Close Menu
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
    Subscribe
    • कविताएं
    • संपर्क
    • Vote for 2017 Best Seller
    • Best Seller 2018
    • सहयोग/ समर्थन
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    उदय प्रकाश की कहानी ‘खंडित स्त्रियां, नेहरूजी और अस्ताचल’

    By December 21, 20105 Comments14 Mins Read
    उदय प्रकाश की कहानियों का जितना प्रभाव समकालीन कथा-धारा पर पड़ा है उतना शायद किसी और लेखक का नहीं. उनकी कहानियों में निजी-सार्वजनिक का द्वंद्व, व्यवस्था विरोध का मुहावरा इतनी सहजता से आया है कि वे कहानियां अपने समय-समाज के प्रति कुछ कहती भी हैं और उनके अंधेरों में झांकने की कोशिश भी करती हैं. वास्तव में, कथाकार उदय प्रकाश को साहित्य अकादेमी पुरस्कार का मिलना कहानी की उस परंपरा का भी सम्मान है जिसके वे सबसे बड़े प्रतिनिधि हैं. प्रस्तुत है उनकी एक प्रतिनिधि  कहानी- जानकी पुल.

    अगर बारिश समय पर शुरू हो जाए तो आधा आषाढ़ होते-होते हमारा गांव सारी दुनिया से कट जाता था. न वहां चिट्ठियां आती थीं, न कोई मेहमान. क्योंकि गांव के एक ओर नदी थी और बाकी तीन तरफ छोटे-बड़े जंगली नाले, पहाड़ियां, डोंगरी और जंगल.
    जिधर बड़ी वाली नदी थी, बाज़ार और कस्बे का रास्ता उधर से ही जाता था. तब तक उस नदी पर पुल नहीं बना था, चारकोल और गिट्टी वाली सड़क नहीं बनी थी. अगर कभी-कभी बाज़ार या कस्बे जाना गांव वालों को ज़रूरी ही पड़ जाता था तो पेड़ के तने को खोखला करके और उसे सुखाकर उसकी डोंगी बना ली जाती थी.
    वह नदी तो खैर तमाम रहस्यों से भरी थी ही, ये जंगली पहाड़ी नाले भी कम रहस्य भरे नहीं थे. ये नाले चट्टानों की खोह से, जंगल के भीतर की खाइयों से और वनस्पतियों-पौधों की नमी से भरे अन्धकार के बीच में से बहते थे.
    और वहीं उन्हीं अबूझ गहराइयों से उनका पानी तरह-तरह से बोलता था. जो लोग अलग-अलग ऋतुओं में, दिन और रात के अलग-अलग पहर में पानी की आवाज़ सुनने के आदी हैं, वे थोडा-बहुत इन पहाड़ी वनैले नालों के रहस्य में उतर सकते हैं.
    जब २७ मई १९६४ को गांव में, अंग्रेजी के नौ नंबर के बीच से आर-पार छलांग मारने वाली बिल्ली छाप बैटरी से चलते रेडियो से प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु का समाचार आया था, उस दिन हम बहुत सारे बच्चे ट्रैक्टर में बैठकर एक दूसरे चट्टानी नाले को देखने गए थे. वह ट्रैक्टर पॉवरिन से चलता था. डीजल की खोज बाद में हुई. अब पॉवरिन कहीं नहीं मिलेगा. यह अब कभी नहीं होगा.
    जिस नाले को हम देखने गए थे, उस नाले के आसपास बहुत-सी बहुत पुरानी मूर्तियां निकली थीं. ये मूर्तियां जिस तरह से पत्थरों को तराशकर बनाई गई थीं, वैसे पत्थर हमारे गांव में तो क्या, पूरे जिले में कहीं नहीं मिलते थे, इसलिए यह अनुमान लगाया जाता था कि ये पत्थर कहीं बहुत दूर देश से यहाँ तक लाये गए होंगे. उस ज़माने में जब ये मूर्तियां गढ़ी गई थीं, उस समय न रेलगाड़ी रही होगी न ट्रक. बैलगाडियों में अगर पत्थर लाए जाते तो बैलों की, पता नहीं कितनी पीढियां सिर्फ चार-पांच पत्थर यहाँ तक पहुंचाने में खत्म हो जाती.
