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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    पटाक्षेप अभी नहीं

    By August 22, 201010 Comments5 Mins Read

    कवि-आलोचक, प्रतिलिपि.इन के संपादक गिरिराज किराड़ू ने आज जनसत्ता में प्रकाशित अपने लेख में कुलपति-नया ज्ञानोदय प्रकरण और उसके प्रति लेखक समाज की नाराज़गी की प्रकृति, उसमें अन्तर्निहित पहलुओं को बड़े वैचारिक परिप्रेक्ष्य में देखा है. साथ ही, कुछ ऐसे ज़रूरी सवाल इस लेख में उठाये गए हैं जिनके जवाब से कुछ संस्थाओं तथा उसके निर्णयकर्ताओं की विश्वसनीयता जुड़ी हुई है- जानकी पुल.

    कुलपति-नया ज्ञानोदय प्रकरण में हिंदी समाज के बारे में कई धारणाएं टूट रही हैं। हिंदी लेखक अपनी वैचारिक, सांगठनिक और निजी निष्ठाएं पीछे छोड़ कर एक हुए हैं। पहली बार हिंदी में ऐसी कोई सूची बनी है, जिसमें सब तरह के वामपंथी, ‘कलावादी’ और मध्यमार्गी एक साथ हैं। यह मिथक भी अंतत: टूट रहा है कि हरेक विरोध के निहित स्वार्थ न सिर्फ होते हैं, बल्कि वही सर्वोच्च और निर्णायक होते हैं। और दो व्यक्तियों की अपरिहार्य केंद्रीयता के बावजूद समूचा विरोध पर्याप्त वस्तुपरक रहा है और उसकी भाषा अधिकांशत: ‘संसदीय’ रही है।

    लेकिन अब भी इस संघर्ष को कुछ हलकों में अगर ‘निहित स्वार्थों’ का संघर्ष बताया जा रहा है तो पूछा जाना चाहिए कि के सच्चिदानंदन, नवनीता देवसेन, न धो मनोहर, नमिता गोखले, मुकल केशवन, उर्वशी बुटालिया, चंद्रकांत पाटील, महेश एलकुंचवार, मीरा देसाई, शीन काफ निजाम से हिंदीतर लेखकों के क्या निहित स्वार्थ हैं?

    हिंदी लेखकों के बारे में भी ऐसा कहा जाना एक रणनीतिक युक्ति से अधिक क्या है, जब कृष्णा सोबती, मैत्रेयी पुष्पा या अनामिका की तरह बड़ी संख्या में स्त्री लेखकों के साथ कुंवर नारायण, कृष्ण बलदेव वैद, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, गिरिराज किशोर,

    ज्ञानरंजन, महेंद्र भल्ला, चंद्रकांत देवताले, काशीनाथ सिंह, रमेशचंद्र शाह, विष्णु खरे, कमला प्रसाद, नंदकिशोर आचार्य, वीरेन डंगवाल, ऋतुराज, राजेश जोशी, प्रयाग शुक्ल, असद जैदी, पंकज सिंह, विष्णु नागर, कुमार अंबुज आदि दो सौ से ज्यादा लेखक प्रतिरोध की अभिव्यक्ति में शामिल हैं! कुंवर नारायण ने लेखकीय आचरण की मिसाल कायम की है और मानता हूं कि अनेक मंचों और मोर्चों पर संघर्ष कर रहे समस्त लेखकों-कलाकारों में हर एक में कुंवरजी का कोई अंश है।

    यह मामूली बात नहीं कि विभूति-कालिया की विदाई की मांग करने वालों का दायरा भाषाई सीमाएं ही नहीं, भौगोलिक दूरियां भी पाट गया है। उस सूची में दिल्ली के अलावा, मुंबई, कोलकाता, चंडीगढ़, इलाहाबाद, लखनऊ, बनारस, पटना, देहरादून, जबलपुर, भोपाल, नागपुर, पुणे, जयपुर, जोधपुर, रायपुर, नैनीताल आदि से लेकर दुर्ग और अयोध्या तक के लेखक सम्मिलित हैं। उसमें ज्ञानपीठ, कबीर, सरस्वती और शिखर सम्मान पाने वाले लेखक हैं तो साहित्य अकादेमी, मूर्तिदेवी और बिहारी पुरस्कार पाने वाले भी।

