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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    एक शताब्दी के कवि आरसी प्रसाद सिंह

    By July 4, 2011119 Comments7 Mins Read

    ‘यह जीवन क्या है ? निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है / सुख-दुःख के दोनों तीरों से चल रहा राह मनमानी है’ जैसी पंक्तियों के कवि आरसी प्रसाद सिंह की भी यह जन्म-शताब्दी का साल है. यह चुपचाप ही बीता जा रहा था. युवा-कवि त्रिपुरारि कुमार शर्मा का यह लेख उस लगभग गुमनाम हो चुके कवि के बारे में बताता है कि क्यों उनको याद करना चाहिए, हिंदी साहित्य में उनका योगदान क्या है- जानकी पुल.




    साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कवि, कथाकार और एकांकीकार आरसी प्रसाद सिंह का जन्म 19 अगस्त 1911 को हुआ और 15 नवम्बर 1996 तक हमारे बीच एक अडिग चट्टान की तरह रहे। आरसी बाबू हिन्दी और मैथिली भाषा के प्रमुख हस्ताक्षर थे। कविता, कहानी, एकांकी, संस्मरण, समीक्षा के साथ-साथ उन्होंने बाल साहित्य भी खूब लिखा। उनके क़रीबियों का कहना है – “आरसी बाबू की जितनी रचनाएँ प्रकाशित हुईं हैं, उससे कहीं ज़्यादा अप्रकाशित हैं।” पता नहीं वजह क्या है? सबब के लब पर एक तवील-सी चुप्पी ‘पिन-अप’ है। खैर, बिहार के समस्तीपुर ज़िला में रोसड़ा रेलवे स्टेशन से आठ किलोमीटर की दूरी पर बागमती नदी के किनारे एक गाँव आबाद है – एरौत (पूर्व नाम ऐरावत)। यही गाँव आरसी बाबू की जन्मभूमि और कर्मभूमि है। इसीलिए इसे आरसी नगर एरौत कहा जाता है। अगर सोच की सतह पर आठ किलोमीटर और आगे तैरने की हिम्मत हो तो बाबू देवकी नंदन खत्री (लेखक – चंद्रकांता, पहला जासूसी उपन्यास जिसे पढ़ने के लिए लोगों ने हिंदी सीखी) का जन्मस्थान बल्लीपुर भी है।
    फिलहाल आरसी बाबू के बारे में… मुझे महाकवि आरसी (जिन्हें मैं बाबा कहता हूँ) का पड़ोसी होने का सौभाग्य प्राप्त है। ठीक उनके घर के सामने मेरा घर है। एक बार मेरे बचपन की मासूम आँखों ने उनको छूआ था। उस वक़्त मुझे पता भी नहीं था कवि, कविता और कहानी किसे कहते हैं? आज जब कोई कविता या कहानी लिखता हूँ तो वह नर्म लम्स तर-ओ-ताज़ा हो उठता है। एक याद दबे पाँव दस्तक देती है। एक लम्हा धीरे-धीरे उभरता है। सूरज ‘बागमती’ में अपने पॉव धो रहा है। रात होने से पहले ही शाम अपने घर को लौट जाना चाहती है। दिन भर की थकी हुई रौशनी को नींद-सी आ रही है। आँखों में रफ़्ता-रफ़्ता तीरगी भरने लगी है। गाँव के चौक के बगल में ज़मीन पर लेटी हरी घास पर बैठे बाबा। एक हाथ में ‘एम्प्रो’ बिस्कुट का खुला पैकेट। दूसरे हाथ की अंगुलियों में उलझा बिस्कुट। बस यही एक सफ़ेद-ओ-स्याह-सा मंज़र का टुकड़ा मेरे पास मह्फ़ूज़ है। जब कभी गाँव जाता हूँ लगता है वो आज भी वहीं बैठे हैं। मैं उनकी जानिब कदम बढ़ाता हूँ। अचानक से गायब हो जाते हैं। कहीं कुछ भी दिखाई नहीं देता। फिर वही टीस लेखन में कई सतहों में उतर आती है।
    पद्मभूषण श्री अमृतलाल नागर ने कभी कहा था – “उन्हें जब कभी देख लेता हूँ, दिल खुश हो जाता है । आरसी में मुझे प्राचीन साहित्यिक निष्ठा के सहज दर्शन मिलते हैं ।” अगर उनके व्यक्तित्व की बात करूँ तो उन्होंने कभी भी परवशता स्वीकार नहीं की। उम्र भर नियंत्रण के ख़िलाफ आक्रोश ज़ाहिर करते रहे। चालीस के दशक में जयपुर नरेश महाकवि आरसी को अपने यहाँ राजकवि के रूप में भी सम्मानित करना चाहते थे। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने काफी आग्रह, अनुनय–विनय किया परंतु आरसी बाबू ने चारणवृत्ति तथा राजाश्रय को ठुकरा दिया। ऐसी थी महाकवि आरसी की शख़्सियत। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, राम कुमार वर्मा, डॉ. धीरेंद्र वर्मा, विष्णु प्रभाकर, शिव मंगल सिंह ‘सुमन’, बुद्धिनाथ मिश्र और अज्ञेय समेत कई रचनाकारों ने हिंदी और मैथिली साहित्य के इस विभूति को सम्मान दिया। कभी शब्दों से तो कभी सुमनों से।