    और वह आदमी भी, जो अपनी बैलगाड़ी में पत्थर रखकर यहाँ के लिए रवाना होता, वह यहाँ पहुँचते-पहुँचते कितना बूढ़ा हो चुका होता. यही कारण था कि बिना किसी इतिहासकार की मदद के हमारे गांव के सीधे-सीधे अनपढ़ लोग भी इस बात को जानते थे कि ये पत्थर इसी नाले की धार में कहीं बहुत ऊपर से बहाए गए होंगे. सैकड़ों-हज़ारों कोस दूर से. इसी से यह शक भी होता था कि यह छोटा-संकरा सा नाला समय के किसी खंड तक कोई बहुत बड़ी नदी रहा होगा.
    इस बात को कोई नहीं जानता कि यह नाला किस इलाके के अज्ञात पहाड़ के भीतर मौजूद किस सदियों पुराने पानी के सोते में से निकलता है. दुनिया के इतिहासकारों और भूगोलविदों को इसकी जानकारी शायद हो, हमारे गांव में इसे कोई नहीं जानता.
    दूसरे जंगली पहाड़ी नालों की तरह ही उस नाले की धार भी बहुत तेज थी. घुटना-भर पानी होते-होते ही लगता था कि यह नाला हमें ज़मीन से उठाकर अपने भीतर के सुरंग में बहा ले जायेगा. आषाढ़-सावन के महीनों में अक्सर रात में अपनी खोई हुई गाय या बैल ढूंढने गए हुए लोग ऐसे नालों में बह जाते थे और फिर उनकी लाश कभी नहीं मिलती थी. होता यह होगा कि या तो उनकी लाश जंगल की किसी चट्टानी खोह में में फंस जाती होगी और बाद में वहां नरपत, घास और ठहरे हुए पानी में सिर्फ कंकाल बचता होगा या फिर चील और कौए उसे भी खा जाते होंगे.
    २७ मई १९६४ को हम जिस नाले को देखने गए थे, हम अपने घर आये किसी भी मेहमान को एक बार ज़रूर वहां ले जाते थे. उस नाले के आसपास जो मूर्तियां निकली थीं, वे कई तरह की थीं. अष्टभुजी दुर्गा की मूर्ति, काल भैरव और यक्षिणी की मूर्ति, बड़े-बड़े पत्थरों के नक्काशीदार खम्भों को अपने सिर या कन्धों पर उठाये शेरों और हाथियों की मूर्तियां. या फिर किसी विशालकाय अज्ञात देवता या पुरुष को अपने सिर और कन्धों पर ढोती हुई, छोटी-छोटी, अत्यंत सुन्दर शरीर वाली स्त्रियों की मूर्तियां.
    उन पत्थरों में जितने देवता और जितने पशु थे, उससे कई गुना ज्यादा स्त्रियां थीं. ये सभी स्त्रियां पीड़ित थीं या प्रसन्न, यह कहीं से ज़ाहिर नहीं होता था. सभी की सभी स्त्रियां पत्थर की थीं और सबका चेहरा एक जैसा दिखाई देता था. यह बात भी सबमें एक समान थी कि उन्होंने कुछ गहनों के अलावा और कुछ भी नहीं पहन रखा था. गहने भी बहुत कम थे, उनके शरीर के मुकाबले.
    ये स्त्रियां या तो अपने नंगे शरीरों के साथ पूजा की मुद्रा में दिखाई गई थीं या किसी देवता की गोद में बैठी हुई. देवता की पूजा, सेवा या उसका विराट बोझ ढोने के लिए ही इन पत्थर की स्त्रियों को गढा गया था. लेकिन वे सुन्दर बहुत होती थीं. खास तौर उनके स्तन और उनकी जंघाएँ. दुःख यह था कि ऐसी ज़्यादातर मूर्तियां खंडित थीं. बल्कि शायद सभी मूर्तियां खंडित थीं. किसी की बाँहें टूटी हुई थीं, किसी का सिर नहीं था, किसी की कमर के नीचे का पूरा हिस्सा गायब था.
