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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    सच में झूठ को मिलाता चलता हूँ

    By November 16, 201137 Comments13 Mins Read

    ‘रॉकस्टार’ फिल्म ने एक बार फिर इम्तियाज़ अली को एक ऐसे लेखक-निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया है जिसने हिन्दी सिनेमा को नया मुहावरा दिया, प्रेम का एक ऐसा मुहावरा जिसमें आज की पीढ़ी की बेचैनी छिपी है, टूटते-बनते सपनों का इंद्रधनुष है, सबसे बढ़कर आत्मविष्वास है जिससे उनकी फिल्मों के पात्र लबरेज आते हैं। इम्तियाज़ अली एक ऐसे निर्देशक हैं जिनकी फिल्में अपनी तरह की कहानियों के लिए जानी जाती हैं। सोचा न था, जब वी मेट और लव आजकल की सफलता ने उनको सफलता के शिखर पर पहुँचा दिया है। फिल्मों में आने से पहले टेलिविजन के लिए भी उन्होंने इम्तेहान जैसा सफल धारावाहिक लिखा और निर्देशित किया। कम उम्र में ही जमशेदपुर के रहने वाले इम्तियाज ने संघर्ष से सफलता की लंबी यात्रा तय की है। यह बातचीत उनकी इसी यात्रा को लेकर है। बातचीत पुरानी है लेकिन दिलचस्प है- जानकी पुल.

    सिनेमा को सपनों की दुनिया कहा जाता है। कब से आप सपनों की इस दुनिया से जुड़ने के सपने देखने लगे? बचपन में आपका सिनेमा से कैसा रिश्ता रहा? क्या याद आता है आपको?
    इम्तियाज़ अली – बचपन मेरा जमशेदपुर में बीता। घर में सिनेमा देखने की मनाही थी, सिनेमा देखना अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन जमशेदपुर में कुछ सिनेमाघर मेरे रिश्तेदारों के थे जहां के टॉर्चमैन और गेटकीपर हमें जानते थे। जो दोस्ती कर लेने पर हमें हॉल के अंदर बगैर टिकट के भी जाने देते थे, हम लोग घुस जाते, पाँच-दस मिनट सिनेमा देखते, फिर निकल आते। सिनेमा रोमांच था। हमें यह बहुत आकर्षित करता था कि एक बड़ा-सा अंधेरा हॉल है जिसमें सिर्फ स्क्रीन दिखाई दे रहा है और लोग पागल हुए जा रहे हैं। जितेन्द्र की फिल्म है तो लोग जितेन्द्र की तरह कपड़े पहन कर आ रहे हैं, अमिताभ बच्चन की फिल्म है तो उसकी तरह। वह माहौल हमें बहुत आकर्षित करता था…
    कुछ आकर्षण खास बन जाते हैं। कोई ऐसी फिल्म, ऐसे अभिनेता-अभिनेत्री जिसने आपको बहुत प्रभावित किया हो उस दौर में?
    इम्तियाज़ अली– शोले फिल्म की याद है। अमिताभ बच्चन का जबर्दस्त इंपैक्ट था मेरे ऊपर उस दौर में। उनकी हर फिल्म का… सिनेमा हॉल के बाहर निकलने पर भी उसका एक नशा-सा हमारे ऊपर रहता, काफी समय तक मैं उसी में खोया रहता। अमिताभ बच्चन की बहुत सारी फिल्में जो बाद में पता चला कि सलीम-जावेद ने लिखी हैं- काला पत्थर की याद है। एक फिल्म खास तौर पर याद आती है-बेमिसाल। उस फिल्म में वह सब नहीं था जो युजुअली अमिताभ बच्चन की फिल्मों में होता था, वह एक रियलिस्टिक फिल्म थी… पहली रियलिस्टिक फिल्म थी जो मैंने देखी थी… वह फिल्म बहुत ज्यादा याद रह गई मुझे। मेरे एज ग्रुप के लोगों को यह तो मानना ही पड़ेगा कि अमिताभ बच्चन से बड़ा इंपैक्ट नहीं था उस दौर में… इस बात को हम समझ सकते हैं जो हिन्दी बेल्ट के लोग हैं। वे जानते हैं कि अमिताभ बच्चन का क्या असर था। एंग्री यंगमैन की उसकी छवि मोहभंग के उस दौर से शायद जुड़ जाती थी… नाराजगी उस दौर में अच्छी चीज़ समझी जाती थी… चुप रहना अच्छा समझा जाता था…
    सिनेमा से ज्यादा मुझे दृश्यों का कोलाज-सा याद आता है… अलग-अलग फिल्मों के अलग-अलग सीन एक साथ हो गए हैं मेरी स्मृतियों में।
    थिएटर से आप कब जुड़े?
