आज तुषार धवल की कविताएँ. तुषार की कविताओं में न विचारधारा का दबाव है, न ही विचार का आतंक. उनमें सहजता का रेटौरिक है. अपने आसपास के जीवन से, स्थितियों से कविता बुनना- वह भी इतनी सूक्ष्मता से, कोई उनसे सीखे. यहाँ उनकी कुछ नई कविताएँ हैं- जानकी पुल.
1. विदुर सा खड़ा हूँ
विदुर सा खड़ा हूँ
हस्तक्षेप में
हाशिये पर मेरी आवाज़ घुट रही है.
निजी प्रतिबद्धताओं से सम्मोहित
बेमतलब हैं
सभी योद्धा
सत्य बेचारा लाचार खड़ा है
आज भी
हस्तिनापुर में
यह रण है नीतियों से अलग
बस पा लेने के
इस युद्ध में
बलि किसकी
यह निरर्थक
स्वार्थ का अपना ही युगधर्म है.
तुम्हारे मगध में भी
एक कलिंग होता है
चन्द्रगुप्त !
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2.
अब लिखता हूँ पराजय !
अब लिखता हूँ पराजय !
कठिन था सफ़र
ये पत्थर बिखरे ही रह गए
इनसे बहुत कुछ गढ़ना था
सब छूट गया
बाकी बिछड़ गए
बस एक कोलाहल है जो
मेरे पीछे चला आता है
यह काल यात्रा हजारों मील की
यह हजारों कान में उतरती आवाजें
तलवों में सिमटती परछाईं यह धूप में
देखता हूँ
शैतान की राह आकर्षक और सरल होती है
पिछली मृत्युओं से निकल कर
अगली मृत्युओं का वरण
इस काल खंड पर दस्तक भर है
जीवन —-
एक कल्पित देश काल की खोज सिर्फ
सब सापेक्ष दीखा इस जगत में
अपनी अपनी गतियों और धुरियों के
अंतर्जाल में
अपनी गत्य–मंथर लय में पाया विश्व
सत्त्व किन्हीं दुर्गम शिलाओं के पार था
जहाँ फिर कोई नहीं आया
ईसा तुम्हारी संतानें वैसी ही हैं अभी भी
अपनी भेड़ बकरियां गिनती
और रौशनी बीत जाती है
बुद्ध तुमने क्या कहा था ?
तुम्हारी प्रतिमाओं में हमने मार डाला तुम्हें
मुमकिन है फिर आओ संसार में
पर तब तुम्हारे संधान अलग होंगे
तुम्हारी यात्राओं पर मेरी भी धूल होगी
धरता हूँ
धूल सनी इस देह को
किसी अँधेरे कोने में
रखी रहने दो लालटेन
मेरे पन्नों पर
उन पर कुछ नक़्शे हैं
अगली कई यात्राओं के .
3.
आधी रात बाद कमोड पर
आधी रात बाद
बाथरूम में कमोड पर बैठा हूँ
एक चाइनीज़ बल्ब दूधिया प्रकाश दे रहा है
टाइल्स पर नमी बढ़ गयी है
काई के चित्ते भी उभर आये हैं
पत्नी सो रही है और सोच रहा हूँ —
यही सबसे महफूज़ जगह है
होने की
इसी वक़्त मैं पूरा का पूरा होता हूँ
सोपकेस में रखा साबुन गीला–गीला
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