पितृसत्ता ने प्रेम को भी अछूता नहीं छोड़ा।

             इस तरह से यह कहा जा सकता है कि यह उपन्यास विभिन्न स्तरों पर, विभिन्न तरीकों से पितृसत्ता के कारनामों को बहुत ही सरलता और स्पष्टता से सामने रखने का एक महत्त्वपूर्ण कार्य करता है।

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