    इम्तियाज़ अली– जमशेदपुर में। जब नौवीं क्लास में पढ़ता था। वहीं पर अलादीन एंड द लैंप के शो में भाग लिया था। वह एक रेकार्डेड इंग्लिश प्ले था, उसमें एक्टिंग किया था, डांस भी किया था। वह मेरा पहला प्ले था। उसके बाद से यह सिलसिला रेग्युलर हो गया… पहले छोटे-छोटे प्ले… चार दोस्तों को जमा किया, कहानी बनाई और प्ले किया- उस दौर के नाटक मेरे इस तरह के हुआ करते थे। साल-दर-साल वे बड़े होते गए…
    नाटकों में आप क्या एक्टिंग किया करते थे?
    इम्तियाज़ अली–  एक्टिंग भी करता था, डायरेक्शन किसको कहते हैं तब समझ में नहीं आता था, लेकिन उस नाटक में किसको क्या करना है यह भी मैं ही बताया करता था, लिखने का काम भी मैं ही करता था, एक तरह से प्ले से जुड़ा हर काम…। धीरे-धीरे उसका स्केल बड़ा होता गया- पहले क्लास प्ले था, फिर हाउस प्ले हुआ, ग्यारहवीं-बारहवीं तक आते-आते फुल लेंथ प्ले करने लगा। पहला बड़ा प्ले जिसमें मैंने एक्टिंग की थी, डायरेक्ट नहीं किया था वह एन इंस्पेक्टर कॉल्स था, इंग्लिश प्ले था। असल में जमशेदपुर में अंग्रेजी नाटकों का कल्चर बहुत पुराना था, वहाँ क्लब संस्कृति भी है, जैसे बेल्डी क्लब है जिसमें मेरा पहला नाटक हुआ था, जिसमें क्लब के मेंबर नाटक देखने आते थे। इसके अलावा स्कूल में नाटक होते थे- डीबीएमएस स्कूल में मैं पढ़ता था। इसी संस्कृति में बड़ा हुआ। जब दिल्ली पढ़ाई करने आया उससे पहले तक मैं एक-दो प्ले डायरेक्ट कर चुका था।
    दिल्ली आने के बाद भी आप नाटकों में एक्टिंग करते रहे?
    इम्तियाज़ अली– देखिए, एक्टिंग मैंने काफी जल्दी शुरु की थी इसलिए एक्टिंग का एक कीड़ा जो होता है वह दिल्ली आने तक मेरा खत्म होने लगा था। फिर एक पर्सनैलिटी भी होती है। मुझे लगता है मेरे अंदर एक्टर वाली पर्सनैलिटी नहीं है। एक होता है इरॉटिक और एक होता है ऑब्सेसिव- मैं अपने आपको ऑब्सेसिव मानता हूँ। मेरे लिए किसी को देखना अधिक महत्वपूर्ण होता है बजाय इसके कि कोई मुझे देखे। जब लोग मुझे ज्यादा देखने लगते हैं तो मैं अपने आपको सहज नहीं महसूस कर पाता हूँ। इसलिए दिल्ली आने के बाद मैंने केवल दो नाटकों में एक्टिंग की- विजय तेंदुलकर के नाटक जाति ही पूछो साधु की में, जो मैंने खुद डायरेक्ट भी की थी। यह तब की बात है जब मैं बी.ए. फर्स्ट ईयर में पढ़ रहा। बाद में थर्ड ईयर में मैंनेनीम-हकीम नामक एक नाटक में एक्टिंग की थी, जो मॉलियर के एक नाटक का एडेप्टेशन था। जिसे मोहित चौधरी ने डायरेक्ट किया था। उसमें मैंने लीड रोल किया था- एक कसाई का रोल था जो डॉक्टर बनने की एक्टिंग कर रहा है। इंटेरेस्ट नहीं था मुझे उतना ज्यादा इसलिए एक्टिंग से मेरा ध्यान धीरे-धीरे हटता गया। मुझे एक्टिंग करना सहज नहीं लगता था।
    फिल्मी दुनिया में जाना है उस दिशा में आपने कब गंभीरता से सोचना शुरु किया?