    लोग मानते थे कि इस जगह पर पहले कोई किला था. यहाँ कोई राजा रहता था. कुछ लोग कहते थे कि अज्ञातवास के समय पांडव यहीं आकर छिपे थे. जो भी रहा हो, लेकिन किले की दीवारों के चिह्न अब भी मौजूद थे.
    अक्सर पत्थर पर बनी ये स्त्रियां या देवियाँ गांव के किसी आदमी से रात में कहती थीं कि तुम नाले के किनारे के फलां पेड़ के नीचे जाकर ज़मीन को खोदो. तुम्हें राजा का गड़ा हुआ खज़ाना मिलेगा.
    लोग सब्बल, गैंती या कुदाल लेकर जाते, ज़मीन को खोदते तो वहां से ये मूर्तियां निकलने लगतीं. सब्बल या कुदाल की फाल की चोट खाकर ये मूर्तियां खंडित हो जातीं. खजाने के लालच में गांव और आसपास के इलाके के लोगों ने तमाम सुन्दर स्त्रियों, यक्षिणियों और देवियों के हाथ, पांव, सिर, कमर तोड़ डाले थे. हर सुन्दर स्त्री का अंग भंग हो चुका था. अब अगर वे जिंदा भी होतीं तो उनका धड़ अधूरा ही रहता.
    हमारे गांव में चारों तरफ ऐसी मूर्तियां बिखरी हुई थीं. वे खेतों में से जुताई करते वक्त हल से टकराकर निकल आतीं. कोई कुआँ खोदता या घर बनाने के लिए नींव खोदता, तो वे वहां से निकल आतीं. कहते हैं, एक पंडित को, जो बहुत ज्योतिष-पंचांग जानता था, बड़ के पेड़ के नीचे खोदने से मिटटी का एक मटका मिला था, जिसमें सोने के गहने थे. लेकिन वह पंडित उसी दिन पागल हो गया था और उसने वह मटका कहाँ रख दिया, कोई नहीं जानता. पंडित अब बूढ़ा और काला हो गया है. वह रेल की पटरियों के किनारे पड़े कोयलों के ढेर में कुछ खोजता रहता है. उसने मटके को किसी रेलगाड़ी में रख दिया होगा. वह खुद उतरकर केले खरीदने या नल पर हाथ-मुंह ढोने गया होगा और वह गाड़ी छूट गई होगी.
    …………..
    मई १९६४ में मेरी उम्र ११-१२ साल रही होगी. मैं उस समय रायबरेली से हमारे गांव आई एक अपनी उम्र की लड़की से प्यार कर रहा था. उस लड़की को साइकिल चलानी नहीं आती थी, तैरना नहीं आता था, पेड़ों पर चढ़ना नहीं आता था और वह गाय-बैल, कुत्तों, सियार और अँधेरे से बहुत डरती थी. जबकि वह शहर की थी. वह उतना तेज दौड़ भी नहीं सकती थी और उसके पैर के तलवे बहुत कमज़ोर थे. सैंडिल के बिना उसके पैरों के लिए सारी पृथ्वी काँटों से भरी थी.
    मई गर्मियों का महीना होता था. बैशाख-जेठ का. जब घर के सारे लोग दोपहर का खाना खाकर सो जाते थे, तो हम दोनों बाहर के मैदान में साइकिल चलाया करते थे.
    उसे साइकिल में बिठाकर किसी ढलान पर ले जाकर मैं साइकिल को धकेल देता और फिर उसके साथ-साथ दौड़ता. मैं जानता रहता था कि गिरेगी ज़रूर. यही मैं चाहता भी और यही होता भी. मेरे छोड़ते ही वह साइकिल के साथ डगमगाती, डर के मारे उसका संतुलन बिगड़ता और वह ब्रेक को भूलकर साइकिल से छुटकारा पाने की कोशिश में लग जाती. कितनी बुद्धू लड़की थी वह, जो चलती हुई साइकिल की रफ़्तार पर बैठकर उसी साइकिल से स्वतंत्र होने की कोशिश करती थी.
