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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    हिंदी-लेखकों को कब मिलेगी मुक्ति उपेक्षित होने के अहसास से

    By May 20, 20118 Comments4 Mins Read

    आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जी के देहांत के बाद बड़े पैमाने पर इस बात को लेकर चर्चा हुई कि करीब ९५ साल की भरपूर जिंदगी जीने वाले इस लेखक की बहुत उपेक्षा हुई. साहित्य अकादेमी में जो शोकसभा हुई उसमें भी यह कहा गया कि साहित्य अकादेमी में उनके ऊपर पहला कार्यक्रम तब हुआ जब उनका देहांत हो गया. उनके जीते-जी उनकी सुध अकादेमी ने नहीं ली. समय-समय पर अनेक लेखकों को लेकर यह सवाल उठाया जाता है कि उनकी उपेक्षा हो रही है, सरकार और संस्थाएं उनकी सुध नहीं ले रही हैं, आदि-आदि. लेकिन यहाँ एक सवाल यह भी उठता है कि आखिर हिंदी लेखकों को लेकर ही यह बात क्यों की जाती है? आखिर हिंदी के लेखक सरकार और संस्थाओं के इतने मुखापेक्षी क्यों होते हैं?
    कोई लेखक सरकार या किसी संस्था के लिए नहीं लिखता है, उसका लेखन पाठकों के लिए होता है और पाठकों का प्यार ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी होती है. अगर हम जानकी वल्लभ शास्त्री जी की ही बात करें तो अपने शहर मुज़फ्फरपुर में उनका जो सम्मान था वह शायद ही किसी लेखक को नसीब होता होगा. उनका निवास स्थान ‘निराला निकेतन’ तीर्थस्थल की तरह था. बाहर से जानेवाला बड़े से बड़ा व्यक्ति उनके घर ज़रूर जाता था. उनकी मृत्यु के बाद अनेक लोगन ने यह कहा-लिखा कि वे मुजफ्फरपुर शहर को जानकीवल्लभ शास्त्री के कारण ही जानते थे. उनको अनेक बड़े-बड़े पुरस्कार मिले, अनेक सामान उन्होंने ठुकराए भी. मृत्यु से कुछ समय पहले उन्होंने पद्मश्री को ठुकरा दिया था क्योंकि वह उनको अपने मान के अनुकूल नहीं लगा था. वे ऐसे लेखक थे जो अपेक्षा या उपेक्षा के लिए नहीं जिए बल्कि लेखकीय मान-सामान को उन्होंने अधिक महत्व दिया. लेखकीय गरिमा को बनाये रखा. वे लेखक की तरह जिए लेखक की तरह मरे. स्थानीय समाज भी उनको लेखक ही मानता था, कुछ और नहीं. लेकिन उपेक्षा या अपेक्षा का प्रश्न क्यों?
    यह प्रश्न केवल शास्त्रीजी के संबंध में ही नहीं बल्कि हिंदी के लेखकों के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर अक्सर हमारे मूर्धन्य लेखकों को लेकर यह सवाल क्यों उठाया जाता है कि उनकी उपेक्षा हो गई. मेरा तो यह मानना है कि हिंदी का लेखक होना ही अपने आपमें उपेक्षित होना है. आज भी हिंदी के लेखकों को समाज में उनके लेखन के कारण महत्व नहीं मिलता है बल्कि इस कारण मिलता है कि वे सत्ता के किस शिखर पर विराजमान हैं, उनकी कुर्सी कितनी ऊंची है. इस संबंध में मनोहर श्याम जोशी एक किस्सा सुनाया करते थे कि एक दिन वे अपने घर प्रसिद्ध लेखक अज्ञेय के साथ बैठे हुए थे कि उनके एक रिश्तेदार उनसे मिलने आये. अज्ञेय कितने बड़े लेखक थे यह बताने की ज़रूरत नहीं है. उन्होंने अपने उस रिश्तेदार को अज्ञेय जी का परिचय देते हुए कहा कि ये अज्ञेयजी हैं, हिंदी के बहुत बड़े लेखक हैं. बाद में जब अज्ञेय जी चले गए तो जोशीजी के उस रिश्तेदार ने पूछा कि लेखक तो ठीक हैं लेकिन ये बताओ कि ये अज्ञेयजी करते क्या हैं? क्योंकि उनके रिश्तेदार की समझ से यह बात बाहर थी कि ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ जैसी पत्रिका का संपादक मनोहर श्याम जोशी अगर किसी आदमी को बहुत बड़ा  बता रहा है तो कोई ऊंचे ओह्देवाला क्यों नहीं है.
    एक तरफ भारत में किताब का बाजार-व्यापार बढ़ रहा है, अंग्रेजी भाषा के लेखक अपने लेखन की बदौलत केवल प्रसिद्धि ही नहीं प्रचुर धन भी बटोर रहे हैं, लेकिन हिंदी का बड़े से बड़ा लेखक भी हिंदी बौद्धिक समाज के बाहर शायद ही प्रतिष्ठा पाता हो, लेखन से आय तो बहुत दूर की बात है. पुरस्कारों वगैरह की राशि इतनी कम होती है कि उनमें सिवाय सम्मान के और कुछ नहीं मिलता. इसलिए लगता है कि हिंदी के अधिकांश लेखक अपने आपको इस नए बाजार में उपेक्षित महसूस करने लगे हैं. आज भी हिंदी का कोई प्रकाशक अपने किसी लेखक को ‘स्टार’ की तरह से पेश नहीं करता, प्रचार-प्रसार पर कुछ खास ध्यान नहीं देता. कुल मिलाकर उनकी नज़र सरकारी खरीद पर ही अधिक रहती है. सरकारी खरीद पाठकों के लिए नहीं होती, उसका उद्देश्य विभिन्न स्तरों पर उस खरीद से जुड़े लोगों को लाभ पहुँचाना होता है. ऐसे में लेखक की बात नहीं होती बात कमीशन की होती है. किताबें तो बिकती हैं लेकिन लेखक उपेक्षित ही रह जाता है.
    अगर उपेक्षा का मतलब सरकारी संस्थाओं द्वारा मान-सम्मान, इनाम-इकराम मिलना न माना जाए तो किसी न किसी स्तर पर हिंदी का हर लेखक उपेक्षित है. इसलिए बजाय इसकी चर्चा के कि जानकीवल्लभ शास्त्री या कई दूसरे मूर्धन्य लेखक उपेक्षित रह गए चर्चा इसकी होनी चाहिए कि आखिर किस तरह हिंदी लेखकों को उपेक्षा भाव से मुक्त करवाया जाए.  

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