    आचार्य हजारी प्रसाद दिवेदी लिखते हैं – “सचमुच ही यह कवि मस्त है। सौंदर्य को देख लेने पर यह बिना कहे रह नहीं सकता। भाषा पर यह सवारी करता है। इस बात की उसे बिल्कुल परवाह नहीं कि उसके कहे हुए भावों को लोग अनुकरण कह सकते हैं, कल्पना प्रसूत समझ सकते हैं : उसे अपनी कहनी है। कहे बिना उसे चैन नहीं है। उपस्थापन में अबाध प्रवाह है। भाषा में सहज सरकाव। ‘जुही की कली’ को देखकर वह एक सुर में बोलता जायेगा – एक कलिका वन छबीली विश्व वन में फूल / सरस झोंके खा पवन के तू रही है झूल / पंखड़िया फूटी नहीं छूटे न तुतले बोल / मृग-चरण चापल्य, शैशव-सुलभ कौतुक लोल / और पायी वह न मादकमयी मुस्कान / सुन, सजनी, तू अधखिली नादान। …और इसी प्रकार बहुत कुछ। समालोचक कवि की ब्यास शैली पर हैरान हैं। उसके भाव सागर के उद्वेलन से दंग।” कवि आरसी कई रूपों में हमारे सामने आते हैं। कुछ रचनाकारों के ख़्याल पेश करता हूँ –
    आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री लिखते हैं – “बिहार के चार तारों में वियोगी के साथ प्रभात और दिनकर के साथ आरसी को याद किया जाता है । किंतु आरसी का काव्य मर्म-मूल से प्रलम्ब डालियों और पल्लव-पत्र-पुष्पों तक जैसा प्राण-रस संचारित करता रहा है, वह अन्यत्र दुर्लभ है । किसी एक विषय, स्वर या कल्पना के कवि वह नहीं हैं । उनकी सम्वेदना जितनी विषयों से जुड़ी हुई है, उनकी अनुभूति जितनी वस्तुओं की छुअन से रोमांचित है, उनका स्वर जितने आरोहों, अवरोहों में अपना आलोक निखारता है, कम ही कवि उतने स्वरों से अपनी प्रतिभा के प्रसार के दावेदार हो सकते हैं ।”
    डॉ. नामवर सिंह ने महाकवि आरसी की एक कृति ‘नन्ददास’ के बारे में लिखा है – “रोमांटिक कवियों में कुछ कवि आगे चलकर अध्यात्मवाद की ओर मुड़ गये और आरसी भी उनमें से एक हैं । निराला ने ‘तुलसीदास’ की जीवन कथा के माध्यम से देशकाल के शर से विंधकर ‘जागे हुए अशेष छविधर’ छायावादी कवि की छवि देखलाकर परम्परा का विकास किया तो कवि आरसी ने ‘नन्ददास’ के माध्यम से परम्परा का पुनरालेखन किया है ।”
    उनकी कहानियों का ज़िक्र करते हुए श्री हरीश जायसवाल ने लिखा – “आरसी बाबू की कहानियों में जहाँ प्रेम अपनी ऊँचाई पर दीख पड़ता है वहाँ बलिदान भी अपनी चरम सीमा पर स्थित मालूम होता है । सस्ते रोमांस की कमी उनकी कहानियों को और अधिक निखारने में बहुत हद तक कामयाब हुई है । प्रेम के नाम पर आधुनिक नीचता से कहानी अछूती मालूम होती है जो शुभ है ।”
    डॉ. रामचरण महेंद्र ने कहा था – “श्री आरसी प्रसाद सिंह हिन्दी में कवि, कहानीकार, और एकांकीकार, के रूप में कार्य कर रहे हैं । हिंदी संसार ने कवि के रूप में उनकी कृतियों की महत्ता और मौलिकता का लोहा माना है । यह सत्य है कि कवि के रूप में श्री आरसी प्रसाद सिंह ने मर्मस्पर्शी काव्य की सृष्टि की है । किंतु अपनी एकांकियों में भी आप चिंतन-प्रधान गम्भीर साहित्य की सृष्टि कर सके हैं । इनमें समाज, धर्म, राजनीति, सामयिक घटनाओं, भोतिकवाद, समाजवाद तथा साम्यवाद का विवेचन हुआ है ।”
    ग्रामीण और नजदीकी श्री सीताराम सिंह ‘सरोज’ के अनुसार, “महाकवि आरसी एक ही साथ उपमा और उपमेय दोनों हैं । चिर यौवना मुक्त वाणी के अमर प्रस्तोता ने चेतना को रूपायित करने का जो स्तुत्य कार्य किया है उसका विवेचन महान चिंतक, विशिष्ट साधक और युगाराध्य कवि जैसे शीर्षकों के अंतर्गत समीचीन ही माना जायेगा ।”

    … और अंत में उनकी एक प्रसिद्ध रचना

    ‘जीवन का झरना’
    यह जीवन क्या है ? निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है
    सुख-दुःख के दोनों तीरों से चल रहा राह मनमानी है कब फूटा गिरि के अंतर से ? किस अंचल से उतरा नीचे ?किस घाटी से बह कर आया समतल में अपने को खींचे ?निर्झर में गति है, जीवन है, वह आगे बढ़ता जाता है धुन एक सिर्फ है चलने की, अपनी मस्ती में गाता है बाधा के रोड़ों से लड़ता, वन के पेड़ों से टकराता
    बढ़ता चट्टानों पर चढ़ता, चलता यौवन से मदमाता लहरें उठती हैं, गिरती हैं; नाविक तट पर पछताता है तब यौवन बढ़ता है आगे, निर्झर बढ़ता ही जाता है
    निर्झर कहता है, बढे चलो, देखो मत पीछे मुड़ कर
    यौवन कहता है, बढे चलो, सोचो मत होगा क्या चल कर ?चलना है, केवल चलना है, जीवन चलता ही रहता है रुक जाना है मर जाना ही, निर्झर यह झड़ कर कहता है

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