    इम्तियाज़ अली– उस दिशा में मैंने काफी लेट फोकस किया। असल में मुम्बई जाने का मेरा मकसद अलग था। मेरी गर्लफ्रेंड प्रीति वहाँ पढ़ती थी। मैं तो वहाँ फिल्म की पढ़ाई पढ़ने भी नहीं गया था। मुंबई जाना है तो माँ-बाप को कुछ कहना था कि वहाँ कोई कोर्स करना है? अगर उनको कहता कि फिल्म का कोर्स करना है तो उनको लगता कि पता नहीं ये क्या कर रहा है, इसलिए मैंने एडवर्टाइजिंग-मार्केटिंग के कोर्स के बारे में उनको बताया। कुछ तो करना था। मुंबई में ऐसे ही बिना कुछ किए तो नहीं रह सकते थे। तो वह एक कारण बन गया। मैं वहाँ गया इसलिए था क्योंकि प्रीति वहाँ थी। तो उससे मिलने मैं मुंबई पहुंच गया, जेवियर इंस्टीट्यूट में एडवर्टाइजिंग-मार्केटिंग के कोर्स में दाखिला लेकर।
    वहाँ पहुँचकर भी मैंने एक प्ले किया था जो मेरा आखिरी प्ले था। वहीं जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ कम्युनिकेशन में किया था। उस प्ले का नाम था ऑफ्टर कॉलेज, जो मैंने खुद लिखा भी था। असल में तीन प्ले मैंने काफी इंटेरेस्टिंग किए थे जो मुझे लगता है कि अच्छे भी थे। पहला प्ले था प्लस टू, दूसरा प्ले था कॉलेज टाईम और तीसरा था ऑफ्टर कॉलेज।
    बाकी दो नाटक आपने कहां किए? दिल्ली में तो नहीं किया था!
    इम्तियाज़ अली- पहला और दूसरा जमशेदपुर में किया था। ग्रेजुएशनन के दौरान गर्मी की छुट्टियों में जब घर जाता था तो उस दौरान मैंने ये प्ले किए। प्लस टू  नाटक प्लस टू में पढ़ने वाले लड़कों को लेकर किया। ये नाटक जीवन की वास्तविकताओं पर आधारित थे,  मेरे अपने जीवन के अनुभवों को लेकर भी।
    आपने बताया कि स्कूल के दिनों में आपने नाटक लिखने शुरू कर दिए थे। लेकिन व्यवस्थित रूप से लेखन आपने कब शुरू किया? यह प्रश्न आपसे इसलिए पूछ रहा हूँ क्योंकि आप अपनी फिल्म की पटकथाएं खुद लिखते हैं और आपकी फिल्मों में पटकथा सशक्त होती है। आपकी फिल्मों को देखकर लगता है कि आप पहले से लिखते रहे हैं।
    इम्तियाज़ अली- लेखन की शुरूआत तो बचपन में कविता लिखने से ही हुई थी। स्कूल के दिनों में लिखना एक तरह से मेरी जरूरत बन गई थी। मैं डायरी और जर्नल्स भी लिखने लगा था उस दौर में, लेटर्स भी बहुत ज्यादा लिखते थे। लिखने की आदत थी बहुत ज्यादा। बाद में जब मुंबई में कोर्स पूरा करने के बाद १९९४ में क्रेस्ट कम्युनिकेशन नामक कंपनी में कंसेप्चुअलाइजर, डायरेक्टर, राइटर के रूप में काम करना शुरू किया तो वहाँ एक तरह से नियमित तौर पर लिखना फिर से शुरू हो गया। वहाँ लिखने का मौका काफी मिला…
    वहाँ क्या सीरियल्स लिखने लगे?
