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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    सुनो यह बारिश के बादलों की गर्जन नहीं है

    By April 6, 2011919 Comments4 Mins Read

    मूलतः इंजीनियरिंग के छात्र आस्तीक वाजपेयी की ये कविताएँ जब मैंने पढ़ी तो आपसे साझा करने से खुद को रोक नहीं पाया. इनके बारे में मैं अधिक क्या कहूँ ये कविताएँ अपने आपमें बहुत कुछ कहती हैं- इतिहास, वर्तमान, जीवन, मरण- कवि की प्रश्नाकुलता के दायरे में सब कुछ है और देखें तो कुछ भी नहीं. होने न होने का यही द्वंद्व उनकी कविताओं को एक खास भंगिमा देता है. आइये पढते हैं- जानकी पुल.

    जानकी पुल को उनकी कविताएँ सबसे पहले प्रकाशित करने पर गर्व हो रहा है.





    1.
    ऐसा ही होता है
    ऐसा ही होता है।
    समय मे भागता अश्वत्थामा
    भूल जाएगा कि वह क्यों भागता है,
    भागना ही बच जाएगा, सब खत्म हो जाएगा।
    ‘प्रेम‘-किससे किया था ?
    वह कौन है जो मुझे देखती है।
    मैं भूल चुका हूँ।
    ‘मृत्यु‘-वह शुरु हो गयी थी मेरे पैदा होते ही,
    खत्म हो पाएगी या नहीं इस घास पर पड़ी
    ओस की चमक।
    यह अन्धकार मेरा पहला अन्धकार
    नहीं है, इसके पीछे से मेरी यादे
    मुझे, भाले मार रही है। कुत्तों की तरह झुँड में
    धावा बोलती है, किसी एक का भी चेहरा नहीं
    देख पाता।
    हत्या सिर्फ़ मैंने ही नहीं की है।
    मुझे ही क्यों दण्डित करता है यह मैं।
    किससे करवाऊँ बचाव खुद से अपना।
    ऐसा ही होता है।
    ‘अफसोस‘-पहले दूसरों पर होता है
    फिर खुद पर, फिर इस बात पर
    कि यह सोचते सोचते कितना समय बीत गया।
    मासूमियत छीन ली है भगवानों ने
    जानवरों को देने के लिए।
    हमारे लिए इच्छाएँ छोड़ दी हैं।
    कुछ ऐसा करूँ जो मुझे अच्छा लगता हो,
    मैं क्यों भाग रहा हूँ ?
    यह मैंने खुद के लिए चुना है या दूसरे ने।
    अगला कदम क्या एक सदी पार कर रहा है
    या एक क्षण या ये सारी सदियाँ ही एक क्षण थीं।
    कितना समय बीत गया।
    यह कुरूक्षेत्र ही है क्या ?
    कोई सपना लगता है, या कोई भ्रम
    मैं इससे क्यों नहीं भाग पाता।
    यह पाताल है या स्वर्ग।
    यह भीड़ क्यों लड़ती है,
    मैं क्यों नहीं लड़ता।
    घास के ऊपर तैर रही ओस पीकर ज़िन्दा रहतीं
    ये मृतकों की चीखें।
    क्या वास्तव में मर गये सिर्फ वे लोग
    या हम भी चलते मुर्दे हैं।
    इस रण में ही छिपी है शान्ति
    हँस रही है धूप, पसीने और रक्त
    से लिप्त खड़ी रण के बीच।
    कुत्तों और गिद्धों की आँखें लाल हो गयीं है
    रक्तचाप से योद्धाओं की कल्पनाएँ लाल हो गयीं हैं।
    इतिहास हम हैं या वेदव्यास या गणेश जो
    लिखते हैं महाभारत या जीत की सम्भावना जो छिप
    गयी है मनुष्यों की इच्छाओं में।
    ऐसा ही होता है।
    हम क्या लड़ें, क्यों लड़ें, किससे लड़ें
    कुछ भी स्मरण नहीं।
    हम सत्ता के लिए नहीं लड़े थे,
    न ही ईर्ष्या से, न ही समृद्धि के लिए
    हम लड़े क्यों ?
    क्या वास्तव में लड़े थे ?
    सम्भव है कि यह देवताओं की चाल हो,
    लेकिन यह भूमि लाल है
    कुरूक्षेत्र, हाय कुरूक्षेत्र जिसे छलनी किया
    भयावह सेनाओं ने, असंख्य योद्धाओं ने
    क्या यह तुम्हारे द्वारा रचा एक स्वप्न था ?
    हमें क्यों कौशल इतना अधिक मिला
    और इच्छाएँ इतनी कम।
    रात्रि में स्वप्न नहीं मिले, सूर्यास्त
    पर सन्तुष्टि नहीं मिली।
    मैं थक गया हूँ, थक गया हूँ, थक गया हूँ।
    कहाँ जा रहा हूँ ? आँखें सूज गयी है
    नहीं सो पाता हूँ, मृत्यु भी क्षमा नहीं करती है।
    यह फूल अभी उगे ही हैं, भीष्म की
    तरह पता है इन्हें भी मृत्यु का समय।
    धन्य हैं।
    अपनी इच्छाओं से बहुत पहले पल्ला
    झाड़ चुका हूँ दूसरों की इच्छाओं को ढोता हूँ
    कभी अर्जुन बनकर द्रोपदी की कामना करता हूँ,
    कभी धृतराष्ट्र बनकर अपने पुत्रों की,
    कभी अश्वत्थामा बनकर मृत्यु की,
    ऐसा ही होता है।
    2.
    तथास्तु
    बुद्ध देखते है शेर की आँखों में
    सूर्य की किरणों से लिप्त
    धूल बह रही है बगीचों के कटे-फटे
    पेड़ों के बीच।
    अभिमन्यु देखता है उन योद्धाओं को
    जिनकी मृत्यु की कल्पना उसकी
    मृत्यु से उपजी है।
    गाँधी देखते हैं उसे
    सदियों पार से और पुकारते हैं
    हे राम!
    घास की कटी हुई नोक के
    ऊपर से एक टिड्डे पर घात
    लगाये बैठा है गिरगिट।
    वह जीभ चटकारता है।
    अर्जुन के तरकश में छिपा
    बाण पुकारता है
    ‘जयद्रथ कहाँ हो तुम
    सामने आओ !‘
    तुम लोग मुझे घेर कर क्यों मारते हो
    कर्ण, तुम शूर हो, पीछे से वार क्यों करते हो
    नहीं किया है मैंने किसी पर पीछे से वार।
    इन भुजाओं पर मेरे पिता का
    आशीर्वाद सवार है, इन्हें तुम
    कैसे मारोगे।
    कर्ण, सूर्यपुत्र कर्ण, तुम क्यों पीछे
    से वार करते हो।
    पलट कर कहता है सीज़र,
    मेरे दोस्त, ब्रूट्स तुम भी
    इस चक्रव्यूह में आये हो।

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