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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    नवसाम्राज्यवाद पूरी दुनिया के लिए खतरा है

    By December 18, 20102 Comments6 Mins Read

    समाजवादी नेता-विचारक सुरेन्द्र मोहन से यह बातचीत युवा पत्रकार विनीत उत्पल ने की थी जो प्रभात खबर में ११ दिसंबर २००५ को प्रकाशित हुआ था. हमारे कहने पर विनीत ने तत्परतापूर्वक इसे उपलब्ध करवाया. सुरेन्द्र मोहन जी को श्रद्धांजलि स्वरुप यह बातचीत प्रस्तुत है- जानकी पुल. 

    जनता में इतनी शक्ति है कि सरकार की पूंजीवादी नीतियों को बहुत दिन तक बर्दाश्त नहीं करेगी  और आन्दोलन के साथ ही स्थितियां भी बदलेंगी. पिछले बीस सालों में जो भी सरकारें केंद्र की सत्ता पर काबिज हुई हैं, वह पूरी तरह से किसान विरोधी रही हैं. उन्हें न तो किसानों से कोई मतलब रहा
    और न ही उनके विकास के लिए कोई नीतियाँ ही बनायीं. इस कारण भारत के किसान पूरी तरह लुट गए और बर्बाद हो गए. सबसे आश्चर्य की बात यह है कि जहाँ स्वतंत्रता प्राप्ति के समय जीडीपी में भारतीय किसानों का भाग ५६ फीसदी था, वहीं २०२० तक उनका हिस्सा केवल छह फीसदी  ही रह जायेगा. देश की चिंता में ये शब्द हैं वरिष्ठ समाजवादी चिंतक सुरेन्द्र मोहन के.
    शुरुआती दौर में विज्ञान के छात्र रहे सुरेंद्र मोहन समाजवादी धारा के ऐसे सशक्त हस्ताक्षर हैं, जिनकी सादगी, समसामयिक विषयों पर उनके विचार और मजदूर-किसानों के हित में जारी आन्दोलन में उनका सहयोग एक अलग मायने रखता है. अपनी बीती युवा जिंदगी को याद कर वे कहते हैं, ‘इंटर तक मैं विज्ञान का छात्र  रहा, लेकिन विज्ञान में मेरी रूचि नहीं थी. यही कारण था कि बीएससी करने में मुझे काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा.‘ ‘जीवन के शुरूआती दौर से ही मेरी रूचि राजनीति में रही है. जालंधर से इंटर करने के बाद मैंने छह साल पढाई छोड़ दी. इस बीच कुछ बिजनेस भी किया. उसी दौरान खेत-मजदूर किसानों के खिलाफ बेदखली आन्दोलन में भाग लेने के
    कारण १९५० में जेल भी जाना पड़ा. फिर कुछ  दिनों तक स्कूल में मास्टरी भी की. उर्दू के एक अख़बार में संपादक का कार्य भी किया. दो महीने में एक बार छपने वाले अखबार के दो अंक मैंने निकाले थे.‘  
    ‘जालंधर से मैं बनारस विश्यविद्यालय आ गया, लेकिन समाजशास्त्र  में एमए की डिग्री डीएवी कालेज देहरादून से लिया और साथ ही मजदूर आन्दोलन में भी भाग लेता रहा. एमए कि डिग्री लेने के बाद आगरा विश्यविद्यालय में सोशल इनवेस्टिगेशन का कार्य किया. उसके उपरांत काशी विद्यापीठ में दो साल तक समाजशास्त्र का प्राध्यापक भी रहा.‘ 
    ‘मैं जिस पार्टी के युवा कार्यकारिणी के लिए काम कर रहा था, उसके केन्द्रीय कार्यालय ने मुझे दिल्ली आने का आग्रह किया, ताकि पार्टी का सन्देश पूरे देश में फ़ैल सके.‘ ‘बनारस में रहने के दौरान कई छात्र और किसान आन्दोलनों में भाग लिया. मुगलसराय और बनारस के बीच एक जगह किसानों के आन्दोलन में भाग लिया. जिस कारण जेल की हवा खानी पड़ी. १९५८ तक उत्तरप्रदेश  के विभिन्न छोटे-बड़े किसान आन्दोलनों में भाग लेता रहा‘  
    ‘नयी दिल्ली आने के बाद सोशलिस्ट पार्टी की केंद्रीय कार्यकारिणी में युवा संगठन के लिए भरपूर कार्य करता रहा. १९६२ से १९६४ तक इंटरनेशनल सेकुलर पार्टी का संयुक्त सचिव रहा और १९७३ में इसका जेनरल सेक्रेटरी बना. ‘१९८४ में जब मेरे राज्यसभा का कार्यकाल ख़तम हुआ तब से पूरी तरह लेखन का कार्य करता हूँ. विभिन्न समाचार पत्रों में कालम लिखता हूँ.‘ 
    सक्रिय राजनीति के संदर्भ में बातचीत करने पर सुरेंद्र मोहन कहते हैं, ‘१९८९ में जब नेशनल फ्रंट बना तो इसकी नीति और घोषणा पत्र पर काम करने वालों में मैं भी शामिल था. जनता दल के साथ काम किया. यूनाइटेड फ्रंट में भी काम किया.  
