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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    वादे जुलूस नारे फिर-फिर वही नज़ारे

    By October 13, 201010 Comments7 Mins Read

    बिहार विधानसभा चुनावों के समय यह लिखा था. अब यूपी चुनावों के समय  इस पोस्ट की याद आ गई- प्रभात
    बिहार में विधानसभा चुनाव हैं. मतदान शुरू होने में दस-बारह दिन रह गए हैं. लेकिन मुजफ्फरपुर में देख रहा हूँ शहर की दीवारें साफ़ हैं, न नारों की गूँज है, न पोस्टरों का समां. चुनाव आयोग की आचारसंहिता ने चुनावी माहौल को बदल दिया है. मुझे बचपन से देखे-सुने चुनाव नहीं उनके नारे याद आ रहे हैं जिनके माध्यम से चुनावी पंडित दीवारों की लिखावट को पढ़ लेते थे-प्रभात रंजन

    सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है
    भावी इतिहास तुम्हारा है
    ये नखत अमा के बुझते हैं
    सारा आकाश तुम्हारा है-

    कैसा अजीब संयोग है राष्ट्रकवि के रूप में जाने जाने वाले रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियाँ जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति का नारा बना, उनकी ही कविता थी- ‘दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो/ सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’. उनकी कविता की ये पंक्तियाँ एमरजेंसी के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बनीं. जबकि १९७४ में अपनी मृत्यु से कुछ साल पहले तक दिनकर कांग्रेस पार्टी से जुड़े रहे थे, सांसद थे. हालांकि यह भी सच्चाई है कि जब दूसरी आजादी के नायक जयप्रकाश नारायण ने १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में जो भूमिका निभाई थी उससे प्रभावित होकर दिनकर ने जयप्रकाश नारायण के ऊपर एक कविता लिखी थी. जिसकी पंक्तियाँ थीं-
    है जयप्रकाश वह नाम जिसे
    इतिहास समादर देता है,
    बढ़कर जिसके पदचिन्हों को
    उर पर अंकित कर लेता है.

    ……………………………………………………………..
    जयप्रकाश है नाम समय की
    करवट का अंगड़ाई का
    तूफ़ान बवंडर के ख़्वाबों से
    भरी हुई तरूणाई का
    कहते हैं इस कविता ने जयप्रकाश नारायण को लोकनायक बना दिया. वैसे मजेदार बात यह है कि आज़ादी के बाद जब दिनकर बाद में कांग्रेस पार्टी से जुड़े, प्रधानमन्त्री नेहरु के करीब आए तो उसके बाद इस कविता को उन्होंने खुद ही नज़रंदाज़ किया. आज़ादी के बाद प्रकाशित उनके प्रमुख संकलनों में में यह कविता नदारद है. यह महज संयोग नहीं हो सकता. बहरहाल, १९७४ के आंदोलन के दौरान जब एक बार फिर देश के अवाम ने इस कविता को दुहराया तब तक दिनकर की मृत्यु हो चुकी थी. १९७४ के छात्र-आंदोलन से १९७७ के चुनाव तक तानाशाही के उस संघर्ष में दिनकर की कविताओं की पंक्तियां नारों के रूप में दीवारों पर लिखी जाती थीं, नेताओं के भाषणों में दुहराई जाती थी. नैतिकता की उस लड़ाई और मूल्यों के आधार पर लड़े गए उस चुनाव के स्तर को उन नारों के माध्यम से समझा जा सकता है. लेकिन १९७९ के मध्यावधि चुनाव के आते-आते दीवारों की लिखावट बदलने लगी थी.
    ‘खिचड़ी विप्लव’ से मोहभंग, हताशा दीवारों पर दिखाई देने लगी थी. बेनजीर बाई की ढहती पीली दीवार पर यह नारा पढ़ने के लिए मैं पहली बार ठिठका था. वहाँ के सांसद जॉर्ज फर्नांडिस थे, चरण सिंह देश के प्रधानमन्त्री. मैं बात नारे की कर रहा था-
    देखो जॉर्ज चरण का खेल
    खा गया चीनी पी गया तेल.
    तब इतनी समझ नहीं हुई थी कि इसका ध्वन्यार्थ समझ पाता. मन ही मन सोचता कि आखिर कितनी चीनी खा गए होंगे कि दीवारों पर लिखवाना पड़ा. उससे भी ज्यादा मैं इस बात को सोचकर परेशान होता कि आखिर ऐसा कौन तेल होता है जिसे पिया भी जाता है. चुराकर चीनी खाने की तो तब मुभे बड़ी भारी लत थी इसलिए मुझे उनसे सहनुभूति भी होती थी क्योंकि क्योंकि पकड़े जाने पर मेरी कभी-कभी पिटाई भी हो जाती थी. हालांकि उससे कुछ समय पहले ही एक नारा पढ़ा था-
    एक शेरनी सौ लंगूर
    चिकमंगलूर चिकमंगलूर 

