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    जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.जानकी पुल – A Bridge of World's Literature.

    एक महाशय जो फिल्म-निर्देशक बन गया.

    By May 24, 20119 Comments4 Mins Read

    आज मिलते हैं हाल में ही कांस फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई विवादस्पद फिल्म ‘माई फ्रेंड हिटलर’ के डायरेक्टर राकेश रंजन कुमार से, जिनको दोस्त प्यार से महाशय बुलाते हैं. मुंबई में रहने वाले महाशय वैसे तो रहने वाले बिहार के हैं, लेकिन उनके सपनों की उड़ान में दिल्ली शहर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है- जानकी पुल.


    जबसे ‘हिटलर माई फ्रेंड’ फिल्म की घोषणा हुई है किसी न किसी कारण से वह लगातार चर्चा में बनी रही है. फिल्म के युवा निर्देशक हैं राकेश रंजन कुमार. दरभंगा के मनीगाछी के रहने वाले इस निर्देशक को लंबे संघर्ष के बाद यह अवसर मिला है. १९९८ में जब मुंबई के लिए दिल्ली छोड़ा था तो आँखों में एक सपना था. कुछ सपने कभी-कभी देर से भी पूरे हो जाते हैं, बशर्ते आप उनमें यकीन करते रहें.
    दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से पढ़ाई करने वाले राकेश ने दिल्ली में करीब १० साल तक थियेटर किया है. हिंदू कॉलेज की नाट्य संस्था ‘इब्तिदा’ की बुनियाद इम्तियाज अली के साथ रखी, जो बाद में मशहूर फिल्म-निर्देशक बने. नाटकों के उस दौर को याद करते हुए दोस्तों के बीच ‘महाशय’ के नाम से जाने जाने वाले राकेश ने बताया कि उन लोगों ने उन दिनों नाटकों को फोक का टच देकर अपनी संस्था की एक अलग पहचान बनाई. फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘पंचलेट’ का नाट्य रूपांतर किया. बाद में ‘सखाराम बाइंडर’ किया. उन दिनों नेमिचंद्र जैन टाइम्स ऑफ इण्डिया में नाटकों पर लिखा करते थे. उन्होंने राकेश के निर्देशित नाटकों पर अपने स्तंभ में लिखा भी था. उन दिनों मिलने वाली ऐसी छोटी-छोटी प्रशंसाओं से अपने अभिनय, अपने निर्देशन पर पर विश्वास जगा.
    राकेश रंजन कुमार अभिनेता बनना चाहते थे, और आरम्भ में दिल्ली में भी उनकी पहचान अभिनय के कारण ही बनी, वे बेजोड़ हास्य-अभिनेता थे. गंभीर से गंभीर दृश्य में भी हास्य पैदा कर देना उनका  कौशल था.  लेकिन मुंबई जाने के बाद नाटकों से नाता टूट गया, टेलीविजन से नाता जुड़ा. राकेश ने कई धारावाहिकों में अभिनय किया, निर्देशन में हाथ आजमाया और डीडी के लिए एक धारावाहिक का निर्माण भी किया. राकेश का जीवन अपने आपमें सिनेमा की किसी कहानी से कम नहीं है. हिंदी साहित्य के गंभीर अध्येता राकेश का सपना सिनेमा लिखने का था, लेकिन हिंदी सिनेमा में लेखकों की जो हालत होती है उससे उनको यह बात अच्छी तरह समझ में आ गई कि भले मुम्बइया सिनेमा में कहानी को प्रमुखता दी जाती हो लेकिन कहानी लिखने वालों को नहीं. आज भी वहां पटकथा लेखकों की कद्र नहीं है, जलवा निर्देशकों का ही है. आज भी पटकथा लेखकों को बहुत कम भुगतान किया जाता है और अक्सर उसके पैसे ही सबसे पहले डूबते हैं.
    निर्देशन के अवसर मिल नहीं रहे थे लेकिन राकेश मुतमईन थे कि बनना तो निर्देशक ही है. बाद में उन्होंने टेलीविजन-सिनेमा के अपने अनुभवों को बाँटने के लिए एक मीडिया संस्थान में पढ़ाना भी शुरु कर दिया. सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था और इंतज़ार था उस सही अवसर का. आखिरकार वह अवसर आया ‘हिटलर माई फ्रेंड’ के रूप में. पहली फिल्म में ही राजनीति के एक विवादस्पद विषय पर काम करने के बारे उनका कहना है कि राजनीति हमारे अतीत को समझने में मदद करती ही है वर्तमान के उहापोहों से भी मुक्ति दिलाती है. हमारा समय पूरी तरह से राजनीति से ग्रस्त है. मीडिया ने राजनीति का विस्तार किया है, उसे ग्लोरिफाई किया है. इसलिए उनको लगता है कि यह राजनीति के विषयों को लेकर फिल्म बनाने का सही समय है. इसलिए उनको लगा कि अगर इस फिल्म पर काम किया जाए तो फिल्म चले न चले निर्देशक के रूप में उनका सिक्का तो जम जायेगा.
    इन दिनों ‘महाशय’ नई-नई पटकथाओं को देख रहे हैं और रिलेशनशिप को लेकर फिल्म बनाने की योजना बना रहे हैं, अगर सब कुछ थी-ठाक रहा तो. फिलहाल तो इंतज़ार है फिल्म के रिलीज होने का जिससे उनके सपने दर्शकों के सामने साकार हो पायें. वैसे यह उनके सपनों का पड़ाव हो सकता है मंजिल नहीं- बढ़े चलो कि वो मंजिल अभी नहीं आई…    

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