    पारिवारिक जीवन: मेरी शादी काफी देर से हुई. मैंने प्रेम-विवाह किया है और वह भी अंतरजातीय. मेरी पत्नी भी सामाजिक कार्यकर्त्ता है. एक पुत्र और एक पुत्री है. पुत्र-पुत्री और पुत्रवधु सभी मीडिया से जुड़े हैं.  
    समाज पर नजरिया: आज भी पूरे देश में कई युवा ऐसे हैं, जो समाज के लिए चिंतित है और उत्थान के लिए कार्य कर रहे हैं, असंगठित मजदूरों, वनवासियों के उत्थान के लिए आज के दौर में सैकड़ों युवा विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं. युवा पीढ़ी में इन आन्दोलनों को नेतृत्व की नयी
    दिशा में अरुणा राय, मेधा पाटेकर, डा. सुनीलम, रामकृष्णन, अशोक चौधरी जैसे लोग गंभीरतापूर्वक कार्य कर रहे हैं.  
    आज का दौर युगांतर का दौर है और इसी वजह से अधिकतर लोग दुखी हैं. यह एक ऐतिहासिक युगांतर है. क्योंकि एक कृषि प्रधान देश को जबरदस्ती औद्योगीकरण की ओर घसीटा जा रहा है. वैसे, उनके अनुसार देश को चलने वाले अपने निजी फायदे के लिए गलत नीतियों को लागू कर रहे हैं. यह सही है कि छोटे-बड़े उद्योगों के स्थापित होने से लोगों को रोजगार मिलेगा और देश में खुशहाली आएगी. लेकिन आज के दौर में शिक्षा, स्वास्थ्य भी हर व्यक्ति का अधिकार हो, पंचायतीराज को और अधिक मजबूत बनाया जाये. साथ ही, रोजगार गारंटी योजना को इससे जोड़ा जाये. उनका मानना है कि ग्राम सुधार का आज के परिवेश में काफी अधिक महत्त्व है और इसे भी पंचायत से जोड़ना होगा. देश के कई इलाकों में ना तो ग्राम सुधार हुए और ना ही भूमि सुधार, यही
    कारण है कि बिहार, उत्तरप्रदेश, तेलंगाना क्षेत्र में हिंसा बढ़ी है.
    मंडल कमीशन को लेकर समाज की पिछड़ी जातियां काफी जागरूक हुई हैं. अस्सी के दशक में मैंने इस मुद्दे को लेकर प्रदर्शन किये थे, जिसमें कर्पूरी ठाकुर, शहाबुद्दीन, शरद यादव, रामविलास पासवान, मधु दंडवते आदि का काफी सहयोग रहा.  
    मेरा सीधे तौर पर मानना है कि पिछड़ी जातियों में सशक्तिकरण होना चाहिए. समाज में ऊंच-नीच का भेदभाव अभी तक है. पिछले १५ सालों के भारतीय राजनीतिक इतिहास की ओर नजर डालें, तो हम पाते हैं कि वही लोग राज्य और केंद्र में सत्ता हासिल कर रहे हैं, जिन्होंने कभी सपने में भी सत्ता हासिल करने कि बात ना सोची हो. इस तथ्य को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता था कि समाज की अगड़ी जातियों ने भी कम भ्रष्टाचार नहीं किये.इसलिए पिछड़ी जातियों को भ्रष्टाचारी कहना ठीक ना होगा. 
    यदि हम स्वतंत्रता आन्दोलन से लेकर अब तक के इतिहास की ओर व्यापक दृष्टि डालें, तो हमेशा ही वरिष्ठ नेताओं के बीच मनमुटाव होते रहे हैं. जवाहरलाल नेहरु और सरदार पटेल के बीच के झगडे जगजाहिर हैं. इसी तरह जयप्रकाश और लोहिया के बीच कुछ मुद्दों पर मनमुटाव रहे.  
    हिंदुस्तान में धर्म के नाम पर लड़ाई-झगड़ा कोई नयी बात नहीं है. लेकिन अमेरिका ने जिस तरह साम्राज्यवाद फ़ैलाने के लिए इस्लाम को निशाना बनाया, इराक में बेगुनाहों का क़त्ल किया, यह काफी शर्मनाक है.  
    आज के दौर में नवसाम्राज्यवाद एक बार फिर दुनिया को गुलाम बनाना चाहता है. इस साजिश का नेतृत्व वर्तमान में अमेरिका कर रहा है. आज की राजनीति मुनाफे की राजनीति बन गयी है. इस राजनीति में धर्म और जाति के मुद्दे काफी जोर-शोर से शामिल हो रहे हैं. राजनीति के स्तर में काफी गिरावट आई है. कभी वक्त था जब लोग देश के लिए अपनी जान तक जोखिम में डाल देते थे, लेकिन वक्त के बदलाव की बयार ने नैतिक मूल्य को ख़तम कर डाला. वक्त बदलने के साथ नैतिक मूल्य भी बदल गए हैं. आज के संसदीय राजनीति में नैतिक मूल्य वाले लोगों का मिलना असंभव सा हो गया है.

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