    मैं उसे कभी गिरने नहीं देता. मैं रहता ही इस फिराक में था. गिरने से ठीक पहले मैं उसे उठा लेता और थोड़ी देर बाद उसे ज़मीन पर खड़ा करता. फिर हम दोनों हंसा करते. मैं उसके डर पर हँसता था और उसकी स्वतंत्रता की ऐसी कोशिश पर, और वह किस बात पर हँसती थी, यह मैं आज भी नहीं जानता.
    उस उम्र में यह कह पाना संभव नहीं था, लेकिन इस उम्र में मैं बहुत विश्वसनीय ढंग से कह सकता हूँ कि मैं उस लड़की से वास्तव में प्यार करता था. वह भी मुझसे प्यार करती थी, उसका पता मई की दोपहर की लू और आंच में झुलसते उसके शरीर को देखकर चलता था. अगर वह मुझसे प्यार न करती होती तो ज़रूर कभी कहती कि ‘बहुत गर्म आग जैसी लू चल रही है, अब यह साइकिल वाला खेल बंद करते हैं.’ या ‘यह क्या पागलपन है. इत्ती दोपहर को कोई साइकिल चलाने घर से बाहर निकलता है.’
    मैं देखता था कि वैशाख-जेठ की धूप में उसका शरीर धीरे-धीरे पकने लगता. लू कुछ ही देर में उसके चेहरे को बैंगनी बना डालती. या शायद ताम्बे के रंग जैसा. उसकी सैंडिल कि बद्धी कई बार टूट जाती, जिसमें वह अपनी फ्रॉक के पता नहीं किस कोने में छिपी हुई आलपिन लगा लेती. मैं यह भी जानता था कि इतनी गर्म दोपहर में साइकिल का लोहे का फ्रेम भी कितना गर्म हो जाता होगा.
    लेकिन शायद मेरी इच्छा की खुशी में, मई की लपटों के भीतर साइकिल चलाती वह लड़की खुश थी.
    वह अपने अनजाने में मेरे भीतर के देवता के लिए तपस्या कर रही थी और भविष्य में उस विशालकाय बोझ को ढोने के लिए अपने शरीर को पका रही थी.
    यही था हम दोनों के ११ साल की उम्र में किये गए प्यार का सबूत.
    लेकिन बात पंडित जवाहरलाल नेहरु की हो रही थी.
    हम लोग उस नाले के किनारे थे और मैं उस लड़की के साथ यक्षिणियों और स्त्रियों की खंडित मूर्तियां देख रहा था. मैं उन यक्षिणियों के सुन्दर शरीर के उन हिस्सों को लड़की को दिखाना चाहता था, जिनके बारे में मेरा विश्वास था कि वे हिस्से लड़की के भविष्य में उसके लिए रखे थे. उसे स्वयं एक दिन यक्षिणी या देवी हो जाना था.
    मैं प्रार्थना करना चाहता था कि यह लड़की पत्थर की न हो जाए और किसी खजाने की खोज में लगे आदमी की कुदाल या सब्बल की चोट से खंडित न हो जाए.
    इसी समय हमारा एक नौकर साइकिल पर वहां आया और उसने मेरी ओर देखते हुए कहा: ‘नेहरूजी मर गए हैं.’
    मैं जानता हूँ यह वाक्य उसने मुझसे ही कहा था. पिताजी ने उसे मुझे बुला लाने के लिए भेजा होगा. लेकिन उसने यह वाक्य कहना ज़रूरी समझा. मेरे और नेहरूजी के बीच जो सम्बन्ध था, उसके बारे में वही नहीं, मेरे घर के सारे लोग जानते थे. मैं नेहरूजी के चित्र बनाया करता था. सनलाइट साबुन के टिक्के को काटकर मैंने उनके प्रोफाइल का कट आउट निकाला था, जो मेरी मेज़ पर हमेशा रखा रहता था. नेहरूजी का निचला होंठ ज़रा-सा बाहर निकला रहता था और उनकी लंबी नाक के नथुनों के ठीक बगल से, होंठों के दोनों ओर दो रेखाएं जाती थीं. मैं अपनी स्लेट पर बत्ती से उनका प्रोफाइल आधे मिनट से भी कम समय में बना डालता था.
