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    बोलेरो क्लास

    By February 16, 201023 Comments6 Mins Read

    बोलेरो क्लास में जाना है, भईया! आप तो मैनेजमेंट पढ़कर कारपोरेट क्लास में चले गए। हमको बोलेरो क्लास में जाना है…
    बोलेरो क्लास? पिक्कू ने जब पहली बार कहा मैं सचमुच समझ नहीं पाया। एक बार अपने गाँव-कस्बे से बाहर रहने लगिए तो उसकी जुबान भी आपको पराई लगने लगती है… उस साल छुटि्‌टयों में गया तो पिक्कू ने बताया शहर के नए-नए आबाद हुए मुहल्ले राजा बाजार के मेन मार्केट में रेस्तरां खोल रहा है। धनतेरस के दिन उद्‌घाटन है।
    उसकी बात सुनकर उद्‌घाटन के दिन रसमलाई खाना छोड कर जब मैं उसकी ओर देखने लगा तो मेरी निगाहों में अनजानापन भांपते हुए उसने कहा-
    नहीं समझे? आप दिल्ली क्या गए अपने तरफ का सब बात-व्यवहार भुला गए हैं। यहां नेता लोगों का फेवरेट गाड़ी वही है… रहते तो देखते मुजफ्फरपुर-सीतामढी में बोलेरो पर सत्तारूढ पार्टी का झंडा टांगकर चलने में कितना रुआब है। नसीब में होता है तो आगे विधायक का प्लेट भी लग जाता है, ऊपर लालबत्ती। राजा गाडी है राजा! सडक पर कितनो धूल-धक्कड हो शीशा बंद करके एसी चला लिजिए कुछ नहीं बुझाता है, सडक चाहे कितना भी उबड -खाबड हो मक्खन की तरह दौडती है उसके ऊपर। इतनी बडी कि साथ में चार-पाँच लटक भी चल सकें… और एकाध समाजसेविका भी, उसने धीरे से कान में कहा और जोर का ठहाका लगाया।
    पिक्कू यानी पंकज मेरे स्कूलिया दोस्त रमेन्द्र का छोटा भाई है। वैसे कहने को ही छोटा भाई है। मथुरा उच्च विद्यालय, रिंग बांध में एक साल ही जूनियर था हमसे। एक ही ग्रुप था। रमेन्द्र तो इंटर के बाद ही नेवी में चला गया था। उससे तो बरसों से भेंट-मुलाकात नहीं हुई, छुटि्‌टयों में जब जाता तो पिक्कू से ही मुलाकात होती। मैं भी पहले प्राइवेट से मैनेजमेंट करने दिल्ली आ गया और फिर एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करके यहीं रहने लगा। पिछले छह सालों में कंपनियां तो कई बदलता रहा मगर शहर दिल्ली ही बना रहा। पिक्कू सीतामढी में ही जमा रहा। बी.ए. पास करने के बाद उसने वहीं कई तरह के कामों में हाथ आजमाए…
    पहले कुछ दोस्तों के साथ मिलकर एक चिट फंड कंपनी की एजेंसी ले ली। लोग कहते उसने कंपनी का काम अच्छा चलाया शहर में लेकिन कंपनी ही डूब गई। कई लोगों के पैसे डूब गए। पिताजी ने गाँव में खेत बेचकर किसी तरह लोगों की देनदारी चुकाई। लेकिन साथ ही अपने छोटके दुलरुआ बेटे को यह भी साफ-साफ बता दिया, आगे किसी रोजगार के लिए मुझसे कुछ उम्मीद मत रखना जो कुछ बचा-खुचा था सब इस चिट फंड के दंड में चला गया। चिंता मत करिए पिताजी जल्दी ही सूद समेत सब चुका दूंगा- सुनते हैं उस दिन उसने अपने पिताजी को जवाब में कहा और तेजी से कमरे से निकल गया।
    उसके बाद उसके बारे में कहानियां तो तरह-तरह की सुनाई देने लगीं लेकिन वह खुद कम ही दिखाई देता। कभी-कभी जब विधायक अजायब सिंह की बोलेरो गाड़ी शहर के मेन रोड से तेजी से गुजरती तो कुछ लोग कहते पीछे वाले शीशॆ से अक्सर उसका चेहरा भी दिखाई दे जाता। खैर… विधानसभा चुनाव आते-आते यह बात सबके सामने खुल गई। अजायब सिंह की लगातार दूसरी जीत के जुलूस में जब गाडियों का काफिला शहर के मेन रोड से गुजरा तो सबने देखा विधायकजी के ठीक पीछे चल रही बोलेरो में बाहर वह भी लटका हुआ एक हाथ उठाए लोगों का अभिवादन कर रहा था।
    लोग कहते अजायब सिंह की जीत में उसकी अहम भूमिका थी।
