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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.
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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    उनके लिए साहित्य मिशन था प्रोफेशन नहीं

    By January 24, 20112 Comments5 Mins Read

    आज आधुनिक हिंदी-साहित्य के निर्माताओं में अग्रगण्य शिवपूजन सहाय की ग्रंथावली का लोकार्पण है. शिवपूजन सहाय हिंदी के वैसे लेखक-संपादक थे जिनके लिए साहित्य मिशन था प्रोफेशन नहीं. ऐसे विभूति की रचनाओं से गुज़रना हिंदी साहित्य के उस दौर से गुज़रना है जिस युग में हिंदी के क्लैसिक्स लिखे जा रहे थे, उसका आधार तैयार हो रहा था. अनामिका पब्लिशर्स से १० खण्डों में प्रकाशित इस ग्रंथावली का संपादन किया है मंगलमूर्ति जी ने- जानकी पुल.

    आचार्य शिवपूजन सहाय का जन्म भोजपुर अंचल के गांव उनवांस (इटाढ़ी प्रखंड, जिला बक्सर) में 9 अगस्त, 1893 को एक मध्यवित्त कृषक परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री वागीश्वरीदयाल आरा के एक जमींदार के पटवारी थे। सहायजी की प्रारंभिक शिक्षा गांव की पाठशाला में हुई। लगभग दस वर्ष की उम्र में इनका नाम आरा के स्कूल के.जे. एकेडमी में लिखाया गया जहाँ से 1913 में उन्होंने प्रवेशिका परीक्षा पास की और लगभग इसी समय से उनके साहित्यिक जीवन का प्रारंभ हुआ। आरा उन दिनों भी बिहार में साहित्य और संस्कृति का एक प्रमुख केन्द्र था। आरा की नागरी प्रचारिणी सभा हिंदी की प्राचीनतम संस्थाओं में रही है। श्री शिवनंदन सहाय, पं. सकलनारायण शर्मा, पं. ईश्वरी प्रसाद शर्मा
    आदि बहुश्रुत विद्वान हिन्दी को इसी संस्था की देन हैं। इसी संस्था ने शिवपूजन सहाय के साहित्यिक जीवन में नींव के पत्थर का काम किया।
    आर्थिक कठिनाइयों के कारण स्कूल छोड़ते ही इन्हें कुछ दिन बनारस की कचहरी में नकलनवीसी करनी पड़ी, पर शीघ्र ही इनको अपने स्कूल में ही अध्यापक-पद मिल गया जिसका परित्याग इन्होंने गांधीजी के असहयोग आंदोलन में किया और कुछ दिन वहीं के एक राष्ट्रीय विद्यालय में अध्यापक रहे। इन दिनों गाँव-गाँव में जाकर इन्होंने कांग्रेस का प्रचार-कार्य भी किया। 1921 में शिवजी कलकत्ता चले गये जहाँ अगले कई वर्षों तक ‘मारवाड़ी सुधार’, ‘मतवाला’, ‘समन्वय’, ‘आदर्श’, ‘मौजी’, ‘गोलमाल’, ‘उपन्यास तरंग’ आदि साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन करते हुए वे हिंदी जगत में एक आदर्श संपादक एवं भाषा के आचार्य के रूप में सुविख्यात हो गये। इसी अवधि में भोजपुर-अंचल के ग्राम्य जीवन पर आधारित उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ प्रकाशित हुआ जिसे हिंदी का पहला आंचलिक उपन्यास माना गया है। इन्हीं दिनों उनकी कहानियों का संग्रह ‘विभूति’ भी प्रकाशित हुआ जिसकी कतिपय कहानियां ‘मुंडमाल’, ‘कहानी का प्लॉट’ आदि हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में परिगण्य मानी गई हैं।
    पत्राकारिता के प्रति शिवजी का यही समर्पण-भाव उन्हें कलकत्ते से खींचकर लखनऊ ले गया जहां ‘माधुरी’ के संपादन-काल में उन्होंने प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास ‘रंगभूमि’ तथा उनकी कई कहानियों का भाषा-संस्कार संपन्न किया। फिर 1926 से वे बनारस चले आये, और वहीं से एक वर्ष (1931) के लिए वे ‘गंगा’ का संपादन करने सुलतानगंज (बिहार) गये। किंतु पुनः 1932 में काशी से प्रकाशित पाक्षिक ‘जागरण’ के संपादक रहे, जिसका संपादन उनके बाद प्रेमचन्द ने संभाला। काशी से अंततः वे लहेरियासराय ‘पुस्तक भंडार’ में आ गये, जहां भी उन्होंने अनेक प्रसिद्ध हिंदी लेखकों एवं कवियों की रचनाओं की भाषा को संस्कार प्रदान किया। वहां लगभग 5–6 वर्ष व्यतीत करने के बाद उन्हें राजेन्द्र