    मुझे नौकर की बात पर विश्वास नहीं हुआ. ऐसा कैसे हो सकता था. यह असंभव था. मैंने घर लौटने की जिद पकड़ ली. वह लड़की मेरे कन्धों को सहला रही थी. मैं बिना पिताजी से पूछे इस खबर को सच नहीं मान सकता था.
    ….
    जब हम घर लौटे तो शाम हो चुकी थी. पेड़ों की छायाएं गायब हो चुकी थीं. लालटेनें जला ली गई थीं. पिताजी रेडियो सुन रहे थे. उनके साथ पांच-छह लोग और बैठे थे. सब एकदम चुप थे. जो लोग वहां मौजूद थे, उनमें इलाहाबाद का जौहरी पन्नालाल भी था. उसका एक पाँव टेढा था. वह अपने बालों में खिजाब लगाता था और उसका चेहरा हूबहू देवानंद की तरह था. वह पुराने राजघराने में गहने वगैरह बनाने का काम करता था. उसने शादी नहीं की थी. वह किस्से सुनाता था कि प्रभुदत्त ब्रह्मचारी और करपात्रीजी को नेहरूजी कैसे चुनावों में हराते थे.
    वह बताता था कि नेहरूजी को जब गुस्सा आता था तो वह रुई का ताकिया उठाकर मारते थे. उसी ने कहा था कि नेहरूजी धोखा खा जाने के कारण दिमाग की धमनी फट जाने से मरे हैं.
    मैंने देखा कि पन्नालाल रो रहा था. फिर मैंने लालटेन की मद्धिम रौशनी में पिताजी को देखा. वह रेडियो सुनते हुए लगातार मेरी ओर पता नहीं कबसे देखे जा रहे थे. उनकी आँखें दबदबा रही थीं. वह गांधीजी और सर्वोदय के आदमी थे, लेकिन राजघराने के थे. रेडियो कह रहा था कि रूस के राष्ट्रपति ख्रुश्चोव नेहरूजी की तस्वीर को पकड़कर रो रहे थे. उन दिनों रेडियो में देवकीनंदन पांडे समाचार बोला करते थे. लोगों ने बताया कि समाचार बोलते हुए वह भी रोने लगे थे. यह अस्वाभाविक बिलकुल भी नहीं था.
    मैं अगर आज की उम्र में होता तो कहता कि यह उनके प्रोफेशन के लिहाज से भी गलत नहीं था.
    दरअसल मैं यह कहना चाहता हूँ कि लालटेन की मद्धिम रौशनी में या अँधेरे में या कोई चित्र पकड़कर रोना कभी भी गलत नहीं होता. यह एक सिद्धांत जैसी बात है.
    मुझे अब लगता है कि नेहरूजी के साथ मेरे संबंधों के पीछे शायद नदियों के रहस्य वाली बात भी रही होगी. जब उनकी वसीयत अखबारों में छपी तो मैंने देखा कि उसमें उन्होंने गंगा नदी के बारे में एक पूरा पैराग्राफ लिखा हुआ था. उस पैराग्राफ के बारे में अब हर कोई जानता है, जिसमें रात में चाँद की रौशनी में अकेली बहती हुई गंगा के रहस्य और उसके जादू के बारे में ज़िक्र है.
    यह भी हर कोई जानता है कि नेहरूजी ने कहा था कि मेरी राख का एक हिस्सा गंगा में बहा दिया जाए. अगर नेहरूजी प्रधानमन्त्री न होते और हमारे गांव के आसपास कहीं पैदा हुए होते तो मैं उनसे जंगली पहाड़ी नालों और अपने गांव की नदी के बारे में निश्चित ही बहुत-सी बातचीत मैं कर सकता था.