    निश्चय ही एक सूची विभूति-कालिया के पक्षधरों ने भी जारी की है। लेकिन अव्वल तो वह किसी विचार का समर्थन नहीं करती; उसका अभीष्ट कुछ लेखकों के ‘आक्रमण’ पर क्षोभ और असहमति प्रकट करना भर है – ‘कुछ रचनाकारों द्वारा एक संचार पत्र समूह विशेष में लगातार गरिमाहीन आक्रमण से हम सभी रचनाकार क्षुब्ध अनुभव कर रहे हैं और अपनी असहमति व्यक्त कर रहे हैं।’’ दूसरे, यह सूची ज्ञानपीठ में काम कर चुके कुणाल सिंह के व्यक्तिगत ब्लॉग पर शाया हुई है। इसे तैयार करने में ज्ञानपीठ में काम कर रहे रवींद्र कालिया के सहयोगी भी सक्रिय रहे हैं। उस सूची को पूर्णतया विश्वसनीय भी नहीं माना गया है। उसमें महाश्वेता देवी का नाम भी है, जो सार्वजनिक रूप से राय की निंदा कर चुकी हैं।

    कुछ लेखकों ने कहा है कि उनके नाम अनुमति के बगैर जोड़ लिये गये, जैसे उषाकिरण खान या मृदुला गर्ग के नाम। मृदुला गर्ग ने तो ‘तहलका’ में इस प्रकरण पर कड़ी टिप्पणी भी लिखी है। और तो और, विभूति और रवींद्र कालिया के पुराने मित्र गंगा प्रसाद विमल ने भी इस सूची से अपने को अलग कर लिया है। इसके अलावा यह सच अपनी जगह है कि राय-कालिया के करीबी समझे जाने वाले लेखक खुल कर उनका पक्ष नहीं ले पा रहे हैं। कुछ का आसान तर्क यही है कि जो हुआ गलत हुआ, अब माफी मांग ली है तो विरोध भी बंद करो।

    जो हो, बेशक साहित्य जगत में विभूतिनारायण राय या रवींद्र कालिया के वक्तव्यों से इत्तेफाक रखने वाले अनेक लोग मौजूद हैं। मगर यह वक्त ही तय करेगा कि सच्चाई और नैतिकता का दामन किनके हाथ था। पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि मामले का पटाक्षेप हो गया है। अव्वल तो यही कि माननीय राष्ट्रपति महोदया से लेखकों की मुलाकात और ज्ञानपीठ न्यास की बैठक के नतीजे अभी आने बाकी हैं। और जैसा कि अपने विवादास्पद लेख में विष्णु खरे ने कहा है, यह संघर्ष सिर्फ सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रह जाना चाहिए। उनके लेख की इस सबसे सार्थक बात का पाठ यह किया जाना चाहिए कि अगर बर्खास्तगी न हो तो आने वाले दिनों में साहित्य में ऐसी गुटबाजियां, मिलीभगत और गुपचुप कारगुजारियां नहीं चलने दी जाएं। अगर बर्खास्तगी की मांग का ‘वामपंथी’ तरीका कामयाब नहीं होता है तो वर्तमान कुलपति और निदेशक संपादक के बने रहने तक दोनों संस्थाओं से असंबद्धता का ‘गांधीवादी’ तरीका अपनाया जाना चाहिए। आखिर लेखकों का इतना व्यापक समुदाय इसीलिए एक मंच यानी एक मांग पर इकट्ठा हुआ है।

    मामले का पटाक्षेप इसलिए भी नहीं हो गया है कि कुलपति की तरह रवींद्र कालिया की माफी भी व्यापक हिंदी समाज को अस्वीकार्य है। भारतीय ज्ञानपीठ ने राय को अपने अतिसम्मानित पैनल से हटाने और विवादास्पद अंक की प्रतियां बाजार से वापस लेने के दो महत्त्वपूर्ण निर्णय लिये हैं। इस पर न्यास की मुहर लगना भले बाकी हो, पर इससे संस्थान ने हिंदी समाज में उम्मीद जगायी है। यह कोशिश खोती साख बचाने के लिए फौरी तौर पर की गयी लीपापोती साबित नहीं होनी चाहिए। संस्था द्वारा रवींद्र कालिया पर कोई कार्रवाई न करना हैरान करता है। जिस मुद्दे पर कुलपति जैसे पद पर आसीन विभूतिनारायण राय को हटाया जा सकता है, उसी मुद्दे पर रवींद्र कालिया को पदमुक्त क्यों नहीं किया जा सकता? क्या ज्ञानपीठ की नजर में अपने ख्यातिप्राप्त पुरस्कार की प्रवर समिति की सदस्यता संस्था की पत्रिका की संपादकी से कम प्रतिष्ठाजनक है?

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