    पाँच गाँव का भोट अकेले मैनेज किए भइया- उसने मुझे खुद बताया था। लोग कहते चुनाव जीतने के बाद विधायकजी ने उसकी वफादारी का मोटा ईनाम दिया। असल में रेस्तरां भी तो उसी चुनाव का प्रसाद है।
    जब पिक्कू रेस्तरां का उद्‌घाटन करने विधायक अजायब सिंह खुद आए तो किसी को इसका कोई शुब्हा नहीं रह गया कि विधायकजी से उसकी कितनी नजदीकी है। अब इसे संयोग कहिए या विधायकजी के शुभ हाथों की महिमा कि रेस्तरां का व्यवसाय का हश्र उसके पिछले व्यवसाय से बेहतर रहा। कुछ ही दिनों में रेस्तरां चल निकला।
    लोग जब उसके बारे में बातें करते तो कहते पिक्कुआ को होटल धार गया… वैसे चर्चाएं तो और भी बहुत सारी चलतीं। बीच में जब-जब गया पिक्कू से कम ही भेंट हुई। हर बार सोचता कि उसके रेस्तरां में जाकर मिलूंगा उससे लेकिन किसी न किसी कारण जाना टलता रहा। अलबत्ता उसके बारे में किस्से खूब सुनने को मिलते रहे…
    पता चला कि उसने अपने रेस्तरां में पुराने ढंग के कुछ केबिन लगवा रखे हैं। कॉलेज में पढ़नेवाले नौजवानों के लिए वे केबिन उस शहर में दुर्लभ एकांत उपलब्ध करवाते और इस सुरक्षित एकांत के एवज में वह उनसे अच्छी रकम वसूलता, खाने-पीने के अलग। एक बार किसी ने बताया कि शााम को जब रेस्तरां बंद हो जाता है तो उसके शटर के पीछे नेता लोग जुटते हैं। साकी वाईन शाप के एक कर्मचारी ने अपना नाम गुप्त रखे जाने की द्रार्त पर बताया शाम के बाद चार से पाँच बोतल व्हिस्की रोजाना पिक्कू रेस्तरां में जाती है।
    तरह तरह की बातें। खैर… उसके घर में समृद्धि दिखाई देने लगी थी। उसके पुराने घर की बरसों बाद रंगाई-पुताई हुई और जब छोटी बहन की शाादी हुई तो शहर के करीब एक हजार लोगों ने उसके यहां लजीज खाने का लुत्फ उठाया, पूरा मोहल्ला लाईट से जगमगा गया और गानों के शोर से धमधमा गया। पिछली बार जब उससे मुलाकात हुई तो उसने मुझे खुद बताया था- अगले धनतेरस के लिए बोलेरो का ऑर्डर दे दिए हैं भइया…
    धनतेरस आने ही वाला था कि एक सुबह ऐसी खबर आई कि खबरों की खबर बनती चली गई। शहर में नए-नए शुरु हुए अखबार दैनिक अमृत खबर ने विस्तार से लिखा था- नए-नए आए एस.पी. मयंक खरे ने शहर में अपराध खत्म करने के अपने संकल्प को कार्यरूप देते हुए पिक्कू रेस्तरां पर देर रात छापे की कार्रवाई। कहते हैं कि छापे के दौरान रेस्तरां के ऊपर के कमरों से नेपाल से भगाकर लाई गई छह लडकियां बरामद हुईं। सूत्रों से पता चला है कि शहर के कुछ गणमान्य लोग भी इस छापे के दौरान पकडे गए हैं। पुलिस ने बरसों से चले आ रहे देह-व्यापार के एक बडे रैकेट के खात्मे का दावा किया है। जिसमें अनेक राजनेताओं के भी शाामिल होने का संदेह है। रेस्तरां के मालिक पंकज को पुलिस हिरासत में भेज दिया गया है। और भी तमाम तरह की खबरें आने लगीं…
    लोग चर्चा करते अजायब सिंह ने जबसे अपनी ही पार्टी के मुखयमंत्री के खिलाफ मोर्चा खोला है उसी का नतीजा है… कहते उस रात वहाँ विधायक खुद भी मौजूद था। जाने कैसे उसको भनक लग गई। पेशाब करने के बहाने उठा और बाथरुम जाने की बजाय रेस्तरां से बाहर निकल गया…बाकी लोग पकड़े गए। जितनी मुँह उतनी बातें…
    बोलेरो तो नहीं आई लेकिन बोलेरो क्लास में जाने का उसका सपना पूरा हो गया शाायद- दीवाली से छठ की छुट्‌टी के दरम्यान मैं सच बताऊँ यही सोचता रहा। कम से कम बोलेरो पर चलनेवाले जिले के बडे-बडे नेताओं की पंक्ति में उसका भी नाम तो छप ही रहा था!

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