    वह लड़की इसके बाद रायबरेली चली गई. मैंने उस दिन के बाद से उसे साइकिल सिखाना बंद कर दिया था. उसने भी इसके लिए मुझसे एक बार भी नहीं कहा था.
    हाँ, एक बार जब हम दोनों बरामदे में वैसी ही दोपहर को खाट में यों ही लेते हुए थे, तब उसने पूछा था कि ‘क्या तुमने और चित्र बनाये हैं?’ मैंने उसे इन दिनों के बनाये चित्र दिखाए. एक चित्र में नेहरूजी पीछे हाथ बंधे अस्ताचल की ओर जा रहे थे. उसने कहा, ये वाली तस्वीर दीवार पर बना दो.
    मैंने कोयले, पीली मिटटी और गेरू से वैसा ही चित्र दीवार पर बना दिया. मैंने अभी दो साल पहले तारिक अली की किताब में पढ़ा कि नेहरूजी बचपन में सपने में उड़ा करते थे.
    मैं, छब्बीस साल हो गए, उस लड़की से कभी नहीं मिल पाया. छब्बीस नहीं, शायद अट्ठाईस साल हो गए हैं.
    लेकिन अट्ठाईस साल तक किसी लड़की से न मिलने से भी आखिर फर्क क्या पड़ता है?
    यह ज़रूर पता चला कि उस लड़की ने इतिहास में एम.ए. किया. वह हमेशा फर्स्ट आती रही. फिर उसने प्यार किया. इसके बाद वह बीमार हो गई. यह भी पता चला कि वह सिगरेटें पीने लगी थी, और बहुत दुबली हो गई थी.
    यह भी पता चला कि उसने कई बार लोगों से मेरे बारे में पूछा है. वह मेरी जानकारियां रखती है.
    मैं उसे दीवार पर बने नेहरूजी के उस चित्र को एक बार फिर दिखाना चाहता हूँ. इसके बाद मैं उसे यह भी बताऊंगा कि मैं बुद्ध के चित्र कितनी ज़ल्दी बना लेता हूँ.
    मैंने यह भी सोच रखा है कि हम दोनों अपनी-अपनी साइकिलों पर बैठकर यक्षिणियों को देखने उस नाले पर जायेंगे.
    यह भी एक नियम है कि साइकिल चलाना सीख लेने के बाद उसे भुला पाना लगभग नामुमकिन है. यही सिद्धांत का सबसे दारुण पक्ष है.
    मैं शायद खंडित मूर्तियों, नेहरूजी और अस्ताचल की बात कर रहा था.  

    ‘और अंत में प्रार्थना’ से साभार        

    Related Posts

    Драгон Мани: Мифический Зверь и Реальные Выигрыши

    June 20, 2026

    Tropicana Online casino Nj Applications on the internet Gamble

    June 19, 2026

    Regulamentação do jogo como a lei pode impactar apostadores e operadores

    June 19, 2026
    View 5 Comments
    Leave A Reply Cancel Reply

    Recent Posts

    • Драгон Мани: Мифический Зверь и Реальные Выигрыши
    • Tropicana Online casino Nj Applications on the internet Gamble
    • Regulamentação do jogo como a lei pode impactar apostadores e operadores
    • Najkorzystniejsze automaty online Graj po slot urządzenia vinyl kasyno bezpłatnie
    • Ultimat Casinon Utrike 2026

    Recent Comments

    No comments to show.
    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
    Facebook X (Twitter) Instagram Pinterest Vimeo YouTube
    © 2026 jankipul. Designed by jankipul.

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.