    इम्तियाज़ अली- वहाँ का किस्सा बहुत मजेदार है। उन दिनों १६-१८ घंटे मैं रोजाना लिखता था। रात को वहीं सो जाना, सुबह उठकर फिर लिखना। लेकिन सबसे मजेदार बात यह है कि करीब डेढ़ साल तक मैंने वहाँ जो कुछ भी लिखा उसमें से कुछ भी सामने नहीं आ पाया। सब गायब है… वहाँ मैंने बहुत सारे कांसेप्ट नोट लिखे, ट्रीटमेंट नोट लिखे… और भी पता नहीं क्या-क्या लिखा? उसमें से पुरुषक्षेत्र नामक एक कार्यक्रम ही सामने आ पाया। और भी काफी कुछ था जिसमें से कुछ भी सामने नहीं आ पाया।
    किस तरह की चीजें लिखीं आपने उस दौरान? जरा विस्तार से बताइए।
    इम्तियाज़ अली- काफी कुछ लिखा। जैसे एक कहानी थी जिसे श्याम बेनेगल ने डायरेक्ट किया था। जो उस समय में मेरे लिए काफी बड़ी बात थी। मेरी उम्र २१-२२ साल थी। लेकिन वह कभी सामने नहीं आ पाया। वह बड़ा इंटेरेस्टिंग कांसेप्ट था, जिसे मैं टेल्स फ्रॉम हार्ट कहता था। जिसका कुछ रूप बाद में मेरे धारावाहिकों रिश्ते या स्टार बेस्टसेलर के रूप में सामने आया। उसका कांसेप्ट यह था कि संबंधों को लेकर लिखी अलग-अलग कहानियों को अलग-अलग निर्देशक डायरेक्ट करें। उसकी पहली कहानी जिसे टीवी की भाषा में पायलट कहते हैं उसे श्याम बेनेगल ने डायरेक्ट किया था। वह अनुभव मेरे लिए बहुत अच्छा था। उस कहानी का नाम था रांग नंबर। कहानी यह थी कि एक औरत के घर में फोन आता है। वह विधवा है, उसका एक छोटा बच्चा है जो फोन उठाकर बातें करता है। लेकिन वह रांग नंबर होता है। उस बातचीत के दौरान कुछ ऐसा इंटेरेस्टिंग होता है कि वह रांग नंबर अंकल उसे बार-बार फोन करने लगता है। पहले उस औरत को कुछ संदेह होता है, लेकिन फिर उस फोन वाली आवाज़, औरत और बच्चे के संबधों की एक कहानी विकसित होने लगती है। हो सकता है उस आदमी के जीवन में कोई कमी रही हो जो बार-बार फोन करता है। वह जाहिर नहीं करता है कि वह कौन है। फिर एक दिन फोन आना बंद हो जाता है। बाद में वह औरत डेस्परेट होकर उसे ढूँढने की कोशिश करती है। चालीस मिनट की एक छोटी-सी कहानी थी।
    एडवर्टाइजिंग-मार्केटिंग का कोर्स करने के बाद आप क्रेस्ट कम्युनिकेशन में आए और धारावाहिक लिखने से आपने व्यावसायिक करियर की शुरूआत की?
    इम्तियाज़ अली- नहीं! मैंने पहली नौकरी ज़ीटीवी में की थी। इंस्टीट्यूट से निकलने के बाद मैंने पहली नौकरी वहीं की थी। कोर्स एडवर्टाइजिंग का था, फिल्म-टीवी का उससे कोई लेना-देना नहीं था। दिल्ली छोड़ने के बाद जो सबसे बड़ा संयोग मेरे साथ हुआ वह थी जीटीवी की नौकरी, जिसके कारण टीवी की दुनिया से मेरा रिश्ता कायम हुआ। मुझे शादी करनी थी और उसके लिए पैसे कमाने थे। एडवर्टाइंजिंग का कोर्स करने के बाद मुझे लगा कि इस क्षेत्र में नौकरी मिल जाएगी। फिर शादी कर पाउंगा…
    यानी तब तक सब कुछ शादी को लेकर ही चल रहा था?
    इम्तियाज़ अली- हाँ! एक्चुअली, तब तक मैंने कुछ और सोचा नहीं था। मैं ये सब बातें इसलिए खुलकर नहीं कहता कि कहीं नौजवान उसे फॉलो न करने लगें। मेरे साथ सब कुछ संयोग से सही पड़ा या गलत पता नहीं लेकिन दूसरा आदमी अगर इसको फॉलो करेगा तो उसका भला तो होनेवाला नहीं है… वह जमाना शायद दूसरा था। पता नहीं…
    मैंने सोचा था कि एडवर्टाइजिंग के क्षेत्र में मुझे नौकरी मिल जाएगी। करीब डेढ़ साल तक मैंने कुत्तों की तरह काम ढूँढा मगर नहीं मिला। कॉपीराइटिंग का काम नहीं मिला। मैं जब कोर्स कर रहा था तबसे ही इस फील्ड में काम ढूंढ रहा था। कोर्स पूरा करने के के करीब छह महीने बाद तक मुझे पता नहीं काम क्यों नहीं मिला! मुझे समझ में नहीं आता था कि ऐसा क्यों हो रहा है। पहले मुझे लगा कि कुछ है जो मुझे उस दिशा में जाने से रोक रहा है। मुझे दो ही बार जीवन में ऐसा अहसास हुआ है कि दुनिया में कुछ सुपर नेचुरल खेल भी है। पहली बार मुझे इसी दफा हुआ कि एडवर्टाइजिंग के फील्ड में जॉब नहीं मिल रही है… पता नहीं क्यों? इसका कोई कारण समझ में नहीं आया। मैं अपनी क्लास का अच्छा राइटर हुआ करता था- हिंदी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं में अच्छी तरह से लिख सकता था। लेकिन किसी विज्ञापन एजेंसी में मुझे बतौर लेखक कॉपीराइटर की जॉब नहीं मिली। कई एजेंसियों में बात हो जाती थी कि ठीक है मंडे से आपका काम शुरू हो जाएगा। ऑफिस के लोगों से भी मिलवा दिया जाता था, कुर्सी भी दिखा दी जाती थी। लेकिन किसी न किसी वजह से मुझे नौकरी नहीं मिली…
    फिर जीटीवी की नौकरी कैसे मिली?