    तब इसे कविता की पंक्ति समझकर दुहराता था. बहुत बाद में समझ आया कि चिकमंगलूर के उपचुनाव में इंदिरा गाँधी के लिए यह नारा बनाया गया था. उसी चुनावी जीत के साथ इंदिरा गाँधी की वापसी की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई थी. जब कुछ और सयाना हुआ तो कभी-कभी सोचता कहीं यह नारा ‘मगध’ कविता संग्रह की मुग्धकारी कविताओं के कवि श्रीकांत वर्मा ने तो नहीं लिखी थी. वैसे मेरी स्मृतियों में अटकी बाद की अधिकांश कविताओं के कवि गुमनाम ही ही रहे. कभी-कभी सोचता हूँ यह नारा किसने लिखा होगा-
    वीर महोबिया कड़ाम-कड़ाम
    बम फूटेगा बड़ाम-बड़ाम
    कौन था वह गुमनाम कवि जिसने जनदाहा विधानसभा क्षेत्र के दीवारों पर यह नारा लिखा या लिखवाया जो धीरे-धीरे बिहार की बदलती राजनीति का मुहावरा बन गया. उस साल वहाँ से वीरेंद्र सिंह महोबिया ने चुनाव जीता था. कहते हैं बिहार की विधानसभा में पहुंचनेवाला वह पहला खुलेआम दागी था. कहते हैं वह पहला विधायक था जिसने राजधानी में सेठों से राजनीतिक धौंस दिखाकर उगाही शुरू की. बाद में उसकी हत्या हो गई थी.
    इसी तरह यह नारा किसने चमकाया होगा- रोम पोप का सहरसा गोप का.

    या हाजीपुर की धरती के उस सुकवि से मिलने की बड़ी हसरत है जिसने यह नारा लिखा था- ऊपर आसमान/ नीचे पासवान. कहते हैं इस नारे ने ही तब वहाँ से एक करिश्माई नेता को रेकॉर्ड मतों से संसद पहुंचाया था.
    इन नारों का अगर व्यवस्थित रूप से अध्ययन किया जाए तो बिहार के चुनाव के बदलते मानचित्र का अंदाजा लगाया जा सकता है. जातियों के संघर्ष का भी. एक किस्सा याद आ रहा है. उत्तर बिहार का शिवहर जिला वैसे तो हर लिहाज़ से पिछड़ा माना जाता है. लेकिन जातियों के लिहाज़ से इसे राजपूत जाति का चित्तौड़गढ़ माना जाता है. किसी ज़माने में वह क्षेत्र बिहार की राजनीति के तीन दिग्गजों का चुनाव क्षेत्र था- कांग्रेस की रामदुलारी सिन्हा, समाजवादी हरिकिशोर सिंह और फिलहाल आरजेडी के सांसद रघुनाथ झा. तीनों मंत्री भी बने. एक बार ऐसा संयोग बना कि तीनों लोकसभा चुनाव में आमने-सामने हुए. उस समय तक रघुनाथ झा सांसद नहीं बने थे लेकिन शिवहर के सबसे लोकप्रिय बाहुबली नेता थे. उनको ब्राह्मणों के साथ राजपूतों का भी समर्थन मिलता था. टिकट मिलने से उनके समर्थक जोश में आ गए. उन्होंने नारा लगाया-
    मउगा मज़ा न देगा, मउगी मज़ा ने देगी,
    तेरे बगैर शेरे बिहार संसद मज़ा ने देगा.
    कहे हैं यही नारा उल्टा पड़ गया क्योंकि इसमें दो दिग्गज राजपूत नेताओं का मजाक उड़ाया गया था. शेरे बिहार यानी रघुनाथ झा बुरी तरह हार गए. जीत हुई मउगा यानी ऑक्सफर्ड रिटर्न हरिकिशोर सिंह की. प्रसंगवश, उस इलाके में तब भी बहुत पढ़े-लिखे नेताओं को जनता पसंद नहीं करती थी क्योंकि वह उनसे घुल-मिल नहीं पाता. हमेशा कमरे में घुसा रहता, दिल्ली से आने वाला अंग्रेजी अखबार पढ़ता हो, घर से बाहर निकलकर लोगों से कम ही मिलता. इसीलिए उनकी नज़र में मउगा होता था. लेकिन इस नारे के कारण रघुनाथ झा की जीती हुई बाज़ी पलट गई. क्योंकि राजपूतों में यह बात फ़ैल गई कि उसने दो-दो दिग्गज राजपूत नेताओं का अपमान किया है. सारे राजपूतों ने एक होकर हरिकिशोर सिंह के पक्ष में मतदान किया और उन्होंने रघुनाथ झा को उस चुनाव में करीब ढाई लाख मतों से पराजित किया. कहते हैं उसके बाद धीरे-धीरे वहाँ उनकी ज़मीन इतनी कमज़ोर पड़ गई कि उनको अपना जमा-जमाया क्षेत्र छोड़ना पड़ गया.
    १९९० के आसपास से चुनावों में तनाव बढ़ने लगा. ‘सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनायेंगे’ या ‘हुई भूल सो गई भूल, अब न भूल कमल का फूल’ जैसे नारे फिजाओं में गूंजने लगे तो दूसरी ओर फुसफुसाहटों में ‘भूरा बाल साफ़ करो’ जैसे उदघोष गूंजने लगे.
    अब तो चुनाव आयोग की आचारसंहिता की जैसे आदत पड़ गई है नेताओं. वे नारे नहीं लगाते, अंदरखाने हवा बनाते-बिगाड़ते हैं. पहले नारों से चुनावी हवा का कुछ-कुछ अंदाजा लग जाता था लेकिन अब तो बस अनुमान लगाए जाते हैं. सच मुझे वे दिन याद आ रहे हैं जब नारों की गूँज होती थी, गाड़ियों का शोर होता था, दीवारों पर नारे होते थे, पोस्टर-पम्फलेट होते थे, कैलेण्डर-झंडे होते थे-
    अंधियारे में एक इजोर
    नवलकिशोर-नवलकिशोर.

    १९८९ में प्रसिद्ध शायर सूर्यभानु गुप्त ने यह शेर लिखकर जैसे नारों की बिदाई का सन्देश लिख दिया था-
    वादे जुलूस नारे फिर-फिर वही नज़ारे
    जागीर है ठगों की कब से तमाम जंगल.

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