इस आयोजन के तो नागरजी मैं सख़्त ख़िलाफ़ हूँ
लिखित में कोई बयान पर मुझसे न लीजिये
मैं जो कह रहा हूँ उसी में बस मेरी सच्ची अभिव्यक्ति है
वैसे भी मौखिक परंपरा का देश है यह
जीभ यहाँ कलम से ज़्यादा ताकतवर रहती आयी है
नारे से ज़्यादा असर डालती आयी है कान में कही बात
आपने यह जो बनाया एक साधारण बयान लिखकर
बढ़कर हर कोई दस्तखत कर देगाः हर व्यक्ति की
इसमें बात आ गई, लेकिन आने से
रह गई हर व्यक्ति की अद्वितीयता
– ऐसे बयान का क्या फायदा?
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