    इम्तियाज़ अली- मैं विज्ञापनों की दुनिया में जगह बनाने की कोशिश करता रहा। दिल में था कि टीवी-फिल्म के लिए भी काम करेंगे, मीडिया से जुड़़ेंगे, लेकिन मन में संदेह भी था- उसमें करेंगे क्या, पैसे कहां से आएंगे, इस फील्ड में कैसे काम मिलेगा, कितना संघर्ष करना पड़ेगा। हम छोटे शहरों से आए लागों को इसमें संदेह रहता है कि यह फील्ड ऑर्गनाइज्ड नहीं होता। बहरहाल, जब एडवर्टाइजिंग की दुनिया में ब्रेक नहीं मिला तो झख मारकर मैंने ज़ीटीवी में नौकरी कर ली, जिसमें मेरी पगार १५०० रुपए थी और उसमें असल में डिलीवरी करने का काम था- टेप इधर से उधर ले जाना, लेबलिंग करना… यह सितंबर १९९४ की बात है। १९९३ में मैं दिल्ली से मुंबई गया था।
    तीन महीने तक मैंने वहाँ काम किया। ज़ी तब नया चैनल था, नई-नई चीजें हो रही थीं। तो वहाँ काम करने का मौका बहुत था। उस समय ऐसा था कि टेलिविजन यहाँ पर जमेगा या नहीं किसी को पता नहीं था। तो बहुत सारी औरतें, लड़कियाँ टाईमपास प्रोफेशन की तरह इसको अपनाती थीं। इसलिए वहाँ कोई काम करना नहीं चाहता था। इसकी वजह से अगर आप काम करना चाहते तो उसके लिए मौके बहुत थे। तीन महीने बाद मुझे क्रेस्ट कम्युनिकेशन में नौकरी मिल गई।
    हाँ पर आपने पुरुषक्षेत्र जैसा कार्यक्रम किया। काफी बोल्ड माना गया था उसे उस समय। लोग टीवी के परदे पर अपने निजी प्रसंगों की चर्चा करते थे। इस तरह का पहला कार्यक्रम था। आज के रियलिटी शो के दौर से पहले आपने एक ऐसा कार्यक्रम बनाया था। जीटीवी पर प्रसारित होनेवाले इस टॉक शो के बारे में जरा बताइए। वह आपका पहला स्वतंत्र काम था। आप उसके कांसेप्चुअलाइजर थे, निर्देशक थे। अपने उस पहले बड़े ब्रेक के बारे में कुछ बताइए?
    इम्तियाज़ अली
    इम्तियाज़ अली-  जैसाकि आप जानते हैं कि औरत-मर्द के रिश्ते में मेरी बहुत दिलचस्पी रही है। बचपन से ही… खासकर ऐसी चीजों में बारे में बातें करना उचित नहीं समझा जाता है समाज में। वह सारी जो जिज्ञासाएँ थीं उसको लेकर इसका कांसेप्ट था कि ऐसा मंच हो जिस पर ऐसे विषयों, ऐसे प्रसंगों को लेकर खुलकर चर्चा हो। उसका पावर होता है इसका अनुभव मुझे पुरुषक्षेत्र के दौरान हुआ। उसमें हर एपिसोड का एक थीम होता था- कुछ रिलेशनशिप को लेकर होते थे, कुछ सीरियस विषयों को लेकर भी होते थे, जैसे कि एक थीम एचआईवी भी था, समलैंगिकता को लेकर कई एपिसोड थे। लेकिन जो थीम मुझे खुद इंटेरेस्टिंग लगते थे वे कुछ अलग तरह के होते थे। जैसे कि एक बार विषय था कि बाहर की दुनिया के बारे में अपनी बीवी को कितना बताना चाहिए, औरतों से उसके पति को डर क्यों लगता है, चाइल्ड एब्यूज से महिलाओं के जीवन पर किस प्रकार के असर पड़ते हैं…

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