    कॉलेज, छपरा में हिंदी-प्राध्यापक का पद ससम्मान प्रदान किया गया। छपरा में लगभग 10 वर्ष प्राध्यापन करने के बाद अंततः 1950 में वे पटना चले आये जहां बिहार सरकार द्वारा नव-स्थापित बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के प्रथम संचालक नियुक्त किये गये। इससे कुछ वर्ष पूर्व कॉलेज से अवकाश लेकर उन्होंने पटना से प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका ‘हिमालय’ का संपादन किया था जो अपने समय की हिंदी की अन्यतम साहित्यिक पत्रिका मानी गई। परिषद् संचालक के रूप में सहायजी ने हिंदी की जैसी सेवा की, और उन्हीं दिनों बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के मुखपत्र ‘साहित्य’ का आचार्य नलिनविलोचन शर्मा के साथ जैसा मानक संपादन किया उससे हिंदी सेवा का एक अप्रतिम कीर्तिमान स्थापित हुआ जो संपूर्ण हिंदी जगत के लिए गौरव का विषय है।
    सहाय जी का निधन 21 जनवरी, 1963 को पटना में हुआ। इससे पूर्व 1960 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया था। 9 अगस्त, 1961 को उनकी 69वीं वर्षगांठ के अवसर पर पटना नगर निगम द्वारा उनका सम्मान किया गया था, तथा मार्च, 1962 में श्रीजयप्रकाश नारायण, श्री दिनकर एवं श्रीलक्ष्मीनारायण सुधांशु के साथ ही भागलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट् की मानद उपाधि प्रदान की थी। हिंदी-भाषा और साहित्य के प्रति शिवजी का अवदान अत्यंत विपुल, बहुआयामी तथा महार्घ है। उनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण अवदान हिंदी गद्य के विकास में माना जायगा। उनके द्वारा संपादित विशेष महत्वपूर्ण ग्रंथों में राजेन्द्र बाबू की ‘आत्मकथा’, ‘द्विवेदी
    अभिनन्दन ग्रंथ’, ‘राजेन्द्र अभिन्दन ग्रंथ’, ‘जयंती स्मारक ग्रंथ’, ‘बिहार की महिलाएं’ आदि हैं। किन्तु उनके द्वारा संपादित सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् द्वारा कई खंडों में प्रकाशित ‘हिंदी साहित्य और बिहार’ नामक ग्रंथ है, जिसकी न केवल मूल परिकल्पना उनकी थी, वरन् जिसका संपूर्ण सम्यक संपादन भी उन्होंने अपने जीवनकाल में ही लगभग पूरा कर लिया था। 77 साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनकी सेवा अप्रतिम है। तीसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र कथा साहित्य का है, जिसमें उनका उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ हिंदी के प्रथम आंचलिक उपन्यास
    के रूप में सर्वमान्य है। उसी प्रकार उनकी कहानी, ‘कहानी का प्लॉट’ को शिल्प एवं भाषा शैली की दृष्टि से हिंदी-कहानी के विधागत विकास में एक क्रोशशिला का स्थान प्राप्त है। चतुर्थतः, मानक संपादन एवं भाषा-परिष्कार के क्षेत्रा में भी शिवजी का योगदान अद्वितीय माना गया है। दूसरों की रचनाओं एवं पुस्तकों के संशोधन-परिष्कार में शिवजी ने हिंदी की जैसी सेवा की है, वह अब सदा के लिए अतुलनीय एवं महनीय बनी रहेगी। साहित्यिक निबंध, संस्मरण

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