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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    कोरी चुनरिया-सा औरत का जीवन

    By June 2, 201152 Comments5 Mins Read

    आज प्रसिद्ध कवयित्री सुमन केशरी की एक लंबी कविता ‘बीजल से एक सवाल’. बीजल से उसके प्रेमी ने छल किया था. उसे अपने दोस्तों के हवाले कर दिया. उसने आत्महत्या कर ली. बीजल के बहाने स्त्री-जीवन की विडंबनाओं को उद्घाटित करती यह कविता न जाने कितने सवाल उठाती है और एक लंबा मौन- जानकी पुल.



    बीजल से एक सवाल 
          कैसेट तले बेतरतीब फटा कॉपी का पन्ना
          कुछ इबारतें टूटी–फूटी
          शब्द को धोता बूँद भर आँसू
          पन्ने का दायाँ कोना तुड़ा़-मुडा़
          मसल कर बनाई चिन्दियाँ
          फैलीं इधर-उधर
    कुछ मेज पर
          कई सलवट पड़ी चादर पर
          तो बेशुमार कमरे में
    फर्श पर इधर-उधर
    टूटे बिखरे पंख और रोएँ
    कमरे में कैद पंछी के
    फड़फड़ाता
    उड़ता
    निकले को व्याकुल
    खुले आकाश में
    एफ़ एम चीखता
    घड़घड़ाता ट्राँजिस्टर
    थका…..
    थका…..
    दरवाजा औंधा पड़ा था धराशाई
    सामने टंगी थी एक आकृ​ति
    सफेद सलवार पहने
    चेहरा छिपाए
    पंखे के ब्लेड से
    ‘दीदी’ चीखा था भाई
    ‘बिटटो’ चिल्लाए पिता
    माँ खडी थी मुँह में आँचल दबाए
    फटी आँखों से घूरती
    लटकती देह को
    जिस पर चोटें अब भी ताजा थीं
    पाँवों और कलाई पर
    कसी गई रस्सी की
    चाकू के नोक की
    सिगरेट के झुलस की
    जिन पर आठ दस मक्खियाँ अलसाई-सी बैठी थीं
    और जाने कितनी भिनभिना रही थीं आस-पास
    बेखौ‌फ़
    बाएँ पैर के अ‍ॅंगूठे पर बँधी पट्टी से
    रिसता खून सूख गया था

    सब कुछ ठहर गया था
    एक उस पल में
    छोड़ ​भिनभिनाती मक्खियों के
    घड़घड़ाते ट्रांजिस्टर के
    और थके कमजोर पंखों पर
    शरीर तोल
    घायल पंखों को फैला
    बाहर उड़ने को व्याकुल पंछी के
    जो बार-बार कभी
    मुड़े पंखे पर बैठता तो     
    कभी खि‌ड़की की सलाखों पर
    कभी छत से टकरा 
    नीचे गिरने को होता
    और किसी तरह
    घायल कमजोर पंखों के सहारे ही
    खुद को उड़ा लेता इधर-उधर
    चीख सुन पट-पट खि‌ड़कियाँ खुलीं
    जंग खाए कब्जोंवाले
    कई-कई दरवाजे खुले चर्र… चर्र… चीं  
    धड़-धड़ भागते हुए कदमों की आवाजें
    पल भर बाद ही खड़ा था जनसमूह
    घर के दरवाजे पर
    आँखों में कौतुक और दिल में छुटकारे का चैन लिए
    ​कि यह तो होना ही था
    होना भी चही चाहिए था
    पर (तो) कहा जनसमूह ने
    आह! यह क्या हो गया
    कैसे हुआ यह सब?
    मानो कहना चाहता था
    अब तो चुप्पी तोड़ो
    कहो क्या हुआ था उस रात
    उस ‘हादसे’ की रात
    आगे बढे़ लोग
    पंछी पंख फड़फड़ा खिड़की पर जा बैठा सिकुड़ा- सा
    बेचैन कातर न‌ज़रों से ताकता
    प्राणों की भीख माँगता

    अनकही कहानी खुद गढ़ते थे लोग अब
    सामने शरीर था कल्पना उकसाता
    नज़रें अब शरीर तौलती थीं
    भिन्न-भिन्न कोणों से
    लम्बाई औसत सही
    उभार मन भावन
    त्वचा की लुनाई नीलेपन से और उभ्रर रही थी
    चेहरा ढँक-सा गया था
    काश! वह भी दिख पाता
    पर हाँ, याद आया
    आँखें बड़ी-बड़ी
    कभी चौंकती कभी असमंजस में जड़ीं
    उँगलियाँ लपेटती थीं
    दुपट्टे का सिरा
    पर कदम ऐसे मानों
    मौका मिलते ही
    थिरकने लगेंगे
    पृथ्वी नाप लेंगे….पलभ्रर में
    आत्मा की हलचल कौंधती थी देह में
    फूट पड़ती थी कभी गीतों के बोल में
    रेडियों के संग-संग
    आज लटकी पड़ी थी वही देह शान्त
    सब देखने-सुननेवालों को करती अशान्त
    क्या हुआ था उस रात
    उस हादसे की रात
    कोरी चुनरिया-सा
    औरत का जीवन
    पल भ्रर में दाग लगे
    पल भ्रर में खोंच
    जग की निगाहों से बचती-बचाती
    पिता की दहलीज से चिता की दहलीज तक
    बीच प​ति गेह
    जानती है वह भी
    तो मानती है क्यों नहीं
    लाँघती क्यों बार-बार वह लखन रेख…….
          मन्त्रोच्चार-सी ये बातें कही गईं सुनी गईं
          बिना कहे सुने भी
          आत्मा बस भटकती रही कमरे में बन्द पंछी-सी
    सिर्फ उसे पता था
    क्या हुआ था उस रात
          उस हादसे की रात
          भय में
          पीड़ा में
          मृत्यु में
    बदलती
          विश्वास की रात
          आनन्द की रात
          प्रेमी था वह तो
          फिर क्यों किया उसने ऐसा व्यवहार

         
    औरत का प्रेम तो
          संशयों पर पलता है
    समाज की निगाहों से
          संस्कार की जकड़नों से
          अहं के भावों से
          बचता-टकराता
          विश्वास की डाल पक‌ड़
          बेल-सा च‌ढ़ता है
          (आत्मा से देह तलक)
         
    औरत के लिए प्रेम
    जीवन की सीप में
          स्वा​ति की बूँद बन
          मु​क्ति-सा पलता है
         
    बूझ नहीं पाता यह
          आत्ममुग्ध हिंस्र पौरूष
          जिसके लिए प्यार-व्यार तिरिया चरितर है
          टाईपास भर
          गुड़िया -सी सजी धजी
          गुड़िया -सी चाभी लगी
          गुड़िया -सी गुंगी ही
          औरत उसे पसन्द
          बोलते ही गुड़िया को तोड़ता मरोड़ता वह
          आत्मा फिर भी बची रहती
          प्रश्नों के रूप में
          फन काढ़े नागिन को
          पाँवों से कुचलता वह बेइज्जती के
          बना छोड़ता उसे बस देह भर
          कपड़े-सा बरतकर फेंक देता उसे
          गलियों में
          पाँवों तले रूँदने को

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